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भारतीय त्यौहार और भारतीय सामान : भारतीयता का उल्लासगान

 Indian Festivals and Indian Goods

बंकिम चंद्र रचित प्रसिद्ध गीत ‘वंदे मातरम्’ में एक पंक्ति है,

‘शस्य श्यामलां मातरम्’...
 

इसमें यह शस्य क्या है, शस्य है खेती..बंकिम जब भारत माता का वंदन करते हैं तो वे भारतमाता के सौंदर्य का भी वर्णन करते हैं। शस्य श्यामला दरअसल भारत माता के सौंदर्य का चित्रण है। कृषि की सघन हरियाली जब दूर-दूर तक फैले खेतों में जब दिखती है तो वह हरा नहीं, श्यामल यानी सांवली दिखती है। हमारी धरती माता खेती-किसानी के सौंदर्य से सदा ओतप्रोत रही है। भारतीय संस्कृति को शस्य संस्कृति इसीलिए कहा जाता है। भारत के सांस्कृतिक इतिहास को अगर हम पांच हजार साल का ही मान लें तो यह इतिहास एक तरह से कृषि केंद्रित संस्कृति का ही इतिहास है। हमारे अतीत में हमारी आर्थिकी भी हमारे संस्कृति की ही बुनियाद पर टिकी थी। यही वजह है कि हमारे के प्रमुख जितने भी त्यौहार हैं, सब कृषि आधारित त्यौहार है।

हमारे पारंपरिक त्यौहार हर बार अपने मौसम में बदलाव के साथ ही हमारी शस्य परंपरा की बुनियाद केंद्रित उत्सवधर्मिता को बढ़ाते रहे हैं। दीपावली को ही लीजिए। शायद ही कोई घर होगा, जो दीपावली पर दलिद्दर ना भगाता होगा,सफाई ना करता हो। इस साफ-सफाई की जरूरत क्यों पड़ती है? इसलिए कि जब दीपावली आती है, तब तक बरसात की विदाई हो चुकी होती है। बारिश के दिनों में घर, पड़ोस और बस्ती आदि में तमाम तरह के झाड़-झंखाड़ उग आते हैं। बारिश की वजह से मकान कई जगह से कमजोर हो चुका होता है। उसे मरम्मत और सफाई की जरूरत होती है। दीपावली पर सफाई की परंपरा दरअसल इसीलिए विकसित हुई है। दीवाली पर अक्सर मिठाइयां खाई-खिलाई जाती हैं। इसके पहले बरसाती मौसम की वजह से पाचन क्रिया कमजोर होती है। लेकिन दीपावली आते-आते शरद ऋतु आ जाती है। इस दौरान हाजमा मजबूत होने लगता है। दीपावली पर खाने-खिलाने की परंपरा दरअसल बदलते मौसम में खानपान मे बदलाव लाने का भी संकेत देती है। इस दौरान तक खेतों में धान की फसल तैयार हो जाती है। दीपावली पर खील और बताशे से महालक्ष्मी के पूजन की परंपरा है। खील भी नए धान से ही तैयार किया जाता है। दीपावली के छह दिनों बाद छठ होती है। छठ पर सूर्य की पूजा की जाती है। सूरज के बारे में भारतीय परंपरा मानती है कि उनकी ही वजह से मौसम बदलते हैं, बारिश होती है, धूप होती है, फसल तैयार होती है, फसल पकती है और फसल सूखाने के बाद घर लाई जाती है। छठ में जितने फल चढ़ाए जाते हैं, वे भी उस वक्त तैयार हुए फल ही होते हैं। भारतीय शकरकंद, सुथनी, अमरस, शरीफा, अमरूद, गन्ना, मूली, लौकी, कद्दू, नींबू आदि छठ की पूजा में इस्तेमाल होते हैं। आज कई सब्जियां और फल पूरे साल मिलते हैं। लेकिन छठ में ज्यादातर प्रयोग किये जाने वाले फल इसी मौसम में तैयार होते हैं। छठ में चिवड़ा भी चढ़ाया जाता है, वह भी नए धान का। ताजा आई फसल से इसे तैयार किया जाता है।

जिस तरह भारतीय त्यौहार भारतीयता और उसकी संस्कृति के प्रतीक हैं, ठीक उसी तरह इन त्यौहारों में भारतीय सामान ही इस्तेमाल लाए जाते हैं। जैसे दीपावली को ही लीजिए। भारत में मिट्टी से बने दीयों में तेल वाली बत्ती डालकर पूजा करने और दीप सजाने की परंपरा रही है। भोर में उत्तर भारत के घरों में दलिद्दर यानी गरीबी और दुख को दूर करने की कोशिश सूप को बजाकर किया जाता रहा है। यह बात और है कि आधुनिकता के चक्कर में पारंपरिक तेल वाले दीपक सिर्फ और सिर्फ प्रतीकात्मक रह गए हैं। उनका स्थान मोमबत्तियों और रंग-बिरंगी बिजली की लड़ियों ने ले लिया है। इसी तरह छठ में नया सुपली और डलिया तैयार करने और उन्हें ही सजाने की परंपरा रही है।

स्थानीय सामानों को बनाने और त्यौहारों में उनके इस्तेमाल का सामाजिक और आर्थिक महत्व रहा है। भारतीय परंपरा में लेन-देन का माध्यम पैसे या मुद्रा को बनाने का चलन पिछले चार-पांच दशकों में बढ़ा है। अन्यथा अनाज और कपड़े के जरिए ज्यादा लेनदेन होता रहा है। यहां तक कि ग्रामीण समाज में मेहनताना भी पैसे की बजाय अनाज या कपड़ा दिया जाता था। या जरूरी वस्तुओं का लेनदेन होता था। भारतीय त्यौहार दरअसल सामाजिक आर्थिकी को संतुलित करने का प्रयास हैं। जैसे दीपावली को ही लीजिए। दीपावली पर दीए कुम्हार बनाता था। उसे बदले में हर घर से लिए गए दीपों के एवज में अनाज और कपड़ा मिलता था। इसी तरह डलिया और सुपली बनाने वाले कुछ खास पारंपरिक परिवार होते थे। उनके बनाए ये सामान पूजा या पूजा के माध्यम के रूप में प्रयोग में लाए जाते थे। बदले में उन परिवारों को उन्हें पैसे की बजाय अन्न, कपड़ा या जरूरत की अन्य वस्तुएं दी जाती थीं।

भारत के बारे में जब हम कहते हैं कि भारतीय परंपरा खेती-किसानी की है तो इसका मतलब यह है कि भारतीय परंपरा में किसान सामाजिक धुरी होता था। वही सबसे पड़ा उत्पादक था। उसके बाद नंबर आता था शिल्पकार और कारीगर का। वस्त्र बनाना, घर बनाना, घर के उपकरण बनाना, काठ का काम करना, बाल बनाना, पानी भरना आदि-आदि काम समाज के तमाम वर्गों के लोग पारंपरिक रूप से करते थे। एक पीढ़ी अपनी आगामी पीढ़ी को अपना पुश्तैनी काम सिखाती थी और इसके जरिए शिल्प और पारंपरिक हुनर की परंपरा बढ़ती रहती थी। चूकिं त्यौहारों के जरिए इन हुनर को भी सम्मान और सहयोग मिलता था। भारतीय शादी और विवाह में भी देसी सामान का इस्तेमाल भी दरअसल इस पारंपरिक हुनर को ही बढ़ावा देने का ही एक सामाजिक इंतजाम है।

भारतीय त्यौहार हों या भारतीय शादी-विवाह हो, पूजा हो या संस्कार हो, भारतीय सामान, भारतीय खेती की उपज और भारतीय हुनर के इस्तेमाल की परंपरा रही है। एक तरह से कह सकते हैं कि भारतीय परंपरा, तीज-त्यौहार एक तरह से भारतीयता के उत्सव हैं, भारतीय आर्थिकी के विस्तार का त्यौहार हैं और भारतीय की उत्सवधर्मिता का त्यौहार हैं। इन त्यौहारों में इस्तेमाल होने वाले पारंपरिक भारतीय सामान सिर्फ सामान नहीं हैं, पूजा या परंपराओं को निभाने का जरिया भर नहीं हैं, बल्कि ये भारतीयता के सम्मान, भारतीय परंपरा के उल्लासमय स्मृति और पारंपरिक भारतीय आर्थिकी के प्रतीक हैं। ये सामान समरसता आधारित भारतीय समाज व्यवस्था के प्रतीक हैं। भारतीय समाज के हर अंग के सामाजिक सरोकार के साथ ही सहधर्मिता की भी ये याद दिलाते हैं। लेकिन दुर्भाग्यवश हम इन तथ्यों को या तो समझ नहीं पाते या भूल गए हैं। इसकी वजह से हम अपनी महान और उदात्त परंपरा को समझ नहीं पाते।

भारतीय सामान इन दिनों फैशन और एंटीक प्रेम के प्रतीक भी बने हैं। बेशक इसकी वजह से भारतीय पारंपरिक सामानों की मांग बढ़ी है। इसकी वजह से इन्हें तैयार करने वाले हुनरमंद लोगों की आर्थिकी भी दुरूस्त हो रही है। लेकिन इसके संदेश कहीं गायब हो रहे हैं। आइए इस दीपावली पर हम इन संदेशों को भी याद करें, समरस भारतीय उदात्त परंपरा को भी याद करें। इन संकेतों और प्रतीकों के पीछे के संदेशों को समझना आज की सबसे बड़ी जरूरत है। भारतीय समाज अगर संलिष्ट है, परंपराओं के जरिए जुड़ा हुआ है, तमाम झंझावातों के बावजूद अपने त्यौहारों के वक्त एक साथ उठ खड़ा होता है तो उसकी बड़ी वजह इनमें प्रयोग होने वाले सामान और उनके संदेशों की गहराई है। वक्त आ गया है कि उस गहराई को हम समझें और भारतीयता के इस संदेश को नए अर्थ दें और नए संदर्भों मे इसे आगे बढ़ाएं। इस दीवाली पर हमारा यही संकल्प होना चाहिए।





उमेश चतुर्वेदी

(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)

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