दिल्ली की सत्ता की सीढ़ी पर खड़े होकर , कभी नौकरशाह रहे, अरविन्द केजरीवाल ने पंजाब के सत्ता संग्राम में सफल छलांग लगाई थी और कांग्रेस की स्थिर सरकार को धूल चटा कर पंजाब में सत्ता ही नहीं संभाली थी बल्कि विधान सभा की 117 सीटों में से 92 सीटें जीत कर स्वयं को भी आश्चर्यचकित किया था। यह घटना 2022 में घटी थी। यह ठीक है कि कांग्रेस के राज परिवार ने 2021 में स्वयं ही पंजाब में बिना किसी कारण के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरेन्द्र सिंह को हटा कर चरनजीत सिंह चन्नी की ताजपोशी करके इस घटना की सफलता के लिए कुछ सीमा तक जमीन तैयार कर दी थी । उसके बाद से केजरीवाल दिल्ली के उसी आसन से पंजाब की राजनीति को परोक्ष रूप से नियंत्रित करते रहे। यहाँ तक कि पंजाब के बड़े नौकरशाह दिल्ली से ही आदेश लेने लगे। स्थानान्तरण की सूचियाँ तक दिल्ली से बनने लगीं। मुख्यमंत्री के निर्णय भी , जब तक राघव चड्डा ओके न कर दे तब तक , रोक दिए जाते थे। इसका असर यह हुआ कि अनेक मंत्री भी केजरीवाल से दिशानिर्देश लेने लगे। बीच बीच में पंजाब के लोगों और नौकरशाहों को यह सन्देश देने के लिए कि सत्ता के तार उनके हाथों में हैं, अरविन्द केजरीवाल ने मुख्यमंत्री भगवन्त मान के व्यक्तिगत स्टाफ़ की भी छुट्टी करवा दी।
लेकिन दिल्ली में सत्ता का वह आसन जिस पर खड़े होकर केजरीवाल पंजाब में एक कबूतर से दो कबूतर बनाने के जादू दिखाया करते थे, वह छिन गया है। दिल्ली के विधान सभा चुनाव में केजरीवाल और उनके लगभग सभी प्रमुख साथी ही चुनाव नहीं हार गए बल्कि पार्टी केवल 22 सीटें हासिल कर सत्ता से बाहर हो गई है। वैसे भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे केजरीवाल इससे पहले ही बेपर्दा हो चुके थे। फिर भी इस ‘बेपर्दा’ को किसी भी तरह दिल्ली के सत्ता सिंहासन पर बिठाए रखने के लिए भगवन्त मान समेत पंजाब के सभी मंत्री व विधायक पिछले एक महीने से ही दिल्ली में डेरा डाल कर बैठे थे। लेकिन दिल्ली ने भारतीय जनता पार्टी को प्रचंड बहुमत से जिता कर , केजरीवाल को उसके शीशमहल से निकल कर पैदल कर दिया। इसलिए यह चर्चा शुरू हो गई है कि पैदल चले केजरीवाल कहीं चलते हुए चंडीगढ़ को नहीं पहुँच जाएँगे ? इस प्रकार के हालात में वे वैसे भी दुड़की चाल चलते हुए देखे जाते रहे हैं। इसका पंजाब की राजनीति पर क्या असर पड़ेगा, क्या अब केजरीवाल पंजाब के मुख्यमंत्री बनेंगे, या फिर खुद मुख्यमंत्री न बन कर अपने किसी प्यादे को मुख्यमंत्री बनाएँगे ,यह चर्चा भी शुरू हो गई है। लेकिन जब किसी प्यादे को मुख्यमंत्री बनाने की अटकलबाजियां चलती हैं तो यह भी क़यास लगते हैं कि क्या भगवन्त मान उनका प्यादा बनने से इन्कार करने लगेंगे ?
लेकिन इन प्रश्नों का उत्तर तलाशने से पहले कुछ दूसरे प्रश्नों के उत्तर तलाशने होंगे। सबसे पहला प्रश्न तो यही है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी के जो चार संसद धर्मवीर गान्धी , हरेन्द्र खालसा , प्रो० साधु सिंह और भगवन्त मान बने थे , उनमें से पहले तीन साल भर के भीतर ही पार्टी से बाहर कैसे हो गए। केजरीवाल जानते थे कि उसके पास लोक सभा में केवल यही चार लोग हैं , इसके बावजूद उसने इनकी बात सुनने की बजाए इन्हें बाहर का रास्ता दिखाने में हिचकिचाहट क्यों नहीं दिखाई ? कारण साफ़ था। ये तीनों लोग पार्टी में सम्मानजनक व्यवहार चाहते थे और ऐसा व्यवहार केजरीवाल की रणनीति का हिस्सा नहीं था। वे पार्टी के भीतर अपनी ऐसी छवि चाहते हैं जिससे आभास हो कि सारी शक्ति का स्रोत वही हैं। लेकिन तब सवाल उठता है कि भगवन्त मान वहाँ कैसे बने रहे ? वे अपमान क्यों और कैसे सहते रहे। इसका एक ही कारण है। भगवन्त मान की सक्रियता के दो क्षेत्र थे , कामेडी और राजनीति। यदि राजनीति में केजरीवाल उनसे सम्मानजनक व्यवहार नहीं करते थे तो कामेडी के क्षेत्र में उन्हें सम्मान मिलता ही था। इस क्षेत्र में वे केजरीवाल पर निर्भर नहीं थे। इसलिए वे सुविधा से केजरीवाल के पीछे पीछे चलते रहे।

दूसरा प्रश्न है कि किया 2022 के विधान सभा चुनावों में आम आदमी पार्टी को जो आश्चर्य चकित करने वाली जीत मिली , वह केजरीवाल के नेतृत्व में विश्वास के कारण थी ? इसका उत्तर हाँ या ना में तो नहीं दिया जा सकता। इसके उत्तर बहुमुखी हैं। एक उत्तर तो शुरू में ही दिया गया है। कांग्रेस के राज परिवार ने बैठे बिठाए नवजोत सिंह सिद्धू और चरनजीत सिंह चन्नी को लेकर पंजाब की राजनीति में ग़लत समय पर एक ख़तरनाक प्रयोग कर लिया। उसका लाभ आम आदमी पार्टी को मिला। अकाली दल से लोग दुखी थे। क्यों दुखी थे , यह देखने समझने वाले के अपने चश्मे पर निर्भर करता है। कुछ को लगता है कि इसका कारण ‘बेअदबी’ के मामले थे। दूसरों का कहना है कि भ्रष्टाचार है। तीसरे तरह के लोगों का मानना है कि सुखबीर बादल की तानाशाही थी। लेकिन कुल मिला कर टोटल असर यह था कि लोग अकाली दल को सत्ता से बाहर करना चाहते थे। लेकिन सत्ता किसको देते ? भारतीय जनता पार्टी लम्बे अरसे से अकाली दल के साथ सत्ता में भागीदार रही थी। वैसे भी पंजाब में भाजपा का नाम कुछ सीमित वर्गों व स्थानों पर ही है। विकल्पहीनता में आम आदमी पार्टी ही बचती थी। इसमें एक और बात ध्यान में रखने की है कि कम्युनिस्टों की इधर उधर छितरी हुई सेना भी , जो मौक़ा देख कर किसान संगठन के रूप में सक्रिय हो रही थी , वह भी मौक़ा देख कर केजरीवाल के पीछे खड़ी हो गई। विकल्पहीनता में आम आदमी पार्टी पंजाब मे सत्ता के शिखर पर पहुँच गई।
लेकिन तीसरा सवाल सबसे महत्वपूर्ण है। पंजाब में वोट केजरीवाल के नाम पर पड़े या भगवन्त मान के नाम पर ? या फिर आम आदमी पार्टी के संगठन के कारण ? जहाँ तक पार्टी के संगठन का सवाल है , यह पार्टी भी जानती है कि प्रदेश में पार्टी का संगठन तो नहीं ही है। इसलिए खोजबीन केवल इस बात की करनी है कि वोट केजरीवाल को पड़े या भगवन्त मान को। चुनाव के दौरान केजरीवाल ने किसी कम्पनी को ठेका देकर पंजाब के हर गली कूचे में चित्रकारी करवा दी - सारा पंजाब, केजरीवाल दे नाल। आवाज उठने लगी , मुख्यमंत्री कौन होगा ? लेकिन केजरीवाल शातिराना तरीक़े से चुप्पी साधने लगे। उनके कभी साथी रहे कुमार विश्वास बहुत साल पहले ही यह ख़ुलासा कर चुके थे कि केजरीवाल के दिल के किसी गहरे कोने में पंजाब का मुख्यमंत्री बनने की चाह छिपी है। सब जानते हैं कि चुनाव से कुछ समय पहले , जब केजरीवाल ने अनुमान लगा लिया था कि हाथ में झाड़ू लेकर मात्र इधर उधर घूमते रहने से पंजाब विधानसभा में सीटें तो मिल जाएँगी लेकिन सरकार नहीं बन पाएगी। सरकार बनाने के लिए भगवन्त मान को आगे करना ही पड़ेगा। यही कारण है कि मतदान से कुछ समय रहते केजरीवाल को मुख्यमंत्री के चेहरे के नाम पर भगवन्त मान का नाम आगे करना ही पड़ा। जब हाथ में झाड़ू पकड़े मान पोस्टरों पर छापे गए तब पंजाब ने आम आदमी के पक्ष में अंतिम फैसला किया। इसमें कोई शक नहीं कि भगवन्त की एक सशक्त कलाकार के रूप में पहचान , उनके राजनीति में आने से बहुत पहले ही बन गई थी। उसका लाभ यक़ीनन केजरीवाल को मिला।
लेकिन इस बात में भी कोई शक नहीं कि मान के मुख्यमंत्री बनने की बाद भी केजरीवाल का व्यवहार इस प्रकार का रहा जिससे लोग साफ़ साफ़ देख लें कि पंजाब की राजनीति का नियंत्रण भी केजरीवाल ही करते हैं। यहाँ तक कि लम्बे समय तक शराब घोटाले में फंस कर जेल में बैठ जाने के बाद भी केजरीवाल के व्यवहार में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। पंजाब में उसने समानान्तर सत्ता केन्द्र स्थापित किए ताकि उसका भय दिखा कर भगवन्त मान को नियंत्रण में रखा जा सके। ‘मैं किसी दूसरे को भी मुख्यमंत्री बना सकता हूं’ इसका निरन्तर जाप करते रहने के दो फ़ायदे हो रहे थे। भगवन्त मान केजरीवाल के सामने मुंडी झुका कर बैठे रहते थे और नया मुख्यमंत्री बनने के इच्छुक भी और ज़ोर से केजरीवाल के नाम की माला जपते थे। लेकिन इस प्रकार के नाना प्रकार के करतब दिखाना का करंट केजरीवाल में दिल्ली की सत्ता के मीटर से आता था। अब वह मीटर दिल्ली के ही लोगों ने उखाड दिया है। इसलिए सवाल खडा हो गया है कि वह मीटर उखड़ जाने के बाद क्या केजरीवाल इस प्रकार के करतब कर पाएँगे ? यदि करते भी हैं तो क्या पंजाब के विधायकों पर उसका पहले की तरह का असर पड़ेगा या फिर वे इन तमाशों पर हँसना शुरू कर देंगे ? अपना प्रभाव दिखाने के लिए ही केजरीवाल ने पंजाब की पूरी सरकार और विधायकों की बैठक दिल्ली में बुला ली। इतना पक्का है अब केजरीवाल की ये कलाबाज़ियाँ प्रभाव नहीं डाल सकेंगी।

पिछले कुछ अरसे से लगता है कांग्रेस पंजाब में फिर से अपनी जमीन पकड़ रही है। 2024 के लोक सभा के चुनाव में उसने सात सीटें हथिया लीं थीं। अभी हुए स्थानीय निकाय चुनावों में भी उसने सम्मानजनक सीटें हासिल कीं। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रताप सिंह बाजवा ने कहा भी है कि दिल्ली चुनाव के बाद से आम आदमी पार्टी के तीस विधायक उनके सम्पर्क में हैं। वे संकेत ये देना चाहते हैं कि आम आदमी पार्टी में फूट पड़ेगी और कांग्रेस भी सत्ता की दावेदार हो सकती है। फिलहाल कांग्रेस के पास 16 विधायक हैं और आम आदमी पार्टी के पास 93 विधायक हैं। सरकार बनाने के लिए 59 विधायकों की जरुरत है। कांग्रेस 43 विधायक तोड़ पाएगी , ऐसा कांग्रेस के समर्थक भी नहीं मानते।
अकाली दल अभी जमीन पर से पुन: उठनेे की स्थिति में नहीं आया है। दूसरे वह हालात से घबरा कर पुन: अपने पुराने तम्बू में वापिस चला गया है। उसने भी कहना शुरू कर दिया है कि वह पंथ के हितों की रक्षा के लिए बना था। पंथ का अर्थ पंजाब में सिख समाज से लिया जाता है। लेकिन सिख समाज का राजनैतिक व्यवहार मजहब से नहीं बल्कि विरादरी से संचालित होता है। इस लिहाज़ से पंथ में मुख्य तौर पर तीन बिरादरियों के लोग शामिल हैं , जाट या जट्ट , खत्री और अनुसूचित समुदाय के लोग। पंजाब का जट्ट या जाट समाज में लगभग सारे का सारा सिख समाज में ही समाहित है। लेकिन खत्री और अनुसूचित समुदायों के लोग दश गुरू परम्परा में आस्था रखने के साथ साथ अन्य देवी देवताओं में भी विश्वास करते हैं। कट्टर व्यवहार के लोगों को यह पसन्द नहीं है। उसके कारण बिरादरियों का राजनीतिक व्यवहार मजहब से नहीं बिरादरी से संचालित होता है। अकाली दल यह जानता है । यही कारण है कि वह अपने खोल से बाहर निकल कर समस्त पंजाबियों की पार्टी बनने की कोशिश करता देखा भी गया है। लेकिन तभी शोर होने लगता है कि सत्ता के लालच में अकाली दल अपना ‘कोर’ छोड रहा है। घबरा कर अकाली दल फिर पंथ के अपने पुराने आसन पर लौट जाता है। यही कारण है कि राजनीतिक पंडित निकट भविष्य में अकाली दल के पुनर्वास की भविष्यवाणी नहीं कर रहे हैं।
भारतीय जनता पार्टी भी अपने खोल से बाहर निकल कर सभी बिरादरियों में अपने संगठन के कार्य का विस्तार कर रही है। लोक सभा के पिछले चुनावों में उसे 18 प्रतिशत से ज्यादा वोट मिले थे। मतदान का वैज्ञानिक अध्ययन करने वाले पंडित बताते रहते हैं कि भाजपा ने पंजाब के अनुसूचित समुदायों व अन्य पिछड़े समुदायों में से अच्छे खासे वोट प्राप्त किए हैं। पंजाब के चुनावों में जाट/जट्ट समाज के अनेक प्रत्याशी भी मैदान में उतारे। उसका सबसे बड़ा लाभ यह हुआ कि इस समाज में भाजपा के प्रति सोच बदली है। भाजपा के वरिष्ठ नेता हरजीत सिंह ग्रेवाल के अनुसार पंजाब के जाट समाज में भाजपा को लेकर विरोध नहीं था बल्कि अजनबीपन था। अब जब भाजपा ने जाट समाज से यह अजनबीपन दूर करना शुरू किया है तो जाहिर है कि जाट समाज का सकारात्मक रुख़ ही है। दिल्ली में सिख समाज ने खुल कर भाजपा का समर्थन किया। इसका असर पंजाब पर भी पड़ेगा।’ ग्रेवाल का विवेचन सही है , इसमें कोई शक नहीं लेकिन इससे भी इंकार नहीं कर सकता कि भाजपा अभी पंजाब में इस स्थिति में नहीं कि 93 सदस्यीय आप विधायकों की टीम में तोड़फोड़ कर अपनी सरकार बना सके। फिलहाल भाजपा के विधान सभा में दो सदस्य हैं। ग्रेवाल स्थिति स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि भाजपा ऐसा करेगी भी नहीं। सरकार जन समर्थन से बनती है , ख़रीद फरोख्त से नहीं। ख़रीद फरोख्त की सरकार संगठन की सारी तपस्या को कलंकित कर देती है। भाजपा के लिए सत्ता साधन है , साध्य नहीं।’ इसलिए पंजाब में उठा पटक की इस भावी लड़ाई में भाजपा को बाहर ही रखा जा सकता है। यदि समग्र रूप से पंजाब के राजनीतिक नक्शा की चर्चा करनी हो तो अकाली दल पंथ की पार्टी है जो किसी समय पंजाबियों की पार्टी बनने की कोशिश कर रही थी लेकिन फिलहाल वापिस अपने परम्परागत आसन पर लौट गई है। कांग्रेस पार्टी व आम आदमी पार्टी किसी एक वर्ग की नहीं बल्कि समस्त पंजाबियों की पार्टी है। भाजपा किसी एक वर्ग की पार्टी की अवधारणा से बाहर निकल कर समस्त पंजाबियों की पार्टी बनने का प्रयास कर रही है।
इस पृष्ठभूमि में अंतिम सवाल ही बचता है जिसका उत्तर खोजना बाक़ी है। दिल्ली के चुनाव का पंजाब की आम आदमी पार्टी पर क्या पड़ेगा ? इतना जाहिर है कि आप का विधायक दल देर सवेर दो हिस्सों में विभाजित हो जाएगा। भगवन्त मान का ग्रुप और केजरीवाल का ग्रुप। लेकिन सरकार चलाने के लिए 59 विधायक होना चाहिए। फिलहाल यह सवाल है कि भगवन्त मान के साथ कितने विधायक हैं या निर्णय के समय उनके साथ कितने हो सकते हैं ? लेकिन यह सवाल भी है कि आम आदमी पार्टी के विधायक जब भगवन्त मान या केजरीवाल के पक्ष या विपक्ष में निर्णय लेंगे तो उस निर्णय को कौन से कारक प्रभावित करेंगे ? राजनीति में केवल एक ही कारक मुख्य होता है , चुनाव में किसके नाम पर चुनाव जीता जा सकता है। हमने उपर चर्चा भी की है कि पंजाब में आम आदमी पार्टी के पक्ष में मतदान का मुख्य कारण भगवन्त मान था न कि केजरीवाल ने। अलबत्ता विश्लेषणों में केजरीवाल ने अत्यन्त चतुराई से भगवन्त मान के नाम की ‘गुडविल’ अपने नाम ट्रांसफ़र करवा ली थी। केजरीवाल के ग्रुप में जो विधायक हैं या होंगे, वे केजरीवाल को मुख्यमंत्री बनाने के लिए एकत्रित होंगे या अपने में से किसी को मुख्यमंत्री बनाने के लिए केजरीवाल का केवल आशीर्वाद पाने के लिए उनके साथ जुटेंगे ? इस प्रश्न का उत्तर फिलहाल देना तो कठिन लेकिन आम आदमी पार्टी के भीतर की इस लडाई में भाजपा की क्या भूमिका रहेगी , यह समझ लेना जरुरी है। दर्शक की या फिर उत्प्रेरक की? कोई भी राजनीतिक दल किसी भी स्थिति में दर्शक मात्र तो रह ही नहीं सकता। तब भाजपा आप के भीतर की इस जोड़तोड़ को कैसे प्रभावित कर सकती है? यदि भाजपा अपना नैतिक समर्थन भगवन्त मान को दे देती है तो जाहिर है मान 59 की संख्या जोड़ सकते हैं। जाहिर है इससे पंजाब में आम आदमी पार्टी टूट जाएगी। भगवन्त मान इन 59 सदस्यों के साथ नए नाम से अपना नया क्षेत्रीय दल बना सकते हैं। ऐसे में उनकी सरकार 2027 तक चल भी सकती है। यदि ऐसा क्षेत्रीय दल बनता है तो वह पंजाब में उस शून्य को भी भर सकता है जो अकाली दल के हाशिए पर जाने से उत्पन्न हुआ है।

डॉ. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री
(लेखक हिमाचल प्रदेश केन्द्रीय विश्वविद्यालय धर्मशाला के पूर्व कुलपति हैं )
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)
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