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किस करवट बैठेगा चुनावी ऊंट

How will the election camel sit?

क्या पांच राज्यों में जारी विधानसभा चुनावों के नतीजों का आम चुनावों पर असर पड़ेगा...मीडिया की मानें और चुनावी जानकारों की बात पर भरोसा करें तो ऐसा ही होने जा रहा है। यानी अगर पांचों राज्यों या ज्यादातर राज्यों में बीजेपी ने अपनी ताकत दिखाई तो अगले आम चुनाव में बीजेपी की बढ़त तय है। लेकिन ऐसा नहीं हुआ तो चुनावी जानकारों के मुताबिक, अगले आम चुनाव में विपक्षी दलों को बढ़त मिलेगी। लेकिन चुनावों के बारे में अपना आकलन है कि चुनाव नतीजों का आकलन या चुनावों में राजनीतिक दलों के प्रदर्शन गणित के फॉर्मूले की तरह नहीं होते। गणित में हमेशा दो जमा दो या दो गुणा दो, चार ही होता है। लेकिन चुनाव के प्रदर्शन और नतीजे अक्सर ऐसे नहीं होते।

याद कीजिए, 2018 में हुए तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव। राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश, तीनों के ही चुनावों में भारतीय जनता पार्टी की हार हुई। जबकि तीनों राज्यों में इसके पहले भाजपा की सरकारें थीं। तब माना गया था कि कुछ ही महीने बाद होने वाले लोकसभा चुनावों में वैसे ही नतीजे होंगे। लेकिन हुआ ठीक उलट। राजस्थान की सभी 25 सीटों पर भाजपा और उसके सहयोगी दलों की जीत हुई। छत्तीसगढ़ की 11 में से दस और मध्य प्रदेश की 29 में से 26 सीटों पर भाजपा की जीत हुई। इसलिए यह कहना कि कुछ ही दिन पहले हुए चुनाव की तरह अगले चुनाव के नतीजे होते हैं, गलत है। जनता का मूड कब कैसा हो जाए, वह किस मुद्दे पर केंद्र और किस मुद्दे पर राज्य के चुनावों में अपना फैसला देती है, तय नहीं होता। 1967 तक लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव साथ होते थे। तब तक भारत में आज की तरह साक्षरता भी नहीं थी। चुनाव के मतदान बक्से साथ ही रखे जाते थे। तब जनता कितनी समझदार थी, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आठ राज्यों के विधानसभा चुनावों के लिए लोगों ने कांग्रेस के विरोध में समाजवादी गठबंधन को वोट दिया, जिसमें जनसंघ भी शामिल था। जबकि लोकसभा के लिए कांग्रेस पर भी भरोसा किया। उसकी तुलना में तो अब तक हालात बहुत बदल गए हैं। आज साक्षरता दर भी 75 प्रतिशत को पार कर चुकी है। आज संचार के तमाम तरह के साधन हैं। सोशल मीडिया है, वैश्विक सूचनाओं तक ज्यादातर लोगों की पहुंच है। भारत में एक अरब से ज्यादा एंड्रायड फोन हैं। इसलिए मान सकते हैं कि पहले की तुलना में आज के लोग ज्यादा जागरूक और सूचनाओं से भरे पड़े हैं। इसलिए यह मान लेना कि एक चुनाव का असर दूसरे चुनाव पर पड़ेगा ही, सही नहीं माना जा सकता।

ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर पांचों राज्यों में क्या होने जा रहा है? वैसे इस पर भी विचार करने के पहले कभी चुनाव शास्त्री और चुनाव विश्लेषक और अब मोदी विरोधी राजनीति के पैरौकार बन चुके योगेंद्र यादव के ही कथन को याद कर लेना चाहिए। योगेंद्र यादव ने करीब चौथाई सदी पहले दिए एक इंटरव्यू में कहा था कि एक्जिट पोल या चुनाव सर्वेक्षण काला जादू नहीं होते। यानी कुछ भी हो सकता है। यानी इन राज्यों में कुछ भी हो सकता है।

सबसे पहले बात करते हैं, मध्य प्रदेश की। मध्य प्रदेश में पिछली बार कांग्रेस भले ही सीटों की संख्या के हिसाब से विजेता रही। लेकिन वोटों के हिसाब से भाजपा को उसकी तुलना में करीब पांच लाख से ज्यादा वोट मिले थे। चुनाव अभियान शुरू होने से कुछ दिन पहले तक माना जा रहा था कि कांग्रेस यहां भारी है। लेकिन अब स्थितियां बदली नजर आ रही हैं। वैसे कुछ जानकारों का मानना है कि राज्य में किसी भी दल यानी ना तो कांग्रेस और ना ही भाजपा की लहर है। वैसे जिस तरह टिकटों के लिए कांग्रेस में बगावत हुई है, उससे उसी को ज्यादा नुकसान होने की आशंका हैं। मतदाताओं को वह वर्ग, जिसने अब तक अपना मन नहीं बनाया है कि वे किसे वोट देंगे, वे कांग्रेस से बिदक सकते हैं। ऐसा नहीं कि बीजेपी में बगावत या टिकटों के लिए सिर फुटौव्वल नहीं हुई है। लेकिन यह भी तय है कि उसके यहां कांग्रेस की तुलना में कम बगावत हुई है। दूसरी बात यह है कि कांग्रेस के सहयोगी के तौर पर जाने जा रही समाजवादी पार्टी, जनता दल यू और आम आदमी पार्टी ने भी अपने उम्मीदवार उतार दिए हैं। जाहिर है कि इसका असर कांग्रेस के वोट बैंक पर भी पड़ेगा। क्योंकि वहां की लड़ाई भाजपा बनाम अन्य की हो गई है। चूंकि तकरीबन चार बार से भाजपा वहां सत्ता में है तो सत्ता विरोधी रूझान भी है। इसे थामने के लिए उसने अपने कद्दावर नेताओं और सांसदों मसलन प्रह्रलाद पटेल, कैलाश विजय वर्गीय, बीडी शर्मा आदि को मैदान में उतारा है। पार्टी इससे सत्ता विरोधी रूझान को थामने की कोशिश में हैं। पार्टी ने एक और काम किया है। उसने शिवराज को अपना चेहरा घोषित नहीं किया है। इसलिए माना जा रहा है कि शिवराज के लिए यह आखिरी विधानसभा चुनाव है। इसलिए यहां क्या होने वाला कहना मुश्किल है। लेकिन यह तय है कि अगर कांग्रेस की हार हुई तो उसकी बड़ी वजह कांग्रेसी होंगे, भाजपा कम। क्योंकि दिग्विजय सिंह को जिस तरह किनारे किया जा रहा है, जिस तरह कमलनाथ ने पूरी ताकत अपने हाथ में केंद्रित कर रखी है. उससे कांग्रेसी भी नाराज हैं।

मध्य प्रदेश के पड़ोसी और कभी उसका हिस्सा रहे छत्तीसगढ़ में कांग्रेस अभी ताकतवर नजर आ रही है। भूपेश बघेल की गोधन न्याय योजना जैसी कई योजनाओं का फायदा हर किसी को मिला है, जिसमें भ्रष्टाचारी और समान लोग भी शामिल हैं, इसलिए बघेल अब भी पहली पसंद नजर आ रहे हैं। लेकिन कांग्रेस के खिलाफ सत्ता विरोधी रूझान भी है। इसे भांपते हुए ही पार्टी ने अपने 22 मौजूदा विधायकों के टिकट काट दिए हैं। वहीं भाजपा ने पूरी ताकत झोंक रखी है। हालांकि भाजपा की कमजोर कड़ी उसके तीन बार मुख्यमंत्री रहे रमन सिंह हैं। चुनाव अभियान में वे आगे हैं। लेकिन यहां की जनता की पहली पसंद वे नजर नहीं आ रहे। भाजपा नया नेतृत्व उभार नहीं पाई है। लेकिन यहां भी अजित जोगी की पार्टी के साथ ही इंडी गठबंधन के दल मसलन आम आदमी पार्टी ने भी अपने उम्मीदवार उतारे हैं। जाहिर है कि इसका असर कांग्रेसी संभावना पर पड़ सकतका है। वैसे कांग्रेस में भी खींचतान कम नहीं है। हालांकि प्रियंका गांधी और राहुल गांधी के कमान संभालने से वह खींचतान सतह पर नजर नहीं आ रही है।

देश के सबसे बड़े राज्य राजस्थान में भी मुख्य मुकाबला भाजपा और कांग्रेस के ही बीच है। यहां भी कांग्रेस के साथी दल मैदान में हैं। वैसे यहां रवायत रही है कि एक बार कांग्रेस तो दूसरी बार बीजेपी। हालांकि कांग्रेस इस बार यह परंपरा बदलने की कोशिश में है। हालांकि यहां कांग्रेस के युवा और प्रभावी चेहरे सचिन पायलट विद्रोह कर चुके हैं। लेकिन अशोक गहलोत ने एक बार फिर ताल मुख्यमंत्री पद पर दावा ठोक दिया है। उन्होंने एक प्रेस कांफ्रेंस में कह दिया कि मुख्यमंत्री की कुर्सी उन्हें ही नहीं छोड़ रही। जबकि सचिन पायलट अपना पूरा जोर लगाए हुए हैं। चुनावों के बीच कांग्रेस की अंदरूनी खींचतान बाहर तो नहीं आ रही है, लेकिन अंदरखाने में गहलोत और पायलट खेमे में घमासान मचा हुआ है। इसका असर कांग्रेस के चुनावी नतीजे पर जरूर पड़ेगा। वैसे यह भी हकीकत है कि अगर पिछली बार भाजपा मिलकर लड़ी होती, आपसी सिरफुटौव्वल से बची होती, ठीक से उम्मीदवारों का चयन होता तो राज्य में अब भी भाजपा की ही सरकार होती। पिछली बार कांग्रेस की तुलना में भाजपा को महज तीन लाख से कुछ ही ज्यादा वोट मिले थे। लेकिन यही अंतर सीटों के रूप में 14 सीटों के अंतर के रूप में दिखा। बहुजन समाज पार्टी के पांच विधायक जीते थे, जिन्हें कांग्रेस ने तोड़कर अपना स्पष्ट बहुमत बना लिया था। वैसे बीजेपी में इस बार फिर खींचतान है। पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को अलग रखकर चुनाव लड़ने की कोशिश हुई। लेकिन जब पार्टी को लगा कि उसके नतीजों पर असर पड़ सकता है तो वसुंधरा को भी साथ रखने की कोशिश की गई। पार्टी रणनीति में शुरु में लगा कि वसुंधरा को अलग रखा जा रहा है। ऐसी आशंका जताई गई कि रानी के विशेषण से राजस्थान में विख्यात वसुंधरा बगावत कर सकती हैं। लेकिन वसुंधरा ने संयत रूख दिखाते हुए चुनावी विशेषज्ञों को गलत साबित किया। इसलिए ऐसा लग रहा है कि भाजपा इस पर राज्य की परंपरा के मुताबिक सत्ता छीनने में कामयाब रहेगी।

तेलंगाना में कुछ हमीने पहले तक भारतीय जनता पार्टी दूसरे नंबर पर तेजी से उभर रही थी। माना जा रहा था कि भाजपा अगले विधानसभा चुनाव में बड़ी टक्कर देगी। लेकिन जब भाजपा ने राज्य के अपने तेजतर्रार अध्यक्ष बांदी संजय कुमार को बदल दिया तो उसकी संभावनाएं धूमिल पड़ती गईं। अब कांग्रेस ने तेलंगाना राष्ट्र समिति से भारत राष्ट्र समिति बन चुके के चंद्रशेखर राव के दल से सत्ता छीनने के लिए पूरा जोर लगा रही है। जबकि भाजपा ने एक बार फिर ताकत झोंक दी है। उसने अपने दो सांसदों को भी मैदान में उम्मीदवार बनाकर उतार दिया है। वैसे यहीं पर ओबैसी की पार्टी भी है। ऐसे में हैदराबाद शहर में जहां चौकोणीय मुकाबला होगा, वहीं राज्य में त्रिकोणीय मुकाबले के आसार बन रहे हैं। वैसे कांग्रेस मान कर चल रही है कि वह राज्य की सत्ता में लौट रही है। चंद्रशेखर राव परेशान तो हैं तो लेकिन ऐसा भी नहीं उन्होंने हथियार डाल दिए हों। इसलिए यह देखना दिलचस्प होगा कि कांग्रेस ताकतवर बनकर उभरती है या भाजपा दम दिखा पाती है या फिर चंद्रशेखर राव अपनी सत्ता बचाए रख पाते हैं। लेकिन एक बात तय है कि अगर चंद्रशेखर राव की हार होती तो इसके बाद भारत राष्ट्र समिति के राजनीतिक भविष्य पर सवाल खड़े होंगे। रही बात मिजोरम की तो वहां चर्च का प्रभाव है। चर्च के साथ स्थानीय कांग्रेसी नेताओं के संबंध मधुर रहे हैं। इसलिए यह तय माना जा रहा है कि वहां कांग्रेस की सत्ता में फिर से वापसी हो सकती है। वैसे भी मणिपुर को लेकर वहां स्थानीय लोगों में भाजपा विरोधी माहौल है। इसका असर मिजोरम के मतदान पर भी पड़ेगा।

एक बात और है कि तीनों राज्यों में करीब साठ लाख नए मतदाता जुड़े हैं। छत्तीसगढ़ और मिजोरम में पुरूष वोटरों के मुकाबले महिला वोटरों की संख्या ज्यादा है। इसलिए यह भी माना जा रहा है कि इन चुनावों में सारे मुद्दों के बावजूद महिलाओं और युवाओं के रूझान से गहरा असर पड़ेगा। वैसे भी पिछले कुछ चुनावों में महिलाएं अपने परिवार प्रमुख पुरूषों की तुलना में वोटिंग के लिए स्वायत्त रूख रखने लगी हैं, इसलिए हर राजनीतिक दल उन्हें साधने की कोशिश में भी है। रही बात पहली बार वोटर बने युवाओं की तो उनमें नरेंद्र मोदी का क्रेज बाकी नेताओं की तुलना में ज्यादा है। इसलिए अगर मोदी उन्हें लुभाने और यह समझाने में सफल रहे कि विधानसभा के लिए वोट डालना राष्ट्रीय राजनीति के लिए मतदान होगा तो नतीजे चौंकाने वाले भी हो सकते हैं।

 

 


उमेश चतुर्वेदी
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)

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