सतीश शर्मा
जापान में चल रहे एशियाई खेलों में भारतीय पुरुष और महिला हॉकी टीमें स्वर्ण पदक के लिए मैदान पर अपना सर्वश्रेष्ठ देने में जुटी हैं। इस बार एशियाई खेलों का स्वर्ण केवल महाद्वीपीय वर्चस्व का प्रतीक नहीं है, बल्कि लॉस एंजिल्स 2028 ओलिंपिक के लिए सीधे प्रवेश का टिकट भी है। दोनों वर्गों के चैंपियन सीधे ओलिंपिक के लिए क्वालीफाई करेंगे। एक ओर भारतीय खिलाड़ी देश के लिए पदक और ओलिंपिक टिकट हासिल करने की चुनौती से जूझ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर भारतीय हॉकी का संचालन करने वाली संस्था हॉकी इंडिया के भीतर अधिकारों और प्रशासनिक नियंत्रण को लेकर विवाद लगातार गहराता जा रहा है।
हॉकी इंडिया के अध्यक्ष और पूर्व भारतीय कप्तान दिलीप तिर्की तथा महासचिव भोला नाथ सिंह के बीच शुरू हुआ प्रशासनिक विवाद अब जर्सी विवाद, महानिदेशक के खिलाफ कार्रवाई, आपात कार्यकारी बोर्ड बैठक, चुनाव और अंततः पुलिस शिकायत तक पहुंच चुका है। 24 सितंबर को तिर्की ने हॉकी इंडिया के चार अधिकारियों के खिलाफ दिल्ली पुलिस में शिकायत भी दर्ज कराई। पुलिस ने शिकायत प्राप्त होने की पुष्टि की है, हालांकि उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार उस समय तक एफआईआर दर्ज नहीं हुई थी।
यह घटनाक्रम उस समय सामने आया है जब भारतीय हॉकी के लिए मैदान पर बेहद महत्वपूर्ण मुकाबले चल रहे हैं। ऐसे में विवाद ने एक बुनियादी सवाल जरूर खड़ा कर दिया है—हॉकी इंडिया में निर्णय लेने की वास्तविक शक्ति किसके पास है और अध्यक्ष तथा महासचिव के अधिकारों की सीमा क्या है?
अध्यक्ष और महासचिव—दोनों शीर्ष पदाधिकारी
डॉ. दिलीप कुमार तिर्की हॉकी इंडिया के अध्यक्ष और भोला नाथ सिंह महासचिव है। दोनों का वर्तमान कार्यकाल 2026 तक है। कार्यकारी बोर्ड में कोषाध्यक्ष सहित उपाध्यक्ष, संयुक्त सचिव, कार्यकारी सदस्य और एथलीट प्रतिनिधि भी शामिल हैं।
जर्सी विवाद से शुरू हुआ टकराव
भारतीय टीम की पारंपरिक नीली जर्सी के स्थान पर विश्व कप के दौरान भगवा/नारंगी रंग की जर्सी इस्तेमाल किए जाने का विवाद इस टकराव का एक प्रमुख बिंदु बना। दिलीप तिर्की का कहना था कि जर्सी का रंग बदलने का फैसला उनकी जानकारी और हॉकी इंडिया कार्यकारी बोर्ड की मंजूरी के बिना किया गया। इस विवाद के बाद उन्होंने हॉकी इंडिया के महानिदेशक कमांडर आर.के. श्रीवास्तव को कारण बताओ नोटिस जारी किया और उनके अधिकारों पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी। नोटिस में जर्सी विवाद के अलावा कई अन्य प्रशासनिक मामलों का भी उल्लेख किया गया था। श्रीवास्तव को जवाब देने के लिए चार सप्ताह का समय दिया गया था। तिर्की का एक अन्य आरोप यह भी रहा कि उनके निर्देश के बावजूद श्रीवास्तव विश्व कप के लिए नीदरलैंड गए। यह मुद्दा भी बाद में उनके खिलाफ कार्रवाई के आधारों में शामिल हुआ।
आपात बैठक ने विवाद को और बढ़ाया
श्रीवास्तव के खिलाफ कार्रवाई के बाद महासचिव भोला नाथ सिंह ने 18 सितंबर को आपात कार्यकारी बोर्ड बैठक बुलाने की प्रक्रिया शुरू की। बैठक के एजेंडे में हॉकी इंडिया लीग के पुनर्गठन, नई गवर्निंग काउंसिल, आगामी चुनाव की तारीख तय करने, निर्वाचन अधिकारी की नियुक्ति और वित्तीय खातों जैसे महत्वपूर्ण विषय शामिल थे।
यहीं से अध्यक्ष और महासचिव के बीच अधिकारों का विवाद खुलकर सामने आया। तिर्की का दावा था कि हॉकी इंडिया के नियमों के अनुसार आपात कार्यकारी बोर्ड बैठक बुलाने का अधिकार अध्यक्ष के पास है और उनकी अनुमति के बिना बैठक नहीं बुलाई जा सकती। दूसरी ओर, भोला नाथ सिंह का पक्ष रहा कि बैठक अध्यक्ष से चर्चा और उनके निर्देश के आधार पर बुलाई गई थी। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार बैठक हुई और उसमें हॉकी इंडिया लीग तथा चुनाव सहित कई मुद्दों पर चर्चा की गई।
विवाद अब पुलिस तक
विवाद का सबसे नया और गंभीर अध्याय 24 सितंबर को सामने आया। दिल्ली में आधिकारिक दौरे पर गए तिर्की के अनुसार हॉकी इंडिया की ओर से उपलब्ध कराया गया वाहन वापस बुला लिया गया, जबकि उनका निजी सामान वाहन में ही रह गया। उन्होंने दावा किया कि सामान में जरूरी दवाइयों वाला बैग भी था। इसके बाद तिर्की ने दक्षिण दिल्ली के पुलिस उपायुक्त को शिकायत देकर चार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की। शिकायत में पूर्व महानिदेशक आर.के. श्रीवास्तव, वित्त प्रबंधक सुबोध कुमार, निदेशक भूषण कुमार और चालक हरमिंदर सिंह के नाम शामिल हैं। शिकायत में आपराधिक विश्वासघात, चोरी, आपराधिक साजिश, जीवन को खतरे में डालने और गलत तरीके से छोड़ने जैसे आरोप लगाए गए हैं।
महत्वपूर्ण बात यह है कि ये तिर्की द्वारा लगाए गए आरोप हैं, जिनका अभी न्यायिक या पुलिस जांच के स्तर पर निर्धारण नहीं हुआ है। दिल्ली पुलिस ने शिकायत प्राप्त होने की पुष्टि की है, लेकिन उपलब्ध रिपोर्टों में एफआईआर दर्ज होने की पुष्टि नहीं है। इसके बाद विवाद और गहरा गया, जब श्रीवास्तव महासचिव भोला नाथ सिंह के साथ चंडीगढ़ पहुंचे, जहां पुरुष एशियाई चैंपियंस ट्रॉफी की औपचारिक घोषणा की गई। इसके बाद 18 सितंबर को भोला नाथ सिंह ने तिर्की की अनुमति के बिना हॉकी इंडिया की आपात कार्यकारी बोर्ड बैठक बुला दी।
चुनाव से पहले बढ़ी अहमियत
हॉकी इंडिया के चुनाव 7 नवंबर को प्रस्तावित बताए जा रहे हैं। महासचिव भोला नाथ सिंह ने भी 25 सितंबर को कहा कि चुनाव 7 नवंबर को ही होंगे। ऐसे में मौजूदा विवाद केवल दो पदाधिकारियों के बीच मतभेद नहीं रह जाता। जर्सी से शुरू हुआ विवाद प्रशासनिक अधिकारों, पेशेवर अधिकारियों पर नियंत्रण, कार्यकारी बोर्ड की बैठक बुलाने की प्रक्रिया और चुनाव व्यवस्था तक पहुंच चुका है। इन दोनों के बीच बढ़ते विवाद के बीच कई पूर्व खिलाड़ियों ने दिलीप तिर्की के समर्थन में आवाज उठाते हुए महासंघ के कामकाज में तत्काल सुधार की मांग की है।
पूर्व खिलाड़ियों के एक समूह ने अध्यक्ष दिलीप तिर्की के समर्थन में 25 सितंबर को दिल्ली में मेजर ध्यानचंद नेशनल स्टेडियम के बाहर प्रदर्शन किया। पूर्व ओलंपियन जफर इकबाल, वी. भास्करन और अशोक कुमार जैसे दिग्गज खिलाडियों ने दिलीप तिर्की के समर्थन किया। उन्होंने आरोप लगाया कि महासंघ में कुछ ऐसे लोग हैं जिन्हें खेल की पर्याप्त जानकारी नहीं है और वे तिर्की को हटाकर सारी शक्तियां अपने हाथ में लेना चाहते हैं।
पूर्व भारतीय महिला हॉकी कप्तान असुंता लकड़ा भी प्रदर्शन में शामिल थीं। उन्होंने झारखंड में युवा खिलाड़ियों के कथित उत्पीड़न पर आपत्ति जताने के बाद भोला नाथ सिंह पर उन्हें परिणाम भुगतने की धमकी देने का आरोप लगाया था।
प्रदर्शन कर रहे पूर्व खिलाड़ियों की प्रमुख मांग है कि अगले चुनाव तक हॉकी इंडिया का संचालन एक तदर्थ समिति को सौंपा जाए। उनका प्रस्ताव है कि समिति में पूर्व खिलाड़ी, एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश अथवा कानूनी विशेषज्ञ तथा खेल मंत्रालय या भारतीय खेल प्राधिकरण (SAI) का एक पर्यवेक्षक शामिल हो।
आखिर हॉकी इंडिया का ‘बॉस’ कौन?
कोई भी संस्था हो उसके संचालन की जिम्मेदारी पदाधिकारियों के एक समूह के पास होती है। हर पदाधिकारी के अधिकार और जिम्मेदारी बंटी होती है। पर कुछ परिस्थितियों में अंतिम निर्णय किसका होगा यह भी स्पष्ट रहता है। अब यंहा अध्यक्ष द्वारा श्रीवास्तव के निलंबन के आदेश के बावजूद वे पूरे अधिकार के साथ अपने पद पर बैठे हुए हैं। अध्यक्ष को आधे रास्ते छोड़कर आधिकारिक वाहन वापस चला जाता है। यह किसके आदेश से होता है ? यंही पर 'बॉस' कौन है का प्रश्न उठता है। जर्सी मामले में अध्यक्ष की कोई सुनवाई नहीं होना, निलंबन आदेश की उपेक्षा, उनसे वाहन वापस ले लेना गंभीर प्रश्न खड़े करता है। जिसका जवाब मिलना चाहिए।
हॉकी इंडिया की आधिकारिक संरचना को देखें तो अध्यक्ष और महासचिव दोनों निर्वाचित शीर्ष पदाधिकारी हैं। पर वास्तविक शक्ति किसके पास है यह प्रश्न स्वाभाविक है। हालिया घटनाओं को देखे तो साफ लगता है कि अध्यक्ष से ज्यादा शक्ति कंही और है। आम लोगों में संदेश यही जायेगा कि अन्य लोग अध्यक्ष से अधिक शक्तिशाली हैं। इन सवालों का अंतिम उत्तर हॉकी इंडिया के उपनियमों और उनकी विधिवत व्याख्या से ही निकल सकता है।
विडंबना यह है कि जिस समय भारतीय पुरुष और महिला टीमें जापान में ओलिंपिक टिकट के लिए मैदान पर संघर्ष कर रही हैं, उसी समय देश में हॉकी के प्रशासनिक ढांचे के भीतर अधिकारों की लड़ाई सार्वजनिक मंच पर पहुंच गई है।
खिलाड़ी मैदान पर भारतीय हॉकी की प्रतिष्ठा के लिए लड़ रहे हैं; संगठन के शीर्ष पदाधिकारी जिस विवाद में उलझे हैं उसे भारतीय हॉकी के लिये शुभ नहीं कहा जा सकता।
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