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कौटिल्य का इतिहास

History of Kautilya

माना कि ग्रीक साहित्य स्रोतों में चाणक्य, कौटिल्य या विष्णुगुप्त का नाम नहीं है। और मैगस्थनीज ने तो नाम बुद्ध का भी नहीं दिया है। लेकिन कौटिल्य को लेकर यह एक पंक्ति ही इतिहास की धारा का निर्माण कर देती है जिसकी अनदेखी कर कोई इतिहास नहीं लिखा जा सकता।  मेगास्थनीज के हवाले से स्ट्रैबो और एरियन नामक ग्रीक लेखकों ने यह पंक्ति उद्धृत कर रखी है कि ''निश्चित ही एक विद्वान ब्राह्मण ने चंद्रगुप्त को उस समय के राजा के विरुद्ध उठ खड़े होने का परामर्श दिया था।''  दूसरी ईस्वी सदी के रोमन लेखक जस्टिन ( ट्रोगुस) ने भी चंद्रगुप्त के साथ एक चतुर सलाहकार की उपस्थिति मानी है। पहली सदी के ग्रीक लेखक प्लूटॉर्क ने उस सलाहकार को विद्वान ब्राह्मण लिखा है। पहली सदी में ग्रीक विद्वान डियोडोरस ने भी उस ब्राह्मण को राजनीति का ज्ञानी पंडित बताया। यहां सवाल है कि वह परामर्श देने वाला सलाहकार महामंत्री ब्राह्मण कौन था? मैगस्थनीज, स्ट्रैबो, एरियन ने भले ही नामोल्लेख नहीं किया है लेकिन इतना तो संकेत कर ही रखा है कि चंद्रगुप्त के साथ कोई ब्राह्मण सलाहकार था।

मैगस्थनीज ने तो तक्षशिला के विवरण देते समय ही ब्राह्मण, सैन्य रणनीतिकारों, पशुपालकों, कृषकों समेत अनेक भारतीय समूहों का ब्यौरा दिया है। और ताज्जुब ये है कि जो ज्ञान 100 साल पहले अंग्रेजों ने इतिहास में विष रूप परोसना प्रारंभ किया कि आर्य बाहर से आए थे, इस आक्रमण का कोई ब्यौरा या  यूरोप से भारत आए लोगों की किसी रिश्तेदारी के संदर्भ में मैगस्थनीज ने या उसके बाद के किसी ग्रीक लेखन ने कोई संकेत तक नहीं दिया है। फिर भी लिखने वाले लिख ही गए हैं उलट-पुलट कि आर्य कहीं और से आए। खैर, मैगस्थनीज की हर बात को सच तो नहीं माना जा सकता। न ऐसा ही है कि जो ग्रीक विद्वान किसी का नाम नोटिस नहीं कर पाए, उस तथ्य को भी हम मानने से इंकार कर दें।  जैसे कि मैगस्थनीज ने स्पष्ट रूप से तो चंद्रगुप्त का भी सही नाम नहीं लिखा है, भगवान बुद्ध का तो कहीं कोई वर्णन ही नहीं दिया है। किन्तु इससे यह तो साबित नहीं होता कि भगवान बुद्ध थे ही नहीं।  विदेशी साहित्य स्रोत और यात्री अपने उद्देश्य के अनुसार लेखन कर रहे हैं। वह हर व्यक्ति की जानकारी नाम सहित देंगे, संभव नहीं। ग्रीक स्रोतों ने ब्राह्मणों सहित भारत के अनेक जातियों का विस्तृत ब्यौरा दे रखा है। चंद्रगुप्त के मंत्री को ब्राह्मण बताया है। अब सवाल है कि वह ब्राह्मण कौन था। तो सीधा उत्तर है कि इस प्रश्न का उत्तर तत्कालीन भारतीय साहित्य स्रोत देंगे।

विष्णु पुराण में पूरा ब्यौरा दिया है। परंपरा के अनुसार गुप्त सम्राटों के समय इसका संकलन हुआ। कामंदकी ने कौटिल्य को गुरू रूप में स्वीकार किया। वह भी उसी समय के लेखक हैं। दूसरी-तीसरी सदी में संकलित तंत्राख्यायिका में उल्लेख है। उस समय के लेखकों और लोक स्मृति से भी उत्तर मिल सकता है। मुद्राराक्षस में विशाखदत्त ने पूरी कथा ही लिख दी है। मेगास्थनीज(ईसा पूर्व तीसरी सदी) सिकंदर के बाद सेल्युकस के साथ रहा था। सेल्युकस के दूत के रूप में उसने अनेक अवसरों पर पाटलिपुत्र का दौरा किया। उसी ने अपनी यात्रा का सारा ब्यौरा लिखते हुए सुप्रसिद्ध पुस्तक इंडिका लिखी थी।  मेगास्थनीज के पहले भी इंडिका नाम से अनेक पुस्तकों का वर्णन ग्रीक साहित्य स्रोत देते हैं। हालांकि न तो मेगास्थनीज की इंडिका की मूल प्रति उपलब्ध है और न ही उसके पूर्ववर्तियों का लिखा ग्रंथ ही कहीं मूल रूप में उपलब्ध है। मेगास्थनीज के बाद उसके मूल ग्रंथ इंडिका के कुछ हिस्से को दूसरे ग्रीक साहित्य स्रोतों में विशेष स्थान प्राप्त है। इसमें एरियन और स्ट्रैबो के ग्रंथ शामिल हैं। कालांतर में ग्रीक के साथ जर्मन, अंग्रेजी आदि अनेक भाषाओं में इसके अनुवाद भी प्रकाशित हुए। ग्रीक साहित्य स्रोत स्ट्रैबो का समय ईसा पूर्व पहली सदी मानते हैं। एरियन का समय ईसा के जन्म के बाद पहली सदी है। मतलब कि एरियन ने स्ट्रैबो को पढ़ा था।  स्ट्रैबो ने जो लिखा उसका ब्यौरा एरियन ने भी हूबहू दिया है। दोनों मेगास्थनीज की इंडिका को ही पूर्व के भारत के संदर्भ में अपने ज्ञान का आधार मानते हैं। स्ट्रैबो ने और एरियन दोनों ने मेगास्थनीज को जगह जगह उद्धृत भी किया है। मेगास्थनीज के हवाले से दोनों लिखते हैं कि गंगा के किनारे भारत में बहुत से नगर हैं। इन नगरों में निवासी स्थान लकड़ियों के बने हैं। राजमहल भी लकड़ियों से बना है। यहां के लोग ईंट की जगह लकड़ियों की इमारत को प्राथमिकता देते हैं। दोनों ने लिखा है कि यहां के लोग किसी का शोषण नहीं करते। गुलाम या दास जैसी कोई प्रथा भारत में नहीं है। अच्छा आतिथ्य भी करते हैं। सात विशेष समूहों में यहां जातियां पाई जाती हैं। सभी स्वावलंबी हैं। कोई किसी की गुलामी नहीं करता है। इंडस नदी के मुहाने से प्रवेश के बाद की सारी भौगोलिक, सामाजिक, राजनीतिक अवस्था का ब्यौरा मैगस्थनीज के हवाले से लिखा है। इसमें नकारात्मक बातें भी लिखी हुई हैं। लेकिन जैसे जैसे गंगा, यमुना की घाटी में ग्रीक दूत पहुंचते हैं, उन्हें भारत की समृद्ध परंपरा देखकर अचरज होता है। पाटलिपुत्र में सेंड्रोकोट्स नामक राजा का ब्यौरा इसमें है। स्ट्रैबो, एरियन दोनों ने मेगास्थनीज के हवाले से इसी राजा के सलाहकार मंत्री के रूप में एक ब्राह्मण के होने का उल्लेख किया है।

अंग्रेजी अनुवाद में लिखा है-A CERTAIN LEARNED BRAHMAN ADVISED SANDROCOTTUS (CHANDRAGUPTA ) TO RISE AGAINST THE THEN KING (NAND)... इसका हिंदी अर्थ है कि निश्चित ही एक विद्वान ब्राह्मण ने चंद्रगुप्त को उस समय के राजा के विरुद्ध उठ खड़े होने का परामर्श दिया था।

अब कोई कहे कि चाणक्य हुए ही नहीं तो उन्हें सदैव ध्यान रखना चा हिए कि अर्थशास्त्र ग्रंथ में ही द्वितीय अधिकरण के 65वें श्लोक में लिखा है कि कौटल्येन नरेंद्रार्थे शासनस्य विधिः कृतः।। कौटिल्य ने राजा के निमित्त यह शासन संहिता निर्मित की है।

अब दुराग्रही कहेंगे कि अर्थशास्त्र ही झूठा है। तो ऐसे मूर्खों को यह भी बताना चाहिए कि कौटिल्य द्वारा अर्थशास्त्र में उद्धृत अनेक राजकीय संस्थाएं यथावत या किंचित परिवर्तन के साथ अपने परंपरागत नाम को लेकर ही आजतक चलती आ रही हैं। जैसे-समाहरणालय, समाहर्ता आदि।

अनेक बौद्ध ग्रंथों यथा महावंश ( छठी सदी) में कौटिल्य और चंद्रगुप्त का साथ-साथ उल्लेख आया है। लोक स्मृतियों में चाणक्य सदा ही जीवित रहे। उनके ग्रंथ के सामने आने के पूर्व एशियाटिक सोसायटी के अंग्रेज विद्वानों ने अर्थशास्त्र की पांडुलिपि खोज निकालने में एड़ी चोटी लगा दी।

इनका लक्ष्य था कि चाहे जैसे भी हो, यह ग्रंथ अंग्रेजों के पुस्तकालय में  आना ही चाहिए। भारत में अंग्रेजी राज में बायबिल हाथ में लिए प्रेस नया नया ही आया था। कोई छपाई तब अंग्रेजों की मंजूरी, उनके द्वारा निर्देशित संपादन के बगैर हो ही नहीं सकती थी।

कितने ही विद्वान रिश्वत वाली फेलोशिप के साथ इसी काम में पहले से नियुक्त कर दिए गए थे। मकसद था कि जैसे-मनु स्मृति में मिलावट की गई, उसी तरह से कौटिल्य अर्थशास्त्र में यदि मिलावट नहीं हुई तो साजिश का भंडाफोड़ हो जाएगा।

क्योंकि वर्ण व्यवस्था की विभेदकारी, आपत्तिजनक बातें जो मनु के साथ अंग्रेजोें ने जोड़ीं, वह कौटिल्य में जोड़ देने से मिशन पूरा हो जाएगा।

किंतु अंग्रेजी राज के दुर्भाग्य से मैसूर और केरल के वि्दवान शामशास्त्री, गणपति शास्त्री ने 1905 में अचानक प्राप्त हुई पांडुलिपि का अनुवाद मूल सहित मैसूर महाराजा के प्रयास से प्रकाशित कर दिया। तब अनेक अंग्रेज विद्वानों ने इस अर्थशास्त्र को झूठा कहा, क्योंकि उनकी योजना अधूरी रह गई। किन्तु उसी समय जब बाली द्वीप से एक अन्य पांडुलिपि अर्थशास्त्र की हूबहू प्राप्त हो गई और सिद्ध हो गया कि अर्थशास्त्र ग्रंथ वही है जिसका उल्लेख सैकड़ों संस्कृत, पाली आदि ग्रंथों में संकेत रूप में रहता आया है।

आज वही कौटिल्य और उनके अर्थशास्त्र को न मानने वाली धूर्ततापूर्ण अंग्रेजी रट कुछ मतभ्रमित विद्वान फिर से लगा रहे हैं। ऐसे मूर्खों के रेंकने से इतिहास के अमिट सत्य धूमिल नहीं हुआ करते।

भारत की इतिहास स्मृति को भ्रमित कर देने का उनका मिशन इस समय उफान पर है। लेकिन उन्हें ध्यान रखना चाहिए कि प्रमाण हटाते हटाते उनकी कलम ही हट जाएगी।

भगवान उन्हें सदबुद्धि दें।




प्रो राकेश उपाध्याय
(क्रमशः)

(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)

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