बि हार विधानसभा चुनाव 2025 का परिणाम भारतीय राजनीति के व्यापक परिदृश्य में दूरगामी प्रभाव छोड़ने वाला है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली जदयू और भाजपा की अगुवाई वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) ने 243 में से 202 सीटें जीतकर ऐसा अभूतपूर्व जनादेश हासिल किया, जो राज्य की राजनीतिक दिशा बदलने वाला साबित होगा। यह प्रदर्शन एनडीए का बिहार में अब तक का दूसरा सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है—सिर्फ 2010 के 206-सीटों वाले रिकॉर्ड से चार सीट पीछे। इसके उलट, तेजस्वी यादव के नेतृत्व वाले महागठबंधन को करारी हार मिली और गठबंधन महज 35 सीटों पर सिमटकर रह गया।
चुनाव दो चरणों—6 और 11 नवंबर—में हुए। दोनों चरणों में भारी मतदान हुआ: पहले चरण में 65.08 प्रतिशत और दूसरे में 69.20 प्रतिशत। कुल मिलाकर 67.13 प्रतिशत मतदान के साथ बिहार ने अपनी चुनावी इतिहास का सर्वाधिक वोट प्रतिशत दर्ज किया। यह जनता की सक्रियता ही थी जिसने एनडीए की निर्णायक जीत को और मजबूत आधार दिया।
यह जनादेश केवल एक राज्य परिणाम नहीं है; इसके दूरगामी राष्ट्रीय राजनीतिक निहितार्थ हैं। यह परिणाम न केवल बिहार में सत्ता-समीकरण बदलता है, बल्कि देश की आगामी राजनीतिक गठबंधनों, विपक्षी एकजुटता और नेतृत्व की दिशाओं को भी प्रभावित करेगा। बिहार के वोटरों ने एक बार फिर साबित किया कि नीतीश कुमार का चुनावी प्रभाव अब भी मजबूत है, कांग्रेस महागठबंधन की सबसे कमजोर कड़ी बनी हुई है और AIMIM का प्रभाव क्षेत्रीय सीमाओं तक ही सिमटा है। यद्यपि एग्ज़िट पोल्स एनडीए की बढ़त की भविष्यवाणी कर रहे थे, लेकिन वास्तविक नतीजों का फासला अनुमान से कहीं अधिक व्यापक था।
उच्च दाँव का चुनाव:
नेतृत्व, विरासत और नए समीकरण
2025 का बिहार चुनाव एक साधारण चुनाव नहीं था; यह कई नेताओं और दलों के लिए अस्तित्व तथा भविष्य-निर्माण का संघर्ष बन गया था। नीतीश कुमार के लिए यह उनकी 20 साल की शासन-यात्रा की पुनर्पुष्टि थी—क्या जनता उन्हें अब भी भरोसेमंद प्रशासक मानती है?—और तेजस्वी यादव के लिए यह पीढ़ीगत नेतृत्व की परीक्षा थी—क्या वे अपने पिता की राजनीतिक छाया से निकलकर खुद को विश्वसनीय विकल्प के रूप में स्थापित कर पाए?
पारंपरिक रूप से बिहार की राजनीति आरजेडी-कांग्रेस-वाम और एनडीए के बीच द्विध्रुवीय मुकाबले पर टिकी रही है। लेकिन इस बार चुनाव त्रिकोणीय हो गया था। प्रशांत किशोर का ‘जन सुराज’ आंदोलन नई राजनीतिक भाषा गढ़ना चाहता था, परंतु मतदाताओं पर इसका प्रभाव न्यून रहा।

भाजपा के लिए भी यह चुनाव बेहद महत्वपूर्ण था, खासकर 2024 लोकसभा चुनाव के बाद जब उसे नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू जैसे सहयोगियों पर निर्भर रहना पड़ा। महाराष्ट्र के बाद बिहार भाजपा के लिए वह निर्णायक मैदान बना जहाँ उसे हिंदी पट्टी में अपनी राजनीतिक पकड़ की पुनर्स्थापना करनी थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह कथन—“गंगा बिहार से बंगाल जाती है”—स्पष्ट संकेत देता था कि 2026 के पश्चिम बंगाल चुनाव की रणनीतिक भूमिका में बिहार को एक निर्णायक कड़ी के रूप में देखा जा रहा था।
महिला शक्ति की निर्णायक भूमिका: एक नया राजनीतिक भूगोल
इस चुनाव की सबसे महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक विशेषता रही—महिला मतदाताओं की रिकॉर्ड-ब्रेकिंग भागीदारी। पहली बार बिहार में महिलाओं ने न केवल पुरुषों से अधिक मतदान किया बल्कि उन्होंने चुनावी परिणाम को निर्णायक रूप से प्रभावित किया। महिला मतदान 71.6 प्रतिशत तक पहुँच गया, जबकि पुरुष मतदान 62.8 प्रतिशत रहा। ऐसे राज्य में जहाँ राजनीति लंबे समय तक जातिगत ध्रुवीकरण के इर्द-गिर्द घूमती रही, महिलाओं का यह उभार लोकतांत्रिक परिदृश्य में गहरे परिवर्तन का संकेत है।
नीतीश कुमार की दो दशक लंबी महिला-केंद्रित नीतियों का यह सबसे स्पष्ट प्रमाण था। लड़कियों को साइकिल, शराबबंदी, पंचायतों में महिलाओं की बढ़ी हुई हिस्सेदारी, पुलिस सेवाओं में आरक्षण, जीविका समूहों का विस्तार, और हाल ही में 25 लाख से अधिक महिलाओं को 10,000 रुपये का प्रत्यक्ष हस्तांतरण—इन सबने महिला समुदाय में शासन और नेतृत्व के प्रति विश्वास गहरा किया। महिलाओं ने इन योजनाओं को अपने आर्थिक, सामाजिक और घरेलू जीवन में ठोस बदलावों का कारण माना और इसी के आधार पर उन्होंने एनडीए की ओर निर्णायक झुकाव दिखाया।
इसके विपरीत, महागठबंधन महिलाओं के साथ भावनात्मक और विकासात्मक जुड़ाव स्थापित करने में असफल रहा। तेजस्वी यादव का अंतिम समय में 30,000 रुपये वार्षिक देने का चुनावी वादा विश्वसनीयता हासिल नहीं कर सका। महिला मतदाताओं ने इसे उन लाभों की तुलना में कम प्रभावी पाया जिन्हें एनडीए पहले ही दे चुका था।
बिहार का 2025 जनादेश स्पष्ट रूप से दिखाता है कि यह चुनाव जितना एनडीए की जीत है, उतना ही यह महिलाओं की उभरती राजनीतिक शक्ति की जीत भी है।
एनडीए की ऐतिहासिक विजय का सूत्र: सामाजिक समीकरण, शासन कथानक और संगठनात्मक कौशल
एनडीए की 2025 की जीत अचानक उत्पन्न हुई लहर नहीं थी; यह एक संगठित, सूक्ष्म और बहुस्तरीय रणनीति का परिणाम थी, जिसने बिहार की जटिल सामाजिक संरचनाओं और राजनीतिक fault lines को बारीकी से समझकर अभियान चलाया।

एनडीए ने व्यापक और समावेशी जातीय गठबंधन तैयार किया—एक ऐसा गठबंधन जो forward castes, युवा मतदाताओं, पिछड़े वर्गों, अत्यंत पिछड़ों, दलितों और महादलितों को एक मंच पर लाया। भाजपा ने अपने पारंपरिक सवर्ण मतदाताओं के अलावा युवाओं और नए वोटरों को जोड़ने में सफलता पाई। जदयू ने अपने मजबूत कोर वोटरों—कुर्मी और अत्यंत पिछड़ों—को संगठित बनाए रखा। वहीं रामविलास पासवान की पार्टी और हम जैसे सहयोगियों ने दलित आधार को मजबूती से थामे रखा। इसने आरजेडी के कभी अजेय माने जाने वाले एमवाई (मुस्लिम- यादव) समीकरण को कई क्षेत्रों में कमजोर कर दिया।
दूसरा निर्णायक तत्व रहा—“जंगल राज” का पुनर्स्मरण। एनडीए ने 1990 के दशक के आरजेडी शासनकाल की अराजकता और भय के माहौल को बार-बार सामने रखा। इसके मुकाबले एनडीए ने अपने शासन, विकास और कानून-व्यवस्था के मॉडल को सुरक्षित विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया। यह तुलना ग्रामीण और अर्ध-शहरी मतदाताओं में गहरी प्रभावी सिद्ध हुई।
महिला मतदाताओं की असाधारण भागीदारी ने चुनावी परिणाम को पूरी तरह बदल दिया। एनडीए ने “महिला + ईबीसी” को “ME factor” बताकर इसे अपनी रणनीति का केंद्र बनाया—और यह दांव निर्णायक साबित हुआ।
नीतीश कुमार पर उम्र और राजनीतिक बदलावों के आरोप लगे, लेकिन उनके प्रशासनिक रिकॉर्ड ने मतदाताओं पर भरोसा बनाए रखा। भाजपा-जदयू के बीच सीट बंटवारे से लेकर बूथ प्रबंधन तक, संगठनात्मक अनुशासन ने एनडीए को और भी मजबूत बनाया। इसके मुकाबले विपक्ष बिखरा हुआ दिखा—तेजस्वी का बेरोजगारी पर फोकस सतही लगा, जबकि कांग्रेस अपनी आंतरिक टूट के कारण चुनावी मैदान में लगभग नदारद थी।
कल्याणकारी योजनाएँ भी निर्णायक रहीं। 10,000 रुपये हस्तांतरण योजना को भले ही विपक्ष ने ‘चुनावी फायदा’ कहा, लेकिन गरीब परिवारों ने इसे अपनी आर्थिक जरूरतों के अनुरूप तात्कालिक राहत के रूप में देखा।
अंततः, एनडीए की जीत तीन तत्वों का संगम थी—शासन क्षमता, सामाजिक इंजीनियरिंग और जमीनी निष्पादन।
महागठबंधन की पराजय: नेतृत्वहीनता, संगठनहीनता और गलत राजनीतिक समझ
महागठबंधन की करारी हार भारतीय विपक्ष के लिए एक अध्ययन का विषय है। यह चुनाव दिखाता है कि जब नेतृत्व कमजोर हो, संदेश अस्पष्ट हो और संगठन विखंडित हो, तो गठबंधन कितना भी बड़ा क्यों न हो—मतदाताओं का विश्वास नहीं जीत सकता।
इस विफलता का केंद्र था—कांग्रेस और उसके नेता राहुल गांधी। तेजस्वी यादव, यद्यपि ऊर्जावान थे, लेकिन आरजेडी के ‘जंगल राज’ वाले अतीत की छवि से निकल नहीं पाए। उन्हें एक मजबूत सहयोगी की जरूरत थी, लेकिन कांग्रेस ने उलट उन्हें और कमजोर कर दिया।
राहुल गांधी की चुनावी उपस्थिति अनियमित रही। उन्होंने कम रैलियाँ कीं, स्थानीय मुद्दों से कमजोर जुड़ाव दिखाया और भाषण भी बिहार की वास्तविकताओं से कटा हुआ लगे। सबसे अधिक नुकसान तब हुआ जब वे चुनाव के बीच ‘वेकेशन’ पर चले गए—इसने मतदाताओं और पार्टी कार्यकर्ताओं दोनों को संकेत दिया कि कांग्रेस चुनाव जीतने के प्रति गंभीर नहीं है।
सीट बंटवारे में भी कांग्रेस का अतार्किक दबदबा महागठबंधन के लिए नुकसानदेह रहा। कमजोर उम्मीदवारों के कारण कई सीटें लड़ाई में आने से पहले ही लगभग हार मानी जा चुकी थीं। कांग्रेस का जमीनी ढाँचा भी लगभग न के बराबर था, जिससे महागठबंधन की कई सीटें पहले ही दिन से खतरे में आ गईं।
तेजस्वी यादव बेरोजगारी को मुख्य मुद्दा बनाना चाहते थे, लेकिन उनका संदेश और वादे—विशेषकर सरकारी नौकरियों के लाखों पद भरने जैसे दावे—व्यावहारिकता से दूर लगते थे। एनडीए ने इसे वास्तविक आर्थिक योजना के अभाव से जोड़कर उनके अभियान को अस्थिर दिखाया।महिलाओं, दलितों और ईबीसी जैसे वर्गों के बीच एनडीए की पकड़ मजबूत थी, जिसे महागठबंधन पहचानने में भी देर कर गया। नतीजतन, उसका पारंपरिक एमवाई समीकरण व्यापक गठजोड़ के सामने टिक नहीं पाया।
महागठबंधन की सबसे बड़ी समस्या थी—नेतृत्व का अभाव। राहुल गांधी न केवल सीमित समय के लिए आए, बल्कि जब आए तो संदेश अस्पष्ट था। उनकी आलोचनाएँ चुनाव आयोग और अन्य संस्थानों की ओर केंद्रित थीं, जिससे लगता था कि गठबंधन संभावित हार के लिए पहले से बहाना तैयार कर रहा है। इससे जनता में यह धारणा बनी कि यह गठबंधन एक विश्वसनीय विकल्प प्रस्तुत नहीं कर सकता।
अंततः, महागठबंधन की पराजय कई कारणों का परिणाम थी, लेकिन सबसे बड़ा कारण था—राहुल गांधी की अनास्था, अनिश्चितता और अप्रभावी नेतृत्व।
निष्कर्ष: जनादेश का संदेश — नेतृत्व, विश्वसनीयता और राजनीतिक परिपक्वता
बिहार चुनाव 2025 यह स्पष्ट संदेश देता है कि लोकतंत्र में केवल नारे और गठबंधन पर्याप्त नहीं होते—विश्वसनीय नेतृत्व, सुदृढ़ संगठन, और जनता का विश्वास जीतने की क्षमता ही सफलता का वास्तविक आधार है। एनडीए ने इन तीनों मोर्चों पर मजबूती दिखाई, जबकि महागठबंधन तीनों में विफल रहा।
राहुल गांधी की चुनावी उदासीनता, अनियमितता और रणनीतिक अस्पष्टता महागठबंधन की हार के सबसे बड़े कारणों में रही। तेजस्वी यादव अपनी तरफ से प्रयास करते रहे, लेकिन नेतृत्वहीन गठबंधन जनता को विकल्प का भरोसा नहीं दे सका। यह चुनाव सिर्फ सीटों या प्रतिशत का खेल नहीं है; यह भारतीय राजनीति को दिया गया एक स्पष्ट और कठोर संदेश है—जनता उसी के साथ खड़ी होती है जो नेतृत्व की जिम्मेदारी उठाए, मुद्दों को समझे और भविष्य का विश्वसनीय रास्ता दिखाए। जो यह करने में असफल होता है, वह लोकतांत्रिक संघर्ष में स्वयं को हाशिये पर पहुंचा देता है।
वोट-चोरी का छलावा: असल संकट कांग्रेस की साख में, ना कि किसी साजिश में
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के नतीजों के बाद कांग्रेस जिस “वोट-चोरी” की कहानी गढ़ने की कोशिश कर रही है, वह तथ्य और आंकड़ों के सामने टिक ही नहीं पाती। पार्टी ने आरोप लगाया कि ईवीएम और “सिस्टम” ने उसके वोट खा लिए, लेकिन जब वोटों का गणित खोला गया, तो सबसे कड़वी सच्चाई सामने आई—कांग्रेस की हार किसी बाहरी साजिश की नहीं, बल्कि अपनी राजनीतिक अप्रासंगिकता और संगठनात्मक ढहान की देन है। यह चुनाव परिणाम साफ बताते हैं कि कांग्रेस का जनाधार वहीं खिसका जहाँ उसके मुख्य मुकाबले में बीजेपी थी ही नहीं।
सबसे पहले मूल तथ्य—कांग्रेस ने बिहार में 61 सीटों पर चुनाव लड़ा। इनमें से केवल 28 सीटों पर उसका मुकाबला सीधे तौर पर बीजेपी के साथ हुआ, और इन सभी 28 पर वह हार गई। लेकिन सबसे दिलचस्प डेटा आगे है—बाकी सीटों पर कांग्रेस बीजेपी से नहीं, बल्कि अपने ही सहयोगी दलों और विपक्षी दलों से पिटी। RJD, CPI-ML, BSP, AIMIM और छोटे क्षेत्रीय दलों ने कांग्रेस को वहाँ ऐसी मात दी कि दूसरे नंबर पर आने का भी सम्मान नहीं मिला।
और तो और, 6 सीटें ऐसी थीं जहाँ कांग्रेस न सिर्फ हारी, बल्कि वहाँ बीजेपी या एनडीए दूसरे नंबर पर भी नहीं थे। यह कांग्रेस के प्रचारित “वोट-कटवा”, “ईवीएम गड़बड़ी”, “बीजेपी की वोट चुराने की मशीनरी” जैसे दावों की पोल खोल देता है। सवाल सीधा खड़ा होता है—जहाँ एनडीए मैदान में भी मजबूत नहीं था, वहाँ भी कांग्रेस कैसे हार गई? कौन उनके वोट चुरा रहा था? बीजेपी या जनता का भरोसा?
वास्तविकता यह है कि कांग्रेस का वोट-आधार धीरे-धीरे पूरी तरह कट चुका है। पार्टी आज बिहार के मतदाता के लिए विकल्प तक नहीं रह गई। उसने जिन सीटों पर उम्मीद लगाई थी, वहां उसकी हार का सबसे बड़ा कारण उसके सहयोगियों की मजबूत पैठ और ग्राउंड रिपोर्टिंग की कमी रही। महागठबंधन की राजनीति में भी कांग्रेस एक बोझ की तरह दिखती रही और उसकी सीटों का बंटवारा इससे ज्यादा था जितना उसका जमीनी प्रभाव। RJD ने अपनी जातीय-सामाजिक समीकरणों के साथ मजबूती दिखाई, CPI-ML ने अपने क्षेत्रों में ठोस कैडर और प्रतिबद्ध वोटरों पर भरोसा किया। लेकिन कांग्रेस के पास न वोटर बेस था, न कैडर, न नेतृत्व, न ऊर्जा। कांग्रेस की सबसे बड़ी समस्या यह रही कि उसने बिहार को सिर्फ चुनावी अखाड़ा समझा, लेकिन ग्राउंड पर संगठन खड़ा करने की कोशिश नहीं की। पार्टी पाँच साल में सिर्फ बयानबाज़ी तक सीमित रही। क्षेत्रीय मुद्दों, स्थानीय नेतृत्व, उम्मीदवारों की तैयारी, बूथ लेवल की रणनीति—इन सब पर कांग्रेस लगभग अनुपस्थित रही। इसका परिणाम यह हुआ कि जिन सीटों पर RJD और CPI-ML का मजबूत जनाधार था, वहाँ कांग्रेस दूर-दूर तक प्रतिस्पर्धी नहीं दिखी।
अगर कांग्रेस के आरोपों में थोड़ी भी सच्चाई होती तो कम से कम वह उन सीटों पर तो सम्मानजनक प्रदर्शन दिखाती जहाँ एनडीए नहीं था। लेकिन इन सीटों पर भी कांग्रेस दो-तीन हजार वोटों के अंतर से नहीं, बल्कि भारी अंतर से हारी। यह हार वोट-चोरी नहीं, भरोसा-चोरी है—जिसमें दोषी बीजेपी नहीं, बल्कि स्वयं कांग्रेस है, जिसने मतदाताओं के विश्वास को संभाल कर रखने का प्रयास ही नहीं किया।
कांग्रेस का “वोट-चोरी” नैरेटिव एक तरह से उसकी राजनीतिक विफलता को ढकने का प्रयास है। जब कोई दल अपनी जमीन खो देता है, तो उसे अपनी हार का कारण अपने भीतर तलाशना चाहिए, किसी बाहरी काल्पनिक साजिश में नहीं। लेकिन कांग्रेस ने आत्ममंथन की जगह आरोपों को चुन लिया है, जो जनता के सामने उसकी विश्वसनीयता को और खत्म करता है।
आज बिहार में चुनाव परिणाम एक स्पष्ट संदेश देते हैं—कांग्रेस न तो महागठबंधन की स्वाभाविक नेतृत्वकर्ता है, न विपक्ष का केंद्रीय स्तंभ। पार्टी की हार को किसी ईवीएम-कथा या “चोरी” के शोर में छिपाने से कुछ हासिल नहीं होने वाला। बिहार का मतदाता इससे पहले से कहीं ज्यादा परिपक्व हो चुका है। वह जानता है कि कौन उसके लिए काम करता है और कौन सिर्फ बयान देता है।
इस चुनाव ने साबित कर दिया कि कांग्रेस की हार किसी षड्यंत्र की नहीं, उनके लगातार घटते जनाधार, नेतृत्वहीनता और संगठनात्मक कमजोरी की देन है। वोट-चोरी नहीं हुई—कांग्रेस का “वोट-बेस” ही गायब हो गया है। और जब बक्से में वोट ही नहीं हों, तो चोरी का आरोप सिर्फ मज़ाक बनकर रह जाता है। (नी.कृ.)

नीलाभ कृष्ण
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)
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