हिन्दू संस्कृति दुनिया की प्राचीनतम संस्कृतियों में से एक है, इसकी अनेक विशेषताएं हैं। हिन्दू संस्कृति में अध्यात्म को बहुत महत्व दिया जाता है। इसमें सांसारिक सुखों से परे जाकर ईश्वर प्राप्ति को महत्व दिया जाता है। हिन्दू संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें प्रत्येक व्यक्ति को अपनी प्रकृति के अनुसार साधना करने की सुविधा है। जबकि अन्य किसी भी संस्कृति ने उनके मानने वालों को यह सुविधा प्रदान नहीं की। इसी कारण हिन्दू संस्कृति अध्यात्म से लिए सबसे उत्तम मानी जाती है। हिन्दू संस्कृति के अंतर्गत सनातन धर्म की बात होती है , जिसका अर्थ होता है सार्व भौमिक धर्म और हिन्दू का अर्थ होता है "हीनं दुष्यति इति हिन्दूः। " अर्थात जो अज्ञानता और हीनता का त्याग करे, उसे हिन्दू कहते हैं।
प्राचीन भारतीय शिक्षा क्रम में 14 विद्या और 64 कलाओं का उल्लेख मिलता है - इन कलाओं का उल्लेख यजुर्वेद के तीसवें अध्याय में भी मिलता है। भगवान् श्रीकृष्ण ने अपने गुरु सांदीपनि जी से इन कलाओं का ज्ञान प्राप्त किया था। हिन्दू संस्कृति में गायन और वादन का बहुत अधिक महत्व रहा है। हिन्दू धर्म में संगीत को शिव और सरस्वती मां के प्रेरणा स्रोत माना जाता है। संगीत में भारतीय संस्कृति के विचारों, मान्यताओं और आदर्शों को विशेष स्थान दिया गया है। भारतीय संगीत परंपरा बहुत पुरानी है। संगीत के माध्यम से ईश्वर की पूजा और अर्चना की जाती है। संगीत में माध्यम से अग्नि को प्रकट करना, बारिश करवाना, खूंखार जानवरों को भगाना इत्यादि किया जाता था । संगीत के माध्यम से प्रेम की भावनाओं को व्यक्त किया जाता था।

हिन्दू संस्कृति में वनस्पतियों, अग्नि, वायु और जल को भी देवता माना जाता है - वनस्पति देव, दस विश्वदेवों में से एक हैं। वनस्पति देव वृक्ष लता पल्ल्वों का भरण पोषण करते हैं। वनस्पतियों का अपमान करने या उन्हें हानि पहुँचाने पर वे दंड देते हैं। अग्नि को देवी-देवताओं का मुख मन जाता है जिसके माध्यम से प्रसाद उन तक पहुँचता है। जल देवता वरुण को पुराणों में दिक्पालों में से एक और पश्चिम दिशा के अधिपति के रूप माने जाते हैं। वायु देवता को जीवन और ऊर्जा का स्रोत माना जाता है। उन्हें प्राण देव भी कहा जाता है।
हिन्दू धर्म में 16 संस्कारों का उल्लेख है - हिन्दू धर्म सिखाता है कि मनुष्य-जन्म ईश्वरप्राप्ति के लिए है; इसलिए जन्म से लेकर मृत्यु तक प्रत्येक प्रसंग में ईश्वर के निकट पहुंचने के लिए आवश्यक उपासना कैसे की जाए, इसका मार्गदर्शन धर्मशास्त्र में किया गया है। जन्म से लेकर विवाह तक जीवन का एक चक्र पूर्ण होता है। उसी प्रकार का चक्र पुत्र / कन्या के जन्म से उसके विवाह तक चलता है । पीढी-दर-पीढी ऐसा चलता रहता है। गर्भधारण से विवाह तक के काल में जीवन के प्रमुख सोलह प्रसंगों में, ईश्वर के निकट पहुंचने हेतु होते हैं सोलह संस्कार!
भारतीय संस्कृति को संजोकर रखने वाला नेपाल - नेपाल के नोट पर किसी राजनेता के चित्र के स्थान पर हिमालय का चित्र होना, हिमालय एक संस्कृति है ऐसा बताने का प्रयास है। सच तो यह है कि भारत भी हिमालय की धरोहर है। भारत को यह बात विश्व को बताने की आवश्यकता है।
इण्डोनेशिया में पग-पग पर दिखाई देने वाले प्राचीन हिन्दू संस्कृति के अवशेष - एक समय जहाँ समुद्र मंथन हुआ था वह भूभाग आज इण्डोनेशिया है। 15वीं शताब्दी तक इण्डोनेशिया में श्रीविजय, मातरम्, शैलेंद्र, संजया, मजपाहित जैसे हिन्दू राजाओं का राज्य था। पश्चात, मुसलमानों के आक्रमण से वहां की भाषा और संस्कृति में परिवर्तन हुआ। तब भी, वहां के नागरिक पहले हिन्दू थे, इसलिए उनके दैनिक जीवन में हिन्दू धर्म के विविध पक्ष दिखाई देते हैं। इंडोनेशिया में नगरों के नाम भी सुंदर हैं। इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता का मूल नाम जयकर्ता है! इसकी सांस्कृतिक राजधानी योग्यकर्ता है। इस नगर की वायव्य दिशा में पूर्वकर्ता और पूर्व दिशा में सूरकर्ता नगर है। यहां की जनसंख्या में 87 प्रतिशत मुसलमान हैं। यह विश्व का सबसे बडा इस्लामी देश है। फिर भी, यहां के लोगों के नाम युधिष्ठिर, भीमा, कृष्णा, वायु, सूर्या, आदिपुत्रो, शिखंडी, भैरवा, सूर्यधर्मा, अर्जुना इस प्रकार के हैं। विष्णु नाम यहां बहुत प्रचलित है।
हिन्दू संस्कृति रक्षण हेतु सनातन संस्था का योगदान- इंडोनेशिया, मलेशिया, कंबोडिया और थाइलैंड आदि देशों में हिन्दू संस्कृति के मंदिरों के अवशेष हैं; परंतु डिस्कवरी और नेशनल जियोग्राफिक चैनल आदि संसार के सबसे बडे दूरचित्रप्रणाल वहां के मंदिरों का व्यवस्थित चित्रीकरण नहीं करते तथा इसका सत्य इतिहास भी नहीं बताते, यह इन देशों में जाने आने के उपरांत ध्यान में आया। ये चैनल उनके चित्रीकरण में मूल हिन्दू संस्कृति नहीं दिखाते। संसार भर में स्थित हिन्दू धर्म के चिन्हों और उनकी जानकारी के लिए भारत शासन स्वतंत्रता के उपरांत से निष्क्रिय रहा। पिछले कुछ वर्षों से भारतीय शासन द्वारा इस हेतु प्रयास आरम्भ हुए हैं। सनातन संस्था द्वारा वर्ष 2010 से विश्व के कई देशों में घूम कर वहां के देवालय, सांस्कृतिक विरासत, ऐतिहासिक वास्तु, हिन्दुओं की मांग विशिष्ट प्रथाएं, महान व्यक्ति और संतमहात्माओं का चित्रीकरण, भेंटवार्ता, उनसे संबंधित पुस्तकें, दृश्य-श्रव्य चक्रिकाएं, ग्रंथ आदि के माध्यम से उसकी विशिष्ट जानकारी एकत्रित की जाती है। वहां की कुछ वस्तुएं भी आध्यात्मिक शोध के लिए संजोकर रखी जाती है। कुछ स्थानों पर वैज्ञानिक उपकरणों द्वारा आध्यात्मिक शोध भी किया जाता है। यदि किसी स्थान पर हिन्दू संस्कृति का ह्रास हुआ हो अथवा धर्मपालन का अभाव दिखाई दे रहा हो, तो उसकी जानकारी भी प्रबोधन करने के उद्देश्य से एकत्रित की जाती है।
कृतिका खत्री
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)
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