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हीट वेव : चुनौती और उपाय

Heat wave: challenges and solutions

नए साल 2025 का अभी तीसरा महीना शुरू ही हुआ  है  की  बढ़ते  तापमान के साथ भारत  के  विभिन्न  राज्यों  में  हीटवेव(लू) ने अपनी  उपस्थिति  दर्ज  कराना  शुरू  कर  दिया  है। वास्तव  में  भारतीय मौसम विभाग के  अनुसार  फ़रवरी   का  महीना  भारत  में  शीत  ऋतु के  अंतर्गत  आता  है  पर  इस  वर्ष  फ़रवरी  के  महीने  में  ही  गोवा  और  महाराष्ट्र  राज्यों  ने  हीटवेव  की  उपस्थिति  अंकित  की। भारतीय मौसम विभाग ने  अपने  रिपोर्ट  के  माध्यम  से  बताया  की  इस  वर्ष  फ़रवरी  का  महीना  पिछले  125 सालों  में  अब  तक   का  सबसे  गर्म  फ़रवरी  रहा।   वहीं  15 मार्च  को  ओडिशा  में  भी  राज्य  ने  साल  का  पहला  हीटवेव  का  दिन  अंकित   किया  जो  की  पिछले  4 सालों  के  रिकॉर्ड  में  सबसे  जल्दी  हीटवेव  का  आगमन  है।  विदित है  िक 2024 में  27 मार्च  को  पहला  हीटवेव अंकित  किया  गया  था।  यही नहीं संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (यूनिसेफ) के  अनुसार  हीटवेव  की  तीव्रता  में  प्रत्येक  वर्ष  वृध्दि  अंकित की  जा रही  है जो  कि  न  केवल  सामान्य  से  लम्बी  अविध  तक  बनी   रही  है  अपितु  गंभीर  परिस्थिति भी  उत्पन्न  कर  रही  है।  हीटवेव  के चपेट में  न केवल मानव अपितु  जीव -जंतु सहित राष्ट्रों  की  अर्थव्यवस्थताएं  भी  नकारात्मक   रूप  से  प्रभावित  हो  रही  हैं। विश्व मौसम विज्ञान संगठन के  अनुसार  विगत  50 वर्षों  से  औसतन  प्रत्येक  दिन  कोई  न   कोई   मौसम  सम्बन्धी तथा  जलवायु  परिवर्तन  सम्बन्धी   घटनाएं  घटित  हुई  हैं। अतः  विश्व  में  मौसम  सम्बन्धी  चरम  घटनाओं  का  यह  क्रम  दिन  प्रतिदिन  अत्यंत  जटिल  एवं  विनाशकारी  ही  होता  जा  रहा  है तथा भारत  में  मौसम  सम्बन्धी  चरम  घटनाओं (हीटवेव ) का  आगमन  हो  चुका  है  जो  की  एक  भयावह  शुरुवात  है एवं ये आगे  आने  वाले  कुछ  महीनों  में  न  जाने  कितने  रिकॉर्ड तोड़ेंगी और  कितनी  जानलेवा साबित होंगी।

वैसे  तो  भारत  कई  प्राकृतिक  आपदाओं   के  लिए  संवेदनशील  है  परन्तु  उष्णकटिबंधीय देश  होने   के  नाते  भारत  हीटवेव  के  लिए  भी  उच्च   रूप  से  संवेदनशील  है।  विश्व  मौसम  विज्ञान  संगठन  के  अनुसार  जब  किसी  स्थान  पर  असामान्य  रूप  से  गर्म  दिन  और  गर्म  रातों  के  फलस्वरूप  अतिरिक्त  ऊष्मीय  तापमान  दर्ज  किया  जाता  है  तो  ऐसी  अवधी  को  हीटवेव  के  अंतर्गत  सम्मिलित  किया  जाता  है। यह  अवधी  कुछ  घंटो  से  लेकर  कुछ  महीनों  तक  बनी  रह  सकती  है। चूँकि  सामान्य  रूप  से  धरती   दिन  में  एकत्रित  की  गयी  सौरऊष्मा  को  रात्रि  के  समय  विकिरित  करती  है  जिसके  परिणामस्वरूप  मौसम  अनुकूलन  बना  रहता  है  परन्तु  जब  किन्हीं  कारणों  से  रात्रि  में  भी  तापमान  अधिक  बना  रहे  तो  ऐसे  में  यह  पहले  से  संगृहीत  ऊष्मा  अगले  दिन  में  प्राप्त  सौर-विकिरण  के  साथ संचयित  होने  के  कारण  गर्मी  की  तीव्रता  में  और  अधिक  वृद्धि  कर  देती  है फलस्वरूप  हीटवेव  जैसी  स्थिति  उत्पन्न  हो  जाती  है।

वहीं भारतीय  मौसम  विज्ञान  संगठन  के  अनुसार  मैदानी  क्षेत्रों  का  तापमान  40 डिग्री  सेल्सियस  और  पहाड़ी  क्षेत्रों  का  तापमान  30 डिग्री  सेल्सियस  से  अधिक  होने  पर  ही  हीटवेव  की  स्थिति  समझी  जाएगी  एवं  विस्तृत  रूप  से  जब किसी  स्थान  के   सामान्य  तापमान  में  6 डिग्री  सेल्सियस  से  अधिक  वृद्धि  की  जाये  तो यह  घटना   भी  हीटवेव  के  अंतर्गत  शामिल  किया  जाता  है। 

हीटवेव  के  कारण

वैश्विक  उष्मन, जिसमें  मानव  जनित  कारणों  से  उत्पन्न  होने  वाली  हरित गृह  गैसों  का  अधिकतम  उत्सर्जन, ऊर्जा  आवश्यकताओं  एवं  जीवन  शैली  को  सुचारु  बनाये  रखने  के  लिए  पारम्परिक  ऊर्जा  स्रोतों  का  उपयोग, इत्यादि  के  अतरिक्त  भारत  के  लिए  कुछ  मौसमी  दशाएं  भी  हीटवेव  की  तीव्रता  में  वृद्धि  करने  के  लिए  महत्वपूर्ण  कारक  हैं। जैसे इस  वर्ष फ़रवरी  माह  से  ही  हीटवेव  अंकित  किये  जाने  के  कई  कारणों  में  से  एक  महत्वपूर्ण  कारण  ठंडी  में  होने वाली वर्षा  (पश्चिमी  विक्षोभ  एवं  लौटते  हुए  मानसून ) का  सामन्य  से  कम  होना  है।  ऐसे  में  भारत  के  कई  भौतिक  भाग  सूखे  तथा  शुष्क  ही  रह  गए।  साथ  ही  एल-नीनो  जैसी  स्थिति  इन   मौसमी  घटनाओं  को  अत्यधिक भयावह  बना  देती  है।  चूँकि  वर्तमान  भौतिक  युग  में  व्यक्ति  सुखी  और  भोग -विलासिता  पूर्ण  जीवन  व्यतीत  करने  के  लिए  ऐसे  संसांधनों  पर  निर्भर  है  जो  की  प्रत्यक्ष  एवं  परोक्ष  रूप  से  ग्रीन  हाउस  गैसों  के  उत्सर्जन  एवं  वैश्विक  उष्मन  में  महत्वपूर्ण  भूमिका  निभाते  हैं।   इनके  अतिरिक्त   नगरीकरण  के  फलस्वरूप  शहरों  में  कंक्रीट  द्वारा  निर्मित  ढांचे  तापमान  का   उच्चतम  अवशोषण  करते  हैं, साथ  ही  हरित क्षेत्र  कम  होने  की  वजह  इन  नगरों  में  वातावरण  अनुकूलन  न  के  बराबर  होता  है  जिससे  हीटवेव  के  समय  शहरी  क्षेत्रों  में  तापमान  ऊँचा   बना  रहता  है  जिसे  नगरीय  ऊष्मा  द्वीप  प्रभाव  भी  कहते  हैं। हालाँकि   हीटवेव  की  यह  समस्या  पिछले  कुछ  वर्षों  से  अधिक  भयावह  हुई  है  जिससे  निपटने  के  लिए  राज्यों  ने  लघु  अवधी  में  त्वरित  उपाय  किये  थे  किन्तु  इस  तरह  से  समस्या  का  केवल  सतही  निदारण  ही  किया  जा  सकता  है।

अतः  इसके  निस्तारण  के  लिए   भारत  को  दीर्घकालिक  उपायों  को  अपनाने  की  आवश्यकता है।  जिनमें  सबसे  महत्वपूर्ण  कदम  प्रकृति  से  सामंजस्य बिठाते  हुए  ऐसी  आदतों और साधनों  को  शामिल  करना  है जिससे  बिना  किसी  कृत्रिम   उपाय   (शीतलीकरण  यंत्र ) एवं  खर्चीली  तथा  महँगी  (जीवाश्म  आधारित  ऊर्जा  जैसे- कोयला  ) ऊर्जा  उपयोग  के  बिना  हीटवेव  की  तीव्रता  को  कम  किया  जा  सके। इस  क्रम  में  हमें  उन  उपायों  को  सम्मिलित  करना  होगा  जिन्हें  हम  दैनिक  रूप  से  न  केवल  अपने  घरों  बल्कि  पेशेवर  ज़िन्दगी  में  कार्यालयों  और  औद्योगिक  भवनों  में  भी  शामिल  कर  सकें।  हालाँकि  वर्तमान  समय  में  अंधाधुंध  पश्चिमीकरण  के   फलस्वरूप  कांच  के  भवन  निर्माण,  खड़ी- खड़ी  लम्बी  मीनारों  जैसे  भवनों  का  निर्माण  जिनमें  किसी  छज्जे  का  न  होना  वास्तव  में  एक  भारी   भूल  है।  उष्णकटिबंधीय  भौगौलिक  स्थिति  एवं  जलवायविक  प्रक्रम  को  ध्यान  में  रखते  हुए  यदि  पारम्परिक  ढांचे  को  नवीनीकृत  कर  आधुनिक  भवनों  का  निर्माण  होता  तो शायद इस समय  हीटवेव  जैसी  समस्या  अपने  चरम  पर  नहीं  होती।  हालाँकि  यह  केवल  एक  पहलु  ही  है अर्थात  हीटवेव  जैसी  समस्या  केवल  एक  कारण  से  ही  नहीं  है। अतः  एकमात्र  विकल्प  फिर  हमारे  पास  यही रहता  है  की  जितना  हो  सके  संसाधनों  का  औचित्यपूर्ण  उपयोग  सुनिश्चित  किया  जाये।  नए  भवन  निर्माण  (औद्योगिक, रिहायशी, सरकारी  भवन ) या  शरीकरण  की  प्रक्रिया  में  उन  सभी  मूलभूत  सिद्धांतों  को आत्मसात  करने  का  प्रयास  किया  जाये  जो  की  देशज  प्रकृति  (काल  तथा स्थानिक  रूप  से  अनुकूल ) की हों।  साथ  ही प्राकृतिक रूप से एक अच्छे वातानुकूलित  एवं ताप-अनुकूलित भवन निर्माणों पर आवश्यक बल दिया जाये एवं शहरी क्षेत्रों में एक  निर्धारित मात्रा में हरित पट्टी (वृक्षारोपण) का समायोजन करने की आवश्यकता है । 

विदित  है  की  जलवायु  परिवर्तन  की  समस्याओं  से  निजात  पाने  के  लिए  न  केवल  राष्ट्रीय  बल्कि  अंतर्राष्ट्रीय  सहयोग  की  आवश्यकता  होती  है  अतः  युद्ध  स्तर  पर नीति  निर्माण  एवं  उनके  क्रियान्वयन  को  सुनिश्चित करना, सरकारी  तथा  गैर -सरकारी  संस्थानों  की  प्राथमिकता  होनी  चाहिए क्योँकि  अतंतः  इन  सभी  दुष्प्रभावों  के   शिकार  सामान्य  तौर  पर  गरीब  और हाशिये पर स्थित वंचित व्यक्ति  ही  होता  है, जिसके  पास  न  घर  है  और  ना  ही आधरभूत  आवश्यकतों की पूर्ति करने के लिए पूँजी।  चूँकि  हीटवेव  इत्यादि  कारणों से ज्यादा  मृत्यु उन  व्यक्तियों  की  ही  होती है जो  अपने  घर  से  दूर  किसी  दूसरे  राज्य  में  मजदूरी या रिक्शा चालान जैसी आजीविकाओं  में  लगे  हुए  हैं और ऐसे  में  इन्हें ज्यादातर समय  धूप  में  और गर्मी  में  काम  करना  होता  है। ज्यादा  से ज्यादा  पानी पीना, शरीर  को  हाइड्रेटेड  रखना, दोपहर में 12-3 बजे  तक  घरों  से बहार न निकलना,  हीटवेव  से  बचने  के  कुछ  महत्वपूर्ण  उपाय  हैं।





स्मृति उपाध्याय
असिस्टेंट प्रोफेसर
दिल्ली यूनिवर्सिटी
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)

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