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“HAL अनुसंधान एवं विकास में बड़ा निवेश कर रहा है”

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देश के लिए हमारी रक्षा आवश्यकताओं में आत्मनिर्भरता बेहद आवश्यक है। विदेशी उपकरण निर्माताओं और विदेशी आपूर्तिकर्ताओं पर हमारी निर्भरता धीरे-धीरे कम होनी चाहिए, ताकि हम शुद्ध आयातक से शुद्ध निर्यातक बन सकें।  आज हम तेजी से उस लक्ष्य की ओर आगे बढ़ रहे हैं। देर-सबेर, भारत अपनी रक्षा जरुरतों को पूरा करने के बाद हमारे उत्पादों का निर्यात भी शुरू कर देगा, ”हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड  के सीएमडी सी. बी. अनंतकृष्णन ने संपादक दीपक कुमार रथ को दिए एक विशेष साक्षात्कार ये जानकारियां प्रदान कीं-

 

 

  • पिछले दशक में एयरोस्पेस और रक्षा उद्योग में HAL ने सबसे महत्वपूर्ण कौन सी उपलब्धियां हासिल की हैं?

पिछले एक दशक में HAL अधिक से अधिक स्वदेशी रक्षा उत्पाद, स्वदेशी विमान और हेलीकॉप्टर लेकर आया है। पहले, हमारे पास केवल उन्नत हल्के हेलीकॉप्टर थे और आज हमारे पास हिंदुस्तान टर्बो ट्रेनर से शुरू होने वाले विमानों की पूरी श्रृंखला मौजूद है, जिसका उपयोग प्रशिक्षु पायलटों के प्रशिक्षण के लिए किया जाना है। हमारे पास फाइटर विमान एलसीए तेजस है, जो बेहद सफल रहा है। एलसीए मार्क वन और फिर अब हम मार्क III को हमने सफलतापूर्वक लांच किया।  हेलीकॉप्टरों की बात करें तो हमने हल्का लड़ाकू हेलीकॉप्टर प्रचंड तैयार किया है, जिसे पूरी तरह विकसित करके भारतीय वायुसेना में शामिल कर लिया गया है। इसी तरह, लाइट यूटिलिटी हेलीकॉप्टर, हम जल्द ही रक्षा बलों को इसकी आपूर्ति करेंगे।

दूसरा यह कि हम बड़े पैमाने पर स्वदेशीकरण भी कर रहे हैं। हम न केवल अपने प्लेटफार्मों और हेलीकॉप्टरों और विमानों के लिए, बल्कि विभिन्न सहायक उपकरणों और एवियोनिक्स के मामले में भी स्वदेशीकरण कर रहे हैं। साथ ही और अधिक स्वदेशीकरण की भी कोशिश जारी है। हमारा पूरा जोर स्वदेशीकरण पर है। हमारे पास अपने स्वदेशी उत्पादों की एक श्रृंखला है। 

तीसरी उपलब्धि यह है कि हम एक लिस्टेड कंपनी भी बन गए हैं।  HAL की विकास कहानी में जहां जनता ने निवेश करना शुरू कर दिया है। बाजार में सूचीबद्ध होने के बाद से हमने लंबी यात्रा तय की है। 2018 में हमारा बाजार पूंजीकरण लगभग 40,000 करोड़ रुपये था। लेकिन आज हमारा बाजार पूंजीकरण एक लाख 30 हजार करोड़ रुपये है। पिछले चार-पांच वर्षों में हमने लगभग तीन गुना तरक्की की हैं। यह एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है, जो हमने हासिल की है और पिछले पांच वर्षों में हम साल दर साल लगातार ग्रोथ कर रहे हैं।  हम लगातार रिकॉर्ड बिक्री के मानदंडों को स्पर्श कर रहे हैं। पिछले वित्तीय साल यानी 31 मार्च 2023 तक हमने फिर से रिकॉर्ड बिक्री कारोबार को छुआ और यह 6,000 करोड़ रुपये से अधिक के लाभ के साथ कुल 26,500 करोड़ रुपये रहा। आज हम देश में एयरोस्पेस और रक्षा उद्योग में बहुत मजबूत स्थिति में खड़े हैं।

  • HAL ने तेजस जैसे स्वदेशी विमान और ध्रुव जैसे हेलीकॉप्टरों के विकास और उत्पादन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। क्या आप बता सकते हैं कि इन परियोजनाओं ने रक्षा में भारत की आत्मनिर्भरता को मजबूत करने में कैसे योगदान दिया है?

रक्षा क्षेत्र में देश का आत्मनिर्भर होना बहुत जरूरी है। विदेशी ओईएम यानी मूल उपकरण निर्माताओं और विदेशी आपूर्तिकर्ताओं पर हमारी निर्भरता धीरे-धीरे कम होनी चाहिए।  ताकि हम शुद्ध आयातक से शुद्ध निर्यातक बन सकें। आज हम उस लक्ष्य की ओर आगे बढ़ रहे हैं। देर-सबेर, भारत हमारे अपने रक्षा बलों की आवश्यकताओं को पूरा करने के बाद हमारे उत्पादों का निर्यात करना शुरू कर देगा। रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को लेकर हम इतने गंभीर इसलिए हुए, क्योंकि कोविड महामारी के दौरान और उसके बाद भू-राजनीतिक की स्थितियों में  विदेश से आपूर्ति श्रृंखला बाधित हो गई थी। लेकिन चूँकि हमारे पास पर्याप्त साजो सामान मौजूद था, इसीलिए हम उस संकट से बाहर आ गये। अन्यथा, आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान से देश की सुरक्षा के लिए बहुत गंभीर खतरा पैदा हो जाता। इसलिए आज, हमने खुद को मजबूत बनाना शुरु कर दिया है और रक्षा उत्पादों का स्वदेशीकरण शुरू कर दिया है। लंबे समय में हम पूरी तरह से स्वदेशी घरेलू आपूर्ति श्रृंखला विकसित करेंगे, जो हमारी अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करने में सक्षम होगी। इसके लिए, हम देश के भीतर विकसित एक संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करेंगे और यह आत्मनिर्भर बनने और यह सुनिश्चित करने के लिए बहुत महत्वपूर्ण होगा कि हमारी आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान न हो।

  • हाल के वर्षों में, HALने मानव रहित हवाई वाहन (यूएवी) के क्षेत्र में कदम रखा है। HAL द्वारा शुरू की गई कुछ उल्लेखनीय यूएवी परियोजनाएं क्या हैं, और वह भारत की रक्षा आवश्यकताओं के लिए कितनी जरुरी हैं?

हमें इस बात का एहसासा है कि भविष्य के युद्ध  में मानवयुक्त और मानवरहित वाहनों के संयोजन का प्रयोग किया जाएगा। इसलिए  हमने मानवयुक्त और मानवरहित संयोजनों की दिशा में अपना अनुसंधान एवं विकास शुरू कर दिया है। हम रोटरी विंग यूएवी विकसित कर रहे हैं, जो एक रोटरी लड़ाकू वाहन है। यह विकास के चरण में है। इसका उपयोग सशस्त्र बलों द्वारा ऊंचाई वाले क्षेत्रों में भी किया जाएगा, जहां यह रक्षा उपकरणों के परिवहन में उनकी मदद करेगा।  यह एक बेहद जरुरी उपकरण है, जिस पर हम ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। इसके अलावा, एक प्रोग्राम है, जिसका नाम है कॉम्बैट एयर टीमिंग सिस्टम है। यह मानवयुक्त और मानवरहित प्रणालियों का एक संयोजन है। इस पर भी काम चल रहा है। ये एक तरह से देश के अंदर मदरशिप तैयार की जाएगी यानी देश के अंदर मदर एयरक्राफ्ट होंगे। जो कि दुश्मन के इलाके में मानव रहित विमानों को नियंत्रित करेगा। इसका नियंत्रण हमारी जमीन से किया जाएगा। इस प्रणाली को हम देश में विकसित कर रहे हैं।

  • HAL अलग-अलग विमानों और हेलीकॉप्टरों के रखरखाव, मरम्मत और ओवरहाल (MRO) सेवाओं को कैसे संभाल रहा है? इसका भारतीय रक्षा पारिस्थितिकी तंत्र पर क्या प्रभाव पड़ा है?

 रखरखाव, मरम्मत और ओवरहाल किसी भी युद्धक बेड़े के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। सिर्फ विमान और उपकरणों का निर्माण और वितरण करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि बिक्री के बाद का सपोर्ट सिस्टम तैयार करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। जब कोई विमान बेचा जाता है, तो  अगले 40 वर्षों तक उसकी देखरेख और मेंटेनेंस की व्यवस्था की जाती है। हमने रखरखाव और मरम्मत में अब बड़ा अनुभव प्राप्त कर लिया है, जो हमारे लिए अच्छी स्थिति में है। हम जगुआर और मिग श्रृंखला जैसे कुछ पुराने जहाजों के बेड़ों की भी मरम्मत जारी रखेंगे। जो कोई और नहीं कर रहा है।  भविष्य के विमान, जिनकी आज डिलीवरी हो रही है, उनके लिए भी इसी तरह का सपोर्ट सिस्टम तैयार किया जाएगा।  हम कई विदेशी निर्माताओं के साथ एक दीर्घकालिक व्यापार समझौता कर रहे हैं। जहां हमें इनमें से कुछ वस्तुओं को मंगाने की भी आवश्यकता है। हम देश के भीतर इनमें से कई वस्तुओं के स्वदेशीकरण पर भी ध्यान केंद्रित करने का प्रयास कर रहे हैं ताकि इससे हमें भी मदद मिले। इस तरह हमारी आपूर्ति श्रृंखला अधिक मजबूत हो जाएगी और विदेशी आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भरता कम होती जाएगी। इन सभी विस्तार योजनाओं के साथ HAL स्वदेशीकरण की दिशा में एक नया अध्याय लिख रहा है। खुशी की  बात है कि पिछले दो-तीन वर्षों में, हमारे राजस्व का बड़ा हिस्सा मरम्मत और ओवरहाल से भी आ रहा है।

  • एयरोस्पेस प्रौद्योगिकी में बेहद तेजी से विकास हो रहा है। HAL इन परिवर्तनों को कैसे अपना रहा है। खास तौर पर  डिजिटलीकरण, ऑटोमेशन आदि के क्षेत्र में?

हमने विमान के रख-रखाव का डिजिटलीकरण शुरू कर दिया है। हम चाहते हैं कि इनके मेंटेंनस संबंधित और दूसरी कुछ प्रणालियों को भी डिजिटल किया जाए, ताकि सूचना का निर्बाध प्रवाह हो सके। हम अपने बेड़े के रख-रखाव में आर्टिफिशिलय इंटेलिजेंस यानी कृत्रिम बुद्धिमत्ता का भी उपयोग करना चाहते हैं। इसके अलावा, हम भविष्य के युद्ध में, जहां भी आवश्यकता होगी, ऑटोमेशन के लिए लगातार आगे बढ़ रहे हैं। हम कुछ उन्नत तकनीकों को भी अपनाना चाहते थे, जिस पर हम पहले से ही कुछ विदेशी साझेदारों के साथ चर्चा कर रहे हैं ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि हमारे भविष्य के कार्यक्रमों में इन नई उन्नत तकनीकों का एक बड़ा हिस्सा शामिल रहे।

इस मामले में हम पूरी तरह से जागरूक हैं और हम खुद को पूरी तरह से तैयार कर रहे हैं कि ये प्रौद्योगिकियां हमारी मौजूदा प्रौद्योगिकियों के साथ एकीकृत हो जाएं। वास्तव में, हम अपने कुछ पुराने डिवीजनों को भी नई तकनीकों के साथ अपग्रेड करने का प्रयास कर रहे हैं, ताकि गतिविधियों का कुछ निर्बाध प्रवाह हो। ऐसा जल्दी ही संभव होगा।

  • जनरल इलेक्ट्रिक कंपनी से साथ जीई इंजन बनाने का जो समझौता हुआ है, वह निर्माण तक सीमित है। लेकिन भारत एयरो इंजन के लिए अपनी स्वदेशी तकनीक कब हासिल कर पाएगा?

दरअसल एयरो इंजन एक ऐसा क्षेत्र है जहां बहुत कम वास्तविक उपकरण निर्माता मौजूद हैं।  वैश्विक बाज़ार में, केवल दो या तीन प्रमुख खिलाड़ी हैं।  क्योंकि यह एक ऐसी तकनीक है, जिसके लिए जटिल अनुसंधान और विकास की आवश्यकता होती है। इसीलिए अभी तक हम इस पर ध्यान नहीं दे पा रहे हैं। हमने कावेरी इंजन के लिए कोशिश की थी। एरो इंजन के निर्माण के लिए भी दो या तीन कार्यक्रम अपनाए गए हैं लेकिन वे बहुत प्रारंभिक अवस्था में हैं। सबसे महत्वपूर्ण कदम यह है कि सबसे पहले हमें उस तकनीक को समझना होगा।

देश के भीतर एरो इंजन प्रौद्योगिकी लाने के लिए जीई के साथ सहयोग और वह भी 80 प्रतिशत प्रौद्योगिकी तकनीक हस्तांतरण के तहत होने जा रही है। हम यहां विनिर्माण करेंगे। वे हमें प्रौद्योगिकी को समझने और आत्मसात करने के लिए मौका देंगे। यह एक आधार होगा और जो हमें पर्याप्त सीख देगा। ताकि भविष्य में हम अपने बलबूते इंजन विकसित करने की स्थिति में हों।

जनरल इलेक्ट्रिक के साथ जिस समझौते पर हम पहुंचे हैं, उसके जरिए हम जल्द ही जीई के साथ विनिर्माण गतिविधि शुरु करेंगे। जो कि बहुत महत्वपूर्ण साबित होगा। इसके अलावा, हेलीकॉप्टर कार्यक्रम के लिए, हमने देश के भीतर संयुक्त विकास के लिए एक एयरो इंजन बनाने के लिए सफरान के साथ समझौता किया है, जिसका उपयोग हेलीकॉप्टर कार्यक्रम में किया जाएगा।

यह एक बड़ी सफलता है, जो इंजनों के भविष्य के विकास के लिए एक ठोस आधार तैयार करेगी, क्योंकि अगर आप आने वाले वर्षों में हम इंजन बनाने की तकनीक में महारत हासिल कर लेते हैं, तो हम पूरी तरह से आत्मनिर्भर हो जाएंगे। इसलिए हमने सारी आवश्यकताएं पूरी कर ली हैं और हम अगले तीन से चार महीनों में गतिविधियां शुरू कर देंगे। जहां तक कार्यक्रम और इंजन का सवाल है, हम सही रास्ते पर हैं और इसे पूरा करने के लिए हम बहुत तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। हमने जीई 404 इंजन के लिए जनरल इलेक्ट्रिक के साथ बहुत गंभीर चर्चा भी शुरू कर दी है, जिसके लिए एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर कर चुके हैं। अब अमेरिकी स्तर पर मंजूरी की प्रक्रिया होनी है, जो शुरु कर दी गई है।

  • पिछले दिनों मैनें रक्षा अनुसंधान और विकास संस्थान DRDO के चेयरमैन का साक्षात्कार किया था। जिसमें मैनें उनसे पूछा कि आखिर कावेरी इंजन फेल क्यों हुआ और अब आगे क्या होगा। इस पर आपका क्या कहना है?

एयरो इंजन प्रोग्राम अपने आप में जटिल कार्यक्रम है। जिसपर लंबे समय तक काम करने की जरुरत होती है। वैश्विक बाजार में भी, केवल दो या तीन प्रमुख कंपनियां हैं, जो इंजन का निर्माण कर सकती हैं, और वे सभी लगभग 50-60 वर्षों के निरंतर डिजाइन और विकास के बाद इस स्तर पर आई हैं।  अब अगर हम उसी गति से चलते रहे जिस गति से हमने इसे आगे बढ़ाया है, तो मुझे लगता है कि अगले दस साल की समय सीमा में, हमें वैश्विक इंजन निर्माताओं के साथ प्रतिस्पर्धा करने की स्थिति में भी होना चाहिए, और हमारा उत्पाद भी वैश्विक स्तर का उत्पाद बनकर तैयार होगा।

  • HAL ने 'मेक इन इंडिया' की पहल में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। कंपनी ने रक्षा उत्पादन और निर्यात में आत्मनिर्भरता के लिए सरकार की पहल में साथ देने के लिए कैसी तैयारियां की हैं?

आज HAL का दृष्टिकोण बिल्कुल स्पष्ट है। हम चाहते हैं कि हमारे सभी उत्पाद देश में ही स्वदेशी रूप से डिजाइन और विकसित हों। हम इस पहल की ओर बढ़ रहे हैं। प्रधानमंत्री के आत्मनिर्भर भारत के आइडिया को तभी हासिल करके हासिल किया जा सकता है, जब आप अनुसंधान एवं विकास पर अधिक से अधिक निवेश करें। हम यह महसूस कर रहे हैं कि अनुसंधान एवं विकास में हमारा निवेश अब पर्याप्त मात्रा में हो रहा है। हम अपने कुल राजस्व लाभ का औसतन 6 से 7 प्रतिशत अपनी अनुसंधान एवं विकास गतिविधियों में निवेश करते हैं। जो कि एक बड़ी राशि होता है।  हमने अपनी अनुसंधान और विकास गतिविधियों के लिए हर साल कर के बाद अपने लाभ का 15 प्रतिशत निर्धारित करके अपने रिसर्च और डिवेलपमेन्ट के लिए एक अलग फंड भी बनाया है। एक बड़ा बदलाव जो हम लाए हैं, वह यह है कि पहले हम सरकारी मंजूरी का इंतजार करते थे। पहले हालत यह थी कि कई रिसर्च कार्यक्रम संबंधित ग्राहकों या सरकार से मंजूरी और अग्रिम मिलने के बाद ही शुरू होते थे। लेकिन आज हम पहले की तरह इंतजार नहीं करते, हम बोर्ड से मंजूरी लेते हैं और अपनी अनुसंधान एवं विकास गतिविधियां शुरू करते हैं। और यही एक कारण है कि हम उस स्थिति में हैं, जहां हम समय पर उत्पाद देने करने में सक्षम हो जाते हैं।

  • भारत की रक्षा आवश्यकताएँ अलग-अलग प्रकार की हैं, जिनमें पारंपरिक और गैर पारंपरिक दोनों तरह के खतरे शामिल हैं। इस तरह की उभरती चुनौतियों से निपटने के लिए HAL अपने उत्पादों में किस प्रकार से बदलाव ला रहा है?

देखिए, उभरती चुनौतियों का सामना करने के लिए हम प्लेटफॉर्म तैयार कर रहे हैं। हम इसे उन्नत प्रौद्योगिकियों के साथ इसका मिश्रण तैयार कर रहे हैं। ताकि हम दुश्मनों का मुकाबला करने के लिए सशस्त्र बलों की सभी आवश्यकताओं को पूरा कर सकें। और जहां तक गैर पारंपरिक युद्ध का सवाल है, हम यूएवी पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। हमने रोटरी विंग साइड के साथ-साथ फिक्स्ड विंग के कार्यक्रम भी शुरू किए हैं, जो भविष्य के युद्ध के नजरिए से बेहद जरुरी कार्यक्रम है।  लेकिन फिलहाल, हमारा मुख्य ध्यान इस बात पर है कि विमान और उससे संबंधित सहायक उपकरण अधिक उन्नत प्रौद्योगिकियों से सुसज्जित हों, ताकि सशस्त्र बलों की आवश्यकताएं पूरी की जा सकें।

  • एयरोस्पेस और रक्षा उद्योग में दीर्घकालिक योजना बनाने की जरुरत होती है। एचएएल ने अगले दशक और उससे आगे के लिए किस तरह के लंबी दूरी के लक्ष्य और रणनीतिक उद्देश्य निर्धारित किए हैं?

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हमें अनुबंध के अनुसार समय पर विमान देने की आवश्यकता है। अभी हम जो कार्यक्रम चला रहे हैं उनमें से कई ऐसे हैं जो अनुबंध आधारित हैं। रोटरी विंग सहित कई ऐसे कार्यक्रम हैं जिनके लिए हमें समय पर उत्पाद डीलिवर करना होगा और देश की सुरक्षा के लिए अच्छी गुणवत्ता और बेहतर तकनीक वाले उत्पाद तैयार करने होंगे। यह प्राथमिक आवश्यकता है। इसके अलावा, हमें अगले दस वर्षों के लिए भी खुद को तैयार करना चाहिए। जिसके लिए हमने लड़ाकू हेलीकॉप्टर आदि जैसे कई कार्यक्रम भी लॉन्च किए हैं। जिसे हम अगले चरण में और अधिक उन्नत प्रणाली में ले जाने वाले हैं। जिसको जल्द ही शुरू किया जाएगा। यह हमारे हेलीकॉप्टर प्रोग्राम को सशक्त बनाएगा।  इसके अलावा, भारतीय मीडियम हेलीकॉप्टर के लिए अलग से प्रोजेक्ट है। जिसको अगले छह से सात साल की समय सीमा में पूरा करना होगा।

फिक्स्ड विंग पर, हम पहले से मैक टू के बारे में चर्चा कर रहे हैं। मैक वन का हम वर्तमान में उत्पादन कर रहे हैं। मैक टू एक और प्रमुख प्रोग्राम है, जो अगले तीन से पांच साल की समय सीमा में आ जाएगा।  जिसके लिए हमें खुद को तैयार करना होगा। हमें अगले दस वर्षों में विमान की डिलीवरी देनी है। एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट प्रोग्राम कार्यक्रम का डिजाइन तैयार हो रहा है। तो यह सभी प्रमुख भविष्य की योजनाएं हैं, जिनपर काम चल रहा है।

  • आपने कई योजनाएं तो गिना दी हैं। लेकिन आप उन्हें कैसे पूरा करेंगे, क्योंकि उनके लिए बहुत अधिक धन की आवश्यकता होगी?

जैसा कि आप आज देख सकते हैं, हमारी बुनियादी वित्तीय स्थिति काफी मजबूत है। आज हम पर कोई कर्ज नहीं है। इसके अलावा हमारे पास लगभग 24,000 करोड़ रुपये आरक्षित अधिशेष है। इसलिए, हम जब चाहें तब बैंकों से उधार लेने और बाजार से धन जुटाने का काम कर सकते हैं। इसलिए यदि कोई आवश्यकता होती है, तो आज की तारीख में हम उस आवश्यकता को पूरा करने में सक्षम हैं।

  • रक्षा उत्पादन में निजी उत्पादकों और छोटे तथा मंझोले उद्योगों की भागीदारी बढ़ाने के लिए रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कई कोशिशें की हैं। लेकिन इसके वांछित परिणाम प्राप्त नहीं हुए हैं। आपके अनुसार इसके क्या कारण हैं?

यह अब हो रहा है। आप जो बता रहे हैं वह पहले हुआ करता था। लेकिन अब वक्त बदल गया है।  पिछले तीन साल में आप देखेंगे कि वर्तमान में ज्यादातर स्वदेशी ऑर्डर पीएसयू को जाते हैं। 70 प्रतिशत स्वदेशी ऑर्डर पीएसयू को और 30 प्रतिशत निजी क्षेत्र को जाते हैं।  लेकिन अगले तीन से पांच वर्षों में आप इसका उलटा होता हुआ देखेंगे।   60 से 70 प्रतिशत ऑर्डर निजी उद्योगों को जाएगा। छोटे और मंझोले उद्योग पीछे का काम संभालते हैं। आप देखते हैं कि जब आप एक बड़ी रक्षा प्रणाली बनाते हैं, तो ऑर्डर HAL या BEL या एलएंडटी जैसी बड़ी कंपनियों को जाता है। लेकिन वे सारा विनिर्माण नहीं करते। आज भारत में कोई भी बड़ी कंपनी अपने दम पर हर चीज़ का उत्पादन नहीं कर सकती है। वे सभी उत्पादन के लिए छोटे और मंझोले उद्योगों पर निर्भर हैं। आप देखिए, आज हमारे पास 2000 से अधिक MSME हैं, जो सूचीबद्ध हैं। इसलिए, 2000 से अधिक MSME पहले से ही सूचीबद्ध हैं और वे सभी सक्रिय MSME हैं और हम इस सूची का विस्तार करते रहते हैं।

 

 

 

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