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ज्ञानेश कुमार बहाना हैं :  निशाने पर भारत की त्योहारी अर्थव्यवस्था?

Gyanesh Kumar is just a pretext: Is India’s festive economy the real target?


बिंदिया कुमारी


भारत में अक्टूबर, नवंबर और दिसंबर केवल कैलेंडर के तीन महीने नहीं हैं। ये भारत के बाजार, कारोबार और रोजमर्रा की आर्थिक गतिविधियों के लिए साल के सबसे महत्वपूर्ण महीनों में गिने जाते हैं। दशहरा, दीपावली, धनतेरस, भाई दूज, छठ, गुरुपर्व और उसके बाद आने वाला विवाह एवं पर्यटन का मौसम—इन महीनों में देश का बाजार एक अलग ही रफ्तार पकड़ता है। दुकानों से लेकर ऑनलाइन प्लेटफॉर्म तक, परिवहन से लेकर पैकेजिंग तक और बड़े व्यापारिक प्रतिष्ठानों से लेकर छोटे कारीगरों तक, करोड़ों लोगों की आजीविका इस त्योहारी मांग से जुड़ी होती है।

इसीलिए ऐसे समय में जब देश चुनावी राजनीति के नाम पर लगातार आंदोलनों, धरनों और सड़कों पर शक्ति-प्रदर्शन की राजनीति देख रहा है, तो केवल राजनीतिक नारों को सुनना पर्याप्त नहीं है। यह भी देखना होगा कि इन आंदोलनों का समय क्या है, उनका केंद्र कहाँ है और उनके संभावित आर्थिक प्रभाव क्या हो सकते हैं।

हाल के दिनों में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर विपक्षी दलों और उनसे जुड़े राजनीतिक समूहों की ओर से जिस तरह का अभियान देखने को मिला है, उसने यही सवाल खड़ा किया है। आरोप वोटर लिस्ट, स्पेशल इंटेंसिव रिविजन यानी SIR और कथित ‘वोट चोरी’ को लेकर लगाए जा रहे हैं। राहुल गांधी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर चुनाव प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए। इसके बाद दिल्ली में विरोध-प्रदर्शन और देशव्यापी आंदोलन की बातें सामने आईं। अब 25 सितंबर के जंतर-मंतर कार्यक्रम से जुड़े पोस्टरों में ‘ज्ञानेश कुमार को गिरफ्तार करो’ जैसे नारे भी दिखाई दिए।

राजनीतिक विरोध लोकतंत्र का हिस्सा है। चुनाव आयोग से सवाल पूछना भी लोकतांत्रिक अधिकार है। लेकिन सवाल यह है कि इन सबके लिए चुना गया समय और तरीका क्या केवल राजनीतिक संयोग है?

इसे समझने के लिए भारत की त्योहारी अर्थव्यवस्था को समझना जरूरी है। पिछली दीपावली के त्योहारी मौसम में देश के बाजारों में लगभग 6.05 लाख करोड़ रुपये का कारोबार होने का अनुमान सामने आया था। इसमें करीब 5.40 लाख करोड़ रुपये के सामान और लगभग 65,000 करोड़ रुपये की सेवाओं का कारोबार शामिल था। यह 2024 के लगभग 4.25 लाख करोड़ रुपये के कारोबार से लगभग 25 प्रतिशत अधिक था। त्योहारी मांग केवल दुकानदारों की बिक्री नहीं बढ़ाती। पैकेजिंग, परिवहन, डिलीवरी, गोदाम, सजावट, होटल, रेस्तरां और अस्थायी श्रम—हर क्षेत्र में इसका असर दिखाई देता है। अनुमान के अनुसार उस मौसम में लगभग 50 लाख अस्थायी रोजगार के अवसर भी पैदा हुए। यानी दीपावली का बाजार सिर्फ बाजार नहीं है। यह करोड़ों परिवारों की आय का जरिया है।

इसमें एक और महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिला है। पारंपरिक बाजारों ने इस कारोबार में लगभग 85 प्रतिशत हिस्सेदारी बनाए रखी। इसका अर्थ साफ है कि भारत के छोटे व्यापारी, स्थानीय बाजार और पारंपरिक कारोबारी तंत्र आज भी त्योहारी अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। दिल्ली जैसे बड़े कारोबारी केंद्र में ही त्योहारी मौसम के दौरान 70 से 80 हजार करोड़ रुपये तक के कारोबार का अनुमान सामने आया।

अब जरा सोचिए—अगर ऐसे समय में राजधानी दिल्ली को लगातार राजनीतिक प्रदर्शन, सड़क अवरोध और तनाव का केंद्र बनाया जाए तो उसका सीधा असर किस पर पड़ेगा? मुख्य चुनाव आयुक्त पर नहीं। राजनीतिक नेताओं पर भी नहीं।

सबसे पहले असर पड़ेगा उस दुकानदार पर जो दीपावली से पहले अपनी दुकान में माल भरता है। उस छोटे व्यापारी पर जिसने पूरे साल इस सीजन की कमाई का इंतजार किया है। उस ट्रांसपोर्टर पर जिसकी गाड़ियां दिन-रात माल पहुंचाती हैं। उस डिलीवरी कर्मचारी पर जिसकी आमदनी ऑर्डर की संख्या से जुड़ी है। उस कारीगर पर जिसने महीनों पहले से दीपावली के लिए सामान तैयार किया है। और अंततः उस ग्राहक पर, जिसे अव्यवस्था की कीमत अधिक कीमतों, देरी और कम उपलब्धता के रूप में चुकानी पड़ सकती है।

यही वह बिंदु है जहां ज्ञानेश कुमार का राजनीतिक विवाद एक व्यापक आर्थिक प्रश्न में बदल जाता है। क्या चुनाव आयोग पर राजनीतिक असहमति का अधिकार है? बिल्कुल है। लेकिन क्या उस असहमति का परिणाम ऐसा होना चाहिए कि देश के सबसे महत्वपूर्ण कारोबारी मौसम में राजधानी और प्रमुख बाजारों में अनिश्चितता पैदा हो? यह सवाल पूछना भी उतना ही जरूरी है।

राहुल गांधी की ‘वोट चोरी’ वाली राजनीति ने इस बहस को और गरमा दिया। चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाना अलग बात है और उन सवालों के समर्थन में ठोस प्रमाण प्रस्तुत करना अलग। जब उनसे पूछा गया कि उन्हें कब लगा कि वोट चोरी हुई है, तो ‘फीलिंग’ जैसी प्रतिक्रिया ने उनके दावों की गंभीरता पर स्वाभाविक रूप से प्रश्न खड़े किए। चुनाव जैसे संवेदनशील विषय पर भावनाओं से अधिक महत्व प्रमाण का होना चाहिए।

लेकिन मामला यहीं नहीं रुकता। SIR को लेकर ‘Gen Z 2.0’ और ‘जंतर-मंतर 2.0’ जैसे अभियानों की चर्चा सामने आ रही है। इन अभियानों में चुनाव आयोग, मतदाता सूची और ज्ञानेश कुमार को केंद्र में रखकर विरोध की अपील की जा रही है। इसे केवल एक सामान्य राजनीतिक आंदोलन मानकर छोड़ देना आसान है। लेकिन इस पूरे अभियान के समानांतर विदेशों में हुई कुछ गतिविधियों पर भी नजर डालना जरूरी है।

हाल में सामाजिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव के अमेरिका दौरे का उल्लेख इसी संदर्भ में किया जा रहा है। वहां उन्होंने भारतीय प्रवासियों और विभिन्न advocacy groups से जुड़े कार्यक्रमों में हिस्सा लिया। 14 सितंबर को कैम्ब्रिज में ‘India After the Student Protests’ विषय पर एक कार्यक्रम में उन्होंने हिस्सा लिया। कार्यक्रम के आयोजकों में Boston South Asian Coalition यानी BSAC का नाम सामने आया। इन संगठनों ने अतीत में CAA-NRC, किसान आंदोलन, असम, लखीमपुर खीरी और भारत से जुड़े अन्य मुद्दों पर अभियान चलाए हैं।

इसके बाद 15 सितंबर को यादव की हार्वर्ड के पास अमर्त्य सेन से मुलाकात की बात भी सामने आई। उपलब्ध विवरणों के अनुसार बातचीत में SIR, मतदाता सूची, छात्र विरोध और विपक्ष की भूमिका जैसे विषय शामिल थे।

यहां किसी विदेशी संगठन से किसी व्यक्ति की मुलाकात अपने आप में अपराध या षड्यंत्र का प्रमाण नहीं है। लोकतांत्रिक समाजों में विचारों का आदान-प्रदान होता है। भारतीय नागरिक विदेशों में कार्यक्रमों में जाते हैं और विदेशी नागरिक भारत में कार्यक्रमों में भाग लेते हैं। इसे सामान्य लोकतांत्रिक गतिविधि के रूप में देखा जाना चाहिए। लेकिन पत्रकारिता का काम सवाल पूछना भी है।

यदि विदेशों में जिन मुद्दों पर चर्चा और लामबंदी हो रही थी, वही मुद्दे कुछ ही समय बाद भारत में राजनीतिक आंदोलनों की भाषा और नारों में दिखाई देने लगें, तो उस समानता की पड़ताल क्यों न की जाए? यही समानता इस पूरे मामले को दिलचस्प बनाती है। छात्र विरोध, SIR, मतदाता सूची, ‘लोकतांत्रिक प्रतिरोध’, विपक्षी राजनीति और चुनाव आयोग—ये सभी मुद्दे अलग-अलग मंचों पर चर्चा में रहे हैं। अब यही मुद्दे दिल्ली के जंतर-मंतर पर दिखाई दे रहे हैं। 25 सितंबर के कार्यक्रम से जुड़े पोस्टरों में ज्ञानेश कुमार की गिरफ्तारी की मांग और ‘वोट चोरी’ जैसे नारे सामने आए। वक्ताओं की सूची में योगेंद्र यादव के साथ विभिन्न राजनीतिक और सामाजिक कार्यकर्ताओं के नाम भी दिखाई दिए।

क्या यह सब किसी बड़े समन्वित अभियान का हिस्सा है? इसका निर्णायक उत्तर केवल समान नारों या कार्यक्रमों की समानता के आधार पर नहीं दिया जा सकता। इसके लिए ठोस दस्तावेज, वित्तीय संबंध, संचार रिकॉर्ड और संगठनात्मक कड़ियों की स्वतंत्र जांच आवश्यक होगी।

लेकिन एक बात स्पष्ट है—राजनीतिक आंदोलन अब केवल संसद और विधानसभा तक सीमित नहीं रहे। डिजिटल प्लेटफॉर्म, विश्वविद्यालय, अंतरराष्ट्रीय advocacy networks, diaspora groups और सड़क पर होने वाले प्रदर्शन—ये सब आधुनिक राजनीतिक विमर्श के हिस्से बन चुके हैं। इसलिए भारत को भी इस बदलते राजनीतिक परिदृश्य को समझना होगा।

सबसे महत्वपूर्ण सवाल फिर भी भारत की अर्थव्यवस्था का है। त्योहारी सीजन में भारत के करोड़ों छोटे व्यापारियों के लिए बिक्री केवल मुनाफे का सवाल नहीं होती। इसी कमाई से कई परिवार साल भर के कर्ज चुकाते हैं, बच्चों की फीस भरते हैं, घर की मरम्मत करते हैं और अगले कारोबारी चक्र के लिए पूंजी जुटाते हैं। एक छोटे व्यापारी के लिए दीपावली का सीजन कई बार पूरे साल की आर्थिक गणना बदल देता है। इसीलिए बाजार में भय या अनिश्चितता पैदा करना किसी भी रूप में मामूली बात नहीं है।

भारत की अर्थव्यवस्था आज दुनिया की सबसे तेज गति से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में है। उपभोक्ता बाजार बढ़ रहा है, डिजिटल भुगतान तेजी से फैल रहा है और ‘वोकल फॉर लोकल’ तथा स्वदेशी उत्पादों को लेकर उपभोक्ता व्यवहार में भी बदलाव दिखाई दे रहा है। पिछले त्योहारी मौसम में लगभग 87 प्रतिशत उपभोक्ताओं द्वारा भारतीय उत्पादों को प्राथमिकता दिए जाने का अनुमान सामने आया था। यह केवल खरीदारी का आंकड़ा नहीं है; यह घरेलू उत्पादन और छोटे कारोबार के लिए एक बड़ा अवसर है।

ऐसे में सवाल यह है कि क्या हम राजनीतिक संघर्ष को इतना बढ़ने देंगे कि उसका असर उस आर्थिक गतिविधि पर पड़े जो करोड़ों भारतीयों की आजीविका से जुड़ी है? राजनीतिक दलों को सरकार और चुनाव आयोग से सवाल पूछने का पूरा अधिकार है। विपक्ष लोकतंत्र का आवश्यक अंग है। लेकिन विरोध का अर्थ यह नहीं हो सकता कि आम नागरिक, दुकानदार, मजदूर और कारोबारी उसकी कीमत चुकाएं।

और यही वह जगह है जहां आम नागरिक की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है। त्योहार केवल धार्मिक या सांस्कृतिक आयोजन नहीं हैं। वे सामाजिक और आर्थिक गतिविधि के भी बड़े केंद्र हैं। जब कोई परिवार स्थानीय बाजार से मिट्टी के दीये खरीदता है, तो वह केवल दीपक नहीं खरीद रहा होता। वह किसी कुम्हार की आय बढ़ा रहा होता है। जब कोई ग्राहक स्थानीय कपड़ा खरीदता है, तो वह किसी छोटे व्यापारी और निर्माता के कारोबार को सहारा देता है। जब कोई व्यक्ति भारतीय उत्पाद खरीदता है, तो वह घरेलू उत्पादन की मांग बढ़ाता है। यानी खरीदारी भी आर्थिक भागीदारी है। इसलिए इस त्योहारी मौसम में सबसे बड़ा जवाब किसी राजनीतिक नारे से नहीं, बल्कि सामान्य जीवन को सामान्य बनाए रखने से दिया जा सकता है। बाजार चलें, दुकानें खुलें, ट्रांसपोर्ट चले, डिलीवरी हो, कारीगर काम करें और ग्राहक खरीदारी करें—यही अर्थव्यवस्था की असली ताकत है।

चुनाव आयोग पर बहस होनी चाहिए तो प्रमाणों के आधार पर हो। SIR पर सवाल हैं तो तथ्य सामने रखे जाएं। मतदाता सूची में गड़बड़ी है तो विशिष्ट उदाहरण और दस्तावेज दिए जाएं। सरकार पर आरोप हैं तो उनका राजनीतिक जवाब दिया जाए। लेकिन इन सबका रास्ता लोकतांत्रिक संस्थाओं के भीतर से होकर जाना चाहिए, न कि ऐसी अव्यवस्था पैदा करके जिससे आम भारतीय की रोजी-रोटी प्रभावित हो।

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार आज इस राजनीतिक टकराव के केंद्र में हैं। उनके फैसलों की आलोचना हो सकती है, चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठ सकते हैं और SIR पर भी सार्वजनिक बहस हो सकती है। लेकिन किसी व्यक्ति को राजनीतिक संघर्ष का चेहरा बनाकर देश की आर्थिक गतिविधियों को बाधित करना अलग विषय है। इसलिए असली कसौटी यही है कि भारत का आम नागरिक किसे प्राथमिकता देता है—अराजकता को या अपनी मेहनत को?

दुकानदार को अपना बाजार चाहिए। मजदूर को अपना काम चाहिए। किसान को अपनी उपज का बाजार चाहिए। कारीगर को अपना ग्राहक चाहिए। युवा को रोजगार चाहिए। परिवार को त्योहार मनाना है। भारत के त्योहारों की यही असली शक्ति है। इसलिए इस बार त्योहारों को केवल उत्सव की तरह नहीं, बल्कि भारत की आर्थिक ताकत के प्रदर्शन के रूप में भी देखना चाहिए। बाजार में जाइए। स्थानीय दुकानदार से खरीदिए। भारतीय उत्पादों को प्राथमिकता दीजिए। कारीगरों से सामान खरीदिए। अपने शहर के बाजारों को जीवंत रखिए।

क्योंकि लोकतंत्र में सरकारें बदलती हैं, राजनीतिक नारे बदलते हैं, नेता बदलते हैं और मुद्दे भी बदलते हैं। लेकिन देश की अर्थव्यवस्था को चलाने वाला आम भारतीय हर दिन अपनी जगह खड़ा रहता है। उसे राजनीति के नाम पर रुकना नहीं चाहिए। त्योहार रुकने नहीं चाहिए। बाजार रुकने नहीं चाहिए। और भारत की विकास यात्रा तो बिल्कुल नहीं रुकनी चाहिए।

ज्ञानेश कुमार को लेकर राजनीतिक संघर्ष अपनी जगह है। लेकिन भारत की अर्थव्यवस्था किसी राजनीतिक दल, नेता या चुनावी अभियान की बंधक नहीं बन सकती। अगर कोई राजनीतिक अभियान वास्तव में लोकतंत्र को मजबूत करना चाहता है, तो उसकी पहली जिम्मेदारी भी यही होनी चाहिए कि लोकतंत्र के सबसे बड़े हितधारक—आम नागरिक—की जिंदगी और रोजी-रोटी बाधित न हो।

इसलिए इस त्योहारी मौसम में भारत का जवाब साफ होना चाहिए—त्योहार भी मनेंगे, बाजार भी चलेंगे, खरीदारी भी होगी और भारत की अर्थव्यवस्था भी आगे बढ़ेगी। और यदि स्वदेशी खरीदारी से किसी भारतीय कारीगर, व्यापारी या निर्माता की कमाई बढ़ती है, तो उससे बेहतर राष्ट्रहित का उत्सव और क्या हो सकता है?


(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)

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