नरेंद्र मोदी को सात अक्टूबर 2001 को गुजरात की जब कमान सौंपी गई थी, तब सूखे की मार झेल चुका गुजरात उबरने की कोशिश कर रहा था। इसी बीच 26 जनवरी 2002 को कच्छ में भयंकर भूकंप आया। इसके बाद तो जैसे गुजरात की अर्थव्यवस्था हिल गई। नए-नए मुख्यमंत्री बने नरेंद्र मोदी को इसके पहले किसी तरह का प्रशासनिक अनुभव नहीं था। इसके बावजूद वे गुजरात को संवारने के लिए चिंतन में जुट गए। उन्हें लगा कि गुजरात को उबारने का एक मात्र रास्ता है, राज्य में निवेश को बढ़ाना। इसके लिए उन्होंने तैयारियां शुरू कर दीं। लेकिन उस आयोजन का नाम क्या हो, इस पर मंथन जारी था। इसी बीच एक दिन गुजरात पर्यटन विकास निगम की एक पुस्तिका मुख्यमंत्री मोदी के सामने लाई गई। जैसा कि अक्सर होता है, पर्यटन से जुड़ी पुस्तिकाएं तड़क-भड़क से भरी होती हैं। रंगीन भी होती हैं, उनके जरिए स्पंदन जगाने की कोशिश होती है। वह पुस्तिका भी वैसी ही थी। मोदी को अपने आयोजन का नाम सूझ गया। उन्होंने वहां बैठे अधिकारियों से कहा कि इस पुस्तिका में ही आयोजन का नाम छिपा है। आयोजन निवेश लुभाने के लिए हो रहा था, लेकिन मोदी ने नाम दिया, वाइब्रेंट गुजरात। इसका अधिकारियों ने यह कहते हुए विरोध भी किया कि इसमें कहीं निवेश का जिक्र नहीं है। लेकिन नाम नहीं बदला गया। साल 2003 में शुरू हुए इस आयोजन ने बीस साल का सफर पूरा कर लिया है।
जहां देश के तमाम राज्य अपने बजट कार्यक्रम की तैयारियां महीनों तक करते हैं, जबकि निवेश आदि के लिए होने वाले आयोजन को जल्दी में निबटा देते हैं, वहीं गुजरात की कहानी कुछ दूसरी है। देश के सबसे पश्चिमी राज्य के लिए ‘वाइब्रेंट गुजरात’ का महत्व इसी से समझा जा सकता है कि इसके आयोजन के लिए राज्य सरकार तकरीबन छह महीने पहले से ही तैयारी करना शुरू करती है। पहले ‘वाइब्रेंट गुजरात’ को साल 2003 के सितंबर महीने के आखिरी हफ्ते में अहमदाबाद में आयोजित किया गया। यहां के टैगोर हॉल में हुए आयोजन का उद्घाटन तत्कालीन उप प्रधान मंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने किया था। इस दौरान तत्कालीन विनिवेश राज्य मंत्री अरुण शौरी, पेट्रोलियम मंत्री राम नाइक, उद्योगपति मुकेश अंबानी जैसी तमाम लोग मौजूद रहे। उसके बाद हर दो साल में इस शिखर सम्मेलन का आयोजन किया जाता है, बीच में कोविड के चलते समिट नहीं हो पाई थी। ऐसे में 10वें संस्करण का आयोजन चार साल बाद हुआ, जो गांधीनगर के महात्मा मंदिर कन्वेंशन सेंटर में 10 से 12 जनवरी तक यानी तीन दिनों तक चला। यहां याद कर लेना चाहिए कि पहले आयोजन के लिए गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री और अब देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद 500 उद्योगपतियों को आंमत्रित किया था। इस आयोजन की अहमियत को इसी से आंका जा सकता है कि जहां पहली बार यानी साल 2003 में सिर्फ 750 प्रतिनिधि ही आ सके थे, वहीं इस बार इनकी संख्या बढ़कर एक लाख को पार कर गई है। आज स्थिति है कि गुजरात के विकास का दूसरा नाम ‘वाइब्रेंट गुजरात’ हो गया है। वाइब्रेंट गुजरात सम्मलेन में हर बार की तरह इस बार भी नामी-गिरामी कंपनियों से गुजरात को खास सहयोग मिला। इस आयोजन के दौरान देश-विदेश की कई कंपनियों ने गुजरात में भारी भरकम निवेश की कई घोषणाएं कीं। इनमें अडाणी, टाटा, रिलायंस इंडस्ट्रीज और डीपी वर्ल्ड समेत कई छोटी-बड़ी कंपनियां शामिल हैं। इस आयोजन के दौरान करीब 41 हजार 299 निवेश प्रस्तावों के समझौते पर हस्ताक्षर किए गए। जिनके जरिए गुजरात में लगभग 26.33 लाख करोड़ रुपये का इनवेस्टमेंट होने की उम्मीद है।
‘वाइब्रेंट गुजरात’ के दसवें संस्करण में देश और दुनिया के जाने-माने उद्योगपति जैसे, लक्ष्य मित्तल, तोशिहीरो सुजुकी, मुकेश अंबानी, संजय मेहरोत्रा, गौतम अडाणी, जेफ्री चुन, एन चंद्रशेखरन, सुल्तान अहमद बिन सुलायम, शंकर त्रिवेदी और निखिल कामत आदि मौजूद रहे। इस सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने उम्मीद जताई थी कि आने वाले कुछ सालों में भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा। उद्घाटन कार्यक्रम में गृह मंत्री अमित शाह भी मौजूद रहे।
वाइब्रेंट गुजरात के आधिकारिक ट्विटर अकाउंट के अनुसार, इस आयोजन में इस बार नई तकनीक के लिए महत्वपूर्ण सेमीकंडक्टर और ई-मोबिलिटी के साथ ही ग्रीन हाइड्रोजन और अक्षय ऊर्जा जैसे सेक्टरों में गुजरात में बड़ी संख्या में निवेश आया है। अहम बात यह रही कि तीन दिनों तक चले इस कार्यक्रम में साढ़े तीन हजार के करीब विदेशी प्रतिनिधि शामिल रहे। इस बार ‘वाइब्रेंट गुजरात’कार्यक्रम के 34 देश बतौर भागीदार शामिल हुए, जबकि दुनिया की 16 प्रमुख संस्थाओं ने भी बतौर भागीदार हिस्सा लिया। विशेष बात यह रही कि गुजरात में हुए इस सम्मलेन के जरिए देश के उत्तर पूर्वी हिस्से के राज्यों में भी निवेश की संभावनाओं को प्रदर्शित करने की कोशिश हुई। कह सकते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी की वजह से गुजरात के इस आयोजन के जरिए उत्तर पूर्वी राज्यों की भी निवेशकों के सामने मार्केटिंग की गई।
‘वाइब्रेंट गुजरात’ की आधिकारिक घोषणा के मुताबिक, इस बार हरित ऊर्जा क्षेत्र में कई बड़े सौदे किए गए। यह आयोजन पिछली बार के आयोजन की तुलना में निवेश के लिहाज से बेहद सफल कहा जा सकता है। जहां साल 2022 में गुजरात में कंपनियों ने 18 लाख 87 हजार करोड़ रुपये के 57,241 प्रोजेक्ट का समझौता किया था, वहीं वाइव्रेंट गुजरात के जरिए इस बार करीब 98540 प्रोजेक्ट के लिए हस्ताक्षर हुए हैं, जिनके जरिए करीब 45 लाख करोड़ रुपये का निवेश गुजरात को मिल रहा है।
गुजरात में 33 जिले हैं। ‘वाइब्रेंट गुजरात’ का मकसद इन सभी तैंतीस जिलों में निवेश लाना, इसके जरिए उत्पादन बढ़ाना और बेरोजगारी पर लगाम लाना है। अपने बीस साल के सफर में यह आयोजन गुजरात का प्रमुख आर्थिक मंच बन गया है। जहां एक साथ निवेशक, प्रबंधक और नीति निर्माता जुटते हैं और भावी चुनौतियों पर विचार करते हुए गुजरात में निवेश को बढ़ावा देने की कोशिश में जुट जाते हैं। कह सकते हैं कि इस आयोजन के जरिए गुजरात ने जो आर्थिक तरक्की की है, वह देश के दूसरे राज्यों के लिए मिसाल बन चुकी है। यही वजह है कि अब तमाम राज्य अपने यहां निवेश बढ़ाने के लिए कुछ इसी तरह के आयोजन करने में जुटे रहते हैं और अपनी तरह से आगे बढ़ भी रहे हैं।

उमेश चतुर्वेदी
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)
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