
डॉ दीपक कोहली
मकालीन मानव सभ्यता के इतिहास में एक ऐसा अभूतपूर्व और क्रांतिकारी मोड़ है जिसने हमारी जीवनशैली, कार्यप्रणाली और सोचने के ढंग को पूरी तरह से बदल दिया है। आदिम युग से लेकर आज के डिजिटल युग तक, मनुष्य ने अपनी शारीरिक और मानसिक क्षमताओं को बढ़ाने के लिए अनगिनत उपकरणों और प्रौद्योगिकियों का आविष्कार किया है। परंतु एआई इन सभी आविष्कारों से बुनियादी तौर पर भिन्न है। यह केवल एक उपकरण नहीं है जो मानव के आदेशों का पालन करता है, बल्कि यह एक ऐसी प्रणाली है जो स्वयं सीखने, निर्णय लेने और जटिल समस्याओं का विश्लेषण करने की क्षमता रखती है। चिकित्सा क्षेत्र में असाध्य रोगों की पहचान से लेकर, कृषि में फसलों की पैदावार बढ़ाने, अंतरिक्ष अनुसंधान की गुत्थियों को सुलझाने और प्रशासनिक व्यवस्थाओं को अधिक पारदर्शी तथा सुदृढ़ बनाने तक, एआई की उपयोगिता ने हमें एक नए स्वर्णिम युग की दहलीज पर ला खड़ा किया है। संपूर्ण विश्व इस समय एक अभूतपूर्व डिजिटल उत्साह से सराबोर है और हर देश, हर कॉर्पोरेट घराना और हर वैज्ञानिक संस्थान इस एआई की दौड़ में सबसे आगे निकल जाना चाहता है। परंतु इस चकाचौंध और तकनीकी प्रगति के महासागर के नीचे एक ऐसा अदृश्य, गहरा और बेहद खतरनाक भंवर आकार ले रहा है, जिसकी ओर दुनिया का ध्यान बहुत देर से गया है। यह संकट है एआई की बेलगाम, असीमित और भयावह होती जा रही ऊर्जा तथा संसाधनों की भूख। हम जिस डिजिटल दुनिया को आभासी, अमूर्त और हवा में तैरती हुई व्यवस्था समझते हैं, वास्तव में उसकी जड़ें इसी भौतिक पृथ्वी के सीमित संसाधनों, जलस्रोतों और ऊर्जा ग्रिडों से गहराई से जुड़ी हुई हैं। आज यह कड़वी सच्चाई पूरी दुनिया के सामने आ रही है कि एआई के रूप में हम जिस 'मस्तिष्क' का निर्माण कर रहे हैं, उसे जीवित रखने के लिए पृथ्वी के पर्यावरण की बहुत भारी कीमत चुकानी पड़ रही है। इसी गंभीर पर्यावरणीय संकट और तकनीकी विडंबना के बीच से एक नई वैचारिक और वैज्ञानिक क्रांति का जन्म हुआ है, जिसे हम 'ग्रीन एआई' अर्थात हरित कृत्रिम बुद्धिमत्ता के नाम से जानते हैं। ग्रीन एआई केवल एक तकनीकी शब्दावली नहीं है, बल्कि यह एक संपूर्ण दर्शन है, एक वैश्विक आह्वान है और एक अनिवार्य आवश्यकता है जो हमें यह याद दिलाती है कि यदि कोई तकनीक हमारी धरती को नष्ट करके विकसित होती है, तो वह प्रगति नहीं बल्कि आत्मघात है।
इस संकट की भयावहता को समझने के लिए हमें उस अदृश्य बुनियादी ढांचे को देखना होगा जो इस एआई क्रांति को संचालित कर रहा है। जब भी हम अपने स्मार्टफोन या कंप्यूटर पर किसी एआई चैटबॉट से एक साधारण सा सवाल पूछते हैं या कोई सुंदर सी तस्वीर बनाने का कमांड देते हैं, तो हमें लगता है कि यह प्रक्रिया तत्क्षण और बिना किसी मानवीय या पर्यावरणीय लागत के संपन्न हो गई। लेकिन पर्दे के पीछे की कहानी बेहद डरावनी है। इन एआई मॉडलों को चलाने के लिए दुनिया भर में फैले विशालकाय डेटा सेंटरों की आवश्यकता होती है। ये डेटा सेंटर लाखों की संख्या में उच्च क्षमता वाले सर्वरों और ग्राफिक्स प्रोसेसिंग यूनिट्स (GPUs) से लैस होते हैं, जो चौबीसों घंटे बिना रुके चलते रहते हैं। इन सर्वरों को अरबों-खरबों गणितीय गणनाएं करनी होती हैं और इस प्रक्रिया में वे अत्यधिक मात्रा में विद्युत ऊर्जा की खपत करते हैं। अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी और संयुक्त राष्ट्र के हालिया शोधों से जो आंकड़े छनकर सामने आ रहे हैं, वे किसी भी संवेदनशील नागरिक और नीति निर्माता की रातों की नींद उड़ाने के लिए पर्याप्त हैं। यह अनुमान लगाया गया है कि आने वाले कुछ ही वर्षों में वैश्विक डेटा सेंटरों की कुल बिजली खपत एक हजार टेरावॉट-घंटे से भी अधिक हो जाएगी। इस आंकड़े की भयावहता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि यदि दुनिया के सभी डेटा सेंटरों को मिलाकर एक देश घोषित कर दिया जाए, तो वह ऊर्जा खपत के मामले में पूरी दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा देश बन जाएगा, जो जापान और रूस जैसे औद्योगिक रूप से विकसित देशों के समकक्ष खड़ा होगा। वर्ष 2030 तक का जो परिदृश्य वैज्ञानिक हमारे सामने रख रहे हैं, वह और भी अधिक चिंताजनक है। एआई के बढ़ते कदम और डेटा सेंटरों के विस्तार के कारण इनकी वार्षिक बिजली खपत इतनी अधिक बढ़ सकती है जो पाकिस्तान, बांग्लादेश और नाइजीरिया जैसे विशाल आबादी वाले देशों की संयुक्त वार्षिक बिजली खपत से भी तीन गुना अधिक होगी। यह स्थिति एक ऐसे समय में उत्पन्न हो रही है जब पूरी दुनिया पहले से ही जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग और जीवाश्म ईंधनों के घटते भंडारों के कारण एक बड़े ऊर्जा संकट से जूझ रही है।
एआई की इस असीमित ऊर्जा भूख के कारणों की पड़ताल करना बेहद जरूरी है ताकि हम इसके समाधान की दिशा में सही कदम बढ़ा सकें। किसी भी आधुनिक एआई मॉडल का जीवनचक्र मुख्य रूप से दो बड़े चरणों में विभाजित होता है, और ये दोनों ही चरण पर्यावरण के दृष्टिकोण से बेहद खर्चीले हैं। पहला चरण होता है मॉडल का प्रशिक्षण अर्थात 'ट्रेनिंग फेज'। आज हम जिस जीपीटी-4 या अन्य फ्रंटियर मॉडलों की बुद्धिमत्ता को देखकर आश्चर्यचकित होते हैं, उन्हें इस स्तर तक पहुंचाने के लिए दुनिया भर के विशाल डेटा सेटों पर महीनों तक प्रशिक्षित किया जाता है। इस प्रशिक्षण के दौरान हजारों सुपरकंप्यूटर और जीपीयू लगातार काम करते हैं। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि आने वाले समय में एक एकल बड़े एआई मॉडल को प्रशिक्षित करने के लिए ही पांच गीगावॉट तक बिजली की आवश्यकता हो सकती है। यह इतनी बिजली है जिससे एक बड़े आधुनिक शहर को हफ्तों तक रोशन किया जा सकता है। एक अनुमान के अनुसार, केवल एक बड़े भाषाई मॉडल को प्रशिक्षित करने में जितनी कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जित होती है, वह पांच सामान्य कारों के उनके संपूर्ण जीवनकाल में होने वाले कुल कार्बन उत्सर्जन के बराबर होती है। लेकिन संकट यहीं समाप्त नहीं होता। प्रशिक्षण तो केवल एक बार होने वाली प्रक्रिया है, इसके बाद शुरू होता है दूसरा चरण जिसे 'इन्फरेंस फेज' या दैनिक उपयोग का चरण कहा जाता है। आम विमर्श में लोग केवल एआई की ट्रेनिंग के दौरान होने वाले नुकसान की चर्चा करते हैं, लेकिन वास्तविकता यह है कि एआई की कुल ऊर्जा खपत का अस्सी से नब्बे प्रतिशत हिस्सा उसके दैनिक उपयोग से आता है। आज जब दुनिया भर में करोड़ों लोग प्रतिदिन एआई का उपयोग अपने ईमेल लिखने, कोडिंग करने या सूचनाएं खोजने के लिए कर रहे हैं, तो हर एक प्रॉम्ट के साथ डेटा सेंटरों पर बिजली का बोझ बढ़ता जा रहा है। इसमें भी सबसे चिंताजनक बात यह है कि कार्य की प्रकृति के अनुसार ऊर्जा की खपत नाटकीय रूप से बदल जाती है। एक सामान्य टेक्स्ट आधारित खोज की तुलना में एआई द्वारा एक एकल छवि अर्थात इमेज जनरेशन में एक हजार गुना अधिक ऊर्जा खर्च होती है। वहीं जब हम एआई के माध्यम से वीडियो जनरेशन या गतिशील ग्राफिक्स बनाने की बात करते हैं, तो यह तकनीक संसाधनों को एक ब्लैक होल की तरह सोखने लगती है।
ऊर्जा की इस भारी खपत के साथ-साथ एक और संकट जुड़ा हुआ है जिसकी चर्चा अक्सर दबा दी जाती है, और वह है जल का संकट। डेटा सेंटरों में लगे हजारों सर्वर जब लगातार और तीव्र गति से गणनाएं करते हैं, तो वे अत्यधिक मात्रा में ऊष्मा अर्थात गर्मी पैदा करते हैं। यदि इन सर्वरों को ठंडा न रखा जाए, तो वे जल जाएंगे और पूरी डिजिटल व्यवस्था ठप हो जाएगी। इन सर्वरों को ठंडा रखने के लिए कूलिंग सिस्टम की आवश्यकता होती है, जिसमें भारी मात्रा में शुद्ध और मीठे पानी का उपयोग किया जाता है। एआई कंपनियों के डेटा सेंटर्स हर दिन लाखों गैलन पानी वाष्पीकृत कर देते हैं। अनुमान है कि इस दशक के अंत तक केवल एआई के कारण होने वाली जल की खपत इतनी अधिक हो जाएगी जो दुनिया के लगभग सवा अरब से अधिक लोगों की बुनियादी सालाना जल आवश्यकताओं को पूरा कर सकती है। एक ऐसे समय में जब दुनिया के सैकड़ों बड़े शहर गंभीर जल संकट का सामना कर रहे हैं, भूजल स्तर लगातार नीचे गिर रहा है, और नदियां सूख रही हैं, एआई को ठंडा रखने के लिए पानी की यह बर्बादी एक बहुत बड़े मानवीय और पारिस्थितिकीय संकट को आमंत्रण दे रही है। इसके साथ ही, इन डेटा सेंटरों को स्थापित करने के लिए हजारों एकड़ भूमि की आवश्यकता होती है, जिसके लिए अक्सर वनों की कटाई की जाती है या कृषि योग्य भूमि का अधिग्रहण किया जाता है, जिससे स्थानीय जैव विविधता और पारिस्थितिकी तंत्र पर बेहद प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
इस स्थिति ने एआई अनुसंधान की दुनिया को दो स्पष्ट वैचारिक धाराओं में विभाजित कर दिया है। पहली धारा को शोधकर्ताओं ने 'रेड एआई' अर्थात लाल कृत्रिम बुद्धिमत्ता का नाम दिया है। रेड एआई का सीधा सा अर्थ है एक ऐसी अंधी दौड़ जिसमें केवल और केवल मॉडल की सटीकता, उसकी चतुरता और उसकी गति को बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित किया जाता है, चाहे इसके लिए कितनी भी कंप्यूटिंग शक्ति, बिजली, पानी या कार्बन उत्सर्जन की आवश्यकता क्यों न हो। रेड एआई के पैरोकार मानते हैं कि तकनीक को सर्वशक्तिमान बनाना ही उनका एकमात्र लक्ष्य है। इस विचारधारा के कारण आज बाजार में एक ऐसी होड़ मची है जिसमें हर कंपनी अपने मॉडल में अरबों-खरबों नए पैरामीटर्स जोड़ रही है, जिससे मॉडल अधिक से अधिक भारी और संसाधन-शोषक होते जा रहे हैं। रेड एआई का एक और बड़ा दोष यह है कि यह तकनीक के लोकतंत्रीकरण के खिलाफ है। चूंकि इतने भारी-भरकम मॉडलों को चलाने और प्रशिक्षित करने के लिए अरबों डॉलर के इंफ्रास्ट्रक्चर की आवश्यकता होती है, इसलिए यह तकनीक केवल मुट्ठी भर बड़ी वैश्विक टेक कंपनियों के नियंत्रण में सिमट कर रह जाती है। विकासशील देश, छोटे स्टार्टअप और स्वतंत्र शोधकर्ता इस दौड़ से बाहर हो जाते हैं। इसके विपरीत, जो दूसरी और सबसे प्रगतिशील विचारधारा उभर कर सामने आई है, उसे हम 'ग्रीन एआई' कहते हैं। ग्रीन एआई का मुख्य फोकस सटीकता के साथ-साथ दक्षता, कम पर्यावरणीय लागत और संसाधनों के अनुकूलतम उपयोग पर होता है। ग्रीन एआई के समर्थक वैज्ञानिकों का मानना है कि हमें ऐसे बुद्धिमान एल्गोरिदम विकसित करने चाहिए जो कम से कम डेटा, कम से कम बिजली और छोटे हार्डवेयर पर भी सर्वश्रेष्ठ परिणाम दे सकें। यह तकनीक को अधिक टिकाऊ, पर्यावरण-अनुकूल और लोकतांत्रिक बनाने का मार्ग प्रशस्त करती है ताकि समाज का हर वर्ग इसका लाभ उठा सके बिना हमारी धरती को नुकसान पहुंचाए।

ग्रीन एआई की इस अवधारणा को धरातल पर उतारने के लिए आज वैज्ञानिक और तकनीकी स्तर पर कई क्रांतिकारी प्रयास किए जा रहे हैं। इनमें से कुछ प्रमुख तकनीकों को समझना अत्यंत आवश्यक है जो भविष्य की दिशा तय करेंगी। पहली महत्वपूर्ण तकनीक है 'प्रूनिंग' जिसे हम छंटाई भी कह सकते हैं। मानव मस्तिष्क की तरह ही एआई के न्यूरल नेटवर्क में भी लाखों-करोड़ों ऐसे कनेक्शन या रास्ते बन जाते हैं जो अंतिम परिणाम या निर्णय लेने में बहुत कम या न के बराबर योगदान देते हैं। प्रूनिंग तकनीक के माध्यम से वैज्ञानिक इन अनावश्यक रास्तों को पहचान कर उन्हें मॉडल से हटा देते हैं। इससे मॉडल का आकार बहुत छोटा हो जाता है, उसकी गणना करने की गति बढ़ जाती है और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उसे चलाने में बिजली की खपत बहुत कम हो जाती है। इसी प्रकार एक और नवोन्मेषी तकनीक है जिसे 'नॉलेज डिस्टिलेशन' यानी ज्ञान का आसवन कहा जाता है। इसमें एक बहुत बड़े, भारी-भरकम और अत्यधिक ऊर्जा सोखने वाले मॉडल (जिसे टीचर मॉडल कहा जाता है) की बुद्धिमत्ता और ज्ञान को एक बहुत ही छोटे, हल्के और कुशल मॉडल (जिसे स्टूडेंट मॉडल कहा जाता है) में स्थानांतरित कर दिया जाता है। यह ठीक उसी तरह है जैसे एक महान विद्वान के वर्षों के अनुभव और ज्ञान को एक संक्षिप्त पुस्तक में समेट दिया जाए। यह छोटा मॉडल अपने मूल मॉडल के बराबर ही सटीक परिणाम देता है, लेकिन इसे चलाने के लिए बहुत ही कम कंप्यूटर शक्ति और बिजली की आवश्यकता होती है। इसके अतिरिक्त 'क्वांटाइजेशन' नामक एक और तकनीक पर तेजी से काम हो रहा है। इसके तहत गणितीय गणनाओं की सटीकता के स्तर को थोड़ा सा अनुकूलित किया जाता है। जैसे पारंपरिक रूप से एआई मॉडल गणना के लिए ३२-बिट वाले बहुत बड़े और जटिल नंबरों का उपयोग करते हैं, जिससे प्रोसेसर पर बहुत दबाव पड़ता है। क्वांटाइजेशन के माध्यम से इन गणनाओं को ८-बिट या उससे कम के नंबरों में बदल दिया जाता है। इससे एआई मॉडल की कार्यक्षमता में तो कोई खास कमी नहीं आती, लेकिन सर्वरों की ऊर्जा खपत नाटकीय रूप से घट जाती है।
तकनीकी सॉफ्टवेयर में सुधारों के साथ-साथ हार्डवेयर के स्तर पर भी अमूल्य परिवर्तन किए जा रहे हैं। पारंपरिक रूप से हम जिन सिलिकॉन आधारित चिप्स और कंप्यूटर आर्किटेक्चर का उपयोग करते आ रहे हैं, वे मूल रूप से एआई जैसे जटिल कार्यों के लिए नहीं बने थे। इसलिए अब वैज्ञानिक 'न्यूरोमॉर्फिक चिप्स' का विकास कर रहे हैं। ये चिप्स जैविक रूप से मानव मस्तिष्क की संरचना और उसकी कार्यप्रणाली की नकल करती हैं। हमारा मानव मस्तिष्क दुनिया का सबसे जटिल और शक्तिशाली कंप्यूटर है, लेकिन आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि यह पूरा मस्तिष्क केवल बीस वॉट की ऊर्जा पर काम करता है, जो कि एक छोटे से बिजली के बल्ब के बराबर है। न्यूरोमॉर्फिक चिप्स इसी जैविक दक्षता को कंप्यूटर की दुनिया में लाने का प्रयास कर रही हैं। यदि यह तकनीक पूरी तरह सफल होती है, तो आने वाले समय में हमारे पास ऐसे सुपरकंप्यूटर होंगे जो आज के सर्वरों की तुलना में एक लाख गुना कम बिजली खर्च करेंगे। इसके अलावा ऑप्टिकल कंप्यूटिंग यानी प्रकाश आधारित गणनाओं पर भी शोध चल रहा है, जहां बिजली के तारों के स्थान पर प्रकाश की किरणों (फोटॉन्स) का उपयोग करके डेटा प्रोसेस किया जाएगा, जिससे ऊर्जा का क्षय लगभग शून्य हो जाएगा।
परंतु केवल तकनीकी समाधान ही इस वैश्विक संकट से निपटने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। जब तक प्रशासनिक, नीतिगत और शासन के स्तर पर कड़े और दूरदर्शी कदम नहीं उठाए जाएंगे, तब तक ग्रीन एआई का सपना केवल प्रयोगशालाओं तक ही सीमित रह जाएगा। आज सबसे पहली और बड़ी आवश्यकता इस बात की है कि वैश्विक स्तर पर एआई का एक व्यापक 'पर्यावरणीय लेखापरीक्षा' यानी एनवायरनमेंटल ऑडिट अनिवार्य किया जाए। वर्तमान में बड़ी-बड़ी टेक कंपनियां अपनी वित्तीय स्थिति और मुनाफे का लेखा-जोखा तो प्रस्तुत करती हैं, लेकिन वे यह कभी नहीं बतातीं कि उनके एआई मॉडल ने एक वर्ष में कितनी बिजली सोखी, कितना पानी बर्बाद किया और कितना कार्बन वातावरण में छोड़ा। सरकारों को ऐसे कड़े कानून बनाने होंगे जिसके तहत हर एआई डेवलपर और कंपनी के लिए अपने मॉडलों के कार्बन और वॉटर फुटप्रिंट को सार्वजनिक करना अनिवार्य हो। जब यह डेटा पारदर्शी रूप से सामने आएगा, तभी उपभोक्ताओं और निवेशकों में भी जागरूकता आएगी और वे ऐसी कंपनियों का समर्थन करेंगे जो पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार हैं।
इसके साथ ही, डिजिटल बुनियादी ढांचे का हरित संक्रमण करना अब वैकल्पिक नहीं बल्कि अनिवार्य हो गया है। दुनिया भर में जितने भी नए डेटा सेंटर बन रहे हैं या पुराने संचालित हो रहे हैं, उन्हें शत-प्रतिशत नवीकरणीय ऊर्जा यानी सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा या भू-तापीय ऊर्जा पर स्थानांतरित करना होगा। भारत इस दिशा में पूरे विश्व के लिए एक मार्गदर्शक की भूमिका निभा सकता है। भारत ने वर्ष २०३० तक पांच सौ गीगावॉट गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित ऊर्जा क्षमता हासिल करने का एक बहुत ही महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है। यदि हम अपने देश में बन रहे नए डेटा सेंटरों और डिजिटल पार्कों को इस स्वच्छ ऊर्जा ग्रिड से सीधे जोड़ दें, तो हम एआई के कारण होने वाले कार्बन उत्सर्जन को बहुत बड़े पैमाने पर रोक सकते हैं। इसके अलावा, डेटा सेंटरों के निर्माण के लिए ऐसे भौगोलिक स्थानों का चयन किया जाना चाहिए जहां की जलवायु प्राकृतिक रूप से ठंडी हो, जैसे कि पहाड़ी क्षेत्र या ध्रुवीय देशों के निकटवर्ती इलाके। इससे सर्वरों को ठंडा रखने के लिए कृत्रिम एयर कंडीशनिंग और पानी की आवश्यकता बहुत कम हो जाएगी।
एक और बेहद दिलचस्प और सकारात्मक पहलू यह है जिसे हम 'एआई फॉर एनर्जी' यानी ऊर्जा संरक्षण के लिए एआई का दृष्टिकोण कह सकते हैं। यह एआई के चरित्र की एक बहुत बड़ी विडंबना और उसकी शक्ति दोनों को दर्शाता है। जहां एक तरफ एआई स्वयं बहुत बड़ी मात्रा में ऊर्जा की खपत कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ उसके पास इतनी क्षमता भी है कि वह दुनिया के ऊर्जा संकट को हल करने में सबसे बड़ा मददगार साबित हो सके। हम एआई के उन्नत एल्गोरिदम का उपयोग करके अपने पारंपरिक बिजली ग्रिडों को 'स्मार्ट ग्रिड' में बदल सकते हैं। एआई मौसम के मिजाज का सटीक पूर्वानुमान लगाकर यह बता सकता है कि किस समय सौर ऊर्जा या पवन ऊर्जा का उत्पादन सबसे अधिक होगा, और उसी के अनुसार ग्रिड में बिजली की आपूर्ति को संतुलित कर सकता है। यह बिजली के ट्रांसमिशन और डिस्ट्रीब्यूशन के दौरान होने वाले भारी नुकसान को रोक सकता है। बड़े-बड़े उद्योगों, कारखानों और गगनचुंबी इमारतों में ऊर्जा के उपयोग को अनुकूलित करने के लिए एआई का उपयोग किया जा सकता है, जो यह सुनिश्चित करेगा कि कहीं भी एक यूनिट बिजली भी व्यर्थ न जाए। इस प्रकार, यदि हम एआई का सही और बुद्धिमत्तापूर्ण उपयोग करें, तो वह जितना नुकसान पर्यावरण को पहुंचा रहा है, उससे कहीं अधिक बचत करके उसकी भरपाई कर सकता है।
भारतीय संस्कृति और दर्शन हमेशा से प्रकृति और प्रगति के बीच एक सुंदर संतुलन की वकालत करते आए हैं। हमारे वेदों और उपनिषदों में 'वसुधैव कुटुम्बकम' और 'ईशावास्यम इदं सर्वम' का संदेश दिया गया है, जिसका अर्थ है कि इस ब्रह्मांड में जो कुछ भी जड़ या चेतन है, वह सब ईश्वर द्वारा व्याप्त है और हमें इसका उपभोग त्याग के भाव से करना चाहिए, किसी के धन या संसाधनों का शोषण करके नहीं। हमारी पारंपरिक सोच हमेशा से यह मानती आई है कि वन बचेंगे तो धरती बचेगी, और धरती बचेगी तभी मानव सभ्यता का अस्तित्व सुरक्षित रहेगा। आज के डिजिटल युग में हमें इसी सनातन दर्शन को अपनी आधुनिक तकनीकों में शामिल करने की आवश्यकता है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता का भविष्य केवल इस बात से तय नहीं होना चाहिए कि वह कितनी चतुर है, वह कितनी तेजी से इंसानों की तरह कविताएं लिख सकती है, या वह कितनी जटिल पेंटिंग्स बना सकती है। बल्कि उसकी वास्तविक सफलता और महानता इस बात में मापी जानी चाहिए कि वह हमारी इस एकमात्र सुंदर पृथ्वी, इसके जंगलों, इसकी नदियों और इसकी हवा को स्वच्छ और सुरक्षित रखने में कितनी मददगार साबित हो रही है।
अतः समय आ गया है कि वैश्विक समुदाय, नीति निर्माता, बड़े कॉर्पोरेट घराने, वैज्ञानिक और शोधकर्ता सभी मिलकर 'रेड एआई' की इस आत्मघाती और अंधी दौड़ से खुद को बाहर निकालें। हमें एक ऐसी तकनीकी संस्कृति का निर्माण करना होगा जहां ग्रीन एआई केवल एक विकल्प न होकर डिफ़ॉल्ट मानक हो। सरकारों को हरित तकनीकी अनुसंधान के लिए विशेष बजटीय प्रावधान और करों में छूट देनी चाहिए, विश्वविद्यालयों में ऐसे पाठ्यक्रम शुरू करने चाहिए जो युवा इंजीनियरों को पर्यावरण-अनुकूल कोडिंग और कुशल एल्गोरिदम डिजाइन करना सिखाएं। हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि डिजिटल दुनिया चाहे कितनी भी आकर्षक, असीमित और चमकीली क्यों न दिखाई दे, अंततः हमारी सांसें इसी भौतिक हवा से चलती हैं और हमारा जीवन इसी मिट्टी और पानी पर निर्भर है। यदि हम तकनीक के इस विशाल और शक्तिशाली दैत्य को प्रकृति के शाश्वत नियमों के साथ संतुलित नहीं कर पाए, तो वह टिकाऊ भविष्य जिसके सपने हम देख रहे हैं, वह केवल एक मृगमरीचिका बनकर रह जाएगा। ग्रीन एआई ही वह एकमात्र सेतु है जो हमें आधुनिक वैज्ञानिक प्रगति के शिखर पर भी ले जाएगा और साथ ही यह भी सुनिश्चित करेगा कि हमारी आने वाली पीढ़ियों को विरासत में एक हरी-भरी, जीवित और सांस लेती हुई धरती मिले। प्रगति और प्रकृति का यही समन्वय ही वास्तविक अर्थों में मानवता की सबसे बड़ी बौद्धिक विजय होगी।
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)
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