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ग्लोबल वार्मिंग: बदलनी होगी विकास की सोच

Global warming: The idea of ​​development must change

आज विश्व ग्लोबल वार्मिंग की विभीषिका से जूझ रहा है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा आयोजित पिछले 30 कोप सम्मेलनों में बार-बार यह चिंता दोहराई गई कि क्या हम औद्योगीकरण के समय से 2050 तक वैश्विक तापमान में वृद्धि को 2 डिग्री तक सीमित रखने में सफल हो पायेंगे? गौरतलब है कि विश्व मौसम विज्ञान संगठन के अनुसार वैश्विक तापमान औद्योगीकरण के पूर्व से लेकर 2024 तक 1.55 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ चुका है, जबकि काॅपरनिक्स क्लाईमेट चेंज सर्विस द्वारा 2024 तक वैश्विक तापमान को 2024 में 1.6 डिग्री सेल्सियस अधिक रिपोर्ट किया गया है।

इन रिपोर्टों की बात को छोड़ दें तो भी हम देख रहे हैं कि साल दर साल ग्लोबल वार्मिंग बढ़ती ही जा रही है और उसका असर भारत में हिमालय से लेकर मैदानी इलाकों तक साफ दिखाई दे रहा है। विश्व के लगभग हर देश में तापमान पहले से ज्यादा बढ़ चुका है। ऐसा अनुमान है कि बढ़ते तापमान का असर सबसे पहले कृषि पर दिखाई देगा। विशेषज्ञों का मानना है कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण बढ़ते तापमान, पानी की कमी, गर्मी का दबाव, इन सभी कारणों से गेहूं की उत्पादकता 8 से 12 प्रतिशत कम हो सकती है।

अन्य खाद्य उत्पादों की उत्पादकता पर भी इसी प्रकार ग्लोबल वार्मिंग का असर देखने को मिल सकता है। समझना होगा कि चाहे फिलहाल विश्व में खाद्य उत्पादन पर असर हो, लेकिन बढ़ती उष्णता का सीधा असर लोगों के जीवन पर पड़ेगा। हजारों-लाखों वर्षों में बने ग्लेश्यिर पिघल रहे हैं, नदियांे के उफान लेने के कारण स्थान-स्थान पर बाढ़ के कारण बड़ी मात्रा में जान-माल का नुकसान हो रहा है। शहरी क्षेत्रों में गर्मी बढ़ने के कारण वातानुकूलन का इस्तेमाल उष्णता को ओर अधिक बढ़ा रहा है। कहीं अतिवृष्टि, तो कहीं अल्पवृष्टि, लोगों के जीवन पर प्रतिकूल असर डाल रही है। समुद्र का बढ़ता जल स्तर समुद्र के आस-पास रहने वाले लोगों को तेजी से विस्थापित करता जा रहा है, और भविष्य में यह समस्या ओर अधिक भीषण रूप ले सकती है।

इन परिस्थितियों में समाज को ग्लोबल वार्मिंग का समाधान खोजना ही होगा। समझना होगा कि ग्लोबल वार्मिंग का सीधा संबंध ऊर्जा के अधिक उपयोग, प्रकृति के शोषण और असंयमित उपभोग से है। ऊर्जा के अधिक उपभोग और मनुष्य द्वारा असंयमित उपभोग के चलते एक ओर हानिकारक ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन होता है, और साथ ही साथ उष्णता भी बढ़ती है। इसमें औद्योगिक और वर्तमान के विकसित देशों का योगदान सर्वाधिक रहा है। देखा जाए तो ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में विकसित देशों का ऐतिहासिक रूप से योगदान 50 से 60 प्रतिशत, चीन का योगदान 12 से 13 प्रतिशत, और भारत का योगदान मात्र 3 से 4 प्रतिशत ही है। विकसित देशों का बार-बार यह कहना है कि वे किसी भी हालत में अपनी जीवन शैली को बदलने के लिए तैयार नहीं हैं। यानि ना तो वे अपनी कारों का उपयोग कम करेंगे, न ही उपभोग को संयमित करेंगे। यानि उनका जीवन यथावत् चलेगा। वर्तमान में अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप तो ग्लोबल वार्मिंग और मौसम परिवर्तन जैसी चर्चा को बेमानी मानते हैं और उन्होंने ऐसे तमाम उपायों, जिससे ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन कम होता हो और उष्णता में कमी आती हो, पर लगभग विराम लगा दिया गया  है। वे उष्णता बढ़ाने वाले जीवाश्म इंधन के ज्यादा से ज्यादा उपयोग की वकालत भी करते दिखाई दे रहे हैं।

इन परिस्थितियों में यक्ष प्रश्न यह है कि बढ़ती वैश्विक उष्णता पर विराम लगाने के लिए क्या उपाय अपनाये जा सकते हैं? इसके लिए विकास के बारे में सोच को बदलना होगा। हमें समझना होगा कि ऐसा विकास जो ज्यादा से ज्यादा जीवाश्म ईंधन के उपयोग को बढ़ावा देता हो, वैश्विक उष्णता बढ़ाकर मानवता के लिए खतरा बन रहा हो, वो विकास नहीं कहा जा सकता। विकास की सोच में बदलाव की जरूरत होगी।

उपभोग में संयम : विकास के वर्तमान माॅडल में अधिकाधिक उपभोग, यानि अधिकाधिक प्रतिव्यक्ति ऊर्जा की खपत, अधिकाधिक वस्तुओं का उपभोग, उपयोग करो और फेंको, खाद्य पदार्थों की बर्बादी आदि निहित है। भारतीय सोच में सदैव संयमित उपभोग की बात कही जाती रही है। लेकिन पश्चिम की देखादेखी भारत में भी अब प्रतिव्यक्ति ऊर्जा की खपत, ज्यादा से ज्यादा वस्तुओं का उपभोग, इस्तेमाल करो और फेंक दो यानि यूज एंड थ्रो आदि देखने को मिल रहा है। दुनिया भर में इस प्रवृत्ति के कारण ज्यादा ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन हो रहा है, उष्णता बढ़ रही है, प्राकृतिक संसाधन लुप्त हो रहे हैं और मानवता पर संकट बढ़ रहा है। आज सिर्फ धारणक्षम उत्पादन पद्धति नहीं, बल्कि धारणक्षम यानि संयमित उपभोग ही एकमात्र उपाय है, जिससे हम मानवता को नष्ट होने से बचा सकते हैं।

पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता : हमारे देश में वैदिक काल से ही पर्यावरण के प्रति संवदेनशीलता देखने को मिलती रही है। हालांकि कुछ लोग भारत का यह कहकर मजाक उड़ाते थे कि यहां नदियों, पहाड़ों, पशु-पक्षियों और समस्त प्राणियों में ईश्वर का रूप देखकर उनकी पूजा की जाती है। उनको लगता था कि इन स्थूल चीजों को क्यों कर पूजा जाए? लेकिन यही कारण रहा कि भारत में हजारों वर्षों की सभ्यता और औद्योगिक विकास के बावजूद हम प्रकृति का संरक्षण कर पाएं। कुछ दशक पहले तक भारत में कोई विशेष पर्यावरणीय संकट दिखाई नहीं देता था। लेकिन विकास के नाम पर प्राकृति संसाधान के अंधाधुंध दोहन के कारण आज देश वायु, जल और मृदा के प्रदूषण से जूझ रहा है। हिमालय में विकास के नाम पर अंधाधुंध निर्माण, आवश्यकता से अधिक पर्यटन और नदियों के मार्ग को अवरूद्ध कर बांध बनाने के कारण हिमालय संकट में है। इसी प्रकार भू-जल के अंधाधुंध दोहन के कारण भू-जल का संकट गहरा रहा है। विकास के नाम पर पर्यावरण से छेड़छाड़ सही नहीं, यह समझ में आ रहा है। भारतीय संस्कृति में पर्यावरण में निहित संवेदनशीलता ही पर्यावरण को बचाने का एकमात्र रास्ता है।

विकेंद्रीकरण : पिछले लगभग 200 वर्षों से अधिक के औद्योगिकीकरण की प्रक्रिया की यह विशेषता रही है कि इसके साथ-साथ शहरीकरण बढ़ा है। दुनियाभर में गांवों से शहरों की ओर पलायन हुआ। यूरोप में इसे एनक्लोजर मूवमेंट कहा गया, जिसमें किसानों की भूमि बड़ी मात्रा में पूंजीपतियों के पास चली गई और कृषि पूंजीवादी पद्धति के अनुसार चलने लगी। हालांकि भारत में ऐसा बड़ी मात्रा नहीं हुआ, लेकिन गांवों में कृषि भूमि पर जनसंख्या के दबाव और रोजगार के अपर्याप्त अवसरों के कारण गांवों से शहरों की ओर पलायन जारी रहा। देश का अधिकांश विकास कुछ 20-25 शहरों तक सीमित रहा। गांव और शहर की आमदनी में विशाल अंतर आ गया। अपने भाग्य की तलाश में गांवों से शहर की ओर पलायन करने वाले लोग और शहरों के अत्यधिक गरीब लोग सभी स्लमों में रहने को मजबूर हो गए। शहरीकरण के कारण फिजूल का उपभोग जैसे काम के लिए लंबी दूरी तय करना, वाहनों के उपयोग में वृद्धि, कंस्ट्रक्शन के कारण पर्यावरणीय प्रदूषण, ऊर्जा की अधिक खपत, ट्रैफिक की अधिकता आदि ग्लोबल वार्मिंग को बढ़ाने वाले तत्व माने जा रहे हैं।

लेकिन ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर आधारित विकेन्द्रित विकास इन समस्याओं से निजात दिला सकता है। आवश्यकता इस बात की है कि गांवों में रोजगार के ज्यादा अवसर जुटाए जाएं। खेतीबारी के साथ-साथ मुर्गीपालन, पशुपालन, बागबानी, मशरूम उत्पाद, मत्स्य पालन के अतिरिक्त खाद्य प्रसंस्करण उद्योग ग्रामीण और कुटीर उद्योग, गांवों में रोजगार और आमदनी के अवसर बढ़ा सकते हैं। 20-25 गांवों के समूह को एक या दो कस्बों के साथ जोड़कर विकास को गति दी जा सकती है। इससे शहरों की ओर पलायन भी रूकेगा और ग्लोबल वार्मिंग के खतरे को भी कम किया जा सकता है।

अंत्योदय : विकास के वर्तमान माॅडल में सबसे बड़ी कमी यह है कि इससे धन और संपत्ति का केन्द्रीकरण होता है, और बेरोजगार, असमानताएं और गरीबी बढ़ती है। यह सही है कि गरीबों का उत्थान एक दिन में नहीं हो सकता, लेकिन यदि आर्थिक नीतियों का नियोजन भलीभांति हो तो हर व्यक्ति के लिए उद्यमिता और रोजगार के अवसर सृजित किए जा सकते हैं। अंत्योदय का मतलब गरीबों को धन बांटना नहीं है। नीति-निर्माण करते हुए इस बात का ध्यान रखने की जरूरत है कि क्या उस नीति से पंक्ति में खड़े अंतिम व्यक्ति को लाभ होगा या नहीं? सरकार केवल अक्षम और बेसहारा लोगों के रहन-सहन की चिंता करे। लेकिन हर स्वस्थ व्यक्ति को इतना सक्षम बनाने की आवश्यकता है कि वो अपनी और अपने परिवार की जरूरतों का स्वयं ध्यान रख सके।

 


डॉ. अश्विनी महाजन

(लेखक राष्ट्रीय सह-संयोजक, स्वदेशी जागरण मंच एवं पूर्व प्रोफेसर, पीजीडीएवी कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय, हैं।)
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)

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