
उमेश चतुर्वेदी
नीट पेपर लीक के विरोध में दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन के बाद जेन जी के नाम से जानी जा रही मौजूदा युवा पीढ़ी आजकल चर्चा में है। नरेंद्र मोदी की सरकार के बारह साल के कामकाज के दौरान प्रदर्शन तो कई हुए, लेकिन किसी मंत्री का इस्तीफा पहली बार हुआ। इसका श्रेय जेन जी के आंदोलन को ही जाता है। इसके बाद राजनीतिक हलकों में डर और उत्साह-दोनों ही माहौल है। भारतीय जनता पार्टी जैसे सत्ताधारी दल जहां सांसत महसूस कर रहे हैं, वहीं विपक्षी कांग्रेस, समजवादी पार्टी और आम आदमी पार्टी के खेमे में उत्साह का माहौल है। सत्ताधारी दल जहां जेन जी को साधने की कोशिश के तहत तमाम तरह के वायदे कर रहे हैं, वहीं विपक्षी दल उनके गुस्से को और ज्यादा शह देने की कोशिश में जुट गए हैं।
जहां तक भारतीय संदर्भ में जेन जी या जेन अल्फा को महत्व देने की बात है तो इसकी वजह यह है कि आगामी आम चुनावों के दौरान जेन जी सबसे बड़ा वोट बैंक होगा। उस समय देश के करीब 38 करोड़ वोटर इसी पीढ़ी के होंगे। अनुमानों के अनुसार, इसमें 'जेन जी' पुरुषों की संख्या करीब 19.9 करोड़, तो महिलाएं लगभग 18.1 करोड़ होगी। इस लिहाज से यह पहला अवसर होगा, जब भारत की सबसे बड़ी वयस्क पीढ़ी 'जेन जी' होगी। यह न सिर्फ संख्या में बड़ी होगी बल्कि यह सबसे सक्रिय वर्ग का प्रतिनिधि भी होगी। पहली बार वोट डालने वाले करोड़ों 'जेन जी' होंगे। जिनमें कॉलेज, यूनिवर्सिटी और तमाम प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्र भी होंगे। इनमें बेरोजगार युवा भी होंगे तो कई स्टार्टअप शुरू करने वाले भी होंगे। जाहिर है कि वे तब के चुनाव में अपनी बड़ी भूमिका निभाएंगे।
कुछ महीनों बाद साल 2027 में उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं। एक आंकड़े के मुताबिक, इस चुनाव में करीब 2.8 करोड़ वोटर इसी पीढ़ी के होंगे। यही वजह है कि छात्रों के साथ संवाद का ‘गूंज’ कार्यक्रम राहुल गांधी उत्तर प्रदेश में आयोजित कर रहे हैं तो अखिलेश यादव लगातार जेन जी को लुभाने के लिए वायदे कर रहे हैं। इस कवायद में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी पीछे नजर नहीं आना चाहते। जेन जी को साधने के लिए युवा आयोग बनाने और युवाओं से निरंतर संवाद के लिए अधिकारियों को निर्देश दे दिए गए हैं।
जो दल जहां सत्ता में है, वह जेन जी से जहां तमाम वायदे कर रहे हैं, वहीं अपने कामकाज में रणनीतिक बदलाव ला रहे हैं। सरकारें अब वायदे कर रही हैं कि अब युवाओं को सिर्फ चुनावी भत्तों या मुफ्त की योजनाओं के भरोसे नहीं रखा जाएगा। बल्कि उनके रोजगार के पक्के अवसरों और डिजिटल इकोसिस्टम के निर्माण के दावे किए जा रहे हैं। इतना ही नहीं, युवाओं को आधुनिक तकनीक और भविष्य की जरूरतों के हिसाब से कुशल बनाने पर भी जोर देने की बात कही जा रही है। उत्तर प्रदेश जैसे राज्य तो 'यूथ फर्स्ट पॉलिसी' और युवा आयोग के गठन की बात कर चुके हैं। इसके साथ ही सभी सरकारी नीतियों को युवाओं की सहूलियत और उनके नजरिए के अनुसार तैयार करने के वायदे किए जा रहे हैं। वैसे तो नरेंद्र मोदी राजनीति में युवाओं की भागीदारी पर जोर देते रहे हैं। लेकिन जेन जी के आंदोलन के बाद बाकी राजनीतिक दल भी अब टिकट बंटवारे में पारंपरिक समीकरणों की बजाय खुद के दम पर आगे बढ़ने वाले युवाओं को अधिक भागीदारी का वायदा कर रहे हैं। कई मुख्यमंत्री और राजनीतिक नेतृत्व अब युवाओं से सीधे संवाद की तैयारियों में जुट गए हैं। इसके साथ ही पारदर्शी परीक्षा प्रणाली और जवाबदेह तंत्र के विकास की भी बात की जा रही है। आंदोलनों से सबक लेते हुए सरकारों ने परीक्षाओं में पारदर्शिता बरतने, पेपर लीक के खिलाफ कड़े कानून बनाने और शिक्षा व्यवस्था में सुधार का वायदा किया है। जेन जी की अहमियत कहें या उनके आंदोलन से हुई घबराहट, जेन जी को अब तक की सबसे ईमानदार पीढ़ी के रूप में स्वीकार किया जा रहा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत और खुद प्रधानमंत्री मोदी खुले तौर पर युवाओं को राष्ट्रप्रेमी और बेहद ईमानदार मान चुके हैं। कानूनों को बदलने तक की बात हो रही है। निश्चित तौर पर इसकी वजह देश की राजनीति में आने वाले बदलाव हैं, जो शायद पिछले कई दशकों में सबसे बड़ा जनसांख्यिकीय परिवर्तन होगा।
जेन जी के साथ किए जा रहे इन वायदों को पूरा कर पाना आसान नहीं होगा। वैसे इसकी वजह यह भी है कि ज्यादातर जेन जी का मानस अत्यधिक सोशल मीडिया के उपयोग, ऑनलाइन सक्रियता और उससे उपजे अकेलेपन के साथ विकसित हुआ है। इस वजह से इस पीढ़ी में बड़ी संख्या अवसाद, एंग्जायटी और मानसिक तनाव वाले युवाओं की संख्या भी ज्यादा है। चूंकि इस पीढ़ी को अपनी पहली पीढ़ी की तरह ज्यादा संघर्ष नहीं करना पड़ा है, उन्हें बहुत सारी सुविधाएं अपने माता-पिता से मिली हैं। इसलिए वे उस तरह के संघर्ष को नहीं समझते, जिस तरह का संघर्ष उनसे पहले की पीढ़ी ने या तो किया है या कर रही है। लेकिन उन्हें अपनी आर्थिक सुरक्षा की चिंता ज्यादा है। आज के आर्थिक दौर में स्थिरता बहुत कम लोगों को मिल पा रही है। इस चिंता से जेन जी वाकिफ है। इसलिए वह अपने भविष्य को लेकर कई बार असुरक्षित महसूस करता है। नीट आंदोलन में भारी संख्या में छात्रों के उतरने के पीछे यही मानस काम कर रहा था और रांची में जेपीएससी आदि की परीक्षाओं में हो रही धांधली के खिलाफ उतरे छात्रों की वजह भी यही है। इस पीढ़ी को अपनी समस्याओं के तत्काल समाधान की चाहत है। ठीक वैसे ही, जैसे वह डिजिटली समस्याओं का समाधान कर लेता है। इस वजह से इस पीढ़ी में अक्सर धैर्य की कमी नजर आती है।
जेन जी की अवधारणा और उसके संघर्ष को गति मिली एशिया के कुछ देशों मसलन नेपाल और बांग्लादेश में हुए सफल आंदोलनों से मिली। भारत में भी उसी तर्ज पर सत्ता परिवर्तन को लेकर कुछ लोगों ने सपने देखने शुरू कर दिए। जेन जी को उकसाने की कोशिशें तभी से शुरू हुईं। जंतर-मंतर के आंदोलन के पीछे तो अब राजनीतिक हलकों में माना जा रहा है कि पर्दे के पीछे से आम आदमी काम कर रही थी। वहीं मोदी और भाजपा विरोध के हर मंच पर पहुंचने वाले वामपंथी वर्ग की भी इस आंदोलन में भूमिका रही। आंदोलन की सफलता को शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद मान लिया गया। इसके साथ ही समूचे देश के जेन जी को एक ही तरह से देखने और मानने की कोशिश तेज हो गई। राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों में जेन जी को लेकर दबाव महसूस किया जाने लगा कि वह अब सबकुछ बिखेर कर रख देगा। लेकिन इसी बीच रांची में जारी आंदोलन ने जेन जी का एक नया ही चेहरा उजागर किया है। जहां संयम है, जातिवाद नहीं है, निजी हमले नहीं और सबसे बड़ी बात, जंतर-मंतर की तरह गालियों की भरमार नहीं है। इससे साफ है कि पूरे देश का जेन जी एक जैसा नहीं है। दिल्ली-मुंबई के जेन जी की तरह की सोच दूसरे और तीसरे स्तर के शहरों या गांवों मसलन, प्रयागराज, वाराणसी, रांची आदि के जेन जी की सोच नहीं है। इसलिए राजनीतिक दलों को जेन जी को समझने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर मौजूद भिन्नताओं को भी देखना और समझना होगा।
वैसे नेपाल, बांग्लादेश, इंडोनेशिया आदि देशों में हुए जेन जी प्रदर्शनों को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चाएं और विचार हो रहे हैं। एशिया ह्यूमन राइट्स एंड लेबर एडवोकेट्स के निदेशक फिल रॉबर्टसन का कहना है कि हाल के विरोध प्रदर्शनों की अगुवाई कर रहे भ्रष्टाचार से गुस्से में हैं। रॉबर्टसन के अनुसार, "एशियाई देशों में सरकारी नाकामी से अमीरों और गरीबों के बीच की खाई बढ़ती जा रही है। इससे युवाओं में विरोध पैदा हो रहा है। ये युवा जानते हैं कि उनके पास खोने के लिए कुछ नहीं है, इसलिए ही वह बेधड़क सड़कों पर उतर रहे हैं।”
इन आंदोलनों में सबसे सफल नेपाल का आंदोलन रहा, जहां प्रधानमंत्री खड्ग प्रसाद शर्मा ओली की सरकार गिर गई और संसद को भंग करने पर मजबूर होना पड़ा। इसके कुछ समय बाद इंडोनेशिया में भी हफ्तों तक हिंसक विरोध प्रदर्शन जारी रहे। इसकी वजह वहां बेकाबू महंगाई रही। वहां युवाओं को गुस्से की आग में घी का काम किया, महंगाई के बीच सांसदों को मिल रही विशेष सुविधाएं। जिसके बाद राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो को कार्रवाई करनी ही पड़ी। सांसदों की सुविधाएं कम की गईं और सरकार में बड़ा फेरबदल किया गया। इसके बाद एशिया के सबसे गरीब देश तिमोर-लेस्ते तक जा पहुंची। विगत साल के सितंबर के आखिर में वहां की संसद के बाहर छात्रों ने कई दिनों तक प्रदर्शन किए। छात्र सांसदों के लिए नई गाड़ियां खरीदने और उनको आजीवन पेंशन देने वाले कानूनों का विरोध कर रहे थे। जिसके चलते सरकार को झुकना पड़ा और सांसदों ने पेंशन कानून और कार खरीद की योजना को रद्द करने के लिए मतदान किया। फिलीपींस में भी ऐसा ही नजारा दिखा। विगत साल के सितंबर में मनीला के रिजाल पार्क में हजारों युवा प्रदर्शनकारी जुटे और उन्होंने लगभग 1.8 अरब डॉलर के भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रदर्शन किया।
इन प्रदर्शनों के संदर्भ में ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी की शोधकर्ता गीता पुत्री दमयाना का भी मानना है कि ये आंदोलन युवाओं के समर्थन और डिजिटल सक्रियता के चलते आगे बढ़े। इन आंदोलनों के पीछे युवाओं में आर्थिक अन्याय और अमीर वर्ग को मिलने वाले विशेष अधिकारों से उपजा गुस्सा है। कनाडा के ओसाका के कानसाई गाइडाई विश्वविद्यालय में शांति और संघर्ष अध्ययन विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर मार्क कोगन के अनुसार, यह कोई नया चलन नहीं है। इसके पहले 2020–21 के दौरान थाईलैंड में युवा आंदोलन ने सत्ता और राजशाही में सुधार की मांग की थी। तब सरकार ने दमन का रास्ता अपना लिया था। हालांकि वह मानते हैं कि इन विरोधों का मकसद तख्तापलट नहीं, बल्कि मौजूदा व्यवस्था में जवाबदेही और बेहतर शासन लाना है। यह बात और है कि भारत की काकरोच जनता पार्टी के रूख से ऐसा नहीं लगता।
माना जा रहा है कि दक्षिण-पूर्व एशिया की सरकारें अब समझ गई है कि अमीरों की दिखावटी सुविधाएं युवाओं को भड़का सकती हैं। लेकिन असली चुनौती है, इन विरोधों को ठोस सुधारों में बदलना। ये सुधार भ्रष्टाचार विरोधी व्यवस्था और पारदर्शिता लाने के जरिए ही किए जा सकते हैं। इसमें दो राय नहीं कि भारत जैसे देशों में विशेषकर क्षेत्रीय दलों की सरकारों के दौरान जाति और धर्म के नाम पर नियुक्तियों में जहां मनमानी होती है, वहीं परीक्षाओं में तकरीबन खुलेआम कदाचार होता रहा है। इसमें भी दो राय नहीं कि आर्थिक सुधारों के चलते आम लोगों की आर्थिक हालत में बेहतरी की तुलना में अमीरो का धन ज्यादा बढ़ा है। अधिकारी और राजनेता भी आम लोगों की तुलना में ज्यादा धनवान होते जा रहे हैं। उन पर प्रभावी लगाम नहीं है। आज के युवा को अब यह स्वीकार नहीं है। जानकारों के मुताबिक, सोशल मीडिया की मदद से एक देश में सफल युवा आंदोलन अन्य देशों में भी प्रेरणा दे रहे हैं। यही असल खतरा है। चाहे केंद्र की सरकार हो या राज्य की, इन सब पहलुओं पर ध्यान दिए बिना अगर जेन जी को साधने के लिए कोई कदम उठाएंगी तो वे बहुत प्रभावी नहीं होंगी।
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)
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