1984 के आम चुनावों में मात्र 2 सांसदों तक सिमट चुकी भारतीय जनता पार्टी की आज की स्थिति भारतीय राजनीति के सबसे बड़े रूपांतरणों में से एक मानी जाती है। तीन लगातार लोकसभा चुनावों में जीत, 21 राज्यों में सत्ता या साझेदारी, और उन क्षेत्रों में पैठ जहां कभी उसका नामोनिशान तक नहीं था—ये केवल चुनावी आंकड़े नहीं हैं, बल्कि एक दीर्घकालिक राजनीतिक रणनीति, वैचारिक स्पष्टता और संगठनात्मक विस्तार का परिणाम हैं। पश्चिम बंगाल में 2011 में शून्य से 2026 में 200 के पार, असम में 3 से 100 के ऊपर, और केरल जैसे कठिन राजनीतिक भूगोल में धीरे-धीरे बढ़ती उपस्थिति यह संकेत देती है कि पार्टी ने अपने विस्तार का मॉडल बदलते भारत के अनुरूप ढाला है। इस उभार की सबसे बड़ी वजह भाजपा का कैडर-आधारित संगठन है, जिसकी जड़ें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ी हैं। यह नेटवर्क न केवल चुनावी समय पर सक्रिय होता है, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक स्तर पर भी अपनी पकड़ बनाए रखता है। भाजपा ने इस संगठनात्मक ताकत को आधुनिक चुनावी तकनीकों, डेटा एनालिटिक्स और बूथ स्तर तक माइक्रो-मैनेजमेंट के साथ जोड़ा है। यही कारण है कि वह उन राज्यों में भी जमीन बना सकी जहां पहले क्षेत्रीय दलों का दबदबा था। दूसरा महत्वपूर्ण पहलू भाजपा की वैचारिक स्थिरता और उसके साथ-साथ व्यावहारिक लचीलापन है। एक ओर वह राष्ट्रवाद, सांस्कृतिक पहचान और मजबूत नेतृत्व जैसे मुद्दों को लगातार आगे बढ़ाती रही, वहीं दूसरी ओर उसने स्थानीय मुद्दों को समझते हुए अपने एजेंडे को क्षेत्रीय आवश्यकताओं के अनुरूप ढाला। पश्चिम बंगाल में “परिवर्तन” की राजनीति हो या असम में अवैध घुसपैठ का मुद्दा—भाजपा ने हर राज्य में अलग नैरेटिव गढ़ा, लेकिन अपनी मूल विचारधारा को नहीं छोड़ा।
तीसरा कारक है नेतृत्व का केंद्रीकरण और उसकी स्वीकार्यता। 2014 के बाद से प्रधानमंत्री स्तर पर मजबूत नेतृत्व की छवि ने भाजपा को राष्ट्रीय स्तर पर एक स्थिर विकल्प के रूप में स्थापित किया। इस नेतृत्व ने न केवल चुनावी रणनीति को दिशा दी, बल्कि कार्यकर्ताओं में आत्मविश्वास भी भरा। इसके साथ ही, पार्टी ने राज्य स्तर पर भी नए नेतृत्व को उभारने में संकोच नहीं किया, जिससे वह क्षेत्रीय दलों के मुकाबले अधिक गतिशील दिखी। भाजपा की सफलता का एक और अहम कारण उसका कल्याणकारी राजनीति का मॉडल है। उज्ज्वला, आयुष्मान, पीएम आवास और मुफ्त राशन जैसी योजनाओं ने गरीब और निम्न मध्यम वर्ग के बीच एक मजबूत आधार तैयार किया। यह “लाभार्थी वर्ग” अब केवल जाति या धर्म के आधार पर नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष लाभ के आधार पर वोट करता दिख रहा है। भाजपा ने इस वर्ग को एक स्थायी वोट बैंक में बदलने की दिशा में काम किया है। इसके अलावा, विपक्ष की कमजोरी और बिखराव ने भी भाजपा के विस्तार को आसान बनाया। कई राज्यों में क्षेत्रीय दलों के बीच आपसी टकराव और राष्ट्रीय स्तर पर एक स्पष्ट वैकल्पिक नेतृत्व की कमी ने भाजपा को बढ़त दी। वह खुद को “स्थिरता बनाम अराजकता” के नैरेटिव के रूप में पेश करने में सफल रही। अंततः, भाजपा का विस्तार केवल चुनाव जीतने की कहानी नहीं है, बल्कि यह भारत की बदलती सामाजिक-राजनीतिक संरचना का प्रतिबिंब भी है। एक ऐसी पार्टी, जिसने हाशिये से शुरुआत की, आज केंद्र में है और लगातार नए भूगोल तलाश रही है। यही उसकी सबसे बड़ी ताकत है—रुकना नहीं, बल्कि लगातार आगे बढ़ना।

दीपक कुमार रथ
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