
डॉ दीपक कोहली
दीपावली भारतीय जनमानस के प्राणों में बसी एक ऐसी सामूहिक चेतना है, जो कार्तिक मास की अमावस्या के घने अंधकार को करोड़ों दीपों की कतारों से पराजित करने का उत्सव मनाती है। परंपरा कहती है कि यह अयोध्या के राजा श्रीराम के चौदह वर्ष के वनवास के पश्चात लौटने का उल्लास है, तो दर्शन कहता है कि यह भीतर के अंधकार पर ज्ञान के प्रकाश की शाश्वत विजय का प्रतीक है। परंतु यदि हम इस सांस्कृतिक पर्व की गहराइयों में उतरें और इसे मात्र एक धार्मिक कर्मकांड के चश्मे से न देखकर तर्क, विज्ञान और प्रकृति के दृष्टिकोण से देखें, तो दीपावली का एक ऐसा विराट स्वरूप उभरता है जो आदिम काल से लेकर आधुनिक युग तक पूरी तरह से वैज्ञानिक सिद्धांतों और पर्यावरणीय संतुलन पर आधारित है। यह पर्व उस समय आता है जब ऋतु परिवर्तन अपनी चरम सीमा पर होता है, जब मानसून की विदाई हो चुकी होती है और शीत ऋतु की आहट से संपूर्ण चराचर जगत प्रभावित हो रहा होता है। भारत के प्राचीन मनीषियों ने प्रकृति के इस संधिकाल को इतनी सूक्ष्मता से समझा कि उन्होंने इसके साथ एक ऐसा उत्सव जोड़ दिया जो मानव स्वास्थ्य, मानसिक चेतना, कीट-पतंगों के नियंत्रण और ब्रह्मांडीय ऊर्जा के प्रवाह को संतुलित करने का काम करता है।
दीपावली के इस वैज्ञानिक और पर्यावरणीय पक्ष को समझने के लिए सबसे पहले हमें उस समय चक्र को देखना होगा जब यह पर्व मनाया जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार कार्तिक मास की अमावस्या वर्ष की सबसे काली रातों में से एक होती है। खगोलीय दृष्टिकोण से इस समय चंद्रमा पृथ्वी और सूर्य के बीच इस प्रकार स्थित होता है कि उसका दृश्य भाग पूरी तरह से अंधकारमय हो जाता है। सूर्य दक्षिणायन की स्थिति में होता है, जिससे पृथ्वी के उत्तरी गोलार्ध में दिन छोटे और रातें लंबी होने लगती हैं। सौर ऊर्जा की उपलब्धता कम होने के कारण वातावरण में एक प्राकृतिक सुस्ती और भारीपन आने लगता है।
विज्ञान के अनुसार, सूर्य के प्रकाश की कमी मानव शरीर में मेलाटोनिन नामक हार्मोन के स्तर को प्रभावित करती है, जिससे अवसाद, सुस्ती और नकारात्मकता की भावनाएं पनप सकती हैं। हमारे पूर्वजों ने इस खगोलीय घटनाक्रम को समझा और अमावस्या की उस सबसे घनी काली रात को दीपों के महाउत्सव में बदल दिया। जब करोड़ों मिट्टी के दीयों में तेल और रुई की बत्ती जलती है, तो उससे उत्पन्न होने वाला प्रकाश केवल बाहरी अंधकार को ही दूर नहीं करता, बल्कि मानव मस्तिष्क में सेरोटोनिन नामक 'हैप्पी हार्मोन' के स्राव को बढ़ाता है, जो उत्साह, उमंग और मानसिक स्पष्टता लाता है। यह प्रकाश पर्व दरअसल एक सामूहिक प्रकाश चिकित्सा या फोटोथेरेपी है, जिसे आज का आधुनिक चिकित्सा विज्ञान अवसाद दूर करने के लिए एक प्रामाणिक पद्धति मानता है।
इस पर्व का जो सबसे पहला और अनिवार्य चरण है, वह है स्वच्छता। दीपावली से कई सप्ताह पूर्व ही घरों, दुकानों और सार्वजनिक स्थानों की व्यापक सफाई का अभियान शुरू हो जाता है। लोग अपने घरों के कोने-कोने को साफ करते हैं, अनुपयोगी सामान को बाहर निकालते हैं और दीवारों पर चूने या नए रंगों की पुताई करते हैं। सतही तौर पर यह लक्ष्मी के आगमन की तैयारी दिखती है, लेकिन इसके पीछे का विज्ञान बेहद गहरा और पूरी तरह से स्वास्थ्य और पर्यावरण से जुड़ा है। भारत में दीपावली से ठीक पहले वर्षा ऋतु का समापन होता है। मानसून के महीनों में अत्यधिक नमी और आर्द्रता के कारण घरों की दीवारों, लकड़ी के सामानों और अंधेरे कोनों में सीलन जमा हो जाती है। यह सीलन कवक यानी फंगस, बैक्टीरिया, दीमक और विभिन्न प्रकार के सूक्ष्मजीवों के पनपने के लिए सबसे अनुकूल वातावरण तैयार करती है। वर्षाकाल के बाद यदि इन घरों की गहन सफाई न की जाए, तो मलेरिया, डेंगू, टायफाइड और त्वचा संबंधी संक्रामक रोगों की महामारी फैलने का खतरा अत्यधिक बढ़ जाता है।
दीपावली की सफाई वास्तव में एक वार्षिक सैनिटाइजेशन अभियान है। पारंपरिक रूप से दीवारों पर की जाने वाली चूने की पुताई (कैल्शियम हाइड्रोक्साइड) एक उत्कृष्ट और सस्ता कीटाणुनाशक है। चूना जब दीवारों पर लगाया जाता है, तो वह हवा की कार्बन डाइऑक्साइड को सोखकर कैल्शियम कार्बोनेट में बदल जाता है और इस प्रक्रिया में नमी को पूरी तरह खत्म कर देता है, जिससे दीवारों पर छिपे हानिकारक बैक्टीरिया और फंगस का समूल नाश हो जाता है।
सफाई के बाद इस उत्सव का सबसे सुंदर और वैज्ञानिक दृश्य उभरता है मिट्टी के दीयों की कतारों के रूप में। आज के इस आधुनिक युग में भले ही बिजली की रंग-बिरंगी लाइटों और मोमबत्तियों का चलन बढ़ गया हो, लेकिन जो विज्ञान मिट्टी के पारंपरिक दीयों में है, वह किसी कृत्रिम विधा में नहीं है। मिट्टी का दीया पंचतत्वों का एक अद्भुत संगम है। मिट्टी भूमि तत्व है, तेल जल और अग्नि का माध्यम है, बत्ती वायु और आकाश के सहयोग से जलती है। जब इन दीयों में शुद्ध सरसों का तेल, तिल का तेल या गाय का घी डालकर जलाया जाता है, तो यह केवल रोशनी फैलाने वाला उपकरण नहीं रह जाता, बल्कि एक शक्तिशाली वायु-शोधक और कीट-नियंत्रक यंत्र बन जाता है। वर्षा ऋतु के ठीक बाद हवा में नमी होने के कारण मच्छरों, मक्खियों और विभिन्न प्रकार के उड़ने वाले कीटों की संख्या में अप्रत्याशित वृद्धि हो जाती है। ये कीट फसलों को नुकसान पहुँचाने के साथ-साथ मनुष्यों में बीमारियाँ भी फैलाते हैं। जब अमावस्या की रात करोड़ों दीये एक साथ जलते हैं, तो उनकी अग्नि और गर्मी की ओर आकर्षित होकर ये हानिकारक कीट स्वतः ही उस लौ में समाहित हो जाते हैं, जिससे उनकी आबादी पर एक प्राकृतिक नियंत्रण लग जाता है। इसे कीट विज्ञान (एंटोमोलॉजी) में 'लाइट ट्रैप' तकनीक कहा जाता है, जिसका उपयोग आज भी आधुनिक कृषि वैज्ञानिक बिना रसायनों के कीड़ों को मारने के लिए करते हैं।
इसके अलावा, इन पारंपरिक तेलों और घी के जलने से निकलने वाला धुआं और वाष्प पर्यावरण के लिए बेहद हितकारी होते हैं। सरसों के तेल में एलिल आइसोथियोसाइनेट नामक तत्व होता है, जो जलने पर हवा में मौजूद हानिकारक बैक्टीरिया और रोगाणुओं को नष्ट करता है। वहीं, जब गाय के शुद्ध घी का दीया जलाया जाता है, तो उससे निकलने वाली तरंगें और गंध वातावरण को शुद्ध करती हैं। वेदों और उपनिषदों में वर्णित यज्ञ चिकित्सा का यह एक सूक्ष्म रूप है। घी और तेल के जलने से निकलने वाली कार्बनिक ऊष्मा हवा की आर्द्रता को सोख लेती है, जिससे साँस के रोगियों को भारीपन और सीलन भरी हवा से राहत मिलती है। इसके विपरीत, आधुनिक समय में उपयोग की जाने वाली मोमबत्तियाँ पैराफिन वैक्स से बनती हैं, जो पेट्रोलियम का एक सह-उत्पाद है। मोमबत्ती के जलने से टोल्यूनि और बेंजीन जैसी जहरीली गैसें निकलती हैं, जो मानव फेफड़ों के लिए हानिकारक हैं। बिजली की चीनी लाइटें पर्यावरण में भारी मात्रा में ई-कचरा और प्रकाश प्रदूषण पैदा करती हैं। इसलिए, विज्ञान सम्मत दृष्टिकोण यही कहता है कि मिट्टी के दीयों की ओर लौटना केवल एक सांस्कृतिक जिद नहीं, बल्कि हमारे पर्यावरण और फेफड़ों को बचाने की एक वैज्ञानिक आवश्यकता है।

दीपावली के दौरान रंगोली बनाने की परंपरा भी केवल सौंदर्यशास्त्र तक सीमित नहीं है, इसका भी एक गहरा व्यावहारिक और जैविक महत्व है। पारंपरिक रूप से रंगोली रासायनिक रंगों से नहीं, बल्कि चावल के आटे, हल्दी, कुमकुम, सुखाए गए फूलों के पाउडर और पत्तों के रंगों से बनाई जाती थी। द्वार पर चावल के आटे से रंगोली बनाने का पहला पर्यावरणीय कारण था 'भूत यज्ञ' या जीवों के प्रति दया भाव। वर्षा के बाद चींटियों और अन्य छोटे कीटों को भोजन की तलाश होती है। जब वे घर के मुख्य द्वार पर ही चावल का आटा पाते हैं, तो उनका पेट वहीं भर जाता है और वे भोजन की तलाश में घर के भीतर प्रवेश नहीं करतीं। यह प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व की एक अनूठी व्यवस्था है, जहाँ हम जीवों को मारे बिना, उन्हें भोजन देकर अपने घरों से दूर रख रहे हैं। रंगोली के ज्यामितीय पैटर्न और रंग मानव मस्तिष्क पर भी सकारात्मक प्रभाव डालते हैं। जब कोई व्यक्ति घर में प्रवेश करते समय जमीन पर एक सुंदर, सममित और चमकीले रंगों वाली कलाकृति देखता है, तो उसकी आँखों के माध्यम से मस्तिष्क के विजुअल कॉर्टेक्स को सकारात्मक संकेत मिलते हैं, जिससे तनाव का स्तर तुरंत कम हो जाता है। हल्दी और कुमकुम के उपयोग के कारण ये रंगोलियाँ प्राकृतिक रूप से कीटाणुनाशक की तरह भी काम करती हैं, जो मुख्य द्वार से आने वाले कीड़ों को रोकती हैं।
इस पर्व का एक अन्य महत्वपूर्ण वैज्ञानिक पहलू इस दौरान बनने वाले व्यंजनों और पकवानों से जुड़ा है। भारत के हर क्षेत्र में दीपावली पर विशेष प्रकार के मिष्ठान और नमकीन बनाए जाते हैं, जिनमें तिल, गुड़, घी, मेवे, बेसन और विभिन्न मसालों का प्रचुर उपयोग होता है। अगर हम इस खान-पान को पोषण विज्ञान के दृष्टिकोण से देखें, तो यह पूरी तरह से आने वाली शीत ऋतु के अनुकूल होता है। आयुर्वेद के अनुसार, शरद ऋतु की समाप्ति और हेमंत ऋतु के आगमन के इस संधिकाल में शरीर की जठराग्नि (पाचन शक्ति) तीव्र होने लगती है। ठंडे मौसम का सामना करने के लिए शरीर को अधिक ऊर्जा और वसा की आवश्यकता होती है। तिल और गुड़ की तासीर गर्म होती है; तिल में प्रचुर मात्रा में कैल्शियम और ओमेगा फैटी एसिड होते हैं, जबकि गुड़ आयरन का मुख्य स्रोत है। घी शरीर के जोड़ों को चिकनाई प्रदान करता है, जो सर्दियों में शुष्कता के कारण होने वाले वात रोगों और जोड़ों के दर्द से बचाता है। दीपावली के पकवान वास्तव में शरीर को आने वाली कड़ाके की ठंड से लड़ने के लिए तैयार करने का एक स्वादिष्ट पोषण पूरक हैं।
परंतु, जैसे-जैसे समय बदला और आधुनिकता की अंधी दौड़ शुरू हुई, इस अत्यंत वैज्ञानिक और पर्यावरण-अनुकूल उत्सव का स्वरूप विकृत होने लगा। इस विकृति का सबसे बड़ा कारण बना पटाखों और आतिशबाजी का अत्यधिक उपयोग। दीपावली के मूल स्वरूप में पटाखों का कहीं कोई उल्लेख नहीं मिलता, क्योंकि बारूद का आविष्कार और भारत में उसका आगमन बहुत बाद की ऐतिहासिक घटनाएँ हैं। प्राचीन काल में उल्कामुख या बांस के खोखले टुकड़ों में कुछ प्राकृतिक ज्वलनशील पदार्थ भरकर केवल ध्वनि और प्रकाश का एक सीमित प्रदर्शन किया जाता था, जिसका उद्देश्य वर्षा के बाद बचे हुए जहरीले कीटों को भगाना था। लेकिन आज के समय में रासायनिक पटाखों ने इस उत्सव को एक पर्यावरणीय आपदा में बदल दिया है। पटाखों में इस्तेमाल होने वाले भारी तत्व जैसे बेरियम (जो हरा रंग देता है), स्ट्रोंतियम (लाल रंग), सोडियम (पीला रंग), एल्युमिनियम (सफेद चमकीली रोशनी) और सल्फर, जलने के बाद हवा में ऐसे सूक्ष्म कण छोड़ते हैं जिन्हें हम PM_{2.5} और PM_{10} के रूप में जानते हैं। ये कण इतने महीन होते हैं कि हमारे श्वसन तंत्र के सुरक्षा चक्र को भेदकर सीधे फेफड़ों और रक्तप्रवाह में पहुंच जाते हैं।
दीपावली के ठीक बाद उत्तर भारत के मैदानी इलाकों में हवा की गति कम हो जाती है और तापमान गिरने के कारण 'थर्मल इन्वर्जन' या तापीय प्रतिलोमन की स्थिति पैदा होती है। इस वैज्ञानिक परिघटना के कारण गर्म हवा ऊपर उठने के बजाय जमीन के करीब ही ठहर जाती है, जिससे पटाखों का धुआं, धूल और कोहरा आपस में मिलकर 'स्मॉग' यानी जहरीली धुंध की एक मोटी चादर बना लेते हैं। यह स्थिति अस्थमा, ब्रोंकाइटिस और हृदय रोगियों के लिए जानलेवा साबित होती है। इसके अतिरिक्त, पटाखों से होने वाला ध्वनि प्रदूषण केवल मनुष्यों के मानसिक स्वास्थ्य को ही प्रभावित नहीं करता, बल्कि हमारे आसपास रहने वाले मूक पशु-पक्षियों के लिए एक भयानक दुःस्वप्न बन जाता है। कुत्तों और बिल्लियों की श्रवण शक्ति मनुष्यों से कई गुना अधिक संवेदनशील होती है। पटाखों की अचानक होने वाली तीव्र गूंज से उनके दिल की धड़कनें रुक सकती हैं, वे गहरे अवसाद और सदमे में चले जाते हैं। पक्षी अपने घोंसलों से डरकर रात के अंधेरे में उड़ जाते हैं और दिशाभ्रमित होकर तारों या दीवारों से टकराकर दम तोड़ देते हैं। यह प्रकृति के उस ताने-बाने को छिन्न-भिन्न करता है जिसकी रक्षा का संकल्प इस पर्व की आत्मा में निहित था।
यहीं पर विज्ञान और पर्यावरण चेतना हमें एक मार्ग दिखाती है। वर्तमान समय में 'हरित पटाखे' या ग्रीन क्रैकर्स का विकल्प सामने आया है, जो पारंपरिक पटाखों की तुलना में लगभग 30 प्रतिशत कम प्रदूषण फैलाते हैं और इनमें सल्फर या बेरियम जैसे घातक रसायनों का उपयोग नहीं होता। लेकिन पूर्ण वैज्ञानिक और पर्यावरणीय समाधान केवल विकल्पों को बदलने में नहीं, बल्कि अपनी मूल जड़ों की ओर लौटने में है। यदि हम दीपावली को उसके वास्तविक स्वरूप में मनाएं, तो यह पृथ्वी के पारिस्थितिकी तंत्र को समृद्ध करने का सबसे बड़ा माध्यम बन सकती है। उदाहरण के लिए, आज के समय में 'इको-फ्रेंडली' या पर्यावरण-अनुकूल दीपावली की अवधारणा तेजी से लोकप्रिय हो रही है। लोग मिट्टी के दीयों में रासायनिक तेलों के बजाय जैविक तेलों का उपयोग कर रहे हैं। गोबर से बने दीयों का चलन बढ़ा है, जो जलने के बाद पूरी तरह से जैविक खाद में बदल जाते हैं और पर्यावरण पर कोई बोझ नहीं डालते।
एक और बहुत ही सुंदर और वैज्ञानिक विचार जो हाल के वर्षों में उभरा है, वह है 'वृक्ष दीपावली' या बीजों के दीये। मिट्टी के इन दीयों के भीतर विभिन्न पौधों और पेड़ों के बीज समाहित कर दिए जाते हैं। जब पर्व समाप्त हो जाता है, तो इन दीयों को फेंकने के बजाय गमलों या खाली जमीनों में दबा दिया जाता है। आने वाले समय में जब मानसून या सिंचाई का पानी इन पर पड़ता है, तो मिट्टी में घुलकर वे बीज अंकुरित हो जाते हैं और नए पौधों को जन्म देते हैं। सोचिए, यदि भारत की विशाल जनसंख्या का एक छोटा सा हिस्सा भी इस विचार को अपना ले, तो हर साल दीपावली के बाद करोड़ों नए पौधे इस धरती को मिल सकते हैं, जो आने वाले समय में कार्बन डाइऑक्साइड को सोखकर ग्लोबल वार्मिंग जैसी वैश्विक समस्या से लड़ने में हमारी मदद करेंगे। यह परंपरा और विज्ञान का एक ऐसा अनूठा संगम होगा जो आने वाली पीढ़ियों को एक हरा-भरा और सुरक्षित भविष्य दे सकेगा।
दीपावली का सामाजिक और आर्थिक विज्ञान भी इसके पर्यावरणीय पक्ष को सुदृढ़ करता है। जब हम स्थानीय कुम्हारों से मिट्टी के दीये खरीदते हैं, तो हम न केवल एक गरीब परिवार की आजीविका का समर्थन करते हैं, बल्कि हम उस कार्बन फुटप्रिंट को भी कम करते हैं जो विदेशों या दूर-दराज की फैक्ट्रियों से आने वाली प्लास्टिक की लाइटों के परिवहन में खर्च होता है। स्थानीय उत्पादों का उपयोग 'लोकल फॉर वोकल' के सिद्धांत पर काम करता है, जो ऊर्जा की बचत करता है और पर्यावरण के अनुकूल विकेंद्रीकृत अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देता है। मिट्टी की यह कला पूरी तरह से बायोडिग्रेडेबल यानी जैव-अपघटनीय है। पर्व समाप्त होने के बाद ये दीये पुनः मिट्टी में मिल जाते हैं, जिससे प्लास्टिक प्रदूषण की तरह सदियों तक धरती को प्रदूषित करने की कोई समस्या उत्पन्न नहीं होती।
इसके अतिरिक्त, दीपावली के समय प्रकाश के वितरण को अगर हम भौतिक विज्ञान की दृष्टि से देखें, तो यह ऊर्जा के संरक्षण और सकारात्मक तरंगों के प्रसार का एक माध्यम है। जब हम एक दीये से दूसरे दीये को जलाते हैं, तो पहली लौ की ऊर्जा कम नहीं होती, बल्कि वह अपनी ऊर्जा को दूसरी बत्ती में स्थानांतरित कर देती है। यह भौतिकी के 'ऊर्जा संरक्षण के नियम' के समान है, जहाँ ऊर्जा कभी नष्ट नहीं होती, केवल अपना रूप बदलती है। इसी प्रकार, जब पूरा समाज एक साथ दीये जलाता है, तो सामूहिक रूप से उत्पन्न होने वाली थर्मल एनर्जी और प्रकाश की तरंगें उस क्षेत्र के सूक्ष्म पर्यावरण को प्रभावित करती हैं। इस सामूहिक सकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव मनुष्यों के तंत्रिका तंत्र पर पड़ता है, जिससे समाज में भाईचारा, सामंजस्य और मानसिक शांति का संचार होता है।
इस प्रकार, दीपावली केवल एक रात का तमाशा या आतिशबाजी का प्रदर्शन नहीं है। यह मानव और प्रकृति के बीच के उस गहरे संबंध का उत्सव है जिसे हमारे पूर्वजों ने हजारों साल पहले पहचान लिया था। यह ऋतु परिवर्तन के समय शरीर को स्वस्थ रखने का आयुर्वेद सम्मत विज्ञान है; यह वर्षा के बाद हवा और घरों को शुद्ध करने का कीट विज्ञान और पर्यावरण विज्ञान है; यह मानसिक अवसाद को दूर करने की प्रकाश चिकित्सा है; और यह पूरी सृष्टि के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का एक दार्शनिक मार्ग है। आज जब हमारी पृथ्वी जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण और जैव विविधता के नुकसान जैसे गंभीर संकटों से जूझ रही है, तब दीपावली के इस वैज्ञानिक और पर्यावरणीय संदेश को समझना और उसे अपने जीवन में उतारना पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गया है। हमें पटाखों के शोर और धुएं को पीछे छोड़कर, मिट्टी के दीयों की शांत, स्निग्ध और पावन लौ की ओर वापस लौटना होगा। जब हम अपनी इस प्राचीन विरासत को विज्ञान की कसौटी पर कसकर और पर्यावरण के प्रति संवेदनशील होकर मनाएंगे, तभी सच्चे अर्थों में यह पर्व अंधकार से प्रकाश की ओर, अज्ञान से ज्ञान की ओर और विनाश से विकास की ओर ले जाने वाला महाउत्सव बनेगा। यही दीपावली की वास्तविक आत्मा है, यही इसका शाश्वत विज्ञान है और यही इस धरती को बचाने का हमारा पर्यावरणीय संकल्प होना चाहिए।
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)
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