नूंह (मेवात) में हाल ही में हुई घटनाओं पर विमर्श से पहले एक बात पर ध्यान देना जरूरी है, ये हमले हिंदु विरोधी हिंसा की कोई एकाध या अलग-थलग घटना नहीं है। गुरुग्राम से सटे हरियाणा के इस मुस्लिम बहुल इलाके में हिंदू शोभायात्रा पर हमले की घटनाएं प्रथम दृष्टया सुनियोजित हैं और 2020 के दिल्ली दंगे, पिछले करीब तीन वर्षों से देश के अलग-अलग हिस्सों में रामनवमी यात्राओं पर हमले और नुपूर शर्मा के बयान के बाद पूरे देश में हिंदूओं की हत्याओं जैसी अनवरत हिंदु लक्षित हिंसा की नई कड़ी है। इस हिंसा में एक नया सूक्ष्म संदेश छिपा है। संदेश यह है कि मुस्लिम बहुल इलाकों में आम हिंदू ही नहीं, पुलिस भी सुरक्षित नहीं है। नूंह की हिंसा में दो होमगार्ड मारे गए हैं और कई पुलिस कर्मी घायल हुए हैं। हमले के बाद प्रशासन-सरकार ने भी साफ कर दिया है कि आम लोगों की सुरक्षा के लिए उनके भी हाथ खड़े हैं। हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर का कहना है कि पुलिस-सेना सब को सुरक्षा नहीं दे सकती और सुरक्षा के लिए सद्भाव बनाना होगा। मुख्यमंत्री यह बताना भूल गए कि बंदूक-पत्थर लेकर खड़े हमलावरों से सद्भाव कैसे कायम किया जाए और इस प्रश्न का भी उत्तर दिया जाना चाहिए कि अगर पुलिस-सेना आम लोगों को सुरक्षित नहीं रख सकते हैं तो लोग अपनी सुरक्षा के लिए क्या इंतजाम करें।
अगर हमें इस हिंसा के कारणों और घटनाओं का ब्यौरा समझना हो तो नूंह के वर्तमान को जानने के लिए हमें मुरादाबाद के इतिहास में जाना होगा। उत्तर प्रदेश के इस शहर में 1980 में सांप्रदायिक दंगों में 83 लोग मारे गए और 112 घायल हुए। देश का सुपारी मीडिया जैसे आज मोनू मानेसर को हिंसा का विलेन बता रहा है, उसी तरह तब भी समुदाय विशेष के भड़कने का जिम्मा आरएसएस, जनसंघ और भाजपा जैसे संगठनों पर डाला जा सकता है। हालांकि अब 43 सालों के बाद इन दंगों की सच्चाई सामने आ गई है। इन दंगों की जांच के लिए इलाहाबाद उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश एमपी सक्सेना के नेतृत्व में एक-सदस्य आयोग बनाया गया। इस आयोग ने तीन वर्ष बाद 1983 में ही अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी लेकिन फिर 40 वर्ष तक इस रिपोर्ट की सच्चाई को छिपाया गया। जानकारी के अनुसार, रिपोर्ट में दंगों के घटनाक्रम का खुलासा करते हुए बताया गया है कि मुरादाबाद का यह दंगा दरअसल मुस्लिम लीग के ही दो नेताओं करतूत थी। सुअर का बहाना बनाकर दलित बस्तियों में लूटपाट और आगजनी को अंजाम दिया गया। इस पूरे घटनाक्रम में हिंदू नेताओं, आरएसएस, भाजपा, जनसंघ या पुलिस की कोई भूमिका नहीं थी लेकिन इस देश के सुपारी मीडिया ने एकपक्षीय रिपोर्ट की और हिंसा की आग लगाने वालों को ही पीड़ित बताया। अब वापस नूंह पर आते हैं। नूंह की ही तरह मुरादाबाद में भी सुरक्षा में जुटे पुलिस कर्मियों को मारा गया। इसके बाद पुलिस से लेकर हिंदूवादी संगठनों और पुलिस तक तमाम लोगों पर दोष मढ़ा गया और समुदाय विशेष के कारनामों पर हीले-हवाले दिए गए।

अगर हाल-फिलहाल की हिंदू विरोधी हिंसा की घटनाओं पर गौर किया जाए तो यह बात साफ होती है कि अक्सर ऐसी हिंसा सुनियोजित और साजिशन होती है। दिल्ली दंगों में छतों पर पत्थर इकट्ठे किए गए, गुलेल का इस्तेमाल किया गया और पुलिस कर्मी रतन लाल एवं आईबी में कार्यरत अंकित शर्मा जैसे लोगों को चुन-चुनकर निशाना बनाया गया। इसी तरह देश के अलग-अलग हिस्सों में रामनवमी की शोभायात्राओं पर पत्थरों, पेट्रोल बमों और पिस्तौलों से हमले तक किए गए। इन सारे हमलों के बारे में मीडिया के एक वर्ग द्वारा चुप्पी साधी गई या हिंदुओं को ही कटघरे में खड़ा किया। समुदाय विशेष द्वारा शुरू की गई इस अकारण पत्थरबाजी और बमबारी के बाद हिंदूओं से ही यह प्रश्न पूछा गया कि आखिर अल्पसंख्यक बहुल इलाकों से शोभायात्रा निकालने की जरूरत क्या थी, मानो अल्पसंख्यक बहुल नहीं, कोई दुश्मन इलाका हो गया।
भारत पर अगर 7वीं शताब्दी के बाद कट्टर धर्मांध इस्लामिक शासकों के शासन में हुए अत्याचारों को छोड़ भी दिया जाए तो 16 अगस्त 1946 को मुस्लिम लीग के डायरेक्ट एक्शन डे से लेकर कश्मीर में हिंदूओं के नरसंहार, आतंकवाद और अब देश के हरेक हिस्से में हमलों तक हिंदुओं ने समुदाय विशेष के कथित ‘भटके हुए’ लोगों के अनगिनत अत्याचारों को सहा है और इस दौरान न्यायालयों, मीडिया और कुछेक अपवादों को छोड़कर तमाम राजनीतिक पार्टियों की चुप्पी भी देखी है। अब हालात यह हैं कि मुख्यमंत्री तक साफ कह रहे हैं कि सब को सुरक्षा देना संभव नहीं है। अब बस यही उम्मीद है कि सरकार-प्रशासन इस षड्यंत्र का पता लगाएंगे और जिन लोगों की जान नहीं बचा पाए, कम से कम उनके हत्यारों को सजा दिला पाएंगे।

प्रेरणा कुमारी
(आलेख में व्यक्त विचार लेखकों के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)
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