
लेखक- श्याम जाजू (पूर्व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, भाजपा)
नई दिल्ली : 15 अगस्त को लाल किले से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के सामने एक बड़ा सपना रखा-अगले दशक में Fortune Global 500 में 50 कंपनियां भारत से होनी चाहिए। सुनने में यह एक बड़ा कॉर्पोरेट लक्ष्य (corporate target) लगता है। Fortune की सूची में 50 भारतीय कंपनियों का होना निश्चित रूप से गर्व की बात होगी। दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियों की सूची में भारत का नाम अधिक ताकत के साथ दिखेगा, भारतीय उद्योगों की वैश्विक पहचान बढ़ेगी और हमारी अर्थव्यवस्था की वृद्धि के एक महत्वपूर्ण प्रतीक के रूप में इसे देखा जाएगा। लेकिन थोड़ा विचार करें, तो समझ आता है कि यह सवाल सिर्फ Fortune की रैंकिंग का नहीं है। यह सवाल उससे कहीं अधिक बड़ा है।
आज भारत के पास विशाल बाजार, युवा आबादी, तकनीक की क्षमता और उद्यमिता की ऊर्जा है। उत्पादन से लेकर सेवाओं तक कई क्षेत्रों में हमारी क्षमता को दुनिया ने स्वीकार किया है।
फिर भी एक सवाल हमें खुद से पूछना होगाः दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियों की सूची में भारत की कंपनियों की संख्या अभी भी इतनी कम क्यों है? क्योंकि Fortune Global 500 में पहुंचना केवल बड़ा टर्नओवर (turnover) हासिल करना नहीं है। इसके पीछे सालों की मेहनत होती है। बड़े पैमाने पर पूंजी (capital) होती है। अनुसंधान और नवाचार (R&D and innovation) होता है। वैश्विक बाजार की समझ होती है। कुशल जनशक्ति होती है। मजबूत प्रबंधन प्रणालियां (management systems) होती हैं। बड़े पैमाने पर उत्पादन या सेवाएं देने की क्षमता होती है। दुनिया भर के ग्राहकों का विश्वास होता है और सबसे महत्वपूर्ण, बड़ा सपना देखने और उसे सच करने की क्षमता होती है। इसीलिए 50 Fortune Global 500 कंपनियों का लक्ष्य सिर्फ 50 कंपनियों का लक्ष्य नहीं है; यह भारत की 'स्केल-अप' (scale-up) क्षमता का लक्ष्य है।
आज हम अक्सर पूछते हैं, "भारत दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्था कब बनेगा?" अब इसके साथ एक और सवाल पूछने का समय आ गया है, "भारत दुनिया की बड़ी कंपनियां बनाने वाला देश कब बनेगा?" क्योंकि जब बड़ी कंपनियां बनती हैं, तो रोजगार बढ़ता है, निर्यात बढ़ता है, अनुसंधान के लिए पैसा उपलब्ध होता है, नई तकनीक विकसित होती है और हजारों छोटी कंपनियों को सप्लाई चेन (supply chain) में अवसर मिलते हैं। एक बड़ी भारतीय कंपनी के पीछे कई MSME होते हैं। एक बड़ी एक्सपोर्ट कंपनी के पीछे कई मैन्युफैक्चरर्स होते हैं। एक ग्लोबल टेक्नोलॉजी कंपनी के पीछे कई स्टार्ट-अप्स, डेवलपर्स और सर्विस प्रोवाइडर्स होते हैं। इसलिए Fortune Global 500 में जाने वाली एक भारतीय कंपनी का मतलब केवल एक कंपनी का बड़ा होना नहीं है; उसके साथ एक पूरा इकोसिस्टम बड़ा होता है।
आज 50 कंपनियों का यह लक्ष्य अचानक सामने नहीं आया है। पिछले कुछ वर्षों में भारत की आर्थिक और औद्योगिक क्षमता के आधार को मजबूत करने की दिशा में कई कदम उठाए गए हैं। 15 अगस्त 2025 के भाषण में इस दिशा के कई महत्वपूर्ण संकेत मिले थे। पहली बार प्राइवेट सेक्टर में नौकरी करने वाले युवाओं के लिए ₹15,000 तक के एम्प्लॉयमेंट इंसेंटिव और लगभग ₹1 लाख करोड़ की 'PM विकसित भारत रोजगार योजना' के माध्यम से बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन की रूपरेखा पेश की गई थी। इसका मतलब सिर्फ युवाओं को नौकरियां देना भर नहीं है। अगर बड़े उद्योग खड़े करने हैं, तो उन्हें बड़े पैमाने पर कुशल और रोजगार योग्य जनशक्ति की भी आवश्यकता होगी।
उसी भाषण में भारत के पहले Made-in-India सेमीकंडक्टर चिप की दिशा में मिशन मोड में आगे बढ़ने की बात कही गई थी। इसका सीधा अर्थ है कि भारत केवल असेंबली करने वाला देश बनकर नहीं रहना चाहता; वह क्रिटिकल टेक्नोलॉजी (critical technology) बनाने वाला देश बनना चाहता है। ऊर्जा के मामले में भी एक बड़ी दिशा तय की गई थी। 10 नए न्यूक्लियर रिएक्टर्स पर काम शुरू होने की बात कही गई और 2047 तक न्यूक्लियर क्षमता को बड़े पैमाने पर बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया। इसके साथ ही देश की समुद्री संपति की खोज के लिए 'नेशनल डीपवॉटर एक्सप्लोरेशन मिशन' की घोषणा की गई। GST के नेक्स्ट जनरेशन सुधारों के माध्यम से टैक्स व्यवस्था को और सरल बनाने का खाका पेश किया गया, और इन सबके साथ दस ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ने की भारत की महत्वाकांक्षा और उसके लिए सुधारों को तेजी से आगे बढ़ाने की आवश्यकता पर बल दिया गया। अगर इन सभी बातों को अलग-अलग घोषणाओं के रूप में देखें, तो ये अलग लगती हैं।
लेकिन जब इन्हें एक साथ देखते हैं, तो एक बड़ी तस्वीर दिखाई देती है: रोजगार से मैन्युफैक्चरिंग, टेक्नोलॉजी से एनर्जी, बिजनेस सुगमता से लेकर स्केल तक।
इस सवाल का जवाब सिर्फ बड़े कॉर्पोरेट घरानों में ढूंढेंगे, तो तस्वीर अधूरी रहेगी। क्योंकि भारत की भविष्य की कई बड़ी कंपनियां आज के MSME सेक्टर में हैं। लेकिन इस यात्रा में एक बड़ी रुकावट बार-बार सामने आती है-पूंजी की उपलब्धता। ऑर्डर है, लेकिन वर्किंग कैपिटल कम है। ग्राहक है, लेकिन पेमेंट देर से मिलेगा। एक्सपोर्ट का मौका है, लेकिन फाइनेंस की जरूरत है। नई मशीनरी खरीदनी है, लेकिन बैलेंस शीट अभी उतनी बड़ी नहीं हुई है। "हम दुनिया के कितने बाजारों तक पहुंच सकते हैं?" इसके लिए फाइनेंस के साथ-साथ टेक्नोलॉजी, स्किल्ड मैनपावर, प्रोफेशनल मैनेजमेंट, एक्सपोर्ट सपोर्ट और रेगुलेटरी सुगमता की आवश्यकता है।
भारत का स्टार्ट-अप इकोसिस्टम इस सपने का एक और बड़ा आधार है।
"Make in India" ने भारत की मैन्युफैक्चरिंग महत्वाकांक्षा को नई दिशा दी। अब इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर्स, EVS, बैटरियों, डिफेंस, एयरोस्पेस, फार्मास्यूटिकल्स, केमिकल्स, रिन्यूएबल एनर्जी, ग्रीन हाइड्रोजन, फूड प्रोसेसिंग और इंडस्ट्रियल मशीनरी जैसे क्षेत्रों में भारत को सिर्फ उत्पादक देश बनकर नहीं रुकना चाहिए। भारत को दुनिया के लिए आवश्यक उत्पाद और तकनीक बनानी चाहिए।
इससे एक व्यापक सोच सामने आती है: सिर्फ भारतीय कंपनियों का बड़ा होना काफी नहीं है, भारत का पूरा बिजनेस इकोसिस्टम विश्वस्तरीय होना चाहिए। ग्लोबल इंडियन कंपनियों को 'ग्लोबल इंडियन फाइनेंस' का साथ चाहिए, और दुनिया भर में पहचाने जाने वाले भारतीय ब्रांड्स भी चाहिए। रेवेन्यू कंपनी को बड़ा बनाता है; लेकिन ब्रांड उसे दुनिया में टिकाए रखता है। "Made in India" शब्द के साथ गुणवता (Quality), विश्वास (Trust) और नवाचार (Innovation)- ये तीन शब्द दुनिया के मन में जुड़ने चाहिए।
एक ऐसी व्यवस्था जहां:
शायद 15 अगस्त के इस सपने का असली अर्थ यही है। भारत एक बड़ी अर्थव्यवस्था बननी चाहिए; भारत को बड़ी कंपनियां बनाने वाली अर्थव्यवस्था बनना चाहिए।
"Make in India" एक यात्रा की शुरुआत थी। अब अगला पड़ाव है- "Build Global from India."
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