– सुबोध चंद्र
प्रांत संगठन मंत्री
भारत की संस्कृति में व्यक्ति और राष्ट्र को कभी अलग-अलग नहीं माना गया। हमारे ऋषियों ने हजारों वर्ष पूर्व ही यह उद्घोष किया था कि राष्ट्र का वैभव उसके भवनों, उसकी संपत्ति या उसकी सेना से नहीं, बल्कि उसके नागरिकों के चरित्र से निर्मित होता है। जिस राष्ट्र के नागरिक चरित्रवान होते हैं, वह राष्ट्र संकटों के बीच भी अडिग खड़ा रहता है; और जहाँ चरित्र का पतन होता है, वहाँ वैभव भी अधिक समय तक टिक नहीं पाता।
आज जब हम व्यक्तिगत चरित्र और राष्ट्रीय चरित्र की चर्चा करते हैं, तब हमें समझना होगा कि ये दो अलग-अलग विषय नहीं हैं। राष्ट्रीय चरित्र, व्यक्तिगत चरित्र का ही विस्तृत और व्यापक स्वरूप है। जिस प्रकार छोटी-छोटी जलधाराएँ मिलकर एक विशाल नदी का निर्माण करती हैं, उसी प्रकार लाखों-करोड़ों व्यक्तियों का चरित्र मिलकर राष्ट्र के चरित्र का निर्माण करता है।
व्यक्तिगत चरित्र : राष्ट्र निर्माण का प्रथम सोपान
व्यक्तिगत चरित्र का अर्थ केवल अच्छा व्यवहार करना नहीं है। सत्य, शुचिता, अनुशासन, आत्मसंयम, कर्तव्यनिष्ठा, करुणा, ईमानदारी और त्याग—ये सभी व्यक्तिगत चरित्र के आधार स्तंभ हैं।
व्यक्ति का वास्तविक मूल्य उसके पद, धन या प्रसिद्धि से नहीं आँका जाता, बल्कि उसके चरित्र से आँका जाता है। धन खो जाए तो पुनः प्राप्त हो सकता है, पद चला जाए तो वापस मिल सकता है, लेकिन चरित्र नष्ट हो जाए तो सब कुछ नष्ट हो जाता है।
भारतीय संस्कृति ने सदैव चरित्र को सर्वोच्च स्थान दिया है। इसलिए कहा गया है—
"वृत्तं यत्नेन संरक्षेत्, वित्तमायाति याति च।"
अर्थात धन आता-जाता रहता है, परंतु चरित्र की रक्षा हर परिस्थिति में करनी चाहिए।
महर्षि वाल्मीकि का जीवन इसका अद्भुत उदाहरण है। रत्नाकर नाम का एक डाकू आत्मबोध के पश्चात ऐसा परिवर्तित हुआ कि वही आगे चलकर महर्षि वाल्मीकि बना और रामायण जैसे अमर ग्रंथ का रचयिता हुआ। यह परिवर्तन बाहरी नहीं था; यह चरित्र का परिवर्तन था।
महर्षि दधीचि ने अपने शरीर की अस्थियाँ तक समाज और धर्म की रक्षा के लिए दान कर दीं। यह त्याग उनके भीतर के चरित्र की महानता को दर्शाता है।
आचरण ही सबसे बड़ा उपदेश
कहा जाता है कि शब्दों से अधिक प्रभाव जीवन का पड़ता है। लोग हमारे भाषण नहीं, हमारा आचरण देखते हैं।
हम प्रतिदिन उद्घोष करते हैं— "धर्म की जय हो, अधर्म का नाश हो।" किन्तु प्रश्न यह है कि क्या यह केवल उद्घोष है या हमारे जीवन का संकल्प?
हम कहते हैं— "हिन्दवः सोदरा: सर्वे।"
हम कहते हैं— "मम दीक्षा हिन्दू रक्षा, मम मंत्र समानता।"
परन्तु क्या समरसता हमारे व्यवहार में दिखाई देती है? क्या हमारा आचरण हमारे शब्दों के अनुरूप है? कथनी और करनी की समानता ही चरित्र की सबसे बड़ी पहचान है।
स्वामी विवेकानन्द के जीवन का एक प्रसिद्ध प्रसंग है। अमेरिका में एक महिला उनके तेजस्वी व्यक्तित्व से प्रभावित होकर विवाह का प्रस्ताव लेकर आई। स्वामीजी ने उत्तर दिया—
"यदि आपको मेरे जैसा पुत्र चाहिए तो मुझे अपना पुत्र मान लीजिए।" यह उत्तर केवल बुद्धिमत्ता नहीं, बल्कि भारतीय संस्कार और चरित्र की श्रेष्ठता का परिचायक था।
चरित्र वह शक्ति है जो बिना बोले भी प्रेरणा देती है। चरित्र विश्वास पैदा करता है।
1965 में देश गंभीर अन्न संकट से गुजर रहा था। तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने देशवासियों से सप्ताह में एक दिन उपवास रखने का आग्रह किया। न कोई कानून था, न कोई दंड का भय। फिर भी देशभर के करोड़ों लोगों ने उनका आह्वान स्वीकार किया। क्यों? क्योंकि लोगों को उनके चरित्र पर विश्वास था। विश्वास वहीं उत्पन्न होता है जहाँ चरित्र होता है।
इसी प्रकार नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने प्रतिष्ठित सरकारी नौकरी छोड़कर राष्ट्रसेवा का मार्ग चुना। जब उन्होंने "तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा" का आह्वान किया, तब हजारों युवक उनके पीछे चल पड़े। उनके शब्दों में शक्ति इसलिए थी क्योंकि उनके जीवन में चरित्र था।
भारतीय चिंतन हमें एक और महत्वपूर्ण सत्य सिखाता है कि केवल व्यक्तिगत चरित्र ही पर्याप्त नहीं है। महाभारत में भीष्म पितामह, गुरु द्रोणाचार्य और कर्ण जैसे महापुरुषों में अनेक व्यक्तिगत गुण थे। वे पराक्रमी थे, विद्वान थे और आदरणीय भी थे। परंतु जब धर्म और अधर्म के संघर्ष का समय आया तो वे अधर्म के पक्ष में खड़े दिखाई दिए। इसलिए भारतीय दर्शन कहता है कि व्यक्तिगत चरित्र के साथ-साथ राष्ट्रीय चरित्र भी आवश्यक है।
राष्ट्रीय चरित्र क्या है?
जब व्यक्ति अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर समाज, संस्कृति और राष्ट्र के हित को सर्वोपरि मानता है, तब राष्ट्रीय चरित्र प्रकट होता है। राष्ट्रीय चरित्र का अर्थ केवल राष्ट्रभक्ति के गीत गाना नहीं है।
राष्ट्रीय चरित्र का अर्थ है—
राष्ट्र पहले, मैं बाद में।
कर्तव्य पहले, सुविधा बाद में।
समाज पहले, स्वार्थ बाद में।
भगवान श्रीराम इसका सर्वोच्च उदाहरण हैं। अयोध्या का सिंहासन उनके सामने था, लेकिन पिता के वचन और धर्म की रक्षा के लिए उन्होंने वनवास स्वीकार कर लिया। उन्होंने अपने व्यक्तिगत सुख से ऊपर धर्म और लोककल्याण को रखा। यही राष्ट्रीय चरित्र है।
राष्ट्रीय चरित्र के प्रेरक आदर्श
छत्रपति शिवाजी महाराज के जीवन का एक प्रसंग अत्यंत प्रेरक है। युद्ध के बाद उनके सैनिक एक मुस्लिम महिला को बंदी बनाकर ले आए। शिवाजी महाराज ने उसे सम्मान सहित वापस भेज दिया। उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि भारतीय संस्कृति में नारी सम्मान सर्वोपरि है। यह केवल व्यक्तिगत सदाचार नहीं था, बल्कि राष्ट्रीय चरित्र का परिचय था। महाराणा प्रताप ने घास की रोटियाँ खा लीं, जंगलों में जीवन बिताया, परंतु पराधीनता स्वीकार नहीं की। गुरु गोविंद सिंह ने अपने चारों पुत्रों का बलिदान दिया, पर धर्म और राष्ट्र की रक्षा से पीछे नहीं हटे। पन्नाधाय ने अपने पुत्र का बलिदान देकर मेवाड़ के भविष्य को बचाया। भगत सिंह ने हँसते-हँसते फाँसी स्वीकार कर ली। मेजर ध्यानचंद ने विदेशी आकर्षण और सम्मान को ठुकराकर मातृभूमि को चुना। डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने सर्वोच्च पद पर रहते हुए भी ईमानदारी और सादगी का उदाहरण प्रस्तुत किया। नीरजा भनोट ने अपने प्राणों का बलिदान देकर कर्तव्य की सर्वोच्च मिसाल स्थापित की। ये सभी उदाहरण बताते हैं कि राष्ट्रीय चरित्र केवल विचार नहीं, बल्कि जीवन की साधना है।
राष्ट्र निर्माण का मार्ग
राष्ट्र का निर्माण संसद में नहीं, पहले व्यक्ति के भीतर होता है। यदि व्यक्ति सत्यनिष्ठ होगा तो परिवार सुदृढ़ होगा। यदि परिवार सुदृढ़ होगा तो समाज संगठित होगा। यदि समाज संगठित होगा तो राष्ट्र शक्तिशाली बनेगा। इसलिए राष्ट्र निर्माण का सबसे प्रभावी मार्ग व्यक्ति निर्माण है। हमें अपने जीवन में सत्य, सेवा, समरसता, शुचिता और राष्ट्रभक्ति को उतारना होगा।
उपसंहार
इतिहास गवाह है— महाराणा प्रताप ने सुख छोड़ा, गुरु गोविंद सिंह ने पुत्र छोड़े, पन्नाधाय ने पुत्र छोड़ा, भगत सिंह ने जीवन छोड़ा, नेताजी ने करियर छोड़ा, किन्तु किसी ने भी राष्ट्र नहीं छोड़ा। यही राष्ट्रीय चरित्र है।
जब व्यक्ति अपने जीवन को चरित्र की साधना बना लेता है, तब वह केवल एक अच्छा व्यक्ति नहीं रहता, वह राष्ट्र की शक्ति बन जाता है। व्यक्तिगत चरित्र से राष्ट्रीय चरित्र तक की यह यात्रा ही भारत के पुनरुत्थान का मार्ग है। यदि हम इस मार्ग पर चल सके, तो न केवल हमारा जीवन सार्थक होगा, बल्कि राष्ट्र भी वैभव के शिखर पर पहुँचेगा।
"चरित्रवान व्यक्ति ही राष्ट्र का वास्तविक वैभव होता है।"यह लेख पत्रिका, स्मारिका, वर्ग-पुस्तिका अथवा 20–25 मिनट के बौद्धिक के आधार-पाठ के रूप में भी उपयोग किया जा सकता है।
Comments (1)
S
Namaste bhaisahb ????