
बिंदिया कुमारी
भारतीय राजनीति में कुछ घटनाएं केवल घटनाएं नहीं होतीं। वे राजनीति के चरित्र का आईना बन जाती हैं। हाल में कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी द्वारा आईआईटी मद्रास के निदेशक प्रोफेसर वी. कामकोटि को “गोमूत्र एक्सपर्ट” कहकर तंज कसना ऐसी ही एक घटना है। लेकिन यदि इसे केवल एक प्रोफेसर पर की गई टिप्पणी मान लिया जाए तो तस्वीर अधूरी रह जाएगी। इसके कुछ ही दिनों बाद संसद परिसर के बाहर पप्पू यादव द्वारा राम मंदिर और मंदिर में आने वाले चंदे को लेकर किया गया नाट्य-प्रदर्शन सामने आया। प्रदर्शन में पप्पू यादव ने साधु का वेश धारण किया और राम मंदिर के दान-पात्र से धन लेकर भागने का अभिनय किया। इस प्रदर्शन को लेकर हिंदू संगठनों और कई राजनीतिक नेताओं ने सनातन आस्था के अपमान का आरोप लगाया। पप्पू यादव ने इसे मंदिरों के धन की कथित लूट के विरुद्ध राजनीतिक प्रदर्शन बताया।
इन दोनों घटनाओं के बीच सीधा संगठनात्मक संबंध स्थापित करना उचित नहीं होगा। लेकिन राजनीतिक दृष्टि से दोनों में एक समानता अवश्य दिखाई देती है—हिंदू धार्मिक प्रतीकों को राजनीतिक व्यंग्य का अपेक्षाकृत आसान माध्यम समझना। यही वह बिंदु है जहां सवाल किसी एक नेता से आगे बढ़कर कांग्रेस और उसके व्यापक राजनीतिक परिवेश की भाषा पर पहुंचता है।
प्रोफेसर कामकोटि की योग्यता पर बहस की जा सकती है। सरकार द्वारा किसी समिति में उनकी नियुक्ति पर विपक्ष प्रश्न उठा सकता है। उनके किसी वैज्ञानिक दावे से असहमति हो सकती है। लेकिन यदि किसी प्रतिष्ठित वैज्ञानिक और शिक्षाविद् को जवाब देने के लिए “गोमूत्र एक्सपर्ट” जैसा शब्द इस्तेमाल किया जाता है, तो यह वैज्ञानिक बहस नहीं रह जाती। यदि किसी दावे में वैज्ञानिक आधार नहीं है, तो प्रमाण मांगिए। शोध प्रस्तुत कीजिए। तर्क दीजिए। लेकिन जिस शब्द के माध्यम से करोड़ों भारतीय अपनी सांस्कृतिक और धार्मिक आस्था को देखते हैं, उसी शब्द को किसी व्यक्ति को उपहास का पात्र बनाने के लिए इस्तेमाल करना केवल व्यक्ति पर हमला नहीं रह जाता।
और यही बात पप्पू यादव के हालिया प्रदर्शन पर भी लागू होती है। यदि आरोप यह है कि अयोध्या के राम मंदिर में आने वाले चंदे का दुरुपयोग हो रहा है, तो उसके लिए दस्तावेज मांगिए, जांच की मांग कीजिए, सरकार को घेरिए, मंदिर प्रशासन से जवाब मांगिए। यदि भ्रष्टाचार हुआ है तो उसे उजागर कीजिए। लेकिन राम मंदिर, साधु का वेश और भगवान राम से जुड़े धार्मिक प्रतीकों को नाटकीय उपहास का हिस्सा बनाकर क्या राजनीतिक संदेश वास्तव में अधिक प्रभावी हो जाता है? या इससे केवल उस समाज को यह संदेश जाता है कि उसकी आस्था फिर से राजनीतिक मनोरंजन का विषय बना दी गई है?

पप्पू यादव के प्रदर्शन पर प्रतिक्रिया भी इसी कारण महत्वपूर्ण है। हरिद्वार के संतों ने इस पर विरोध की घोषणा की और इसे सनातन परंपरा का अपमान बताया। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी पप्पू यादव और उनके साथियों पर सनातन का मजाक उड़ाने का आरोप लगाया। यह केवल भाजपा और विपक्ष के बीच सामान्य राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप नहीं था। इसने एक पुराने प्रश्न को फिर सामने ला दिया—क्या भारत में राजनीतिक विरोध के लिए हिंदू धार्मिक प्रतीकों को हास्य और उपहास का माध्यम बनाना स्वीकार्य मान लिया गया है? यही प्रश्न कांग्रेस के लिए अधिक असहज है।
क्योंकि पप्पू यादव भले ही स्वतंत्र सांसद हों, लेकिन उनका यह प्रदर्शन जिस व्यापक विपक्षी राजनीतिक वातावरण में हुआ, उसमें कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी भी मौजूद थे और प्रदर्शन को लेकर विवाद में उनका नाम भी सामने आया। इस मामले में उनके तथा अन्य नेताओं के खिलाफ शिकायतें और प्राथमिकी की कार्रवाई भी हुई है। इसलिए इसे केवल पप्पू यादव की निजी राजनीतिक शैली कहकर छोड़ देना उस राजनीतिक संदर्भ को नजरअंदाज करना होगा जिसमें यह पूरा प्रदर्शन हुआ। यहां सवाल किसी व्यक्ति की धार्मिक आस्था का परीक्षण करना नहीं है। सवाल राजनीतिक शालीनता का है।
क्या हम कल्पना कर सकते हैं कि किसी दूसरे धर्म के प्रमुख धार्मिक प्रतीक को लेकर ऐसा ही नाट्य-प्रदर्शन किया जाता और उसे केवल “राजनीतिक व्यंग्य” कहकर छोड़ दिया जाता? यदि उत्तर नहीं है, तो फिर हिंदू धार्मिक प्रतीकों के मामले में यह सहजता क्यों? यदि उत्तर हां है, तो वही कसौटी सभी धर्मों पर समान रूप से लागू होनी चाहिए। यही वास्तविक धर्मनिरपेक्षता है।
हिंदू धर्म आलोचना से ऊपर नहीं है। बल्कि हिंदू सभ्यता की महानता ही इस बात में है कि उसने प्रश्न पूछने और असहमति की लंबी परंपरा को स्वीकार किया। उपनिषदों से लेकर दर्शन के विभिन्न मतों तक, शास्त्रार्थ की परंपरा भारतीय बौद्धिक जीवन का अभिन्न हिस्सा रही है। इसलिए हिंदू धर्म की किसी मान्यता पर प्रश्न उठाना न तो अपराध है और न ही असहिष्णुता। लेकिन आलोचना और उपहास में अंतर होता है। तर्क और तिरस्कार में अंतर होता है। प्रश्न और अपमान में अंतर होता है। यही अंतर भारतीय राजनीति को समझना होगा।
दुर्भाग्य से कांग्रेस और उसके राजनीतिक सहयोगियों की भाषा में इस अंतर की रेखा कई बार धुंधली दिखाई देती है। कभी भगवा को आतंकवाद के साथ जोड़ने वाली शब्दावली सामने आती है, कभी सनातन धर्म को लेकर विवादास्पद टिप्पणियों पर राजनीतिक चुप्पी दिखाई देती है, कभी हिंदू धार्मिक प्रतीकों को लेकर कटाक्ष होता है और कभी मंदिर तथा साधु-संतों को राजनीतिक नाटक का पात्र बना दिया जाता है।
2010 में तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने “भगवा आतंकवाद” शब्द का इस्तेमाल किया था। उस समय कांग्रेस के तत्कालीन महासचिव जनार्दन द्विवेदी ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि आतंकवाद का कोई रंग नहीं होता। यह प्रतिक्रिया अपने आप में बताती है कि उस समय कांग्रेस के भीतर भी इस शब्दावली को लेकर असहजता थी। लेकिन प्रश्न यह है कि ऐसी शब्दावली राजनीतिक विमर्श में आई ही क्यों?

भगवा भारतीय सभ्यता में केवल एक रंग नहीं है। यह संन्यास, त्याग, तपस्या और साहस का प्रतीक रहा है। यदि किसी व्यक्ति ने भगवा पहनकर अपराध किया है तो उसका अपराध कानून के अनुसार जांचा जाना चाहिए। लेकिन भगवा जैसे सभ्यतागत प्रतीक को आतंकवाद के साथ जोड़ देना एक अलग राजनीतिक संदेश पैदा करता है।
फिर आया “हिंदू आतंकवाद” या “हिंदू आतंक” का राजनीतिक विमर्श। यह सही है कि अपराध का कोई धर्म नहीं होता और आतंकवाद की जांच करते समय किसी भी आरोपी की धार्मिक पहचान उसे कानून से ऊपर नहीं रखती। लेकिन किसी अपराध की जांच और एक व्यापक धार्मिक समुदाय के लिए राजनीतिक विशेषण गढ़ना दो अलग चीजें हैं। यहीं से यह प्रश्न उठता है कि क्या आतंकवाद की चर्चा में भी समान कसौटी अपनाई गई?
सनातन धर्म पर 2023 में हुए विवाद ने इस प्रश्न को और स्पष्ट किया। द्रमुक नेता उदयनिधि स्टालिन ने सनातन धर्म को समाप्त करने की बात कही और उसकी तुलना ऐसी बीमारियों से की जिन्हें खत्म करना चाहिए। कांग्रेस ने उस समय सभी धर्मों के सम्मान की अपनी प्रतिबद्धता दोहराई, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि हर राजनीतिक दल को अपने विचार व्यक्त करने की स्वतंत्रता है।
यहां फिर वही समस्या सामने आती है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार निश्चित रूप से है। लेकिन राजनीतिक दल केवल कानूनी अधिकारों के आधार पर नहीं चलते। उनसे सामाजिक और नैतिक जिम्मेदारी की भी अपेक्षा की जाती है। यदि कोई व्यक्ति करोड़ों लोगों की धार्मिक आस्था को समाप्त करने की भाषा इस्तेमाल करता है, तो केवल “उसे अपने विचार व्यक्त करने की स्वतंत्रता है” कह देना पर्याप्त राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं हो सकती। और फिर आता है राम मंदिर।
राम भारतीय समाज में केवल धार्मिक व्यक्तित्व नहीं हैं। वे भारतीय सांस्कृतिक चेतना का अभिन्न हिस्सा हैं। अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण करोड़ों लोगों की आस्था, लंबे सामाजिक संघर्ष और ऐतिहासिक स्मृति से जुड़ा विषय है। इस मंदिर की राजनीति पर सवाल उठाना पूरी तरह वैध है। मंदिर के निर्माण और उससे जुड़ी सरकार की नीतियों की आलोचना भी की जा सकती है। मंदिर के आर्थिक प्रभाव, प्रबंधन, चंदे या प्रशासन पर प्रश्न भी उठाए जा सकते हैं।
लेकिन जब राम मंदिर को ही राजनीतिक तमाशे का मंच बनाया जाता है, तब सवाल उठना स्वाभाविक है।
पप्पू यादव का हालिया प्रदर्शन इसी कारण महत्वपूर्ण है। यदि उद्देश्य मंदिर के चंदे में कथित अनियमितताओं को उजागर करना था, तो राजनीतिक भाषण, दस्तावेज, पत्रकार सम्मेलन, जांच की मांग और संसदीय प्रश्न जैसे अनेक रास्ते उपलब्ध थे। लेकिन साधु का वेश धारण करके राम मंदिर के दान-पात्र से चंदा लेकर भागने का अभिनय करना एक अलग प्रकार का राजनीतिक संदेश देता है। आलोचक इसे धार्मिक प्रतीकों का उपहास मानते हैं, जबकि पप्पू यादव इसे भ्रष्टाचार के खिलाफ व्यंग्य बताते हैं। यही विवाद इस बात को रेखांकित करता है कि राजनीतिक व्यंग्य की भी सांस्कृतिक सीमाएं होती हैं। यही बात प्रियंका गांधी की टिप्पणी पर भी लागू होती है।
यदि प्रोफेसर कामकोटि की वैज्ञानिक समझ पर प्रश्न है, तो उस पर बहस कीजिए। यदि उनकी नियुक्ति गलत है, तो कारण बताइए। लेकिन “गोमूत्र एक्सपर्ट” कहना राजनीतिक आलोचना को सांस्कृतिक उपहास में बदल देता है। और जब यही पैटर्न बार-बार अलग-अलग रूपों में दिखाई देता है, तो उसे केवल संयोग कहकर टालना कठिन हो जाता है। यहां कांग्रेस के सामने सबसे बड़ा प्रश्न उसकी धर्मनिरपेक्षता का है।
क्या धर्मनिरपेक्षता का अर्थ केवल अल्पसंख्यक धार्मिक भावनाओं की संवेदनशीलता है? क्या बहुसंख्यक समाज की धार्मिक भावनाएं राजनीतिक रूप से कम महत्वपूर्ण हैं? क्या हिंदू आस्था पर टिप्पणी करने की राजनीतिक स्वतंत्रता और दूसरे धर्मों की आस्था पर टिप्पणी करने की राजनीतिक कीमत अलग-अलग होनी चाहिए? यदि कांग्रेस वास्तव में सभी धर्मों का समान सम्मान करती है, तो उसे इन सवालों का स्पष्ट उत्तर देना होगा। क्योंकि भारतीय समाज अब इन विरोधाभासों को बहुत ध्यान से देखता है।
आज का हिंदू केवल मंदिर जाने वाला व्यक्ति नहीं है। वह आईआईटी का विद्यार्थी है। वह वैज्ञानिक है। वह सेना का जवान है। वह चिकित्सक है। वह उद्यमी है। वह कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर शोध कर रहा है। वह अंतरिक्ष में भारत की सफलता पर गर्व करता है। और उसी समय वह अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं को भी सम्मान देता है। उसे कोई विरोधाभास दिखाई नहीं देता।
वह विज्ञान को स्वीकार करने के लिए अपनी आस्था छोड़ने को तैयार नहीं है। और अपनी आस्था का सम्मान करने के लिए विज्ञान छोड़ने को भी तैयार नहीं है। यही नया भारत है।

पुरानी राजनीति में शायद यह मान लिया जाता था कि हिंदू परंपरा का मजाक उड़ाने वाला व्यक्ति आधुनिक और प्रगतिशील दिखाई देगा। लेकिन आज स्थिति बदल चुकी है। भारतीय समाज अब यह पूछता है कि आधुनिकता का अर्थ अपनी सभ्यता का उपहास करना कब से हो गया? यदि गोमूत्र के औषधीय गुणों का दावा गलत है तो वैज्ञानिक प्रमाण से गलत साबित कीजिए। यदि राम मंदिर में चंदे की गड़बड़ी हुई है तो दस्तावेजों के साथ सामने आइए। यदि किसी हिंदू परंपरा में सामाजिक बुराई है तो उसके सुधार की मांग कीजिए। लेकिन किसी परंपरा के प्रतीकों को हास्य का पात्र बनाकर उसे समाप्त करने की कोशिश मत कीजिए। क्योंकि इससे विचार नहीं जीतते। केवल समाज के भीतर अविश्वास बढ़ता है।
कांग्रेस के लिए यह आत्ममंथन का समय है। उसे तय करना होगा कि वह भारतीय सभ्यता के साथ संवाद करेगी या उस पुराने वैचारिक ढांचे में बनी रहेगी जिसमें हिंदू प्रतीकों के प्रति उपहास को बौद्धिक श्रेष्ठता समझ लिया जाता था।
यह भी समझना होगा कि हिंदू आस्था का सम्मान करना भाजपा का एकाधिकार नहीं है। राम किसी दल के नहीं हैं। गंगा किसी पार्टी की नहीं है। भगवा किसी संगठन की संपत्ति नहीं है। योग किसी राजनीतिक दल का घोषणापत्र नहीं है। गाय करोड़ों भारतीयों की धार्मिक और सांस्कृतिक संवेदना का हिस्सा है। इन सबका सम्मान करना किसी दल का राजनीतिक एजेंडा नहीं, भारत की सामाजिक वास्तविकता को स्वीकार करना है। और शायद यही बात कांग्रेस को सबसे अधिक समझने की आवश्यकता है।
भारत अब उस दौर से बहुत आगे निकल चुका है जहां किसी हिंदू प्रतीक का उपहास करके राजनीतिक और बौद्धिक श्रेष्ठता का दावा आसानी से स्वीकार कर लिया जाता था। आज भारतीय नागरिक प्रश्न करता है। वह तर्क मांगता है। वह प्रमाण मांगता है। लेकिन वह अपनी आस्था के लिए शर्मिंदा होने से भी इनकार करता है।
इसलिए “गोमूत्र एक्सपर्ट” और “चंदा चोर लीला” जैसी घटनाओं को अलग-अलग राजनीतिक घटनाओं की तरह देखना पर्याप्त नहीं है। ये उस बड़े संघर्ष के संकेत हैं जिसमें एक ओर भारत की सभ्यतागत आत्मचेतना है और दूसरी ओर वह राजनीतिक भाषा है जो अभी भी हिंदू प्रतीकों को आसान उपहास का विषय समझती है। यह संघर्ष केवल भाजपा और कांग्रेस के बीच नहीं है। यह भारत के राजनीतिक विमर्श के भविष्य का संघर्ष है।
भारत को ऐसी राजनीति चाहिए जो धर्म के नाम पर विज्ञान को नकारे नहीं और विज्ञान के नाम पर धर्म का उपहास भी न करे। ऐसी राजनीति चाहिए जो मंदिर के चंदे में भ्रष्टाचार हो तो उसे उजागर करे, लेकिन राम का मजाक बनाकर नहीं। ऐसी राजनीति चाहिए जो किसी वैज्ञानिक के दावे से असहमत हो तो शोध से उसे चुनौती दे, “गोमूत्र एक्सपर्ट” कहकर नहीं। क्योंकि असहमति लोकतंत्र की शक्ति है, लेकिन उपहास लोकतंत्र की भाषा नहीं हो सकता।
कांग्रेस के लिए संदेश स्पष्ट है—यदि वह सचमुच नए भारत से संवाद करना चाहती है तो उसे अपने पुराने राजनीतिक मुहावरों से बाहर निकलना होगा। उसे समझना होगा कि आज का भारतीय अपनी जड़ों से जुड़ा हुआ भी है और आधुनिक भी। वह राम को भी मानता है और रोबोटिक्स को भी। वह गीता भी पढ़ता है और कृत्रिम बुद्धिमत्ता भी सीखता है। वह योग भी करता है और आधुनिक चिकित्सा पर भी भरोसा करता है। उसे किसी एक को चुनने की जरूरत नहीं है।
भारत बदल चुका है। अब सवाल यह नहीं है कि कांग्रेस हिंदू आस्था का मजाक उड़ाकर कितनी राजनीति कर सकती है। सवाल यह है कि क्या वह उस भारत को समझ पाएगी जो अपनी आस्था का सम्मान करते हुए आधुनिक दुनिया का नेतृत्व करना चाहता है।
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)
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