सयाली पराते
फ्लोराइड पृथ्वी पर प्राकृतिक रूप से पाया जाने वाला एक खनिज है। यह फ्लोरीन तत्व का यौगिक रूप है, जो चट्टानों, मिट्टी, भूजल और कुछ खाद्य पदार्थों में स्वाभाविक रूप से मौजूद रहता है। सामान्य मात्रा में फ्लोराइड दांतों और हड्डियों के विकास के लिए उपयोगी माना जाता है, लेकिन यदि इसकी मात्रा लंबे समय तक अधिक हो जाए तो यह मानव स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन सकता है।
सरल शब्दों में कहा जाए तो फ्लोराइड एक ऐसा प्राकृतिक खनिज है, जो कम मात्रा में लाभकारी और अधिक मात्रा में हानिकारक होता है।
भारत में फ्लोराइड प्रदूषण मुख्यतः भूजल से जुड़ी समस्या है। देश के अनेक राज्यों में लोग वर्षों से ऐसे भूजल का उपयोग कर रहे है जिसमें फ्लोराइड की मात्रा निर्धारित मानकों से अधिक पाई गई है।
परिणामस्वरूप लाखों लोग डेंटल फ्लोरोसिस (Dental Fluorosis) और स्केलेटल फ्लोरोसिस (Skeletal Fluorosis) जैसी बीमारियों से प्रभावित हुए है।फ्लोरीन तत्व का ऋणात्मक आयन, जो प्राकृतिक या कृत्रिम स्रोतों से पानी, मिट्टी और भोजन में पाया जाता है।
फ्लोराइड कहाँ पाया जाता है?
फ्लोराइड प्राकृतिक और मानवजनित दोनों स्रोतों से पर्यावरण में पहुंच सकता है।
प्राकृतिक स्रोत - भारत में अधिकांश फ्लोराइड भूजल में प्राकृतिक रूप से घुलकर आता है। मुख्य प्राकृतिक स्रोत ग्रेनाइट एवं ज्वालामुखीय चट्टानें, फ्लोराइट, एपेटाइट, क्रायोलाइट, भूजल में चट्टानों का घुलना है। जब वर्षा का पानी चट्टानों से होकर भूजल तक पहुंचता है, तब उनमें मौजूद फ्लोराइड पानी में घुल जाता है।
मानवजनित स्रोत - कुछ औद्योगिक गतिविधियां भी फ्लोराइड प्रदूषण बढ़ाती है। इसके मुख्य स्रोत एल्युमिनियम उद्योग, उर्वरक उद्योग, ईंट भट्टे, कोयला आधारित ताप विद्युत संयंत्र, कुछ रासायनिक उद्योग है। हालांकि भारत में अधिकांश फ्लोराइड प्रदूषण प्राकृतिक कारणों से ही होता है।
पीने के पानी में फ्लोराइड कैसे आता है?
जब भूजल लंबे समय तक फ्लोराइड युक्त चट्टानों के संपर्क में रहता है, तब उसमें फ्लोराइड घुल जाता है। इसकी मात्रा बढ़ने के प्रमुख कारणों में भूजल का अत्यधिक दोहन, कम वर्षा, सूखा, गहरे बोरवेल, भूगर्भीय संरचना शामिल है। इसी कारण राजस्थान, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, गुजरात, कर्नाटक, मध्य प्रदेश और अन्य कई राज्यों के कुछ क्षेत्रों में फ्लोराइड की समस्या अधिक देखी जाती है।
पीने के पानी में फ्लोराइड की सुरक्षित सीमा क्या है ?
भारत में पेयजल गुणवत्ता के मानक भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) द्वारा निर्धारित किए जाते है। इनके अनुसार -
यदि फ्लोराइड की मात्रा लंबे समय तक 1.5 mg/L से अधिक रहती है, तो फ्लोरोसिस का खतरा बढ़ जाता है।
शरीर में फ्लोराइड की भूमिका क्या है ?
उचित मात्रा में फ्लोराइड लाभदायक भी होता है। इसके प्रमुख लाभ दांतों के इनेमल को मजबूत बनाता है। दांतों में कीड़े लगने की संभावना कम करता है। हड्डियों के खनिजीकरण में सहायता करता है। लेकिन आवश्यकता से अधिक मात्रा शरीर के लिए विषैली सिद्ध हो सकती है।
अधिक फ्लोराइड क्यों खतरनाक है?
अत्यधिक फ्लोराइड शरीर में धीरे-धीरे जमा होने लगता है। यह मुख्य रूप से हड्डियों, दांतों, जोड़ों को प्रभावित करता है। लंबे समय तक अधिक फ्लोराइड युक्त पानी पीने से फ्लोरोसिस नामक बीमारी विकसित होती है।

फ्लोरोसिस (Fluorosis) क्या है?
फ्लोराइड की अधिक मात्रा के लंबे समय तक सेवन से होने वाली बीमारी को फ्लोरोसिस कहा जाता है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) के अनुसार फ्लोरोसिस एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या है, जिसका समय पर निदान और रोकथाम आवश्यक है। फ्लोरोसिस मुख्यतः तीन प्रकार की होती है।
गैर-कंकालीय फ्लोरोसिस कुछ मामलों में यह शरीर के अन्य अंगों को भी प्रभावित करती है। संभावित प्रभाव मांसपेशियों में दर्द, थकान, पाचन संबंधी समस्याएं, कमजोरी होती है।
भारत में फ्लोराइड की स्थिति
भारत सरकार के जल शक्ति मंत्रालय द्वारा 22 मार्च 2021 को संसद में दी गई जानकारी के अनुसार, Central Ground Water Board (CGWB) की देशव्यापी भूजल गुणवत्ता निगरानी में कई राज्यों के अलग-अलग जिलों में फ्लोराइड, आर्सेनिक, नाइट्रेट, आयरन और भारी धातुओं का स्तर Bureau of Indian Standards (BIS) द्वारा निर्धारित सुरक्षित सीमा से अधिक पाया गया।
रिपोर्ट के अनुसार, फ्लोराइड की अधिकता 23 राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों के 370 जिलों के कुछ हिस्सों में दर्ज की गई। राज्यवार आंकड़ों में मध्य प्रदेश में फ्लोराइड प्रभावित 43 जिले, राजस्थान में फ्लोराइड और आयरन से प्रभावित 33-33 जिले, तथा कर्नाटक में फ्लोराइड प्रभावित 30 जिले प्रमुख है।
सरकार ने स्पष्ट किया कि भूजल प्रबंधन राज्यों का विषय है, जबकि केंद्र सरकार Jal Jeevan Mission के तहत गुणवत्ता-प्रभावित बस्तियों को प्राथमिकता देते हुए सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराने, सामुदायिक जल शुद्धिकरण संयंत्र (CWPPs) स्थापित करने तथा सुरक्षित जलभृतों (Aquifers) के उपयोग हेतु राज्यों को तकनीकी सहायता प्रदान कर रही है।
देश भर में किए गए फ्लोराइड परीक्षणों के आधार पर 370 जिलों की सूची तैयार की गई, जहां आंशिक रूप से फ्लोराइड पाया गया। यानी कि जरूरी नहीं है कि इन जिलों के सभी इलाकों में फ्लोराइड हो। अब आप उन जिलों की सूची देख सकते हैं हां के कुछ इलाकों में भूजल में फ्लोराइड पाया गया।
फ्लोराइड की जांच कैसे की जाती है?
यदि किसी क्षेत्र के पेयजल में फ्लोराइड की आशंका हो, तो उसकी प्रयोगशाला में जांच कराई जाती है। मुख्य जांच विधियाँ -
फ्लोराइड से होने वाली बीमारियाँ क्या है ?
अत्यधिक फ्लोराइड शरीर के विभिन्न अंगों को प्रभावित करता है।
फ्लोराइड से बचाव कैसे करें?
यदि किसी क्षेत्र में फ्लोराइड अधिक है तो निम्न उपाय अपनाए जा सकते है-
पानी से फ्लोराइड कैसे हटाया जाता है?
इसे Defluoridation कहा जाता है। भारत में कई तकनीकों का उपयोग किया जाता है।
नलगोंडा तकनीक (Nalgonda Technique) - यह भारत में विकसित सबसे प्रसिद्ध तकनीक है। इसे नेशनल एनवायरनमेंटल इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट (NEERI) ने विकसित किया। इसमें फिटकरी, चूना, ब्लीचिंग पाउडर का उपयोग करके फ्लोराइड हटाया जाता है। इसमें कम लागत, ग्रामीण क्षेत्रों के लिए उपयुक्त, सामुदायिक जल योजनाओं में उपयोगी होता है।
Activated Alumina - इस तकनीक में विशेष फिल्टर मीडिया फ्लोराइड को अवशोषित कर लेता है।
Reverse Osmosis (RO) - आज घरों और संस्थानों में सबसे अधिक उपयोग की जाने वाली तकनीक है । इससे फ्लोराइड हटाता है और अन्य घुलित लवण भी कम करता है। ये महंगा होता है और पानी की बर्बादी अधिक होती है।
Bone Char Method कुछ देशों में उपयोग होती है, लेकिन भारत में सीमित है।
सरकार द्वारा किए जा रहे प्रमुख प्रयास क्या है ?
भारत सरकार ने फ्लोराइड प्रभावित क्षेत्रों के लिए कई कार्यक्रम शुरू किए है।
जल जीवन मिशन वर्ष 2019 में शुरू किए गए इस मिशन का उद्देश्य है, हर ग्रामीण परिवार को काम करने के लिए घरेलू नल कनेक्शन (Functional Household Tap Connection - FHTC) उपलब्ध कराना है। मिशन के अंतर्गत फ्लोराइड एवं आर्सेनिक प्रभावित गांवों को प्राथमिकता दी गई है।
इसका मुख्य उद्देश्य सुरक्षित पेयजल, गुणवत्ता प्रभावित गांवों को प्राथमिकता, नियमित जल गुणवत्ता जांच, ग्राम स्तर पर Water Testing Laboratories शामिल है
Atal Bhujal Yojana भूजल संरक्षण को बढ़ावा देकर फ्लोराइड जैसी समस्याओं को कम करने का प्रयास है । National Water Quality Sub-Mission फ्लोराइड एवं आर्सेनिक प्रभावित ग्रामीण क्षेत्रों को सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराने हेतु शुरू किया गया विशेष कार्यक्रम है।
केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) नियमित रूप से भूजल गुणवत्ता, फ्लोराइड स्तर, जल गुणवत्ता मानचित्र जारी करता है।
राष्ट्रीय फ्लोरोसिस रोकथाम एवं नियंत्रण कार्यक्रम (NPPCF) के तहत क्या-क्या सेवाएं दी जाती है?
फ्लोरोसिस की बढ़ती समस्या से निपटने के लिए केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय फ्लोरोसिस रोकथाम एवं नियंत्रण कार्यक्रम (National Programme for Prevention and Control of Fluorosis - NPPCF) लागू किया है। इस कार्यक्रम का उद्देश्य केवल बीमारी का इलाज करना नहीं, बल्कि समय रहते इसकी पहचान, रोकथाम और प्रभावित लोगों के पुनर्वास तक व्यापक स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराना है।
कार्यक्रम के तहत सबसे पहले समुदाय स्तर पर फ्लोरोसिस की निगरानी की जाती है, ताकि प्रभावित गांवों, ब्लॉकों और क्षेत्रों की पहचान की जा सके। इसके साथ ही डॉक्टरों, पैरामेडिकल स्टाफ और अन्य स्वास्थ्यकर्मियों को विशेष प्रशिक्षण देकर उनकी क्षमता बढ़ाई जाती है। जिला अस्पतालों और चिकित्सा संस्थानों में फ्लोरोसिस की जांच के लिए आवश्यक नैदानिक सुविधाएं विकसित की जाती हैं, जिससे बीमारी की समय पर पुष्टि हो सके।
रिपोर्ट के अनुसार सरकार फ्लोरोसिस से प्रभावित मरीजों को उपचार, आवश्यक होने पर सर्जरी तथा पुनर्वास की सुविधाएं भी उपलब्ध कराने पर जोर देती है। इसके अलावा लोगों को सुरक्षित पेयजल, संतुलित पोषण और फ्लोराइड के दुष्प्रभावों से बचाव के बारे में जागरूक करने के लिए स्वास्थ्य शिक्षा अभियान चलाए जाते हैं।
कार्यक्रम के अंतर्गत गांव, ब्लॉक और क्लस्टर स्तर पर फ्लोरोसिस की सामुदायिक पहचान की जाती है। साथ ही यह आकलन किया जाता है कि किसी क्षेत्र में रोकथाम, स्वास्थ्य संवर्धन, जांच, सर्जरी और पुनर्वास जैसी सुविधाएं पर्याप्त हैं या नहीं। जहां सुविधाओं की कमी होती है, वहां आवश्यक वित्तीय और भौतिक संसाधन उपलब्ध कराकर इन कमियों को दूर करने का प्रयास किया जाता है।
इसके अतिरिक्त प्रत्येक मरीज की व्यक्तिगत जांच कर उसका उपचार सुनिश्चित किया जाता है। समुदाय में फ्लोरोसिस की स्थिति के आधार पर सार्वजनिक स्वास्थ्य हस्तक्षेप किए जाते हैं तथा सूचना, शिक्षा और संचार (IEC) गतिविधियों के माध्यम से लोगों के व्यवहार में सकारात्मक बदलाव लाने का प्रयास किया जाता है। स्वास्थ्य कर्मियों के नियमित प्रशिक्षण के जरिए कार्यक्रम के प्रभावी क्रियान्वयन पर भी विशेष बल दिया जाता है।

फ्लोराइड और सतत विकास
फ्लोराइड नियंत्रण केवल स्वास्थ्य का विषय नहीं है बल्कि जल सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण, सतत विकास लक्ष्य (SDG-6 - Clean Water and Sanitation) से भी जुड़ा हुआ है। फ्लोराइड नियंत्रण कई वैश्विक सतत विकास लक्ष्यों से जुड़ा हुआ है।
सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराना इन लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
भारत में फ्लोराइड नियंत्रण की प्रमुख चुनौतियाँ क्या है ?
फ्लोराइड की समस्या केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जल प्रबंधन, पर्यावरण, ग्रामीण विकास और सामाजिक-आर्थिक स्थिति से भी जुड़ी हुई है। सरकार द्वारा कई योजनाएं संचालित होने के बावजूद कई क्षेत्रों में यह समस्या बनी हुई है।
फ्लोराइड नियंत्रण के लिए भविष्य की रणनीति क्या है ?
विशेषज्ञों के अनुसार फ्लोराइड समस्या का समाधान केवल उपचार से नहीं, बल्कि सुरक्षित जल प्रबंधन से संभव है।
(https://hindi.indiawaterportal.org/pollution-and-water-quality/fluoride-in-drinking-water-23-affected-states-india)
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)
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