सदियों पुरानी एक जानी-पहचानी कहानी महाराष्ट्र के शांत कस्बे मंचर में फिर से उभर रही है। वहाँ हाल ही में शुरु हुए मरम्मत कार्य के दौरान स्थानीय मस्जिद के नीचे हिंदू मंदिर का संकेत मिला है। कई लोगों को ऐसा लगता है कि यह एक पूजा स्थल को लेकर छिड़ा स्थानीय विवाद है। लेकिन सिर्फ़ इसी रूप में इसका सरलीकरण करना एक बड़े संकेतक को नज़रअंदाज़ करना है। दरअसल मंचर का यह वाकया भारत में फैली उस विसंगति का ही एक सूक्ष्म रूप है—जिसने एक सभ्यता का पवित्र भूगोल व्यवस्थित रूप से बदल दिया, उसकी स्मृतियों को दबा दिया गया और उसके सत्यों को राजनीतिक स्वार्थ और युद्ध में जीत के नीचे छिपाने की कोशिश की गई। इस कार्य के लिए निर्बाध समन्वयवाद का एक आख्यान सदियों से सावधानीपूर्वक गढ़ा गया। पाठ्यपुस्तकों में पढ़ाए जाने वाले और राजनीतिक विमर्श में प्रतिध्वनित होने वाले आधिकारिक इतिहास में मध्ययुगीन आक्रमणों के दौरान व्यापक रूप से मंदिरों को अपवित्र करने की असहज वास्तविकता को अक्सर नज़रअंदाज़ कर दिया गया। क्योंकि यह इतिहास विजेताओं द्वारा लिखा गया था। लेकिन आजादी के बाद भी इसे सुधारा नहीं गया बल्कि उत्तर-औपनिवेशिक "धर्मनिरपेक्ष" प्रतिष्ठान द्वारा इसे और आगे बढ़ाया गया। जिसने भी इस सभ्यतागत घाव की चर्चा की कोशिश की उसे अव्यावहारिक समझा गया और इसके बारे में बात करना विभाजनकारी करार दिया गया। उन मध्यकालीन विभीषिकाओं को याद रखना आधुनिकता की अस्वीकृति के रूप में स्थापित किया गया। हिंदू से यह अपेक्षा की गई कि वह राष्ट्रीय शांति के लिए उस रक्तरंजित इतिहास को भूल जाएं और उदात्त बनें। फिर भी, धरती की याददाश्त बहुत लंबी होती है। सच्चाई पानी की तरह हमेशा रिसने का रास्ता ढूँढ ही लेती है। भारत का सभ्यतागत सत्य यह है कि इस पवित्र भूभाग पर पहले से उकेरी हुई प्राचीन हिंदू और बौद्ध संरचनाओं पर एक नई इबारत लिखने की कोशिश की जा रही है- लेकिन अब यह दफ्न रहने से इनकार कर रहा है। इसलिए अहम सवाल यह नहीं है कि क्या ये सच सामने आएंगे? जैसे-जैसे उत्खनन की तकनीक आगे बढ़ेगी और ऐतिहासिक अन्वेषण गहराता जाएगा, इस तरह के सच सामने आएंगे ही। लेकिन असली और निर्णायक सवाल यह है कि एक राष्ट्र और समाज के रूप में भारत इनका सामना कैसे करेगा?
इस पृष्ठभूमि में धर्मनिरपेक्षता से जुड़ा एक प्रासंगिक प्रश्न उठता है: क्या हम एक मनगढ़ंत धर्मनिरपेक्षता को कायम रखेंगे जो मूल रुप से कुछ खास तरह की समृतियों के विलोप होने की मांग करता है? धर्मनिरपेक्षता का यह रूप बहुसंख्यक समुदाय को ऐतिहासिक अन्याय का मनोवैज्ञानिक बोझ बिना किसी निवारण के सहने के लिए मजबूर करता है और अपने पवित्र पूजा स्थलों को हमेशा के लिए खोया हुआ मानता है। लेकिन यह यह मौन के जरिए कायम की गई जबरदस्ती की शांति है, एक ऐसा सामंजस्य जो झूठ पर टिका है। ऐसा दृष्टिकोण कतई टिकाऊ साबित नहीं हो सकता है, जिसमें वास्तविक मेल-मिलाप नहीं, बल्कि सड़ता हुआ आक्रोश और समय-समय पर हो रहा विस्फोट छिपा हुआ हो। इसके वास्तविक विकल्प के तौर पर परिपक्व बहुलवाद को अपनाना ही होगा। इसकी शुरुआत भूलने से नहीं, बल्कि ऐतिहासिक गलतियों को साहसपूर्वक और ईमानदारी से स्वीकार करने से होगी। एक वास्तविक बहुलवाद यह समझेगा कि किसी सभ्यता के संपूर्ण होने के लिए, उसकी स्मृति को पुनर्स्थापित किया जाना आवश्यक है। इसमें संग्रहालयों, स्मारकों, या साझा पवित्र स्थलों के नए रूपों के माध्यम से ऐसे स्थान बनाना शामिल होगा, जो अतीत के मूर्तिभंजन को कायम रखे बिना, इस भूमि के जटिल इतिहास का सम्मान करें। मंचर के मंदिर का भाग्य महत्वपूर्ण है, लेकिन यह एक बहुत बड़े आकलन का हिस्सा है। हम जिस समाधान पर पहुँचेंगे, वह ना केवल एक पुरातात्विक स्थल बल्कि हमारे भविष्य को भी बेहतर तरीके से परिभाषित करेगा। यह भारतीय गणतंत्र की नैतिक अखंडता को परिभाषित करेगा। क्या हम सत्य और प्रामाणिक सामंजस्य का कठिन मार्ग चुनेंगे या फिर जबरन भुला दिए जाने के भंगुर मुखौटे से चिपके रहेंगे? मंचर के पत्थर और उसके जैसे अनगिनत स्थल हमारे उत्तर की प्रतीक्षा कर रहे हैं। भारत के दफ़नाए हुए अतीत का उभरना भविष्य के लिए ख़तरा नहीं है बल्कि आखिरकार देश के समग्र स्वरुप धारण करने का निमंत्रण है।

दीपक कुमार रथ
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