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सूर्य सरोवर से ऊर्जा आत्मनिर्भरता : भारत का सौर भविष्य

Energy Self-Reliance through Surya Sarovar: India's Solar Future


डॉ दीपक कोहली


भारत में सूर्य केवल प्रकाश का साधन नहीं है, बल्कि यह जीवन, ऊर्जा और प्रगति का एक सनातन स्रोत रहा है। जैसे-जैसे देश आधुनिकता की ओर बढ़ रहा है और हमारी ऊर्जा की आवश्यकताएँ दिन-प्रतिदिन बढ़ रही हैं, वैसे-वैसे सूर्य से मिलने वाली यह प्राकृतिक शक्ति हमारे राष्ट्र के भविष्य का मुख्य आधार बनती जा रही है। आज जब हम ऊर्जा के पुराने और सीमित साधनों, जैसे कोयला और तेल, पर अपनी निर्भरता को कम करने का प्रयास कर रहे हैं, तब सौर ऊर्जा एक स्वच्छ, सुरक्षित और कभी न समाप्त होने वाले विकल्प के रूप में उभरकर सामने आई है। भारत का भौगोलिक स्थान ऐसा है जहाँ वर्ष के लगभग 300 दिनों से अधिक समय तक प्रचुर मात्रा में धूप उपलब्ध रहती है, जो प्रतिवर्ष लगभग 5,000 खरब किलोवाट-घंटा के बराबर सौर ऊर्जा प्राप्त करने की क्षमता रखती है। देश के विशाल मैदानी भागों, मरुस्थलीय क्षेत्रों और तटीय इलाकों में सूरज की किरणें प्रचुर मात्रा में पड़ती हैं। इस प्राकृतिक वरदान का सही उपयोग करके भारत न केवल अपनी ऊर्जा संबंधी आवश्यकताओं को पूरा कर सकता है, बल्कि संपूर्ण विश्व के सामने पर्यावरण संरक्षण और ऊर्जा आत्मनिर्भरता का एक अनूठा उदाहरण भी प्रस्तुत कर सकता है। ऊर्जा के क्षेत्र में यह परिवर्तन केवल बिजली उत्पादन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारे समाज, अर्थव्यवस्था और पर्यावरण की संपूर्ण दिशा को बदलने की क्षमता रखता है।

पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों के उपयोग से हमारी पृथ्वी पर प्रदूषण का बोझ लगातार बढ़ा है। कोयले और खनिज तेल के दोहन और उनके उपयोग से वायुमंडल में हानिकारक गैसों का प्रसार हुआ है, जिससे जलवायु परिवर्तन और वैश्विक तापमान में वृद्धि जैसी गंभीर समस्याएँ उत्पन्न हुई हैं। इन समस्याओं का प्रभाव हमारे मौसम चक्र, कृषि, स्वास्थ्य और जल संसाधनों पर स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। ऐसे संकट के समय में सौर ऊर्जा एक अत्यंत वरदान सिद्ध हो रही है। यह ऊर्जा का ऐसा रूप है जो बिना किसी प्रदूषण के, बिना वातावरण को हानि पहुँचाए और बिना किसी सीमित संसाधन को नष्ट किए प्राप्त किया जा सकता है। आँकड़ों के अनुसार, 1 गीगावाट सौर ऊर्जा के उपयोग से प्रतिवर्ष लगभग 14 लाख टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन को रोका जा सकता है। सूर्य से मिलने वाली रोशनी को बिजली में बदलकर हम उन विषैली गैसों के उत्सर्जन को रोक सकते हैं जो हमारे पर्यावरण को नष्ट कर रही हैं। यह एक ऐसा मार्ग है जो हमें विकास की गति को धीमा किए बिना अपनी धरती को भावी पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखने का अवसर देता है। इसलिए पर्यावरण की सुरक्षा और जीव-जंतुओं के संरक्षण के दृष्टिकोण से भी सौर ऊर्जा को अपनाना अब केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि एक अनिवार्य आवश्यकता बन चुका है।

भारत जैसे विकासशील और विशाल आबादी वाले देश में ऊर्जा की माँग लगातार बढ़ रही है। नए उद्योगों की स्थापना, नगरों का विस्तार, कृषि कार्य का मशीनीकरण और प्रत्येक घर तक बिजली पहुँचाने का लक्ष्य ऊर्जा के नए और स्थायी स्रोतों की माँग करता है। भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर वर्ष 2030 तक अपनी कुल स्थापित विद्युत क्षमता का 50 प्रतिशत अक्षय ऊर्जा से प्राप्त करने तथा 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता हासिल करने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है। सौर ऊर्जा इस माँग और लक्ष्य को पूरा करने का सबसे सुलभ और प्रभावकारी माध्यम है। भारत में सौर ऊर्जा के विकास की अपार संभावनाएँ विद्यमान हैं। आज भारत विश्व में स्थापित सौर ऊर्जा क्षमता के मामले में पाँच प्रमुख देशों में शामिल है। देश के राजस्थान , जहाँ विश्व के सबसे बड़े सौर पार्कों में से एक भादला सोलर पार्क स्थित है, गुजरात, मध्य प्रदेश और दक्षिणी राज्यों में जहाँ विशाल बंजर भूमि उपलब्ध है, वहाँ बड़े-बड़े सौर संयंत्र स्थापित किए जा रहे हैं। ये संयंत्र न केवल भारी मात्रा में बिजली का उत्पादन कर रहे हैं, बल्कि उन क्षेत्रों के आर्थिक विकास में भी योगदान दे रहे हैं।

हालाँकि, भारत में सौर ऊर्जा के तीव्र विस्तार के समक्ष भूमि की कमी तथा ऊर्जा भंडारण से संबंधित चुनौतियाँ प्रमुख बाधाएँ बनकर उभरी हैं। 1 मेगावाट क्षमता वाले पारंपरिक सौर संयंत्र की स्थापना के लिए औसतन 4 से 5 एकड़ भूमि की आवश्यकता होती है, जो कई बार कृषि, वनों और जन-आबादियों के लिए संघर्ष की स्थिति उत्पन्न करती है। इसके साथ ही, सूर्य का प्रकाश केवल दिन में उपलब्ध होने के कारण रात के समय बिजली आपूर्ति बनाए रखने के लिए ऊर्जा भंडारण (बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणाली ) एक बड़ी चुनौती रहा है। इसके समाधान के लिये ‘सूर्य सरोवर योजना’ के माध्यम से अंतर्देशीय जल निकायों का उपयोग करते हुए भूमि-निरपेक्ष फ्लोटिंग सौर ऊर्जा उत्पादन को बढ़ावा देने की अनुशंसा की गई है। इस नवीन पहल के अंतर्गत झीलों, जलाशयों, बांधों और औद्योगिक तालाबों के जल स्तर पर तैरते हुए सौर पैनल स्थापित किए जाते हैं। इससे भूमि अधिग्रहण की समस्या पूरी तरह समाप्त हो जाती है और कृषि या वन भूमि को कोई क्षति नहीं पहुँचती।

जल निकायों के ऊपर फ्लोटिंग सौर प्रणाली स्थापित करने के कई अन्य अद्वितीय लाभ भी हैं। जल के प्राकृतिक शीतलन प्रभाव के कारण सौर पैनलों का तापमान नियंत्रित रहता है, जिससे उनकी बिजली उत्पादन क्षमता और दक्षता में 5 प्रतिशत से 10 प्रतिशत तक की वृद्धि होती है। इसके अतिरिक्त, अध्ययनों के अनुसार, पानी की सतह को सौर पैनलों से ढकने से वाष्पीकरण की दर में 60 प्रतिशत से 70 प्रतिशत तक की भारी कमी आती है, जिससे भयंकर गर्मी के दिनों में प्रति हेक्टेयर लाखों लीटर अमूल्य पेयजल और सिंचाई के पानी की बचत होती है। ‘सूर्य सरोवर योजना’ में उन्नत ऊर्जा भंडारण प्रणालियों (जैसे आधुनिक लिथियम-आयन और उन्नत बैटरियों) का समावेश किया गया है, जो दिन के समय उत्पन्न अतिरिक्त बिजली को संचित करके रात के समय या बादल छाए रहने पर निरंतर और निर्बाध विद्युत आपूर्ति सुनिश्चित करती हैं। इस प्रकार यह योजना भूमिहीन ऊर्जा उत्पादन और भंडारण की दोहरी चुनौतियों का एक साथ अत्यंत सटीक और व्यावहारिक समाधान प्रस्तुत करती है।

सौर ऊर्जा की सबसे बड़ी विशेषता इसकी पहुँच और सरलता है। इसके लिए केवल बड़े-बड़े उद्योगों या सरकारी संयंत्रों पर निर्भर रहने की आवश्यकता नहीं है। 'प्रधानमंत्री सूर्य घर: मुफ्त बिजली योजना' जैसी केंद्रीय पहलों के माध्यम से 1 करोड़ परिवारों को छतों पर सौर प्रणाली (रूफटॉप सोलर) स्थापित करने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है, जिससे परिवारों को प्रति माह 300 यूनिट तक मुफ्त बिजली प्राप्त हो रही है। एक साधारण नागरिक भी अपने घर की छत पर छोटे सौर पैनल लगाकर अपने स्वयं के उपयोग के लिए बिजली बना सकता है। छतों पर सौर प्रणाली लगाने से नगरों में बिजली के मुख्य नेटवर्क पर दबाव कम होता है और लोगों के बिजली के बिलों में भारी कमी आती है। ग्रामीण और सुदूर क्षेत्रों में, जहाँ अभी तक पारंपरिक बिजली की लाइनें पहुँचाना कठिन और व्ययसाध्य रहा है, वहाँ सौर ऊर्जा ने एक नई क्रांति ला दी है। छोटे-छोटे गाँवों, पहाड़ी इलाकों और जंगलों के बीच बसे आबादियों में सौर पैनलों के माध्यम से प्रकाश और बिजली पहुँचाई जा रही है।

कृषि क्षेत्र में सौर ऊर्जा की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण और कल्याणकारी सिद्ध हो रही है। 'पीएम-कुसुम' योजना के अंतर्गत देश भर में लाखों किसानों को रियायती दरों पर सौर पंप वितरित किए जा रहे हैं। किसानों को अपनी फसलों की सिंचाई के लिए निरंतर बिजली और पानी की आवश्यकता होती है। कई बार बिजली की अनिश्चित आपूर्ति या महंगे डीजल पंपों के कारण किसानों को भारी कठिनाइयों और आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ता था। सौर ऊर्जा से चलने वाले सिंचाई पंपों ने किसानों के जीवन में एक सकारात्मक बदलाव ला दिया है। अब किसान बिना किसी डीजल के खर्च के और बिना बिजली के कटने की चिंता के दिन के समय आसानी से अपने खेतों में पानी लगा सकते हैं। इससे फसलों की पैदावार में सुधार हो रहा है और किसानों की आय में वृद्धि हो रही है। इसके साथ ही, कई स्थानों पर किसान अपनी अनुपयोगी या बंजर भूमि पर सौर पैनल लगाकर उत्पादित अतिरिक्त बिजली को ग्रिड को बेचकर 'ऊर्जादाता' भी बन रहे हैं।

आर्थिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो सौर ऊर्जा क्षेत्र में असीम संभावनाएँ छिपी हुई हैं। सौर ऊर्जा के विकास से देश में नए उद्योगों की नींव पड़ रही है और बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर उत्पन्न हो रहे हैं। एक अनुमान के अनुसार, नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र में भारत में वर्ष 2030 तक लाखों प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर सृजित होने की संभावना है। सौर पैनलों के निर्माण, उनकी स्थापना, मरम्मत और रखरखाव के लिए लाखों कुशल और अर्ध-कुशल कार्यकर्ताओं की आवश्यकता होती है। उत्पादन-संबद्ध प्रोत्साहन योजना के माध्यम से देश के भीतर ही उच्च दक्षता वाले सौर मॉड्यूल के निर्माण को बढ़ावा दिया जा रहा है। जैसे-जैसे देश में सौर उपकरणों का उत्पादन बढ़ेगा, वैसे-वैसे विदेशी आयात पर हमारी निर्भरता कम होगी, जिससे देश का विदेशी मुद्रा भंडार सुरक्षित रहेगा और हमारी अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी।

सौर ऊर्जा के भविष्य को और अधिक उज्ज्वल और प्रभावी बनाने के लिए तकनीकी अनुसंधान और नवाचार की दिशा में निरंतर कार्य हो रहा है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सौर पैनल निर्माण तकनीक में तेजी से सुधार हुआ है, जिससे बीते एक दशक में सौर ऊर्जा उत्पादन की प्रति यूनिट लागत में 80 प्रतिशत से अधिक की गिरावट दर्ज की गई है। अब कम स्थान में अधिक बिजली पैदा करने वाले उन्नत 'पेरोवस्काइट' और 'बाइफेशियल' (दोनों तरफ से बिजली बनाने वाले) पैनल बनाए जा रहे हैं। इसके साथ ही ऊर्जा को सुरक्षित रखने के लिए 'पम्प्ड स्टोरेज हाइड्रो' और 'बैटरी स्टोरेज' तकनीकों का एक साथ उपयोग किया जा रहा है, जिससे राष्ट्रीय ग्रिड में स्थिरता बनी रहे।

परिवहन के क्षेत्र में भी सौर ऊर्जा का प्रवेश एक नई क्रांति की शुरुआत कर रहा है। राष्ट्रीय विद्युत गतिशीलता योजना के तहत देश में बिजली से चलने वाले वाहनों का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है। परंतु यदि इन इलेक्ट्रिक वाहनों को चार्ज करने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली बिजली भी कोयले से बनाई जाएगी, तो पर्यावरण को पूरी तरह से लाभ नहीं मिल पाएगा। इसलिए इलेक्ट्रिक वाहनों के चार्जिंग केंद्रों को सीधे सौर ऊर्जा संयंत्रों से जोड़ने की नीति पर काम किया जा रहा है। जब हमारे वाहन सीधे सूरज की रोशनी से बनने वाली बिजली से चलेंगे, तब परिवहन का पूरा क्षेत्र पूरी तरह से स्वच्छ और शून्य-उत्सर्जन वाला हो जाएगा।

भारत की सौर ऊर्जा यात्रा में सामाजिक समानता और जन-भागीदारी का भी बड़ा योगदान है। जब एक छोटे से गाँव में सौर ऊर्जा के माध्यम से पहली बार बिजली की रोशनी पहुँचती है, तो वहाँ का सामाजिक जीवन बदल जाता है। रात के समय सड़कों पर रोशनी रहने से सुरक्षा की भावना बढ़ती है, महिलाएँ और बच्चे निर्भय होकर बाहर निकल सकते हैं, छोटे घरेलू उद्योग-धंधे रात में भी काम कर सकते हैं और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में जीवन रक्षक टीकों को सुरक्षित रखने के लिए सौर-संचालित रेफ्रिजरेटर चलाए जा रहे हैं। इस प्रकार सौर ऊर्जा केवल एक वैज्ञानिक साधन नहीं है, बल्कि यह सामाजिक उत्थान, शिक्षा के विस्तार और स्वास्थ्य सेवाओं के सुधार का एक शक्तिशाली माध्यम है।

सौर ऊर्जा के व्यापक प्रसार के लिए जन-जागरूकता का होना भी अत्यंत आवश्यक है। जब तक आम नागरिक इसके लाभों को पूरी तरह से नहीं समझेंगे और इसे अपने दैनिक जीवन में नहीं अपनाएँगे, तब तक इसका पूर्ण लाभ प्राप्त करना कठिन होगा। आज लोगों को यह समझाने की आवश्यकता है कि सौर ऊर्जा प्रणाली की शुरुआती लागत भले ही थोड़ी अधिक लगे, लेकिन 3 से 4 वर्षों के भीतर इसकी लागत वसूल हो जाती है और इसके बाद अगले 20-22 वर्षों तक मुफ्त बिजली प्राप्त होती है। एक सजग और जागरूक नागरिक समाज ही किसी भी नई और स्वच्छ तकनीक को पूरी सफलता से लागू कर सकता है।

भविष्य के दृष्टिकोण से देखें तो सौर ऊर्जा केवल एक विकल्प नहीं है, बल्कि यह भारत के सतत विकास का मुख्य चालक बनने जा रही है। भारत सरकार द्वारा मध्य प्रदेश के ओंकारेश्वर बांध के जलाशय पर 600 मेगावाट की क्षमता वाली फ्लोटिंग सौर परियोजना तथा गुजरात में नहरों के ऊपर स्थापित सोलर पैनल (कैनाल-टॉप सोलर सिस्टम) इसके उत्कृष्ट उदाहरण हैं। ये परियोजनाएँ दर्शाती हैं कि हम अपनी उपलब्ध जगह का अधिकतम और बुद्धिमत्तापूर्ण उपयोग करके ऊर्जा स्वतंत्रता की ओर बढ़ रहे हैं।

जलवायु परिवर्तन से निपटने के अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी भारत ने सौर ऊर्जा को बढ़ावा देने का संकल्प लिया है। भारत और फ्रांस की संयुक्त पहल पर गठित 'अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन' का मुख्यालय गुरुग्राम, भारत में ही स्थित है, जो विश्व के 100 से अधिक धूप-समृद्ध देशों को एकजुट कर रहा है। "एक सूर्य, एक विश्व, एक ग्रिड" (One Sun, One World, One Grid - OSOWOG) की जो अवधारणा भारत द्वारा रखी गई है, वह संपूर्ण मानवता को एक सूत्र में पिरोने वाली एक दूरदर्शी सोच है। इसके अंतर्गत भविष्य में दुनिया के विभिन्न देशों के सौर ग्रिड आपस में जुड़े होंगे, जिससे चौबीसों घंटे पार-सीमावर्ती स्वच्छ बिजली का आदान-प्रदान संभव हो सकेगा।

भारत की इस महान यात्रा में चुनौतियाँ भी कम नहीं हैं। सौर पैनलों के निर्माण के लिए आवश्यक दुर्लभ खनिजों , जैसे - सिलिकॉन और लिथियम की आपूर्ति, पुरानी बिजली वितरण कंपनियों की वित्तीय स्थिति, और समय सीमा समाप्त होने वाले सौर पैनलों का ई-कचरा प्रबंधन जैसे विषय ऐसे हैं जिन पर गहन विचार और नीतिगत सुधार की आवश्यकता है। परंतु 'सर्कुलर इकोनॉमी' के सिद्धांतों को अपनाकर और स्वदेशी विनिर्माण को बढ़ावा देकर इन समस्याओं के समाधान खोजे जा रहे हैं।

हमारी आने वाली पीढ़ियों का भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि हम आज ऊर्जा के कौन से स्रोतों को चुनते हैं। वर्ष 2070 तक 'शुद्ध-शून्य' कार्बन उत्सर्जन का लक्ष्य हासिल करने के भारत के संकल्प में सौर ऊर्जा सबसे मुख्य आधार स्तंभ है। जब भारत का हर गाँव, खेत और नगर सूरज की रोशनी से जगमगाएगा, तब देश वास्तव में सतत विकास की नई ऊँचाइयों को छुएगा।

निष्कर्ष रूप में यह कहा जा सकता है कि भारत में सौर ऊर्जा का भविष्य अत्यंत उज्ज्वल, समृद्ध और आशाजनक है। यह केवल बिजली पैदा करने का एक साधन नहीं है, बल्कि यह भारत के स्वाभिमान, पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक समृद्धि का एक नया अध्याय है। सूर्य जो अनादि काल से इस धरती पर जीवन का पोषण करता आ रहा है, अब हमारी आधुनिक प्रगति का भी आधार बन रहा है। इस असीम और स्वच्छ ऊर्जा को अपनाकर हम न केवल अपनी वर्तमान ऊर्जा आवश्यकताओं को पूर्ण कर रहे हैं, बल्कि अपनी भावी पीढ़ियों के लिए एक हरियाली से परिपूर्ण, स्वस्थ, सुंदर और आत्मनिर्भर भारत का निर्माण कर रहे हैं।


(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)

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