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जल संसाधनों में उदीयमान प्रदूषक : स्रोत, प्रभाव एवं उपचार

Emerging pollutants in water resources: sources, effects and treatment

उदीयमान प्रदूषकों (emerging pollutants EPs) को इमर्जिंग कन्सर्न (emerging concern) वाले प्रदूषकों के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि इनमें मानव स्वास्थ्य और पारिस्थितिकी तंत्र को हानि पहुँचाने की अपार क्षमता होती है। जैसा कि इसके नाम से ही विदित है कि ये प्रदूषक नये या उभरते हुए हैं परन्तु ऐसा नहीं है, ये प्रदूषक हमारे पर्यावरण में तब से उपस्थित हैं, जबसे इनका प्रयोग हो रहा है। इन्हें उदीयमान प्रदूषक इसलिए कहा जाता क्योंकि पर्यावरण के विभिन्न घटकों में इनकी उपस्थिति, उनके पर्यावरण में संग्रहण तकनीकों व उनका संचय तथा उनके द्वारा संभावित स्वास्थ्य जोखिमों के विषय की जानकारी बहुत सीमित है।

उदीयमान प्रदूषकों के लिए कोई नीति, नियम या सूत्रीकरण स्थापित नहीं किये गये हैं और न ही कोई निर्वहन मानदंड तय किये गए हैं।

इसका एक उदाहरण डी.डी.टी. (Dichloro diphenyl tricholoroethane) हैं जो एक कीटनाशक है। यह मलेरिया व डेंगू के रोकथाम में रामबाण सिद्ध हुआ है तथा इसके उपयोगस्वरूप कृषि उत्पाद में भी सार्थक वृद्धि पाई गई है। इन लाभों के कारण डी.डी.टी. को मानवजाति के लिए एक वरदान माना गया, परन्तु 15 वर्षों के उपयोग के पश्चात ही पर्यावरण पर इसके दुष्परिणाम दृष्टिगोचर होने लगे और इसे उदीयमान प्रदूषकों की श्रेणी में रखा गया क्योंकि इसके दुष्परिणाम के विषय में बहुत सीमित जानकारी उपलब्ध थी। विस्तृत शोध के पश्चात अमेरिकी सरकार ने इसके प्रथम उपयोग के लगभग 30 वर्षों बाद, 1972 में सभी क्षेत्रों में इसके उपयोग को पूर्णतः प्रतिबंधित कर दिया।

विभिन्न अध्ययनों से यह निष्कर्ष निकाला गया है कि डी. डी.टी. की कुछ सांद्रता तो उसके मूल वास्तविक रूप में ही उपस्थित रहती है तथा कुछ मात्रा उसके चयापचयों (Metabolites), डी.डी.डी. (Dichloro diphenyl dichloroethane) तथा डी.डी.ई. (Dichloro diphenyl dichloroethylene), में रूपांतरित हो जाती है। काफी विचार विमर्श के पश्चात 2004 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने डी.डी.टी. व इसके चयापचयों की जल में अनुमेय सीमा 0.001 mg/L निर्धारित की। भारत सरकार ने भी कृषि में डी.डी.टी. के उपयोग को अधिसूचना संख्या 378 (E) दिनांकित 26 मई 1989 के द्वारा प्रतिबंधित कर दिया है। इसके अतिरिक्त, भारत सरकार द्वारा वर्ष 2006 में अधिसूचना संख्या 295 (E) दिनांकित 8 मार्च 2006 के द्वारा घरेलू सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रम के लिए डी.डी.टी. के उपयोग को प्रति वर्ष 10,000 मीट्रिक टन तक सीमित कर दिया गया है। चूँकि वर्तमान समय में डी.डी.टी. के विषय में पर्याप्त जानकारी प्राप्त हो चुकी है, इसलिए इसे अब उदीयमान प्रदूषकों की श्रेणी से हटा दिया गया है।
 

उदीयमान प्रदूषकों के स्रोत

कृषि, औद्योगिक प्रतिष्ठान, अस्पताल व डिस्पेंसरी, घरेलू उत्पाद, व्यक्तिगत देखभाल उत्पाद आदि उदीयमान प्रदूषकों के मुख्य स्रोत हैं।
 

कृषि परिवेश

कृषि गतिविधियों के कारण उदीयमान प्रदूषक कई मार्गों से पर्यावरण में प्रवेश कर सकते हैं। फसलों के उत्पादन में वृद्धि के लिए उर्वरक, खरपतवार नाशक, व कीटनाशकों का प्रयोग आवश्यकता से अधिक मात्रा में किया जाता है, जिसके कारण अप्रयुक्त रसायन धीरे-धीरे जल संसाधनों तक पहुंच जाते हैं। इसी प्रकार, जब गहन पशुधन सुविधाओं से उत्सर्जित खाद और घोल को उर्वरक के रूप में कृषि भूमि पर प्रयोग किया जाता है तो पशुचिकित्सीय दवाएं और उनके मेटाबोलाइट्स मिट्टी और जल संसाधनों में घुल जाते हैं। जर्मनी में किये गए एक अध्ययन में 58 सतही और भूजल नमूनों में 150 कीटनाशक और उनके मेटाबोलाइट्स पाए गए। भारत में भी अलग-अलग सरकारी और गैर-सरकारी संस्थानों द्वारा सतही और भूजल के नमूनों में कीटनाशकों के पाए जाने की जानकारी दी गई है।


 

औद्योगिक प्रतिष्ठान

व्यक्तिगत देखभाल संबंधी उत्पाद, कीटनाशक, फार्मास्यूटिकल्स, सर्फेक्टेंट, परफ्लोरोअल्काइल यौगिक, फ्लेम रिटाडेंट, प्लास्टिसाइजर, एंटीऑक्सिडेंट, क्लोरीनयुक्त सॉल्वेंट्स आदि के निर्माण और पैकेजिंग में शामिल उद्योग यदि अपने उद्योगों से जनित अपशिष्टों का समुचित उपचार नहीं करते हैं, तो उनके अपशिष्ट जल में उपस्थित उदीयमान प्रदूषक जल संसाधनों तक पहुंच जाते हैं और उसे प्रदूषित करते हैं।
 

अस्पताल व डिस्पेंसरी

अस्वस्थ नागरिकों के स्वास्थ्य को बेहतर करने में अस्पतालों का श्रेष्ठ योगदान होता है, लेकिन बहुत से अस्पतालों की गतिविधियाँ अक्सर विविध अकार्बनिक, कार्बनिक, और माइक्रोबियल घटकों के उत्पादन के लिए भी उत्तरदायी होती हैं। अस्पताल के अपशिष्ट जल में दवाइयाँ और मेटाबोलाइज्ड फार्मास्यूटिकल्स यौगिक (सूजनरोधी, मधुमेहरोधी, मिर्गीरोधी, परफ्लुओरिनेटेड यौगिक, एनाल्जेसिक, अंतःस्रावी, एंटीबायोटिक्स, हार्मोन), रेडियोधर्मी तत्व, भारी धातुएं, और सूक्ष्मजीव (फीकल कोलीफॉर्म, कुल कोलीफॉर्म, ई. कोली, स्टैफिलोकोकस, साल्मोनेला, स्यूडोमोनास एरुगिनोसा इत्यादि) उपस्थित होते हैं। फार्मास्युटिकल सक्रिय हाइड्रोकार्बन को छद्म-स्थायी प्रदूषक माना जाता है जो लगातार बहुत कम सांद्रता में पर्यावरण में प्रवेश करते हैं और जलीय प्रणाली में लगभग 160 से अधिक विभिन्न फार्मास्यूटिकल्स, नैनोग्राम प्रति लीटर से माइक्रोग्राम प्रति लीटर तक, रिपोर्ट किये गए हैं। सक्रिय फार्मास्युटिकल अवयव और उनके बायोट्रांसफॉर्मेशन उत्पाद जैव संचय कर रहे हैं जिससे बैक्टीरिया में एंटीबायोटिक प्रतिरोध जीन का विकास हो रहा है और इससे पारिस्थितिकी तंत्र पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा हैं।
 

आवासीय परिसर

व्यक्तिगत देखभाल संबंधी उत्पाद (Personal Care Products), स्वास्थ्य, सौंदर्य, और सफाई उद्देश्यों के लिए उपयोग किए जाते हैं, जैसेः कपड़े धोने के डिटर्जेंट, सर्फेक्टेंट, खाद्य योजक व परिरक्षक, माइक्रोप्लास्टिक्स, कीटाणुनाशक, कीट विकर्षक, संरक्षक, दवाइयाँ, इंजीनियर्ड हार्मोन, स्टेरॉयड इत्र, शैंपू, और यूवी फिल्टर आदि घरों से निकलने वाले अपशिष्ट जल में उपस्थित होते है। इनमें मुख्य रसायन पेरासिटामोल paracetamol), बेन्जोफेनोंन (Benzophenone), सिप्रोफ्लाक्सिन (Ciproflaxin), एसीटामिनोफेन (Acetaminophen), पैराक्सैन्थिन (Paraxanthine), नेप्रोक्सन (Naproxen), सल्फापिरीडीन (Sulphapyridine), बेंजोफेनोन-3 (Benzophen one-3), गैलेक्सोलाइड (Galaxolide), 1,4-डाइऑक्सेन (1,4-dioxane), प्रोपाइल पैराबेन (Propyl paraben), बिस्फेनॉल, (Bisphenol A), बीस-(2- इथाइलहेक्साइल), थैलेट (Bis-(2-Ethylhexyl) phthalate), डिब्यूटाइल थैलेट (Dibutyl phthalate), निकोटीन (Nicotine), बेंजोट्रायजोल, मिथाइल-1 एच (Benzotriazole methyl-1H), 17a-एथिनिल एस्ट्राडियोल (17a-ethinyl estradiol), एस्ट्रोन (Estrone), एस्ट्रिऑल (Estriol), ट्रिस (2-क्लोरोइसोप्रोपाइल) फॉस्फेट (Tris2-chloroisopropyl) phosphate), ट्रिस (2-ब्यूटॉक्सी एथिल) फॉस्फेट (Tris (2-butoxy ethyl) phosphate), ट्रिस (2-क्लोरोइथाइल) फॉस्फेट (Tris (2 chloroethyl) phosphate) आदि शामिल हैं।

उदीयमान प्रदूषक हमारे पर्यावरण के जैविक तथा अजैविक दोनों ही घटकों को प्रभावित करते हैं। विभिन्न स्त्रोतों से उत्सर्जित उदीयमान प्रदूषक वायु, मृदा और सतही जल में प्रवेश करते हैं, तथा निक्षालन प्रक्रिया के द्वारा ये भूजल को भी दूषित करते हैं। मृदा और जल के द्वारा ये मनुष्यों व जीव-जन्तुओं में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से प्रवेश करते हैं।

उदीयमान प्रदूषक मनुष्यों व जीव जन्तुओं में अंतःस्रावी तंत्र को प्रभावित करते हैं तथा साथ ही ये एंटीबायोटिक प्रतिरोधक क्षमता भी कम कर देते हैं। लिंग संबंधी असमानतायें व विषम लिंगानुपात जैसी समस्याएं भी उदीयमान प्रदूषकों के कारण होती हैं। अध्ययनों में यह भी पाया गया है कि प्राकृतिक हार्मोन का अनुकरण करने वाली बहुत सी दवाओं में रसायनों के मिश्रण जल संसाधनों में पाए गए हैं जो इंटरसेक्स मछलियों के उद्भव के लिए उत्तरदायी हैं।

फार्मास्युटिकल-दूषित जल के सेवन से महिलाओं में अंडे और पुरुषों में शुक्राणु कम हो सकते हैं।

उदीयमान प्रदूषकों को मृदा में बैक्टीरिया की आबादी को कम करने और उनमे एंटीबायोटिक प्रतिरोधक क्षमता की वृद्धि के लिए उत्तरदायी पाया गया है। इनकी उपस्थिति के कारण मृदा में कार्बनिक पदार्थों के अपघटन की दर में भी कमी पायी गयी है। शिकारी पक्षियों, जैसे गिद्धों के पास मानव आबादी में मौजूद विषहरण एंजाइम नहीं होते हैं, जिसके कारण वे पर्यावरण में फार्मास्यूटिकल्स के प्रभावों के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं, जिसके परिणामस्वरूप उनकी आबादी में गिरावट आती है।

एशिया में गिद्धों की तीन प्रजातियों की आबादी में गिरावट के लिए गैर-स्टेरायडल सूजन-रोधी दवा डाइक्लोफेनाक को पशु चिकित्सा में उपयोग हेतु उत्तरदायी पाया गया है। चूंकि गिद्ध एक मूल तत्व प्रजाति है, इसलिए उनकी आबादी में गिरावट के पारिस्थितिक, सामाजिक-आर्थिक- सांस्कृतिक और मानव स्वास्थ्य पर कई तरह के प्रभाव पड़ते हैं।
 

उदीयमान प्रदूषकों के उपचार के लिए विभिन्न तकनीकें

पर्यावरण में उदीयमान प्रदूषकों की पुनः स्थापना को नियंत्रित करने के लिए स्रोत नियंत्रण सबसे कम लागत की प्रभावी तकनीकों में से एक है, हालांकि पर्यावरण में उनका स्राव अपरिहार्य है, और इसलिए इन यौगिकों की पर्यावरण में सांद्रता को कम करने के लिए उपचार विधियों पर निरंतर शोध जारी है।

रासायनिक और जैविक उपचार प्रक्रियाओं पर आधारित पारंपरिक व आधुनिक तकनीकों के माध्यम से बहुत से उदीयमान प्रदूषकों का निवारण किया गया है जैसे कि फेंटन अभिकर्मक, सक्रिय कार्बन, ओजोन व पराबैंगनी विकिरण, सक्रिय स्लज प्रक्रिया, अपशिष्ट स्थिरीकरण तालाब, आर्द्रभूमि, निस्पंदन, आदि।
 

फेंटन अभिकर्मक (Fenton's Reagent)

मुख्यतः फेंटन अभिकर्मक, फेरस सल्फेट (FeSO.) तथा हाइड्रोजन परोक्साइड (H.O.) का मिश्रण होता है। हाइड्रोजन परोक्साइड के साथ फेरस और फेरिक आयनों के बीच अभिक्रिया से हाइड्रॉक्सिल और हाइड्रोपेरॉक्सिल रेडिकल तथा हाइड्रॉक्सिल आयन बनते हैं। इस अभिकर्मक में, फेरस आयन उत्प्रेरक के रूप में कार्य करता है और फ्री रेडिकल के निर्माण को बढ़ावा देता है। फ्री रेडिकल में उपस्थित अयुग्मित इलैक्ट्रॉन के कारण इनकी स्थिरता बहुत कम होती है और ये बहुत ही प्रतिक्रियाशील होते हैं। अत्यधिक प्रतिक्रियाशील होने के कारण भी जटिल व बड़े यौगिक के साथ अभिक्रिया करते हैं और उन्हें ये सरल व छोटे-छोटे अणुओं में विघटित कर देते हैं। अध्ययनों में यह दर्शाया गया है कि DEET (N.N diethyl-meta- tolumide), कैफीन (Caffeine), कार्बमेजपाइन (Carbamazepine), ट्राईक्लोसेन (Triclosan) आदि का उपचार फेंटन अभिकर्मक के द्वारा सफलतापूर्वक हुआ है और इनमें लगभग 70%-100% निष्कासन क्षमता पाई गयी है। क्योंकि फेरस सल्फेट की घुलनशीलता जल में बहुत ही अधिक है, इसलिए रिएक्टर में फेरस आयनों की सांद्रता बनाए रखने के लिए हमें लगातार फेरस युक्त नमक मिलाना पड़ता है, जिसके कारण यह एक महंगी उपचार तकनीक मानी जाती है।
 

सक्रिय कार्बन (Activated carbon)

सक्रिय कार्बन का उपयोग नगर निगम के पेयजल, खाद्य और पेय प्रसंस्करण, गंध दूर करने, औद्योगिक प्रदूषण नियंत्रण सहित विभिन्न अनुप्रयोगों में तरल पदार्थ और गैसों को शुद्ध करने के लिए किया जाता है। कार्बनयुक्त स्रोत सामग्री, जिनमें कार्बन का प्रतिशत ज्यादा होता है, जैसे नारियल, कोयला और लकड़ी आदि से सक्रिय कार्बन का उत्पादन किया जाता है। सक्रिय कार्बन में माइक्रोपोर होते हैं, जिनके कारण इनका सतही क्षेत्र अधिक होता है, ये माइक्रोपोर कार्बनिक अणुओं को अवशोषित और अधिशोषित करने का कार्य करते हैं।

सक्रिय कार्बन ग्रेफाइट प्लेट (activated carbon graphite plates) अपने तटस्थ कार्बनिक अणुओं को इंट्रा-आणविक द्विध्रुवों में रूपांतरित करने के लिए प्रेरित करती हैं, और प्रेरित द्विध्रुव अणु एक-दूसरे के प्रति आकर्षित होते हैं और एक साथ चिपकते जाते हैं और इस प्रकार वे विलयन से अवक्षेपित हो जाते हैं। सक्रिय कार्बन तकनीक के द्वारा सैलिसिलिक एसिड (Salicylic Acid), इबुप्रोफेन (Ibuprofen), बेंजोफीनोन (Benzophenone)) क्लोफाइब्रिक एसिड (Clofibric Acid), डिक्लोफेनेक (Diclofenac), गैलिक एसिड (Gallic Acid) का उपचार किया गया है, और यह पाया गया है कि इसकी दक्षता अन्य तकनीकों से बेहतर है। उदीयमान प्रदूषकों के उपचार हेतु सक्रिय कार्बन की निष्कासन क्षमता बहुत कुछ सक्रिय कार्बन की स्रोत सामग्री और उदीयमान प्रदूषकों के प्रकार पर निर्भर करती है। सक्रिय कार्बन के द्वारा उदीयमान प्रदूषकों की निष्कासन क्षमता 30% से 100% तक पाई गयी है।
 

जैविक प्रक्रियाएं (एरोबिक और एनारोबिक)

सक्रिय स्लज प्रक्रिया (activated Sludge Process) वर्तमान में सबसे व्यापक रूप से उपयोग की जाने वाली एरोबिक जैविक अपशिष्ट जल उपचार प्रक्रिया है। सक्रिय स्लज प्रक्रिया में वात्तन टैंक में निलंबन या संलग्न वृद्धि में सूक्ष्मजीवों (मूल रूप से वैक्टीरिया, प्रोटोजोआ और कवक) की उच्च सांद्रता बनाए रखी जाती हैं, जिसकी सहायता से अपशिष्ट जल में उपस्थित कार्बनिक पदार्थ ऑक्सीकृत होकर अकार्बनिक रूपों में परिवर्तित हो जाते हैं।

अवायवीय (एनारोविक) अपशिष्ट जल उपचार एक जैविक प्रक्रिया है जो ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में सूक्ष्मजीवों का उपयोग करके अपशिष्ट जल में मौजूद कार्बनिक प्रदूषकों को बायोगैस (मीथेन और कार्बन डाइऑक्साइड के मिश्रण) में परिवर्तित करती है। प्रकाशित साहित्य उदीयमान प्रदूषकों को दूर करने के लिए जैविक प्रक्रियाओं के प्रदर्शन में व्यापक विविधता का संकेत देता है। विशिष्ट यौगिक और उपचार की स्थितियों के आधार पर जैविक प्रक्रियाओं की निष्कासन दक्षता बिना निष्कासन से लेकर लगभग पूर्ण निष्कासन तक पायी गयी है।

उदीयमान प्रदूषकों को दूर करने के लिए एरोबिक और एनारोविक प्रक्रियाओं का मिश्रण एक श्रेष्ठ विकल्प हो सकता है। संयुक्त प्रभाव के उपयोग 70% से अधिक की निष्कासन क्षमता पाई गई है।
 

निर्मित कृत्रिम आर्द्रभूमि (Constructed Wetland)

साधारण शब्दों में आर्द्रभूमि वह स्थान है जहां धरती और जल परस्पर समाहित होते हैं। प्राकृतिक आर्द्रभूमि के विपरीत, मानव निर्मित आर्द्रभूमि को कृत्रिम आर्द्रभूमि कहा जाता है क्योंकि यह मनुष्य द्वारा उसकी आवश्यकता के अनुरूप विकसित की जाती है। अन्य शब्दों में यह भी कहा जा सकता है कि जल को साफ करने के लिए जलीय वनस्पति तथा सूक्ष्मजीवों के संयुक्त प्रयोग की तकनीक को निर्मित आर्द्रभूमि कहा जाता है।

सौंदर्य, संचालन की लागत और उपचार-क्षमता की दृष्टि से उदीयमान प्रदूषकों के उपचार के लिए निर्मित आर्द्रभूमि और अन्य प्राकृतिक उपचार प्रणालियाँ महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकियाँ हैं। करीब 70% तक सिप्रोफ्लोक्सासिन एचसीएल (Ciprofloxacin HCI), ऑक्सीटेट्रासाइक्लिन एचसीएल (Oxytetracycline HCI), नाडोलोल (Nadolol) कोटिनीन (Cotinine) आदि का निवारण निर्मित आर्द्रभूमि द्वारा सफलतापूर्वक किया जा सकता है।

शोधकर्ताओं ने पाया है कि निर्मित आर्द्रभूमि में उदीयमान प्रदूषकों को दूर करने की क्षमता पारंपरिक अपशिष्ट जल उपचार संयंत्रों के समान या उनसे बेहतर है। अतः निर्मित आर्द्रभूमि को अपशिष्ट जल से उदीयमान प्रदूषकों को दूर करने के लिए एक प्रभावी विकल्प के रूप में उपयोग में लाया जा सकता है।
 

अपशिष्ट स्थिरीकरण तालाब (Waste stabilization ponds)

अपशिष्ट जल स्थिरीकरण तालाब बड़े तथा मानव निर्मित जल निकाय हैं जिनमें सौर प्रकाश, वायु, सूक्ष्मजीवों और शैवाल के प्रभाव से प्रदूषित जल का प्राकृतिक रूप से उपचार किया जाता है। ये तालाब तीन प्रकार (अवायवीय, वैकल्पिक, और एरोबिक) के होते हैं। अलग-अलग उपचार के लिए अलग-अलग विशेषताओं वाले अभिकल्प की आवश्यकता होती है।

प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया के दौरान शैवाल द्वारा छोड़ी गई ऑक्सीजन एरोबिक बैक्टीरिया द्वारा उपयोग कर ली जाती है। ज्यादा ऑक्सीजन की आवश्यकता की पूर्ति के लिए कभी-कभी यांत्रिक एयरेटर भी लगाए जाते हैं। शोध में यह भी पाया गया है कि अपशिष्ट स्थिरीकरण तालाब प्रौद्योगिकी, 80% से अधिक की समग्र निष्कासन दक्षता प्राप्त कर सकती है। इस तकनीक द्वारा प्राप्त की गई उच्च निष्कासन दक्षता को विभिन्न निष्कासन प्रक्रियाओं, जैसे कि बायोडिग्रेडेशन, सोर्शन और फोटोडिग्रेडेशन, के संयोजन के साथ-साथ प्रौद्योगिकी के उच्च द्रवीय अवधारण समय जो लगभग 20-30 दिन है, के संयोजन से स्पष्ट किया जा सकता है।

निष्कर्ष : वर्तमान में उदीयमान प्रदूषकों की दुनियाभर में लगातार मौजूदगी रिपोर्ट की जा रही है और यह चिंता का विषय बनी हुई है। इनमें मानवजनित जहरीले यौगिक जैसे दवाइयाँ और व्यक्तिगत देखभाल के उत्पाद, हार्मोन, खाद्य योजक व परिरक्षक, कीटनाशक, प्लास्टिसाइजर, कपड़े धोने के डिटर्जेंट, सर्फेक्टेंट, ट्रेसतत्व (trace metal), सूक्ष्म जीव आदि सम्मिलित हैं। उदीयमान प्रदूषकों की जल संसाधनों में उपस्थिति उनके पर्यावरण में संग्रहण की तकनीकों पर उनके संचय तथा उनके द्वारा संभावित स्वास्थ्य जोखिमों के विषय में ज्ञान व जानकारी बहुत सीमित है।

वर्तमान में नगरपालिका और औद्योगिक अपशिष्ट जल उपचार संयंत्रों को उदीयमान प्रदूषकों के उपचार के लिए अभिकल्पित नहीं किया गया है जिस कारण से वे जल संसाधनों में पहुंच जाते हैं। अतः जल संसाधनों में इनकी उपस्थिति को कम करने के लिए अपशिष्ट जल उपचार संयंत्रों के पश्चात पोलिशिंग संयंत्रों को स्थापित किये जाने की आवश्यकता है। इसके अतिरिक्त, जल संसाधनों में उभरते प्रदूषकों और उनके चयापचयों की व्यापकता और पर्यावरण तथा मानव स्वास्थ्य पर उनके नकारात्मक प्रभाव की व्यापक निगरानी करने की आवश्यकता है।

 

 

 

kesar@indiawaterportal.org

(https://hindi.indiawaterportal.org/pollution-and-water-quality/emerging-pollutants-in-water-resources-sources-effects-and-treatment-part-1)

(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)

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