वर्ष 2023 के अंतिम महीनों में पाँच राज्यों के हुए चुनाव के परिणाम घोषित हो गए मुख्य तौर पर मुकाबला कांग्रेस और भाजपा में ही था जिसमंे मध्यप्रदेश में 230 सीटों में भाजपा 163, कांग्रेस 66 और अन्य के खाते में 1 सीट आई राजस्थान में 199 सीटों में से भाजपा 115, कांग्रेस 69, बसपा 2, और अन्य 13 रहा तेलंगाना 119 सीटों में कांग्रेस 64, बीआरएस. 39, भाजपा 08, एआईएमआईएम 07, और अन्य 01 पर रहें छत्तीसगढ़ के 90 सीटों में भाजपा 54, कांग्रेस 35, जनता कांग्रेस 0, अन्य 01 पर जीत दर्ज़ करा। मिजोरम के 40 सीटों में से जेडपीएम. 27, एमएनएफ. 10, भाजपा 02, कांग्रेस 01 सीट जीतने में क़ामयाब रही।
इस वर्ष के अंतिम महीनों में हुए पाँच राज्यों के चुनाव में भाजपा ने तीन राज्यों में अपने दम पर सरकार बना कर एक संदेश जरूर दे दिया है कि भले ही विपक्ष लाख़ चाहे महंगाई, बेरोजगारी, और तुष्टीकरण का आरोप लगाए लेकिन भारत की जनता उसमे में भी उत्तर भारत की जनता अभी भी भाजपा को अपनी पसंद मानती है।
भाजपा के पसंद करने के पीछे कई कारण हो सकते है लेकिन मुख्य रूप से भाजपा का हिंदुत्व के प्रति समर्पण और त्याग जग जाहिर है कुछ राजनैतिक पंडित तो कह रहें थे कि भाजपा का मध्यप्रदेश से सफाया हो सकता है लेकिन मध्यप्रदेश में भाजपा ने अनुमान से परे 230 में से 163 जीतकर प्रचंड बहुमत से वापस आई है।
राजस्थान में भाजपा ने बिना किसी चेहरे के चुनाव लड़ा और वही कांग्रेस के पास विख्यात नेतृत्व रहा जिसमे अशोक गहलोत और सचिन पायलट थे परन्तु ये कहा जा सकता है कि कहीं न कहीं कांग्रेस की हार की वजह उनकी एंटी हिंदू छवि रही जिसमे कन्हैया लाल की हत्या भी अपने रोष पर रही, और भा.ज.पा 199 में से 115 सीट जीतने में क़ामयाब रही ।
छत्तीसगढ़ में कमोवेश ये स्थिति थी कि कांग्रेस पुनः सत्ता में वापसी कर सकती है लेकिन वहाँ कांग्रेस के तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल पर लगे भ्रष्टाचार के आरोप जिसमे ईडी की तरफ से उस मामले की जांच की जा रही है, कांग्रेस की हार का फैक्टर कही न कही ये भी रहा
तेलंगाना में उस पार्टी को हार का सामना करना पड़ा जिसके मुखिया कुछ दिन पहले तक प्रधानमंत्री बनने का सपना देख रहे थे, वहीं कांग्रेस ने तेलंगाना में 119 में से 64 सीट जीत कर कांग्रेस ने पांच राज्यों में से एक राज्य में सत्ता हासिल करने में क़ामयाब रही।
मिजोरम में जेडपीएम ने 40 सीटों में से 27 जीतकर सत्तारूढ़ पार्टी एमएनएफ को सत्ता से हटाकर 10 सीटों पर ला दिया।
पाँच राज्यों में से तीन राज्यों में भाजपा ने उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन किया है, जिसमे मध्यप्रदेश राज्य को छोड़कर राजस्थान और छत्तीसगढ़ में पाँच साल के अंतराल के पश्चात सत्ता में वापस लौटी है।
भाजपा के तीन राज्यों में जीत के पीछे किसका हाथ ?
भाजपा के उत्तर भारत या हिंदी पट्टी राज्य में इस प्रचंड जीत के पीछे प्रधानमंत्री मोदी को माना जा रहा है अतः इसमे कोई दो मत है भी नही लेकिन पूर्णतः जीत का श्रेय एक व्यक्ति को दे देना राजनीति में उचित नही होता क्योंकि युद्ध मे जितना घाव राजा सहता है उससे कई अधिक उसकी सेना को सहना पड़ता है।
भाजपा की जीत और हार के पीछे हमेशा से ही एक बहुत बड़ा फैक्टर काम करता है वह है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ क्योंकि संघ भाजपा के आम कार्यकर्ता से कई अधिक ज़मीन स्तर का कार्य करता है संघ हमेशा से ही अपने आपको मुख्य तौर न जीत का श्रेय और ना ही हार का श्रेय लेते हुए दिखा है और कदाचित भविष्य में दिखे भी ना, इसलिए एक विषय अन्य पार्टियों के लिए मंथन का विषय होना चाहिए कि संघ जैसी कार्यशैली को कैसे समझा जाए और उसको अपनाया जाए, परन्तु उनके लिए यथार्थ यह संभव न हो कारण संघ अपनी पूरी निष्ठा के साथ देश सेवा में लगा है और संघ उसके साथ हमेशा से खड़ा हुआ मिलता है जो राष्ट्र को जोड़ने की बात करता हो, जो राम के अस्तित्व को स्वीकारता हो, जो भारत की परम्परा में अपना अटूट विश्वास रखता हो। इसलिए कही न कही भाजपा के कुछ विचार संघ से मिलते हैं तो उनको वो समर्थन जाता है, बाकी पार्टियों कि राजनीति ही भारत को तोड़ने, और राम के अस्तित्व को नकारने से प्रारम्भ होती है, कही न कही इसलिए संघ उनका खुलकर विरोध भी करता है वो भी तर्क के साथ।
अब भाजपा की तीन राज्यों में सरकार बनी है तो इसका लाभ भी भाजपा को आगामी वर्ष के आम चुनावों में देखने को मिल सकता है, जहाँ एक और भाजपा के खेमे को ये ज्ञात है कि यह चुनाव परिणाम उनके लिए दूर की कौड़ी साबित होती अगर इन चुनावों में संघ की अप्रत्यक्ष रूप से भागीदारी न होती कही न कही भाजपा के कार्यकर्ता को अपने आप में मजबूत होने की आवश्यकता है जो कि नही दिखा है अब चाहे चुनाव परिणाम उनके पक्ष में ही क्यों न हो।
पाँच राज्यों के चुनाव परिणामों का विश्लेषण करते हुए, सामान्यत: यह दिख रहा है कि लोगों ने अपने वोटों के माध्यम से अच्छी शासन प्रणाली की प्रतीक्षा की है। श्रेष्ठ प्रबंधन ने चुनावी प्रक्रिया में निष्कलंकता और सामाजिक न्याय के मामले में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
यह चुनाव साफ रूप से बता रहा है कि अच्छे गवर्नेंस की मांग लोगों के मन में कैसे बढ़ रही है। सुशासन के तत्वों में समाहित जिम्मेदार और ईमानदार नेतृत्व के माध्यम से, विभिन्न राज्यों ने जन-संबंध, शिक्षा, स्वास्थ्य, और अन्य क्षेत्रों में सुधार की दिशा में कदम बढ़ाया है।
इस चुनाव में जनता ने न केवल राजनीतिक दलों को चुना, बल्कि उन्होंने विकास और प्रगति की दिशा में सकारात्मक संकेत दिया है। राज्य सरकारें शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र में नई योजनाओं के माध्यम से जनता के आत्मविश्वास को बढ़ाने का कार्य कर रही हैं, जिससे नौजवानों को नए रोजगार के अवसर मिल रहे हैं।
चुनाव परिणामों का अध्ययन करते समय यह सामान्य दिख रहा है कि विभिन्न राज्यों में लोगों ने विकास के प्रति उम्मीद और आकुलता को मध्यस्थ बनाया है। यह साबित करता है कि एक सशक्त और सुशासित सरकार की मांग में एक सामान्य चुनाव कैसे अहम भूमिका निभा सकता है।
अच्छे गवर्नेंस की भूमिका ने इस चुनाव को एक उदाहरण स्थापित करते हुए दिखाया है कि जनता किसी भी समय में उच्चतम शासन मानकों की प्रतीक्षा कर रही है और वह उन्हें अपने नेतृत्व में देखना चाहती है।
समाप्त करते समय, यह कह सकते हैं कि चुनाव परिणाम न सिर्फ राजनीतिक स्थिति को बदल रहे हैं, बल्कि ये एक सशक्त और सुशासित समाज की दिशा में भी कदम बढ़ा रहे हैं। लोगों की आशाएं और मांगें बदल रही हैं, और वे एक सशक्त और सशक्त भविष्य की दिशा में अग्रसर हो रहे हैं।
निशांत मिश्रा
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)
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