उत्तर प्रदेश के इतिहास में 19 मार्च 2017 की तारीख को किस रूप में याद किया जाना चाहिए, यह सवाल इन दिनों मौजूं हो गया है। प्लेटो ने अपने ग्रंथ में दार्शनिक राजा की कल्पना की है। उत्तर प्रदेश की सत्ता में इस तारीख को दार्शनिक तो नहीं कह सकते, लेकिन एक संत ने सत्ता संभाली थी। महज 44 साल के योगी आदित्यनाथ ने जब बीजेपी विधानमंडल दल के नेता के तौर पर सत्ता संभाली तो शायद ही किसी को उम्मीद थी कि वे अपना कार्यकाल पूरा कर पाएंगे। बीजेपी की अतीत की सरकारों में जिस तरह की उठापटक रही, उससे इस आशंका को बल मिलना स्वाभाविक था। लेकिन घुटे हुए सिर और भगवा वस्त्रधारी इस संत राजनेता ने ना सिर्फ आठ साल का कार्यकाल पूरा कर लिया है, बल्कि इस दौरान बदलाव का वाहक भी बना है।
राम, कृष्ण, तुलसी, कबीर, सूर की धरती उत्तर प्रदेश का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि यहां जाति आधारित राजनीति का बोलबाला रहा है। एक दौर में तो यहां जातीय और धार्मिक उन्माद राजनीति पर इतने भारी रहे कि राज्य की कानून-व्यवस्था कुछ जातीय समूहों की जागीर बनकर रह गई थी। इस पृष्ठभूमि में अगर देखें तो योगी आदित्यनाथ की सरकार बेहद अलग नजर आती है। अब उत्तर प्रदेश की कानून-व्यवस्था को जातीय और धार्मिक समूहों की जागीर मानना अतीत की बात हो चुकी है। योगी आदित्यनाथ के शासन काल में ही अयोध्या में चिर प्रतीक्षित राम मंदिर बना, उनके ही शासन काल में दुनिया की सबसे प्राचीन मानी जाने वाली नगरी काशी का कायाकल्प हुआ, उनके ही शासन काल में पहली बार उत्तर प्रदेश के अति पिछड़े पूर्वी उत्तर प्रदेश पर शासन का ध्यान गया।
एक दौर में उत्तर प्रदेश में माफिया का बोलबाला था। माफिया को शासन का सहयोग मिलता था या यूं कहें कि माफिया ही शासन चलाते थे। माफिया के सामने पुलिस नतमस्तक नजर आती थी। लेकिन अब माफिया पुलिस से दूर भागते हैं। यह इसलिए संभव हुआ, क्योंकि उत्तर प्रदेश के संत राजनेता मुख्यमंत्री ने विधानसभा में ही कह दिया कि माफिया को वे मिट्टी में मिला देंगे।
1980 के दशक के मध्य में अर्थशास्त्री आशीष बोस ने बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश को बीमारू राज्य की संज्ञा दी थी। दरअसल उन दिनों भारतीय विकास की दौड़ में ये चारों राज्य फिसड्डी थे और भारतीय विकास के पहिए को एक तरह से कीचड़ में फंसा रहे थे। तब से बीमारू शब्द एक तरह से उत्तर प्रदेश पर चिपक गया था। लेकिन योगी राज्य में अब उत्तर प्रदेश बीमारू राज्य नहीं रहा। वह एक ट्रिलियन यानी एक खरब की अर्थव्यवस्था बनने की ओर आगे बढ़ रहा है। आज भारतीय राज्यों में सूबे की अर्थव्यवस्था दूसरे नंबर पर आती है। कभी आर्थिक मोर्चे पर लगातार पिछड़ा रहा उत्तर प्रदेश आज राजस्व के मामले में सरप्लस राज्य हो गया। ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि राज्य की कानून व्यवस्था सुधारी गई। कानून-व्यवस्था सुधरने से कारोबारी जगत का ध्यान उत्तर प्रदेश की ओर गया और निवेश बढ़ा। इसका असर दोहरा हुआ। उत्तर प्रदेश के लोगों को जहां रोजगार मिलना शुरू हुआ, वहीं राजस्व के जरिए राज्य का खजाना भरने लगा। उत्तर प्रदेश सरकार के आंकड़ों के अनुसार राज्य में साल 2016 में बेरोजगारी दर जहां 18 प्रतिशत थी, वहीं यह अब घटकर तीन प्रतिशत रह गई है। इस दौरान 8.5 लाख से ज्यादा युवाओं और करीब 1.38 लाख महिलाओं को सरकारी नौकरी दी गई। कभी उत्तर प्रदेश के कर्मचारियों और अध्यापकों को वेतन समय पर मिलना बड़ी बात होती थी, अब राज्य में ऐसा नहीं है।
योगी राज में उत्तर प्रदेश में तीन नई चीनी मिलों की स्थापना हुई, जबकि बंद पड़ी छह चीनी मिलों को फिर से चालू कराया गया। इसके साथ ही 38 मिलों का विस्तार हुआ। उत्तर प्रदेश में इन दिनों 122 चीनी मिलें काम कर रही हैं। इनके जरिए राज्य के गन्ना किसानों को जहां वाजिब मूल्य मिल रहा है, वहीं राज्य को राजस्व का भी फायदा हो रहा है। उत्तर प्रदेश कृषि प्रधान राज्य रहा है। गंगा, घाघरा, यमुना, राप्ती, गोमती आदि नदियों की लाई उत्तर प्रदेश की माटी खेती-किसानी के लिए बेहद मुफीद रही है। लेकिन एक दौर में यहां किसानी की स्थिति खराब हो गई थी। लेकिन योगी सरकार का दावा है कि उसके राज में खेती-किसानी भी लगातार विकास कर रही है। राज्य सरकार के आंकड़ों के अनुसार, साल 2016-17 तक सूबे में कृषि की विकास की दर जहां पांच प्रतिशत के आस-पास थी, वहीं आज कृषि विकास की दर 13.5 प्रतिशत से ज्यादा हो गई है। राज्य में बाढ़ एक स्थायी आपदा रही है। लेकिन योगी सरकार का दावा है कि उसने अब इस आपदा पर काबू पाने की दिशा में बड़ी कामयाबी हासिल की है और करीब 32 लाख हेक्टेयर से ज्यादा भूमि बाढ़ से बचाई गई है। उत्तर प्रदेश अपने विशिष्ट हस्तशिल्प और उत्पाद के लिए भी मशहूर रहा है। इसे बढ़ावा देने के लिए योगी सरकार ने ‘एक जिला-एक उत्पाद’ की नीति लागू की। जिससे जहां पर्यटकों को उत्तर प्रदेश के उत्पादों से परिचय मिल रहा है, वहीं शिल्पकारों और किसानों की आय बढ़ी है। उत्तर प्रदेश में इसी तरह निराश्रित गोवंश के लिए 7700 से अधिक गो-आश्रय स्थल बनाए गए हैं, जबकि डेढ़ लाख से ज्यादा किसानों को करीब 1.63 लाख से ज्यादा गोवंश सरकार की ओर से दिए गए। इसी तरह पशुपालकों को प्रति गोवंश 1500 रुपए दिए जा रहे हैं।
कानून-व्यवस्था सुधरने और धार्मिक पर्यटन स्थलों के विकास, राज्य में एक्सप्रेस वे के विकास आदि के चलते अब उत्तर प्रदेश भी पर्यटकों को पसंद बनता जा रहा है। साल 2024 में राज्य में करीब 64.90 करोड़ पर्यटक आए, जबकि साल 2023 में 48 करोड़ सैलानियों को राज्य ने रिझाया। इस लिहाज से देखें तो सिर्फ एक साल में ही सैलानियों की संख्या में 17 करोड़ का इजाफा हुआ। उत्तर प्रदेश इन दिनों विदेशी पर्यटकों की भी पसंद बन कर उभरा है। साल 2024 में जहां 22,69,067 विदेशी पर्यटक राज्य में आए, वहीं एक साल पहले उनकी आमद करीब 16,01,503 रही। इस तरह कह सकते हैं कि सिर्फ एक साल में विदेशी पर्यटकों की आवक में भी सात लाख का इजाफा हुआ। सबसे ज्यादा पर्यटक अयोध्या आ रहे हैं, दूसरे नंबर काशी का है। अयोध्या में राममंदिर बनने का असर ही है कि स्थानीय और विदेशी-दोनों तरह के पर्यटक आ रहे हैं। अयोध्या की अकेले बात करें तो साल 2024 में जहां 16.44 करोड़ सैलानी आए तो वहीं इसके एक साल पहले यहां 5.75 करोड़ पर्यटक आए। रामलला का ही असर कहेंगे कि राम नगरी में आने वाले सैलानियों की संख्या में सिर्फ एक साल में 10.68 करोड़ का इजाफा हुआ। इस बार का प्रयाग महाकुंभ तो जनसैलाब का गवाह बन गया। इस साल रिकॉर्ड 66 करोड़ श्रद्धालु प्रयाग आए। राज्य और केंद्र सरकार ने मिलकर प्रयाग महाकुंभ पर करीब सात हजार करोड़ रूपए खर्च किए। राज्य सरकार का दावा है कि इससे राज्य के जीडीपी में इक्कीस हजार करोड़ की बढ़ोत्तरी हुई। इसका असर यह रहा कि राज्य के दूसरे धार्मिक स्थलों पर भी भारी भीड़ रही। शायद इन सब उपायों का ही असर कहेंगे कि आज उत्तर प्रदेश प्रदेश की जीडीपी में 28 फीसद की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
योगी सरकार का दावा है कि उसके शासन काल में राज्य की स्वास्थ्य सेवा में भी बेहतरी दर्ज की गई है। राज्य सरकार के आंकड़ों के अनुसार सा 2017 तक उत्तर प्रदेश में सिर्फ 12 मेडिकल कॉलेज ही थे। लेकिन आठ सालों के योगी शासन में राज्य में 80 मेडिकल कॉलेज बने हैं, जिनमें 44 सरकारी और 36 निजी मेडिकल कॉलेज हैं।
योगी राज में उत्तर प्रदेश की सुरक्षा व्यवस्था में जबरदस्त सुधार हुआ है। इसकी वजह यह है कि राज्य के पुलिस बल को मजबूत बनाया गया। राज्य के अर्धसैनिक बल पीएसी की 54 कंपनियों को जहां पुनर्जीवित किया गया, वहीं इसकी अलग से दो महिला कंपनियां भी बनाई गईं। जिसमें राज्य की लड़कियों को रोजगार भी मिला और सुरक्षा के लिए आत्मविश्वास भी। सुरक्षा और सर्विलांस को ध्यान में रखते हुए पूरे राज्य में जहां 11 लाख सीसीटीवी कैमरे लगाए गए, वहीं करीब 2.16 लाख से ज्यादा पुलिसकर्मियों की भर्ती की गई। सुरक्षा और कानून व्यवस्था के लिहाज से नो टॉलरेंस नीति का ही असर है कि अब राज्य के अपराधी अपराध करने में हिचकते हैं और अगर अपराध होता भी है तो तुरंत कार्यवाही होती है और अपराधी को तत्काल सबक सिखाया जाता है।
योगी सरकार ने निश्चित तौर पर कई उपलब्धियां हासिल की हैं। लेकिन अभी निचले स्तर पर भ्रष्टाचार पर पूरी तरह काबू नहीं पाया जा सका है। राज्य के कर्मचारी अब भी आम जनता के लिए बेलगाम हैं। कुछ राजनेता दबी जुबान से राज्य में अफसरशाही के दबदबे को भी स्वीकार करते हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार की ख्याति दुनियाभर में मजदूर सप्लाई करने वाले राज्यों की रही है। योगी राज में इसमें कमी तो आई है, लेकिन अभी इसका खात्मा नहीं हो पाया है। इस मोर्चे पर योगी सरकार को अभी बहुत मेहनत करनी होगी।

उमेश चतुर्वेदी, वरिष्ठ पत्रकार, राजनीतिक समीक्षक
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)
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