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सामाजिक और नैतिक ताकतों से युक्त बने शिक्षा आयोग

Education Commission should be made up of social and moral forces.


उमेश चतुर्वेदी

 

शिक्षा क्षेत्र से जुड़ी हाल ही में तीन घटनाएं हुईं। इन तीनों से जुड़े मामलों कपर गहराई से विचार करें तो हमारी शिक्षा व्यवस्था की असलियत सही मायने में सामने आती है। पहली घटना ऐसी रही, जिसने पूरे देश को हिलाकर रख दिया, वह घटना थी राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी यानी एनटीए द्वारा आयोजित मेडिकल कॉलेजों में दाखिले के लिए हुई प्रवेश परीक्षा का पेपर आउट होना। दूसरी घटना रही, केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड यानी सीबीएसई द्वारा बारहवीं की परीक्षा की कॉपियों की जांच में हुई व्यापक गड़बड़ी, जिससे बारहवीं की परीक्षा दे चुके लाखों छात्रों के सपनों में दरार पड़ गई है। तीसरी घटना भी सीबीएसई के ही एक आदेश से जुड़ी है, जिसके अनुसार अब उसका पाठ्यक्रम पढ़ाने वाले विद्यालयों में छात्रों के लिए तीन भाषाएं पढ़ना अनिवार्य होगा।

तीनों ही घटनाओं को लेकर नागरिक समाज की प्रतिक्रिया तीखी रही। लेकिन इस तीखेपन में भी नागरिक समाज ने राष्ट्र के व्यापक फायदे की बजाय अपने निजी लाभ को ध्यान में रखा। नीट परीक्षा के पर्चे का आउट होना निश्चित तौर पर राष्ट्रीय कलंक है, वहीं सीबीएसई द्वारा परीक्षाओं के नतीजों में गड़बड़ी भी कोई माफी की बात नहीं है। इसे लेकर नागरिक समाज की तीखी प्रतिक्रिया होना स्वाभाविक है। लेकिन बहुलवादी-विविधरंगी संस्कृति और भाषा वाला अपना देश बहुभाषिकता की ओर बढ़े और ऐसी पीढ़ी तैयार हो, इसका कहां तक स्वागत होना चाहिए, लेकिन इसका भी विरोध हो रहा है।

1823 से पहले भारत में शिक्षा की जिम्मेदारी प्रमुखत: समाज की थी। अंग्रेजों द्वारा भारतीय शिक्षा व्यवस्था में सीधे हस्तक्षेप से पहले संचालन के लिहाज से तीन तरह के विद्यालय थे। पहली श्रेणी में ग्रामीण समाज द्वारा सार्वजनिक रूप से संचालित अपने विद्यालय थे, दूसरी श्रेणी जमींदारों द्वारा संचालित विद्यालयों की थी, जबकि तीसरी श्रेणी में राज्य यानी तत्कालीन राजाओं द्वारा संचालित विद्यालय थे। जाहिर है कि गांव का समाज अपने विद्यालय, विशेषकर अपने अध्यापक का खर्च उठाता था, इसी तरह जमींदार अपने विद्यालयों और राजा अपने विद्यालयों के खर्च चलाते थे। तब अंग्रेजी शिक्षा भले ही नहीं थी, लेकिन विद्यालयों के संचालन के पीछे प्रमुख भाव पैसा कमाना नहीं, बल्कि शिक्षा देना था। उन विद्यालयों की पूरी शिक्षा का उद्देश्य समाजोपयोगी मानस के साथ राष्ट्र और समाज के लिए विद्वानों और नागरिकों को तैयार करना था, जो आगे चलकर सामाजिक भूमिका को समझे और राष्ट्रीय दायित्वों को भी निभाने से पीछे नहीं रहे। उस शिक्षा व्यवस्था के मूल में नैतिक मूल्य थे, अर्थोपार्जन नहीं। इसलिए उन विद्यालयों में अध्यापकों की नियुक्ति के लिए उनका ज्ञानार्थी होना तो था ही, चरित्र की कसौटी पर भी सर्वोच्च उतरना था।

जब इस संदर्भ में आज की शिक्षा व्यवस्था को देखते हैं तो पाते हैं कि ज्यादातर शैक्षिक परिदृश्य का बुनियादी उसूल अर्थोपार्जन हो गया है, इसके जरिए अगर ज्ञान की कुछ बूंदें छात्रों पर बरस जाएं तो ये उनका भाग्य। दिलचस्प यह है कि आधुनिक राजनीतिक व्यवस्था भी नैतिक मूल्यों और ज्ञान की कसौटी पर खरा उतरने वाले विद्यार्थी देने वाले विद्यालयों की बजाय विद्यालयों की संख्या पर ज्यादा भरोसा कर रहा है। शैक्षिक गुणवत्ता और नैतिक मूल्यों के समायोजन वाली शिक्षा की बजाय गणनात्मक शिक्षा की ओर हमारी राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था बढ़ चुकी है। अब सरकारें और राजनीतिक दल अपनी उपलब्धियां विद्यालयों, कॉलेजों, मेडिकल कॉलेजों और इंजीनियरिंग कॉलेजों की बढ़ी हुई संख्या के जरिए अपनी उपलब्धियों का ढिंढोरा पीटते हैं। उन विद्यालयों से किस स्तर के विद्यार्थी निकल रहे हैं, इसकी जांच-परख द्वितीयक हो गई है, प्राथमिक नहीं। यही वजह है कि समूचा परिदृश्य ज्ञानोपार्जन और नैतिक मूल्यों की स्थापना की कसौटी की बजाय आर्थिक दोहन की कसौटी प सफलता को गिन-गिना रहा है। कह सकते हैं कि नैतिकता, पारंपरिक सांस्कृतिक मूल्यों और ज्ञानार्जन की कसौटी अब शिक्षा में पीछे छूट गई है। सिर्फ अर्थ पर जोर है। इसीलिए नीट के पर्चे के लीक होने जैसी घटनाएं घटती हैं, सीबीएसई अपनी बनी-बनाई और अब तक सवाल रहित व्यवस्था को बदलता है और स्कैन करके उत्तर पुस्तिकाएं जांचने की व्यवस्था स्थापित करता है। तंत्र के लिहाज से ये कदम सहजता और कम समय में परीक्षा परिणाम देने के लिए उठाए गए, लेकिन क्या ऐसा हो पाया? नीट के पर्चे लीक होना और बारहवीं की परीक्षा की उत्तर पुस्तिकाओं की गड़बड़ जांच शिक्षा व्यवस्था में आई गिरावट का ही नतीजा है।

सत्ता संभालने के बाद नरेंद्र मोदी शैक्षिक व्यवस्था में पहले से जारी कदाचार को रोकने के लिए कोशिश के तहत नीट, जेईई और सीयूईटी की परीक्षाएं कराने के लिए राष्ट्रीय टेस्टिंग एजेंसी की स्थापना की। लेकिन इस संस्था के जरिए पारदर्शिता और गुणवत्तायुक्त विद्यार्थियों के चयन का उद्देश्य सफल होता नहीं दिख रहा है। क्योंकि एजेंसी महज परीक्षा लेने का तंत्र बनकर रह गई है, परीक्षाओं के स्तर को बेहतरीन बनाने और उसके जरिए पात्र एवं योग्य छात्रों के संबंधित विषय और विधा के चयन के अपने उद्देश्य में अब तक यह एजेंसी खास कामयाब नहीं रही। अगर अनुभवी प्रोफेसरों से बात करेंगे तो पता चलेगा कि इन परीक्षाओं के जरिए किस तरह के विद्यार्थी सामने आ रहे हैं और कॉलेजों को उन्हें दाखिला देना पड़ रहा है।

आज देश में राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, कुल 780 मेडिकल कॉलेज हैं। इनमें लगभग 386 सरकारी कॉलेज हैं और बाकी निजी क्षेत्र और ट्रस्ट द्वारा संचालित हैं। इन मेडिकल कॉलेजों में एमबीबीएस (MBBS) के लिए कुल 1,18,190 सीटें उपलब्ध हैं। अगर 1947 के आंकड़ों के देखेंगे तो यह संख्या बड़ी दिखती है। तब भारत में सिर्फ 28 मेडिकल कॉलेजों ही थे। इसी तरह आज देश में करीब 8876 इंजीनियरिंग कॉलेज हैं , जिनमें से 6611 कॉलेज निजी और 2265 कॉलेज सरकारी हैं। इनमें 23 आईआईटी, 31  एनआईटी और 26 आईआईआईटी हैं। जिनमें प्रमुख था रूड़की का इंजिनियरिंग कालेज, जिसका पहले नाम थॉमसन कॉलेज ऑफ सिविल इंजीनियरिंग था। दूसरे नंबर पर गिड्डी, चेन्नई का कॉलेज ऑफ इंजिनियरिंग और तीसरे नंबर पर पुणे का सीओईपी कॉलेज था। आजादी के वक्त की महज 38 इंजीनियरिंग कालेजों की संख्या की तुलना में आज की यह संख्या बहुत ज्यादा ही कही जाएगी और सरकारों की उपलब्धि भी। इसी तरह अखिल भारतीय उच्च शिक्षा सर्वेक्षण  रिपोर्ट के अनुसार, भारत में मान्यता प्राप्त डिग्री प्रदान करने वाले कुल  कॉलेजों की संख्या 46,624 कॉलेज हैं। इसके अलावा देशभर में करीब 1,338 विश्वविद्यालय  और निजी क्षेत्र के 11,923 संस्थान हैं। आजादी के समय के लिहाज से इनकी संख्या देखें तो यह संख्या भी कई गुना कही जाएगी, क्योंकि उस समय पूरे देश में केवल 636 कॉलेज और 17 विश्वविद्यालय ही थे।

बेशक आजादी के पहले शिक्षा व्यवस्था आज की तुलना में संख्या की लिहाज से बेहद पीछे थी। लेकिन तब जितने भी विद्यालय, कॉलेज और विश्वविद्यालय थे, उनके अध्यापक आज की तुलना में कहीं ज्यादा प्रतिबद्ध, नियमबद्ध, और अपने नैतिक उद्देश्यों के प्रति समर्पित थे। तब अध्यापकों को सम्मानपूर्वक जीवन-यापन लायक पैसे नहीं मिलते थे, फिर भी तब के अध्यापकों का ध्यान न तो शिक्षा को कारोबार बनाने पर था, तब ना तो वे ट्यूशन पढ़ाते थे, ना ही कोचिंग कक्षाओं में ज्यादा दिलचस्पी लेते थे। तब के अध्यापकों के लिए उनके विद्यालय, कॉलेज और विश्वविद्यालय एक तरह से उनके प्रार्थनाघर थे। लेकिन अब ऐसा नहीं है। अब शिक्षा का एक बाजार ख़ड़ा हो गया है। उसमें ज्यादातर प्राइवेट विश्वविद्यालय और कॉलेज ज्ञानदान और ज्ञानार्जन के केंद्र नहीं, बल्कि डिग्री बांटने का साधन बन गए हैं। एक और दिलचस्प तथ्य की ओर ध्यान दिया जाना चाहिए। निजी पब्लिक स्कूलों का भी मूल उद्देश्य पैसा कमाना रह गया है, फिर भी उनके यहां सरकारी विद्यालयों की तुलना में बेहतरीन शिक्षा मिलती है, जबकि कई बार निजी पब्लिक स्कूलों और विद्यालयों के अध्यापकों को पूरा वेतन नहीं मिलता या फिर कई बार कागजों और बैंक खातों में पूरा वेतन मिलता है, लेकिन बाद में उन्हें वेतन से नगद निकालकर अपने मालिकों और प्रबंधन को वापस करना पड़ता है। इसके बरक्स सरकारी स्कूलों में फीस कम लगती है या नहीं लगती, वहां के अध्यापक निजी स्कूलों के अध्यापकों की तुलना में कहीं ज्यादा पढ़े-लिखे और डिग्री के लिहाज से योग्य हैं, लेकिन सरकारी स्कूलों की ओर मजबूरी में ही लोग अपने बच्चों को भेजना पसंद करते हैं। इनमें सबसे बड़ी मजबूरी आर्थिक है, लेकिन पब्लिक स्कूलों में अपना पेट काटकर, अपने जरूरी खर्चों में कटौती करके अपने बच्चों को पढ़ाना लोग पसंद करते हैं। इसके ठीक उलट पैसे वाले लोग भी सरकारी विश्वविद्यालयों में अपने बच्चों को पढ़ाना चाहते हैं, क्योंकि निजी विश्वविद्यालयों की तुलना में सरकारी विश्वविद्यालय अब भी ज्ञानदान और ज्ञानार्जन के स्रोत हैं,जबकि निजी विश्वविद्यालय और संस्थान पैसे की कमाई के केंद्र।

शिक्षा में धन के बढ़ते बोलबाले के चलते अब वक्त आ गया है कि हमारी व्यवस्था शिक्षा की गुणवत्ता पर ध्यान दे। अगर देश को विश्व गुरू बनना है तो वह पदवी  योग्यता और ज्ञान से ही हासिल की जा सकेगी, पैसे के बदले डिग्री लेकर नहीं। फिर हमें योग्यता आधारित समाज को विकसित करना होगा, सिर्फ डिग्री आधारित समाज नहीं। डिग्री और सर्टिफिकेट हासिल करने का मोटा अर्थ ज्ञान हासिल से भी लगाया जाता है, लेकिन डिग्रियां ज्ञान की गारंटी नहीं बन पाई हैं। इसके लिए जरूरी है कि समूचे शैक्षिक परिदृश्य पर विचार के लिए शिक्षाविदों, समाजविज्ञानियों और समाज की नैतिक ताकतों के संयोजन में शिक्षा आयोग बने, जो शैक्षिक बेहतरी के लिए सुझाव दे। इस आयोग में नौकरशाही का प्रतिनिधि नहीं होना चाहिए। तभी जाकर हमारी शिक्षा में बुनियादी बदलाव लाने की कारगर कोशिश हो सकेगी।

(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)

 

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