
बिंदिया कुमारी
इतिहास का सबसे बड़ा गुण यह है कि वह कभी पूरी तरह मौन नहीं रहता। समय की धूल चाहे कितनी भी मोटी क्यों न हो जाए, किसी न किसी दिन कोई पुरातात्विक खोज, कोई अभिलेख, कोई सिक्का, कोई मंदिर अथवा कोई साधारण-सी प्रतीत होने वाली वस्तु उस धूल को हटाकर बीते युगों की सच्चाई को पुनः सामने ले आती है। बीते दिनों थाईलैंड के फेचाबुरी प्रांत स्थित डॉन याई थोंग (Don Yai Thong) पुरातात्विक स्थल से लगभग दो हजार वर्ष पुरानी दो स्वर्ण अंगूठियों की खोज ने ऐसा ही कार्य किया है। पहली दृष्टि में यह केवल एक पुरातात्विक खोज प्रतीत हो सकती है, लेकिन जब इनमें से एक अंगूठी पर ब्राह्मी लिपि में उत्कीर्ण शब्द "पुसारखितस" अर्थात "पुष्य द्वारा संरक्षित" पढ़ा गया, तो यह स्पष्ट हो गया कि यह केवल स्वर्ण का एक आभूषण नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता के उस विराट विस्तार का प्रमाण है जिसे समय, राजनीति और औपनिवेशिक इतिहास लेखन भी समाप्त नहीं कर सके।
आज जब दुनिया "इंडो-पैसिफिक", "कनेक्टिविटी", "सॉफ्ट पावर" और "सिविलाइज़ेशनल डिप्लोमेसी" जैसे शब्दों का प्रयोग करती है, तब थाईलैंड की धरती से निकली यह अंगूठी मानो यह स्मरण कराती है कि भारत इन अवधारणाओं को दो हजार वर्ष पहले ही व्यवहार में उतार चुका था। उस समय न आधुनिक राष्ट्र-राज्य थे, न पासपोर्ट, न अंतरराष्ट्रीय कानून और न विशाल नौसैनिक बेड़े। फिर भी भारत के व्यापारी, साधु, विद्वान और समुद्री यात्री हजारों किलोमीटर दूर तक पहुंच रहे थे। वे केवल व्यापार नहीं कर रहे थे; वे एक ऐसी सभ्यता के प्रतिनिधि थे जो अपने साथ भाषा, दर्शन, संस्कृति, आध्यात्मिकता और जीवन मूल्यों को भी लेकर चलती थी।
यह खोज इसलिए भी विशेष महत्व रखती है क्योंकि पिछले कई दशकों में इतिहास लेखन के एक प्रभावशाली वर्ग ने भारत की प्राचीन वैश्विक भूमिका को सीमित करके प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। भारत को प्रायः एक ऐसे भूभाग के रूप में चित्रित किया गया जिसने बाहरी आक्रमणों को झेला, लेकिन जिसने स्वयं विश्व को बहुत कम प्रभावित किया। दक्षिण-पूर्व एशिया में मिले ऐसे पुरातात्विक साक्ष्य इस धारणा को चुनौती देते हैं। वे बताते हैं कि भारत केवल प्रभाव ग्रहण करने वाली सभ्यता नहीं था; वह प्रभाव उत्पन्न करने वाली सभ्यता भी था। अंतर केवल इतना था कि उसका प्रभाव तलवार के बल पर नहीं, बल्कि विश्वास, व्यापार और ज्ञान के माध्यम से स्थापित हुआ।
डॉन याई थोंग की खुदाई में इन अंगूठियों का मानव अस्थियों के साथ मिलना अनेक नए प्रश्न भी खड़े करता है। प्रारंभिक अध्ययन संकेत देते हैं कि इनका संबंध संभवतः किसी भारतीय वैश्य व्यापारी से रहा होगा। यदि आगे के अनुसंधान इस संभावना की पुष्टि करते हैं, तो यह सिद्ध होगा कि पहली-दूसरी शताब्दी ईस्वी तक भारतीय व्यापारी दक्षिण-पूर्व एशिया में केवल आगंतुक नहीं थे, बल्कि वहां स्थायी उपस्थिति भी स्थापित कर चुके थे। इसका अर्थ यह होगा कि भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच आर्थिक संपर्क अपेक्षा से कहीं अधिक गहरे और संगठित थे।
यहां यह समझना आवश्यक है कि उस समय का समुद्री व्यापार आज की तरह विशाल जहाजों और आधुनिक बंदरगाहों पर आधारित नहीं था। भारतीय नाविक मानसूनी हवाओं का अद्भुत ज्ञान रखते थे। वे जानते थे कि किस मौसम में बंगाल की खाड़ी पार करनी है, किस दिशा से हवाएं चलेंगी और किस समय वापसी सुरक्षित होगी। यही ज्ञान भारत को प्राचीन विश्व की सबसे सक्रिय समुद्री व्यापारिक शक्तियों में शामिल करता था। गुजरात के भरुकच्छ, तम्रलिप्त, कावेरीपट्टनम, अरिकामेडु और ओडिशा के प्राचीन बंदरगाह केवल व्यापारिक केंद्र नहीं थे; वे सभ्यताओं के मिलन स्थल थे। इन्हीं बंदरगाहों से निकलने वाले जहाज मसाले, रेशम, सूती वस्त्र, मोती, हाथीदांत, औषधियां, धातुएं और बहुमूल्य पत्थर लेकर दक्षिण-पूर्व एशिया पहुंचते थे।
लेकिन भारतीय जहाजों का सबसे मूल्यवान निर्यात कोई वस्तु नहीं था। वह था—भारतीय विचार। व्यापारियों के साथ संस्कृत भाषा गई, ब्राह्मी लिपि गई, बौद्ध और वैदिक परंपराएं गईं, ज्योतिष गया, गणित गया, स्थापत्य गया और वह सांस्कृतिक दृष्टि गई जिसने स्थानीय समाजों को प्रभावित तो किया, लेकिन उन्हें विस्थापित नहीं किया। यही भारतीय सभ्यता की सबसे बड़ी विशेषता थी। उसने जहां भी प्रवेश किया, वहां की स्थानीय संस्कृति के साथ संवाद स्थापित किया, संघर्ष नहीं।
ब्राह्मी लिपि का मिलना इस खोज का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। ब्राह्मी भारतीय उपमहाद्वीप की सबसे प्राचीन और प्रभावशाली लिपियों में से एक मानी जाती है। इसी से आगे चलकर नागरी, बंगला, गुजराती, उड़िया, तमिल, सिंहली, बर्मी, थाई, खमेर और दक्षिण-पूर्व एशिया की अनेक लिपियों का विकास हुआ। इसलिए थाईलैंड में ब्राह्मी का मिलना केवल भारतीय उपस्थिति का प्रमाण नहीं है; यह उस बौद्धिक आदान-प्रदान का भी संकेत है जिसने पूरे एशिया की भाषाई संरचना को प्रभावित किया।
अंगूठी पर अंकित "पुष्य" का उल्लेख भी अत्यंत रोचक है। भारतीय परंपरा में पुष्य नक्षत्र शुभता, संरक्षण और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। यदि वास्तव में यह शब्द किसी व्यक्ति के नाम अथवा धार्मिक विश्वास से जुड़ा है, तो यह बताता है कि भारतीय व्यापारी विदेश यात्रा के दौरान भी अपनी सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखते थे। वे केवल आर्थिक गतिविधियों में संलग्न लोग नहीं थे; वे अपने साथ भारतीय समयबोध, ज्योतिषीय मान्यताएं और धार्मिक विश्वास भी लेकर चलते थे। यही कारण है कि भारतीय प्रभाव केवल बाजारों तक सीमित नहीं रहा; वह समाज और संस्कृति के भीतर भी समाहित हो गया।
इस खोज का एक अन्य महत्वपूर्ण आयाम "सुवर्णभूमि" की अवधारणा से जुड़ता है। भारतीय ग्रंथों—विशेषकर जातक कथाओं, रामायण और अनेक बौद्ध स्रोतों—में सुवर्णभूमि का उल्लेख बार-बार मिलता है। लंबे समय तक कुछ इतिहासकार इसे केवल एक पौराणिक कल्पना मानते रहे। लेकिन पिछले कुछ दशकों में थाईलैंड, म्यांमार, मलेशिया और इंडोनेशिया में मिले पुरातात्विक साक्ष्य यह संकेत देते हैं कि सुवर्णभूमि वास्तव में दक्षिण-पूर्व एशिया के उन समृद्ध समुद्री क्षेत्रों का सांस्कृतिक नाम था, जिनसे भारत का निरंतर संपर्क था। थाईलैंड की यह स्वर्ण अंगूठी उसी ऐतिहासिक स्मृति को नए साक्ष्य के साथ पुष्ट करती है।
यह भी उल्लेखनीय है कि भारत का यह प्रभाव किसी औपनिवेशिक परियोजना का परिणाम नहीं था। यूरोपीय शक्तियों ने जहां समुद्री व्यापार के साथ राजनीतिक नियंत्रण स्थापित किया, वहीं भारत ने व्यापार के साथ सांस्कृतिक संबंध विकसित किए। भारतीय व्यापारियों ने कहीं साम्राज्य स्थापित नहीं किए, न स्थानीय शासकों को हटाया और न ही संसाधनों का शोषण किया। इसके विपरीत उन्होंने स्थानीय समाजों के साथ वैवाहिक संबंध बनाए, व्यापारिक समुदायों का निर्माण किया और सांस्कृतिक समन्वय की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया। यही कारण है कि दक्षिण-पूर्व एशिया में भारतीय प्रभाव आज भी सम्मान के साथ स्मरण किया जाता है, न कि औपनिवेशिक स्मृति के रूप में।

सुवर्णभूमि, समुद्री व्यापार और सभ्यता का विस्तार
यदि इतिहास को केवल युद्धों, राजवंशों और राजनीतिक सीमाओं के आधार पर पढ़ा जाए, तो भारत की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक अदृश्य रह जाती है—उसकी समुद्री सभ्यता। विडंबना यह है कि जिस राष्ट्र ने हजारों वर्षों तक हिंद महासागर को व्यापार, संस्कृति और ज्ञान के आदान-प्रदान का सबसे सक्रिय मार्ग बनाया, उसके समुद्री इतिहास पर उतनी चर्चा नहीं हुई जितनी स्थलीय साम्राज्यों पर हुई। थाईलैंड के डॉन याई थोंग से मिली दो हजार वर्ष पुरानी स्वर्ण अंगूठी इस भूले-बिसरे इतिहास को फिर से जीवित कर रही है। यह हमें याद दिलाती है कि भारत केवल एक उपमहाद्वीप नहीं था; वह हिंद महासागर की धड़कन था, जिसके बंदरगाहों से निकलने वाले जहाजों ने एशिया के आर्थिक और सांस्कृतिक भूगोल को आकार दिया।
भारत का समुद्री इतिहास किसी एक राजवंश से प्रारंभ नहीं होता। सिंधु घाटी सभ्यता के समय से ही लोथल जैसे बंदरगाहों के माध्यम से मेसोपोटामिया तक व्यापारिक संबंध स्थापित हो चुके थे। बाद के काल में मौर्य, सातवाहन, चेर, पांड्य, चोल, कलिंग और पाल शासकों ने समुद्री संपर्कों को और सुदृढ़ किया। प्राचीन भारतीय ग्रंथों में समुद्री यात्रा का उल्लेख अत्यंत स्वाभाविक रूप से मिलता है। 'समुद्रयान', 'नौवहन' और 'नाविक' जैसे शब्द केवल साहित्यिक अलंकार नहीं थे, बल्कि उस समय की जीवंत आर्थिक गतिविधियों का हिस्सा थे। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में समुद्री व्यापार के लिए अलग अधिकारियों का उल्लेख मिलता है। जातक कथाओं में व्यापारी जहाजों के अनेक प्रसंग हैं। पेरिप्लस ऑफ द एरिथ्रियन सी जैसे यूनानी ग्रंथ भारतीय बंदरगाहों की समृद्धि का विस्तार से वर्णन करते हैं। रोमन इतिहासकार प्लिनी ने शिकायत की थी कि भारत के साथ व्यापार के कारण रोम का सोना बड़ी मात्रा में भारत चला जाता है। यह शिकायत वस्तुतः भारत की आर्थिक शक्ति का प्रमाण थी।
ओडिशा, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु के तटों से निकलने वाले जहाज म्यांमार, थाईलैंड, मलय प्रायद्वीप, सुमात्रा, जावा और बाली तक नियमित रूप से पहुंचते थे। कलिंग के समुद्री व्यापार की स्मृति आज भी ओडिशा के 'बोइता बंदाना' उत्सव में जीवित है, जहां कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर लोग छोटी-छोटी नावें जल में प्रवाहित कर उन समुद्री यात्राओं को स्मरण करते हैं जिन्होंने भारत को दक्षिण-पूर्व एशिया से जोड़ा था। लोक परंपराओं में संरक्षित यह स्मृति बताती है कि समुद्र भारतीय समाज के लिए भय का नहीं, अवसर का प्रतीक था।
कंबोडिया का अंगकोर वाट, इंडोनेशिया का प्रम्बानन, वियतनाम का चाम स्थापत्य, थाईलैंड के प्राचीन अभिलेख, मलेशिया के संस्कृत शिलालेख और बाली की जीवंत हिंदू परंपरा किसी एक घटना के परिणाम नहीं हैं। ये उस हजारों वर्ष लंबे सांस्कृतिक संवाद की अभिव्यक्तियां हैं, जिसकी शुरुआत व्यापारिक संपर्कों से हुई और जो धीरे-धीरे सभ्यतागत साझेदारी में बदल गया। आश्चर्य की बात यह है कि इन क्षेत्रों ने भारतीय संस्कृति को यथावत स्वीकार नहीं किया, बल्कि उसे अपनी स्थानीय परंपराओं के साथ मिलाकर नया स्वरूप दिया। यही भारतीय सभ्यता की सबसे बड़ी विशेषता थी—उसने प्रभाव डाला, लेकिन प्रभुत्व स्थापित नहीं किया; उसने प्रेरित किया, लेकिन पहचान नहीं छीनी।
भारत की सांस्कृतिक स्वीकार्यता का सबसे बड़ा उदाहरण इंडोनेशिया है। दुनिया का सबसे बड़ा मुस्लिम बहुल देश होने के बावजूद वहां रामायण और महाभारत आज भी सांस्कृतिक जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं। योग्याकार्ता के प्रम्बानन मंदिर में रामायण बैले का मंचन केवल पर्यटन कार्यक्रम नहीं, बल्कि उस साझा सांस्कृतिक स्मृति का उत्सव है जिसने धर्म परिवर्तन के बाद भी अपनी जड़ें नहीं छोड़ीं। बाली में हिंदू परंपराएं आज भी उतनी ही जीवंत हैं जितनी सदियों पहले थीं। इंडोनेशिया का राष्ट्रीय प्रतीक 'गरुड़', राष्ट्रीय एयरलाइन 'गरुड़ा इंडोनेशिया', अनेक नगरों और व्यक्तियों के संस्कृत मूल के नाम तथा राज्य समारोहों में भारतीय सांस्कृतिक प्रतीकों का प्रयोग यह दर्शाता है कि भारतीय प्रभाव वहां राजनीतिक सत्ता से नहीं, बल्कि सामाजिक सम्मान से स्थापित हुआ था।
थाईलैंड का नाम ही इस ऐतिहासिक संबंध की कहानी कहता है। वहां के राजाओं की उपाधि 'राम' रही है। वर्तमान चक्री वंश के सम्राट भी 'राम' की परंपरा का हिस्सा माने जाते हैं। बैंकॉक के राजमहल की दीवारों पर अंकित रामाकियन—जो रामायण का थाई रूपांतरण है—इस बात का प्रमाण है कि भारतीय महाकाव्य केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं रहे, बल्कि स्थानीय संस्कृति का अंग बन गए। वहां के अनेक मंदिरों, नृत्य शैलियों और उत्सवों में भारतीय परंपराओं की स्पष्ट झलक दिखाई देती है। यह सब किसी राजनीतिक विजय का परिणाम नहीं, बल्कि सदियों तक चले सांस्कृतिक संवाद का स्वाभाविक निष्कर्ष था।
यही वह बिंदु है जहां भारतीय और यूरोपीय समुद्री विस्तार के बीच मूलभूत अंतर दिखाई देता है। पंद्रहवीं और सोलहवीं शताब्दी में जब यूरोपीय शक्तियां एशिया पहुंचीं, तो उनका उद्देश्य व्यापार पर नियंत्रण और राजनीतिक प्रभुत्व स्थापित करना था। उन्होंने बंदरगाहों पर कब्जा किया, उपनिवेश बनाए और स्थानीय संसाधनों का दोहन किया। इसके विपरीत भारत का समुद्री संपर्क साझेदारी पर आधारित था। भारतीय व्यापारी स्थानीय समाज का हिस्सा बनते थे, न कि उसके शासक। यही कारण है कि दक्षिण-पूर्व एशिया में भारतीय प्रभाव आज भी सम्मानपूर्वक स्मरण किया जाता है, जबकि औपनिवेशिक शक्तियों की स्मृति अक्सर शोषण और दमन से जुड़ी हुई है।
वास्तव में यदि भारत की सभ्यतागत यात्रा को समझना है, तो उसे केवल स्थलीय सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता। उसकी असली शक्ति उन समुद्री मार्गों में छिपी है जिन्होंने भारत को एशिया, अफ्रीका और उससे भी आगे की दुनिया से जोड़ा। थाईलैंड की स्वर्ण अंगूठी उसी विराट समुद्री इतिहास का एक छोटा-सा लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय है। वह यह सिद्ध करती है कि भारतीय सभ्यता का विस्तार किसी क्षणिक घटना का परिणाम नहीं था, बल्कि सदियों तक चले सतत संपर्क, विश्वास और सांस्कृतिक आदान-प्रदान की प्रक्रिया थी।
और शायद यही कारण है कि दो हजार वर्ष बाद भी जब किसी विदेशी भूमि की मिट्टी से ब्राह्मी लिपि में अंकित एक भारतीय नाम सामने आता है, तो वह केवल पुरातत्व की खोज नहीं रहता। वह इतिहास का वह मौन उद्घोष बन जाता है जो कहता है कि भारत ने दुनिया को केवल वस्तुएं नहीं दीं, बल्कि एक ऐसी सभ्यतागत दृष्टि दी जिसने समुद्रों को दूरी नहीं, बल्कि संवाद का माध्यम बना दिया।
आज जब भारत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में 'एक्ट ईस्ट' नीति और 'महासागर (MAHASAGAR)' जैसी पहलों के माध्यम से दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ अपने संबंधों को नई ऊर्जा दे रहा है, तब थाईलैंड से प्राप्त यह स्वर्ण अंगूठी केवल अतीत की खोज नहीं, बल्कि वर्तमान की कूटनीतिक शक्ति भी बन जाती है। भारत-आसियान संबंध आज रक्षा, समुद्री सुरक्षा, कनेक्टिविटी, डिजिटल अर्थव्यवस्था और व्यापार के नए आयामों तक पहुंच चुके हैं, किंतु इन आधुनिक साझेदारियों की सबसे बड़ी पूंजी वह साझा सभ्यतागत विरासत है जो हजारों वर्षों से दोनों क्षेत्रों को जोड़ती रही है। इंडोनेशिया में रामायण की जीवंत परंपरा, थाईलैंड के शाही इतिहास में 'राम' की उपाधि, बाली की हिंदू संस्कृति और दक्षिण-पूर्व एशिया में संस्कृत तथा ब्राह्मी के असंख्य प्रमाण बताते हैं कि भारत का प्रभाव राजनीतिक विस्तार से नहीं, बल्कि सांस्कृतिक आत्मीयता से निर्मित हुआ था। यही कारण है कि भारत की 'एक्ट ईस्ट' नीति केवल आर्थिक या सामरिक रणनीति नहीं, बल्कि उस प्राचीन सभ्यतागत संवाद का आधुनिक पुनर्जागरण है, जिसकी पुष्टि आज थाईलैंड की मिट्टी से निकली एक छोटी-सी स्वर्ण अंगूठी भी कर रही है। इतिहास के ऐसे साक्ष्य हमें यह स्मरण कराते हैं कि भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी सैन्य विजय नहीं, बल्कि उसकी सभ्यता की वह स्वीकार्यता है जिसने बिना किसी साम्राज्यवादी विस्तार के विश्व के विशाल भूभाग को अपने विचारों, मूल्यों और संस्कृति से जोड़ दिया। इसलिए यह खोज केवल पुरातत्व का विषय नहीं, बल्कि भारत के आत्मविश्वास, उसकी सांस्कृतिक कूटनीति और उसके वैश्विक भविष्य की भी कहानी है। इतिहास को भुलाया जा सकता है, किंतु मिटाया नहीं जा सकता—और थाईलैंड की यह स्वर्ण अंगूठी उसी अमर सत्य की चमकती हुई साक्षी है।
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)
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