भारत में जब डिजिटल क्रांति की चर्चा होती है तो सामान्यतः हमारी आंखों के सामने UPI, Aadhaar और डिजिटल भुगतान जैसे उदाहरण आते हैं। लेकिन डिजिटल इंडिया की एक ऐसी उपलब्धि भी है, जिसकी चर्चा अपेक्षाकृत कम हुई है और जिसका प्रभाव सीधे भारत के गांवों, गरीबों, महिलाओं और बुजुर्गों के जीवन पर पड़ा है। यह उपलब्धि है—ई-संजीवनी। इस सरकारी टेलीमेडिसिन प्लेटफॉर्म के माध्यम से अब तक लगभग 43 करोड़ निःशुल्क चिकित्सकीय परामर्श दिए जा चुके हैं। 43 करोड़ यानी 430 मिलियन। यह संख्या केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि भारत में स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच के बदलते भूगोल का प्रमाण है।
ई-संजीवनी की शुरुआत वर्ष 2019 में हुई थी। उस समय शायद ही किसी ने कल्पना की होगी कि कुछ वर्षों में यह देश के करोड़ों लोगों तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने वाला विशाल डिजिटल नेटवर्क बन जाएगा। कोविड-19 महामारी के दौरान, जब अस्पतालों की ओपीडी बंद थीं और लोगों के लिए डॉक्टर तक पहुंचना कठिन हो गया था, तब इस प्लेटफॉर्म ने तेजी से विस्तार किया। 2020 के मध्य तक लाखों परामर्श हो चुके थे। इसके बाद इसकी गति लगातार बढ़ती गई और कुछ ही वर्षों में यह करोड़ों परामर्श के आंकड़े को पार करता चला गया। जनवरी 2025 तक 25 करोड़ से अधिक और नवंबर 2025 तक लगभग 43 करोड़ परामर्श इस बात का प्रमाण हैं कि सरकारी डिजिटल प्लेटफॉर्म भी अभूतपूर्व गति से विस्तार कर सकते हैं।
ई-संजीवनी की सबसे बड़ी विशेषता उसका हब एंड स्पोक मॉडल है। देश के दूरदराज क्षेत्रों में स्थित स्वास्थ्य केंद्रों को बड़े अस्पतालों और विशेषज्ञ चिकित्सकों से डिजिटल माध्यम से जोड़ा गया है। कल्पना कीजिए कि छत्तीसगढ़ के किसी ग्रामीण क्षेत्र में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पर पहुंचा व्यक्ति किसी विशेषज्ञ डॉक्टर के लिए 100 किलोमीटर की यात्रा करने को मजबूर नहीं है। वहां मौजूद स्वास्थ्यकर्मी उसकी प्रारंभिक जांच के बाद उसे वीडियो माध्यम से विशेषज्ञ चिकित्सक से जोड़ सकता है। बीमारी का परामर्श उसी स्थान पर मिल सकता है, जहां मरीज रहता है।

यही वह बदलाव है जिसे केवल तकनीकी उपलब्धि कहकर सीमित नहीं किया जा सकता। भारत जैसे विशाल और भौगोलिक विविधता वाले देश में स्वास्थ्य सेवाओं की सबसे बड़ी चुनौती केवल डॉक्टरों की संख्या नहीं, बल्कि डॉक्टर और मरीज के बीच की दूरी भी रही है। ई-संजीवनी ने तकनीक के माध्यम से इस दूरी को कम करने का प्रयास किया है। लगभग 1.31 लाख ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों को करीब 17 हजार अस्पतालों से जोड़ने वाला यह नेटवर्क अब किसी अस्थायी कोविड व्यवस्था के रूप में नहीं, बल्कि ग्रामीण स्वास्थ्य अवसंरचना के महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में विकसित हो चुका है।
इसकी पहुंच का सामाजिक पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। इसके लाभार्थियों में बड़ी संख्या महिलाओं की है। करीब 57 प्रतिशत लाभार्थी महिलाएं हैं, जबकि लगभग 12 प्रतिशत वरिष्ठ नागरिक हैं। ये वही वर्ग हैं जिनके लिए शहर के अस्पताल तक बार-बार जाना आर्थिक, सामाजिक और शारीरिक रूप से कठिन हो सकता है। इस दृष्टि से ई-संजीवनी केवल ‘ऑनलाइन डॉक्टर’ की सुविधा नहीं, बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं के लोकतंत्रीकरण का माध्यम बन रही है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह पूरी व्यवस्था किसी विदेशी निजी कंपनी की देन नहीं है। इसे भारत सरकार के सी-डैक (C-DAC) ने विकसित किया है। यह उस भारत की तस्वीर है जहां सरकारी तकनीकी संस्थान ऐसी डिजिटल प्रणालियां तैयार कर रहे हैं जो करोड़ों नागरिकों के जीवन को सीधे प्रभावित कर रही हैं।
भारत की डिजिटल कहानी केवल UPI के अरबों लेन-देन या Aadhaar की विशाल संख्या तक सीमित नहीं है। उसकी असली सफलता तब दिखाई देती है, जब तकनीक किसी महानगर के स्मार्टफोन से निकलकर गांव के स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंचती है और किसी गरीब नागरिक को डॉक्टर से मिलने के लिए पूरा दिन यात्रा नहीं करनी पड़ती।
43 करोड़ परामर्श इसलिए केवल एक संख्या नहीं हैं। यह उस बदलते भारत का प्रमाण हैं जहां तकनीक सुविधा नहीं, सेवा का माध्यम बन रही है। डिजिटल इंडिया की यही वह शांत क्रांति है, जिसकी आवाज भले महानगरों में कम सुनाई दे, लेकिन जिसका प्रभाव भारत के गांवों में बहुत गहरा है। भारत सचमुच उठ रहा है—और इस बार तकनीक के सहारे स्वास्थ्य के अधिकार को भी गांव-गांव पहुंचा रहा है।
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