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“रक्षा तकनीक में भारत को विश्वगुरु बना रहा है डीआरडीओ”

“हमारे प्रधानमंत्री ने देश को अगले 25 वर्षों में विकसित देश बनाने का लक्ष्य रखा है। उन्होंने हमारे लिए यह लक्ष्य भी रखा है कि हम वैश्विक समुदाय के बीच रक्षा प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अग्रणी बनें। हम अपने प्रधानमंत्री के इस दृष्टिकोण के तहत और अपने रक्षा मंत्री के मार्गदर्शन में काम कर रहे हैं। जैसा कि मैंने आपको बताया, हम धीरे-धीरे भविष्य की प्रौद्योगिकियों पर काम कर रहे हैं, जो हमारी रक्षा प्रणालियों को अत्याधुनिक बनाएगी। इसलिए, हम नई प्रौद्योगिकियों जैसे हाइपरसोनिक मिसाइलों, ऊर्जा हथियारों जैसी भविष्य की प्रौद्योगिकियों पर काम कर रहे हैं। हालांकि  हमारा निर्यात लगातार बढ़ रहा है, लेकिन मुझे आशा है कि अगले 15 वर्षों में,  हम दुनिया के अग्रणी निर्यातकों में से एक बन जाएंगे,”  डीआरडीओ के अध्यक्ष डॉ. समीर वी कामत का संपादक दीपक कुमार रथ के साथ एक विशेष साक्षात्कार में यह बताया। प्रस्तुत हैं उस साक्षात्कार के संपादित अंश:

 

  •  अभी तक डीआरडीओ की क्या उपलब्धियां रही हैं?

रक्षा क्षेत्र में काम करने वाला प्रमुख संगठन होने के नाते रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) ने हमारे वैज्ञानिकों को देश की सुरक्षा में बड़ा योगदान देने के लिए प्रेरणा दी है। यदि अर्थव्यवस्था को बढ़ाना है, तो हमारे पास एक मजबूत सुरक्षा व्यवस्था होनी चाहिए। एक मजबूत रक्षा तंत्र तभी विकसित हो सकता है, जब आपके पास अपना खुद का अनुसंधान एवं विकास हो, जिससे कि रक्षा क्षेत्र में हम अपनी स्वयं की तकनीक विकसित कर पाएं। डीआरडीओ यही भूमिका निभाता है और पिछले कुछ वर्षों में हमने देश को कई प्रणालियों में आत्मनिर्भर बनाया है। उदाहरण के लिए, हमारी मिसाइलें दुनिया में सर्वश्रेष्ठ में हैं। हमारे पास ना केवल अपना मिसाइल डिफेंस सिस्टम है, बल्कि हम दूसरे तरह की सभी आवश्यक मिसाइलें बनाने में भी सक्षम हैं। हमारे रडार भी अत्याधुनिक हैं, हमारी इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली, हमारा सोनार, हमारे टॉरपीडो, हमारी अटैक तोपें दुनिया के सर्वश्रेष्ठ हथियारों में से एक हैं।  हमारी ब्रह्मोस मिसाइल अब फिलीपींस को निर्यात की जा रही है। हमें कई देशों से निर्यात ऑर्डर मिल रहे हैं। इस साल, भारत ने 16,000 करोड़ रुपये के रक्षा उपकरण निर्यात किए हैं और उनमें से अधिकांश को डीआरडीओ ने विकसित किया हैं। कुल मिलाकर डीआरडीओ रक्षा क्षेत्र को आत्मनिर्भर बनाने अपनी अहम भूमिका निभा रहा है।

  •  डीआरडीओ अनुसंधान और विकास तक सीमित है। क्या आपको नहीं लगता कि यह पर्याप्त नहीं है और इसमें और अधिक काम करने की जरूरत है?

2014 में वर्तमान सरकार के सत्ता संभालने के बाद से आत्मनिर्भरता और मेक इन इंडिया पर जोर दिया जा रहा है, जो पहले नहीं होता था। इससे उद्योग जगत को रक्षा क्षेत्र में भाग लेने के लिए बड़ा बढ़ावा मिला है और अब वे सिस्टम डिजाइन और विकसित करने के लिए आगे आ रहे हैं। चूंकि  पहले ऑर्डर मिलने का कोई आश्वासन नहीं होता था, क्योंकि हमारे बहुत सारे उपकरण आयात किए जा रहे थे, इसीलिए उद्योग जगत भी रक्षा क्षेत्र में आने के लिए उतना उत्साहित नहीं था। लेकिन सरकार द्वारा भरोसा दिलाए जाने के बाद  हम देश के अंदर एक ऐसा इकोसिस्टम तैयार कर रहे हैं, जहां रक्षा क्षेत्र में काम करने के लिए बड़े उद्योगों, एमएसएमई और स्टार्टअप्स की रुचि बढ़ रही है। शिक्षा जगत भी अब रक्षा क्षेत्र की समस्याओं पर काम करने के लिए अधिक इच्छुक है। इसलिए, अब हमने एक अलग तंत्र विकसित किया है, जहां वह रक्षा प्रणालियां, जो वर्तमान रक्षा प्रणाली की तुलना में क्रमिक प्रगति कर चुकी हैं, उनको भारतीय उद्योग स्वयं संभाल सकता है। इसलिए इस प्रकार की प्रणालियों का डिज़ाइन और विकास सीधे उद्योग द्वारा हो सकता है। डीआरडीओ ने उद्योगों को अपना विकास-सह-उत्पादन भागीदार बनाकर यह प्रक्रिया शुरू की है। इसके बाद, वे अगली प्रगति का डिज़ाइन और विकास स्वयं कर सकते हैं।

 यह प्रक्रिया शुरू हो गई है। यह डीआरडीओ को भविष्य की प्रौद्योगिकियों पर काम करने के लिए मुक्त कर देगा, जो हमें विश्वगुरु बना देगा। उभरती हुई सभी नई प्रौद्योगिकियां, जैसे क्वांटम टेक्नोलॉजीज, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, मशीन लर्निंग, स्मार्ट मैटेरियल्स, कॉग्निटिव टेक्नोलॉजीज और कुछ नए अत्याधुनिक क्षेत्र हैं, जिन पर डीआरडीओ अब ध्यान केंद्रित कर रहा है। हम आशा करते हैं कि इन भविष्य के क्षेत्रों में अपने प्रयासों को केंद्रित करके, हम देश को रक्षा प्रौद्योगिकी में विश्व गुरु बनाएंगे और भविष्य में अपनी देश के सैन्य बलों को अत्याधुनिक रक्षा प्रणालियां प्रदान करेंगे।

  • डीआरडीओ की उपलब्धि यह है कि उसने बेहद अच्छी तकनीकी क्षमता का प्रदर्शन किया है। खास तौर पर मिसाइल के क्षेत्र में। लेकिन क्या उनका उत्पादन पर्याप्त संख्या में किया गया है? क्या आपको नहीं लगता कि उनके अधिक उत्पादन की आवश्यकता है?

देखिए, DRDO उत्पादन नहीं करता। डीआरडीओ का काम अनुसंधान एवं विकास है। हम एक प्रोटोटाइप विकसित करते हैं। उद्योग में उत्पादन होता है लेकिन उद्योग तभी उत्पादन करेगा जब सेवाओं से ऑर्डर मिलेंगे। अब, सरकार द्वारा ऑर्डर मिलने का भरोसा दिखाए जाने, प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री द्वारा मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत का मार्ग प्रशस्त किए जाने के बाद अब उद्योगों को ऑर्डर मिल रहे हैं। आप देखेंगे कि आगे चलकर हमारे द्वारा डिजाइन किए गए उत्पादों को भारी मात्रा में निर्माण किया जाएगा।

  •  मेक इन इंडिया के लिए भारतीय उद्योग जगत की प्रतिक्रियाएं क्या हैं। अतीत में ऐसे कई मामले सामने आए हैं जब रक्षा क्षेत्र के सार्वजनिक उपक्रमों को हथियार प्रणाली या कुछ उपकरण बनाने के लिए नामित किया गया है। वर्तमान स्थिति क्या है?

जैसा कि मैंने पहले बताया कि भारतीय उद्योग अब उत्साहित है। उन्होंने मेक इन इंडिया को अपना लिया है। क्योंकि अब वह जानते हैं कि यदि उन्होंने किसी सिस्टम के विकास और उत्पादन में समय और प्रयास लगाया, तो इसके लिए बाजार उपलब्ध होगा।  इसलिए, रक्षा क्षेत्र में कई नए उद्योग आए हैं। एलएंडटी, महिंद्रा, अदानी जैसे बड़े औद्योगिक संस्थान काम कर रहे हैं। रक्षा क्षेत्र में छोटे और मंझोले उद्योगों की भी संख्या बहुत बड़ी है। और फिर नए स्टार्ट-अप भी हैं। इसलिए, मुझे पूरा यकीन है कि आने वाले वर्षों में, हम दुनिया में अग्रणी रक्षा प्रौद्योगिकियों और सिस्टम का उत्पादन करने वालों में से एक होंगे।

  • आतंकवाद का मुकाबला करने के लिए कौन से हथियार या उपकरण तैयार किए जा रहे हैं और उसमें से कौन से उपकरण केन्द्रीय पुलिस बलों द्वारा इस्तेमाल किया जा रहा है?

हम सीधे तौर पर ऐसा कोई सिस्टम तैयार नहीं करते हैं। लेकिन हमारे कई उत्पाद सीधा या परोक्ष रुप से केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों के काम आते हैं। हम गृह मंत्रालय के साथ सक्रिय रूप से जुड़े हुए हैं और लगातार इस बात पर नजर रखते हैं कि हमने उपकरण अपने सशस्त्र बलों के लिए विकसित किया है, वह कितने कारगर हैं या फिर उनमें किसी संशोधन की जरुरत तो नहीं है।  यह एक लगातार चलने वाली प्रक्रिया है। हमारा एक अलग विभाग है जो इस तरह के कार्यों में लगा हुआ है। हमारे कई उपकरणों को केन्द्रीय सशस्त्र पुलिस बलों द्वारा इस्तेमाल किया जाता है। आपने बेहद अच्छा प्रश्न पूछा है। मुझे भी लगता है कि रक्षा अनुसंधान एवं विकास का लाभ केंद्रीय पुलिस बल या राज्य पुलिस बल को भी मिलना चाहिए।

  • क्या इस विषय में समन्वय ठीक से चल रहा है?

इसके लिए हमारे पास एक व्यवस्था मौजूद है। जिसके तरह गृह सचिव और मैं साल में दो बार एक साथ बैठते हैं और फिर इस बात की पहचान करते हैं कि डीआरडीओ की कौन से उपकरण या उत्पाद  सीएपीएफ के लिए उपयोगी हो सकते हैं।

  • अब चूंकि सरकार द्वारा डीआरडीओ को और अधिक प्रोत्साहन दिया जा रहा है। उसे देखते हुए  डीआरडीओ भविष्य के लिए किस तरह की योजना तैयार कर रहा है?

हमारे प्रधानमंत्री ने देश को अगले 25 वर्षों में विकसित देश बनने का लक्ष्य रखा है। उन्होंने हमारे लिए यह लक्ष्य भी रखा है कि हम वैश्विक समुदाय में रक्षा प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अग्रणी बनें। हम अपने प्रधान मंत्री के इस दृष्टिकोण के तहत और अपने रक्षा मंत्री के मार्गदर्शन में काम कर रहे हैं। जैसा कि मैंने आपको बताया, हम धीरे-धीरे भविष्य की प्रौद्योगिकियों पर काम करने की ओर बढ़ रहे हैं, जो हमारी रक्षा प्रणालियों को अत्याधुनिक बनाएगी। इसलिए, हमारा दृष्टिकोण नई प्रौद्योगिकियों, हाइपरसोनिक मिसाइलों, निर्देशित-ऊर्जा हथियारों जैसी भविष्य की प्रौद्योगिकियों पर काम करना है। इस प्रकार, अगले 15 वर्षों के भीतर, आप एक ऐसा डीआरडीओ देखेंगे जो देश को रक्षा प्रौद्योगिकी में अग्रणी बना देगा। और एक बार जब आप सबसे आगे पहुंच जाते हैं, तो विश्व स्तर पर निर्यात करने में सक्षम हो जाते हैं। वर्तमान में हमारा निर्यात बढ़ रहा है, लेकिन मुझे आशा है कि अगले 15 वर्षों में हम दुनिया के अग्रणी निर्यातकों में से एक बन जायेंगे।

  • भारत स्वदेशी विमानों के लिए जीई इंजन का इस्तेमाल कर रहा है। हमारे स्वदेशी कावेरी इंजन का क्या हुआ? यह असफल क्यों साबित हुआ ?

एयरो इंजन तकनीक एक जटिल और चुनौतीपूर्ण तकनीक है। दुनिया में केवल चार देशों को ही इस तकनीक में महारत हासिल है।  मैं यह नहीं कहूंगा कि कावेरी इंजन विफल रहा। दरअसल हम एलसीए के लिए आवश्यक थ्रस्ट पैदा करने में सक्षम नहीं  हुए। हालाँकि, कावेरी इंजन अच्छा काम कर रहा है। यह थोड़ा कम थ्रस्ट पैदा कर रहा है। इसलिए अब हम मानव रहित हवाई जहाजों में कावेरी इंजन का उपयोग कर रहे हैं। कावेरी इंजन के लिए हमने अब तक जो रिसर्च की है, उसका उपयोग मानव रहित हवाई जहाज में किया जाएगा। यह एलसीए में नहीं लग पाएगा, क्योंकि यह एलसीए की प्रमुख आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर सका। इसलिए हमें GE इंजन को अपनाना होगा। लेकिन यह वह आधार होगा जिस पर अब हम अगली पीढ़ी के इंजन, जो कि 110 किलोन्यूटन थ्रस्ट का इंजन है, उसको विकसित करेंगे। इसके लिए हम विदेशी साझेदारों के साथ मिलकर काम करने पर विचार कर रहे हैं।  ताकि हम इस इंजन को अगले 10 से 15 वर्षों में वितरित कर सकें। इससे हमें भविष्य के उन सभी हवाई प्लेटफार्मों के लिए इंजन बनाने की क्षमता मिलेगी जिनकी हमें देश में आवश्यकता है। मैं कावेरी को असफल नहीं कहूंगा। मैं कहूंगा कि यह एलसीए की बड़ी आवश्यकताओं को पूरा नहीं पाया।  लेकिन जो इंजन हमने विकसित किया, अब वह दूसरे प्लेटफॉर्म में इस्तेमाल किया जाएगा।

  • एरो इंजन को लेकर जीई के साथ हुए समझौते के बाद, आप अगली पीढ़ी के विमानों के लिए कितने आशान्वित हैं?

यह समझौता निर्माण के लिए है ना कि यह अनुसंधान एवं विकास के लिए। यह विनिर्माण समझौता एचएएल और जीई के बीच है। यह भारत में F414 इंजन के उत्पादन के लिए है। मैं जिस बारे में बात कर रहा हूं वह हमारे एचएएल तेजस एमकेII के लिए 98 किलोन्यूटन थ्रस्ट इंजन है।  जब हम एक भविष्य का विमान बनाएंगे तो उसके लिए अधिक थ्रस्ट इंजन की आवश्यकता होगी। इसलिए हमें अभी से उच्च थ्रस्ट देने वाले इंजन पर काम करना शुरू करना होगा।

इसके लिए हम साझेदारों की तलाश में हैं। भविष्य में जीई यानी जनरल इलेक्ट्रिक हमारे भागीदारों में से एक हो सकता है। फ्रांसीसी  कंपनी सेफ्रॉन भी भागीदारों में से एक हो सकती है। या फिर ब्रिटिश कंपनी रोल्स-रॉयस के साथ भी बात बन सकती है। हम इस पर काम कर रहे हैं हम यह देखने के लिए उन सभी के साथ बातचीत कर रहे हैं कि क्या हम अपनी अगली पीढ़ी के विमानों के लिए आवश्यक इंजन का एक साथ मिलकर विकास कर सकते हैं।

  • डॉ. कामत आप मेटलर्जी यानी धातु विज्ञान के विश्व विख्यात विशेषज्ञ हैं। कृपया हमारे पाठकों को बताएं कि मेटलर्जी का ज्ञान एक उच्च श्रेणी के एयरो इंजन के निर्माण के लिए कितना जरुरी है?

एयरो इंजन बनाने के लिए आपको तीन चीजों की आवश्यकता होती है। सबसे पहले, आपको एक इंजन डिज़ाइन करने की ज़रूरत है, जो एक वैमानिकी और यांत्रिक ज्ञान का क्षेत्र है। फिर आपको उन सामग्रियों की आवश्यकता है, जो उन उच्च तापमान और दबाव का सामना कर सकें। तीसरा, आपको सटीक इंजन पार्टस को तैयार करने के लिए उच्च गुणवत्ता के निर्माण की आवश्यकता होती है।  जो कि बेहद उच्च दबाव को सहन कर सके क्योंकि इंजन प्रति मिनट 30,000 आरपीएम की स्पीड से घूमता है। जिसके लिए आपको बेहद सटीक निर्माण क्षमता की आवश्यकता है।  और फिर आपको सभी से मेल खाने के लिए एक सिस्टम इंजीनियरिंग क्षमता की आवश्यकता है। तो, सिर्फ सामग्री होने से आप इंजन का निर्माण नहीं कर सकते हैं बल्कि इसके लिए आपको उच्च श्रेणी की मैन्यूफैक्चरिंग क्षमता की जरुरत होती है। तभी आप एरो इंजन का निर्माण कर सकते हैं।  इसलिए हमे इन तीनों ज्ञान को एक साथ मिलाकर संयोजित करने की सिस्टम इंजीनियरिंग की आवश्यकता है।

जैसा कि मैंने बताया, हमारे पास तीनों में अच्छी क्षमताएं हैं।  लेकिन जब हमने कार्यक्रम शुरू किया था तो उस समय हमारे पास जो सिस्टम इंजीनियरिंग क्षमता थी, वह हाई थ्रस्ट के निर्माण के लिए पर्याप्त नहीं थी।  इसलिए, हमने इस उम्मीद के साथ एक डिज़ाइन तैयार किया कि हम एलसीए के लिए आवश्यक थ्रस्ट को पूरा कर पाएंगे।  लेकिन जब इंजन बनकर तैयार हुआ तो हमें ये पता चला कि हम उस आवश्यक थ्रस्ट को हासिल करने में सक्षम नहीं हो पाए। लेकिन वह इंजन, जैसा कि मैंने पहले कहा, बेकार नहीं होने वाला है। इसका उपयोग किसी अन्य एप्लिकेशन में किया जाएगा। अब हमने कावेरी, जो कि चौथी पीढ़ी का इंजन है, के अनुभव के आधार पर बहुत कुछ सीखा है। अब इंजन तकनीक छठी पीढ़ी में चली गई है। इसलिए इसे विकसित करने में समय लगाने की बजाय, हम किसी अन्य कंपनी के साथ काम करना चाहते हैं, जिसके पास पहले का अनुभव मौजूद है और उसने पांचवीं पीढ़ी के इंजन विकसित किए हैं। जिसका वर्तमान में दुनिया भर में उपयोग किया जा रहा है। हम साथ मिलकर काम करेंगे और साथ मिलकर छठी पीढ़ी का विकास करेंगे। यह न केवल रिसर्च और डिवेलपमेन्ट के समय को कम करता है, बल्कि खर्च में भी कटौती भी करता है।

  •  क्या यह संभव हो पाएगा कि भारत यह काम अकेले पूरा कर ले?

मुझे यकीन है कि हम इसे अकेले कर सकते हैं लेकिन इसमें अधिक समय लगेगा। इसलिए, लगने वाले समय को कम करने के लिए, हमें इसे कई हिस्सों में बांटकर करना चाहिए। क्योंकि जैसा कि मैंने कहा कि यह एक बहुत ही चुनौतीपूर्ण तकनीक है - टॉलरेंस, आप टरबाइन में देखते हैं, धातु ब्लेड, टरबाइन ब्लेड एक तापमान पर काम करते हैं- -टरबाइन ब्लेड से टकराने वाली गैस का तापमान धातु के पिघलने के तापमान से अधिक होता है, जिसका उपयोग किया जा रहा है। इस प्रकार, उस धातु को अंदर से ठंडा करने के लिए आपके कौशल की आवश्यकता होती है और यह एक बहुत ही अत्याधुनिक तकनीक है। इसीलिए बहुत कम देशों को ही इसमें महारत हासिल है। हालाँकि, मुझे यकीन है कि देश में इसमें महारत हासिल करने की क्षमता मौजूद है, लेकिन इसमें समय लगेगा और इसमें जोखिम भी अधिक है। इस बिंदु पर हमारी कोशिश यह है कि अगली पीढ़ी के इंजन को विकसित करने के लिए किसी अन्य देश के साथ मिलकर काम करें, जो कि देश के लिए बेहतर है।

  • हमारे मुख्य युद्धक टैंक अर्जुन और एलसीए तेजस को लेकर मीडिया में आलोचनापूर्ण खबरें छपी हैं।  क्या आप हमें बता सकते हैं कि इन दोनों उत्पादों को सुधारने के लिए उनमें क्या बदलाव किए गए हैं?

अर्जुन के बारे में आलोचना तो हो रही है, लेकिन वास्तविकता यह है कि T90 से तुलना की जाए तो वह  सर्वश्रेष्ठ टैंकों में से एक है। इसने T90 से बेहतर प्रदर्शन किया है।  लेकिन इसमें असली मुद्दा लंबे समय तक टिकने का था। अर्जुन के लिए दिए गए ऑर्डर की गई संख्या बहुत कम थी, इसलिए हुआ यह कि ट्रांसमिशन और इंजन जैसे उन घटकों का स्वदेशीकरण देश में नहीं हुआ। ये घटक विदेश से खरीदे गए सबसिस्टम हैं, क्योंकि सेना द्वारा ऑर्डर की गई संख्या पहली बार में केवल 108 थी और अब दूसरी बार में 112 है। यह संख्या देश में उन उपप्रणालियों को स्वदेशी बनाने के लिए पर्याप्त नहीं थी। जिसकी वजह से सस्टेनेंस एक समस्या बन गई है क्योंकि जब उन्हें वे स्पेयर पार्ट्स चाहिए होते हैं, तो वे विक्रेता से उपलब्ध नहीं होते हैं। यह टैंक के साथ मुख्य चुनौती है, अन्यथा यह एक उत्कृष्ट टैंक है। जो T90 से बेहतर प्रदर्शन करता है।

  • कृपया हमें डीआरडीओ द्वारा विकसित संग्रह और दिव्य दृष्टि इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली के बारे में कुछ बताएं?

ये इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली हैं, जिन्हें सैन्य बलों तक पहुंचा दिया गया है। इसने अपनी भूमिका बहुत अच्छे से निभाई है और अब हम अगली पीढ़ी की इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली विकसित कर रहे हैं। जैसा कि आप जानते हैं, इलेक्ट्रॉनिक्स की दुनिया में बहुत तेजी से बदलाव आता है। इसीलिए अब हम अगली पीढ़ी की प्रणालियों के लिए विकसित कर रहे हैं। इन प्रणालियों ने देश हित में बहुत अच्छा प्रदर्शन किया है।

  • आपके और अन्य लोगों की कई उपलब्धियों और क्षमताओं के बावजूद रक्षा विनिर्माण के स्वदेशीकरण की धीमी गति का कारण क्या है?

जैसा कि मैंने कहा कि इसका संबंध मिलने वाले ऑर्डर्स से है। जब कोई ऑर्डर नहीं मिलेगा, तो कोई भी उद्योग रक्षा उत्पादन क्षमता कैसे विकसित कर पाएगा। जैसा कि अभी स्थितियों में बदलाव दिखाई दे रहा है। उस तरह के हालातों में अगले पांच वर्षों में आप देखेंगे कि हमारी 80 से 90 प्रतिशत रक्षा खरीद भारतीय स्रोतों से होगी। हम पहले ही 70 फीसदी तक पहुंच चुके हैं। जबकि पहले हम अपनी रक्षा खरीद का 70 प्रतिशत आयात करते थे।

जब आप घरेलू उद्योगों से उपकरण खरीदेंगे ही नहीं तो उद्योग जगत विनिर्माण सुविधाएं क्यों स्थापित करेगा? अब जब सरकार ने एक स्पष्ट नीति बनाई है, जिसके लिए मैं हमारे प्रधानमंत्री और रक्षामंत्री को धन्यवाद देना चाहता हूं, उनकी आत्मनिर्भरता और मेक इन इंडिया की इस मजबूत नीति से ही समय बदला है। एक बार जब ये नीतियां अस्तित्व में आ गईं हैं, तो आप रक्षा विनिर्माण में तेज गति से वृद्धि महसूस करेंगे। पिछले साल, हमारे सैन्य बलों के लिए रक्षा मंत्रालय के माध्यम से स्वदेशी निर्माताओं से एक लाख करोड़ से अधिक मूल्य के रक्षा उपकरण खरीदे किए गए थे। यह संख्या बढ़ती रहेगी और जैसा कि मैंने कहा अगले चार पांच वर्षों में हम अपनी रक्षा खरीद का 90 प्रतिशत तक पहुंच जाएंगे। जिसके बाद हमारे रक्षा विनिर्माण उद्योग में तेज गति से मांग बढ़ेगी और उत्पादन में

वृद्धि होगी।

  • भारत सरकार और रक्षा मंत्री  ने रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता को बेहद महत्व दिया है। लेकिन जो व्यावहारिक तौर पर दिख रहा है कि भारत में निजी उद्योगों और छोटे तथा मंझोले उद्योगों की भागीदारी उतनी उत्साहजनक नहीं है, जितनी होनी चाहिए। आखिर समस्या कहां है?

यह अब हो रहा है।  आप जो बता रहे हैं वह पहले हुआ करता था। लेकिन अब वक्त बदल गया है।  पिछले तीन साल में आप देखेंगे कि वर्तमान में ज्यादातर स्वदेशी ऑर्डर पीएसयू को जाते हैं। 70 प्रतिशत स्वदेशी ऑर्डर पीएसयू को और 30 प्रतिशत निजी क्षेत्र को जाते हैं।  लेकिन अगले तीन से पांच वर्षों में आप इसका उलटा होता हुआ देखेंगे। 60 से 70 प्रतिशत ऑर्डर निजी उद्योगों को जाएगा। छोटे और मंझोले उद्योग पीछे का काम संभालते हैं। आप देखते हैं कि जब आप एक बड़ी रक्षा प्रणाली बनाते हैं, तो ऑर्डर एचएएल या बीईएल या एलएंडटी जैसी बड़ी कंपनियों को जाता है। लेकिन वे सारा विनिर्माण नहीं करते। आज भारत में कोई भी बड़ी कंपनी अपने दम पर हर चीज़ का उत्पादन नहीं कर सकती है। वे सभी उत्पादन के लिए छोटे और मंझोले उद्योगों पर निर्भर हैं।

  • इसरो के सफलतापूर्वक चंद्रयान 3 मिशन लांच किया, जिसे देखते हुए डीआरडीओ प्रमुख के तौर पर  राष्ट्र के लिए आप क्या संदेश देना चाहेंगे?

राष्ट्र के लिए मेरा संदेश यह है कि बहुत सी ऐसी चीजें हैं जिनके बारे में डीआरडीओ खुलकर बात नहीं कर सकता। इसरो एक नागरिक संगठन है, जबकि डीआरडीओ एक रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन है। हम बहुत से ऐसे उत्पाद बनाते हैं, जिसकी जरुरत देश की सुरक्षा के लिए होती है। लेकिन हम उसके बारे में जानकारियां सार्वजनिक नहीं कर सकते हैं।  इसलिए, हम अपनी कई उपलब्धियों को उजागर नहीं कर पाते क्योंकि देश की रक्षा के लिए उन्हें गुप्त रखना ही बेहतर है। लेकिन मैं आपको यह भी आश्वासन दे सकता हूं कि अगले तीन से पांच वर्षों में आप बहुत सारी सामरिक प्रणालियाँ देखेंगे, जिनके बारे में हम बात कर सकते हैं, जो डीआरडीओ द्वारा विकसित की गई हैं, देश के भीतर उत्पादित की जा रही हैं, और हमारी सेवाओं द्वारा उपयोग की जा रही हैं। इसलिए, हमारे देशवासियों को मेरा संदेश है कि डीआरडीओ सही रास्ते पर है और यह देश का गौरव बढ़ाता रहेगा।

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