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डिजिटल ईस्ट इंडिया कंपनी?

Digital East India Company?

क्या भारत के लोकतंत्र पर विदेशी एल्गोरिद्म का अदृश्य पहरा है?


बिंदिया कुमारी


इतिहास स्वयं को कभी हूबहू नहीं दोहराता, लेकिन वह नए रूपों में अवश्य लौटता है। कभी भारत की संपदा पर अधिकार स्थापित करने के लिए समुद्री जहाज़ आते थे, आज डेटा के रूप में हमारी सबसे मूल्यवान संपत्ति विदेशी सर्वरों तक पहुँचती है। कभी व्यापार के बहाने ईस्ट इंडिया कंपनी आई थी, आज वैश्विक टेक कंपनियाँ नवाचार और डिजिटल सेवाओं के माध्यम से हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुकी हैं। दोनों युगों की परिस्थितियाँ अलग हैं और उनकी तुलना को सीमाओं के साथ ही समझना चाहिए, परंतु एक समानता अवश्य दिखाई देती है—शक्ति का केंद्रीकरण। तब आर्थिक शक्ति धीरे-धीरे राजनीतिक प्रभाव में बदली थी; आज डिजिटल शक्ति सामाजिक, सांस्कृतिक और लोकतांत्रिक प्रभाव का नया माध्यम बन रही है। यही कारण है कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के फेसबुक और इंस्टाग्राम पर साझा किए गए वीडियो की दृश्यता को लेकर उठा विवाद केवल एक तकनीकी घटना नहीं माना जा सकता। मेटा ने बाद में इसे तकनीकी त्रुटि बताते हुए सार्वजनिक रूप से खेद व्यक्त किया, किंतु इस घटना ने एक बड़े प्रश्न को जन्म दिया है—क्या भारत का लोकतांत्रिक संवाद विदेशी एल्गोरिद्म के भरोसे छोड़ा जा सकता है?

यहाँ मूल प्रश्न किसी एक नेता, किसी एक दल या किसी एक वीडियो का नहीं है। मूल प्रश्न उस व्यवस्था का है जिसमें अरबों लोगों के विचार, संवाद, समाचार और राजनीतिक विमर्श कुछ निजी कंपनियों द्वारा विकसित एल्गोरिद्मिक प्रणालियों के माध्यम से संचालित होते हैं। लोकतंत्र में जनता यह तय करती है कि कौन-सा विचार स्वीकार्य होगा और कौन-सा अस्वीकार्य। लेकिन डिजिटल युग में इस प्रक्रिया के बीच एक नया निर्णायक आ गया है—एल्गोरिद्म। वह यह तय करता है कि कौन-सी पोस्ट लाखों लोगों तक पहुँचेगी, कौन-सी पोस्ट सीमित लोगों तक रहेगी और कौन-सी पोस्ट डिजिटल भीड़ में लगभग अदृश्य हो जाएगी। सबसे गंभीर बात यह है कि इस निर्णय की प्रक्रिया आम नागरिकों के लिए लगभग पूरी तरह अपारदर्शी है।

मेटा ने कहा कि यह एक तकनीकी गड़बड़ी थी। यदि ऐसा है, तो उसका स्वागत किया जाना चाहिए कि कंपनी ने सार्वजनिक रूप से त्रुटि स्वीकार की। किंतु लोकतंत्र में केवल क्षमा-याचना पर्याप्त नहीं होती। जवाबदेही उससे आगे की अपेक्षा करती है। यदि तकनीकी त्रुटि थी तो उसका कारण क्या था? किस प्रणाली ने उस सामग्री की दृश्यता को प्रभावित किया? कितने उपयोगकर्ता प्रभावित हुए? भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए कौन-सी तकनीकी और संस्थागत व्यवस्थाएँ विकसित की गई हैं? भारत जैसे लोकतंत्र में इन प्रश्नों का उत्तर केवल सरकार को नहीं, बल्कि जनता को भी मिलना चाहिए। पारदर्शिता आधुनिक लोकतंत्र की अनिवार्य शर्त है।

यह घटना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह पहली बार नहीं है जब वैश्विक टेक कंपनियों की कार्यप्रणाली पर प्रश्न उठे हों। पिछले एक दशक में डेटा गोपनीयता, कैम्ब्रिज एनालिटिका विवाद, चुनावी विज्ञापनों की पारदर्शिता, फर्जी समाचारों के प्रसार, एल्गोरिद्मिक पक्षपात, बच्चों की सुरक्षा और ऑनलाइन सामग्री के नियमन जैसे विषयों पर मेटा सहित अनेक बड़ी तकनीकी कंपनियाँ वैश्विक जांच के दायरे में रही हैं। अमेरिका की कांग्रेस से लेकर यूरोपीय संसद तक और ऑस्ट्रेलिया से लेकर भारत तक, लगभग हर लोकतंत्र में यह प्रश्न पूछा गया है कि आखिर ये कंपनियाँ किस आधार पर यह तय करती हैं कि कौन-सी सामग्री को कितना महत्व मिलेगा।

यही वह बिंदु है जहाँ भारत को अपनी स्थिति स्पष्ट करनी होगी। भारत किसी डिजिटल उपभोक्ता समाज का नाम भर नहीं है। भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। यहाँ लगभग हर प्रमुख वैश्विक सोशल मीडिया मंच का सबसे बड़ा या सबसे बड़ा उपयोगकर्ता आधार मौजूद है। फेसबुक, इंस्टाग्राम और व्हाट्सएप भारत में केवल ऐप नहीं हैं; वे सूचना के विशाल माध्यम हैं। करोड़ों छोटे व्यापारी, विद्यार्थी, पत्रकार, सामाजिक संगठन, राजनीतिक दल और सामान्य नागरिक इन्हीं मंचों के माध्यम से संवाद करते हैं। जब कोई निजी मंच लोकतांत्रिक संवाद का प्रमुख माध्यम बन जाए, तब वह केवल निजी मंच नहीं रह जाता; उसके निर्णय सार्वजनिक महत्व प्राप्त कर लेते हैं।

भारत के संदर्भ में एक और तथ्य महत्वपूर्ण है। मेटा का वैश्विक विज्ञापन कारोबार भारतीय बाजार से अत्यंत गहराई से जुड़ा हुआ है। भारत उसके लिए केवल उपयोगकर्ताओं की संख्या का प्रश्न नहीं है; यह उसके आर्थिक भविष्य का भी महत्वपूर्ण आधार है। ऐसे में यह अपेक्षा असंगत नहीं कही जा सकती कि भारत के लोकतांत्रिक संस्थानों, संवैधानिक गरिमा और सार्वजनिक विमर्श के प्रति कंपनी सर्वोच्च स्तर की पारदर्शिता और उत्तरदायित्व का परिचय दे। व्यापार का अधिकार किसी भी विदेशी कंपनी को यह अधिकार नहीं देता कि वह अपारदर्शी प्रणालियों के माध्यम से सार्वजनिक संवाद को प्रभावित करे।

यहाँ एक व्यापक वैचारिक प्रश्न भी खड़ा होता है। क्या डिजिटल युग में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ केवल सामग्री प्रकाशित कर देना है? या फिर यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि किसी सामग्री की पहुँच को कृत्रिम रूप से सीमित न किया जाए? यदि किसी मंच की अनुशंसा प्रणाली या एल्गोरिद्म बिना स्पष्ट कारण के किसी सार्वजनिक महत्व की सामग्री की पहुँच घटा देता है, तो क्या वह लोकतांत्रिक संवाद को प्रभावित नहीं करता? आधुनिक लोकतंत्रों को अब इस नए प्रश्न का उत्तर देना होगा। सेंसरशिप केवल सामग्री हटाने का नाम नहीं है; कभी-कभी सामग्री को अदृश्य बना देना भी लोकतांत्रिक प्रभाव को कम कर सकता है।

पिछले कुछ वर्षों में यूरोप ने इसी चुनौती को समझते हुए डिजिटल सर्विसेज़ एक्ट (Digital Services Act) जैसे व्यापक नियामकीय ढाँचे विकसित किए हैं। इनका उद्देश्य इंटरनेट की स्वतंत्रता को सीमित करना नहीं, बल्कि बड़ी तकनीकी कंपनियों को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाना है। भारत ने भी डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन कानून और अन्य डिजिटल सुधारों के माध्यम से एक दिशा निर्धारित की है। लेकिन अब आवश्यकता केवल डेटा संरक्षण तक सीमित नहीं रह गई है। अब एल्गोरिद्मिक पारदर्शिता भी उतनी ही महत्वपूर्ण हो चुकी है। यदि एल्गोरिद्म सार्वजनिक विमर्श को प्रभावित कर सकते हैं, तो उनकी जवाबदेही पर भी गंभीर राष्ट्रीय चर्चा होनी चाहिए।

भारत ने पिछले दस वर्षों में डिजिटल क्षेत्र में अभूतपूर्व परिवर्तन देखा है। आधार, यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI), डिजिलॉकर, कोविन और डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना ने विश्व को यह दिखाया कि भारत केवल तकनीक का उपभोक्ता नहीं, बल्कि नवाचार का अग्रणी राष्ट्र भी बन सकता है। आज अनेक देश भारत के डिजिटल मॉडल का अध्ययन कर रहे हैं। किंतु एक विडंबना यह भी है कि जिस देश ने डिजिटल भुगतान की विश्वस्तरीय व्यवस्था विकसित की, वही देश आज भी अपने सामाजिक संवाद के लिए विदेशी प्लेटफ़ॉर्मों पर अत्यधिक निर्भर है। यही वह क्षेत्र है जहाँ आत्मनिर्भरता की अगली यात्रा प्रारंभ होनी चाहिए।

आत्मनिर्भर भारत का अर्थ कभी भी आत्मविरोधी भारत नहीं रहा। भारत ने हमेशा वैश्विक निवेश और तकनीकी सहयोग का स्वागत किया है। लेकिन स्वागत और समर्पण में अंतर होता है। विदेशी पूंजी का स्वागत हो सकता है, विदेशी तकनीक का स्वागत हो सकता है, विदेशी निवेश का स्वागत हो सकता है; किंतु भारत के लोकतांत्रिक संवाद पर किसी भी प्रकार का अपारदर्शी प्रभाव स्वीकार नहीं किया जा सकता। यह सिद्धांत किसी एक कंपनी के लिए नहीं, बल्कि प्रत्येक डिजिटल मंच के लिए समान रूप से लागू होना चाहिए।

कुछ लोग यह तर्क देते हैं कि सोशल मीडिया निजी कंपनियाँ हैं, इसलिए उन्हें अपने मंच पर नियम बनाने का अधिकार है। सिद्धांततः यह बात सही है। लेकिन जब कोई मंच अरबों लोगों के सार्वजनिक संवाद का प्रमुख माध्यम बन जाए, तब वह केवल निजी मंच नहीं रह जाता। जिस प्रकार बैंक निजी हो सकते हैं, किंतु बैंकिंग व्यवस्था सार्वजनिक नियमन के अधीन रहती है; जिस प्रकार दूरसंचार कंपनियाँ निजी हो सकती हैं, किंतु स्पेक्ट्रम राष्ट्रीय संपत्ति होने के कारण उनका नियमन होता है; उसी प्रकार डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म भी सार्वजनिक उत्तरदायित्व से पूरी तरह मुक्त नहीं हो सकते।

इस बहस का एक सांस्कृतिक आयाम भी है। भारत केवल एक राजनीतिक इकाई नहीं है; यह एक प्राचीन सभ्यता है। हमारी सभ्यता ने सदैव विचारों के मुक्त आदान-प्रदान को महत्व दिया है। उपनिषदों की संवाद परंपरा, शास्त्रार्थ की परंपरा, बौद्ध संघों की खुली बहसें, नालंदा और तक्षशिला की ज्ञान परंपरा—इन सबका मूल तत्व था खुला संवाद। विडंबना यह होगी यदि इक्कीसवीं सदी में भारत का संवाद किसी ऐसे एल्गोरिद्मिक ढाँचे के अधीन हो जाए, जिसकी कार्यप्रणाली भारत के नागरिकों से ही छिपी हो।

भारत को डिजिटल स्वराज की आवश्यकता है। महात्मा गांधी का स्वराज केवल राजनीतिक स्वतंत्रता तक सीमित नहीं था; वह आत्मनिर्भरता, आत्मविश्वास और आत्मनिर्णय की अवधारणा थी। आज उसी भावना को डिजिटल युग में पुनर्परिभाषित करने की आवश्यकता है। डिजिटल स्वराज का अर्थ इंटरनेट पर दीवारें खड़ी करना नहीं है। इसका अर्थ यह भी नहीं कि विदेशी कंपनियों को भारत से बाहर कर दिया जाए। इसका वास्तविक अर्थ है कि भारत के नागरिकों के अधिकार, भारत के कानूनों के अनुसार सुरक्षित हों; भारत के लोकतांत्रिक विमर्श का संचालन पारदर्शी नियमों के अंतर्गत हो; और किसी भी डिजिटल मंच को यह स्पष्ट रूप से बताना पड़े कि उसके एल्गोरिद्मिक निर्णय किन सिद्धांतों पर आधारित हैं।

इस दिशा में भारत को तीन स्तरों पर आगे बढ़ना होगा। पहला, एल्गोरिद्मिक पारदर्शिता के लिए स्पष्ट नियामकीय मानक विकसित किए जाएँ। दूसरा, बड़ी तकनीकी कंपनियों के लिए स्वतंत्र तकनीकी ऑडिट और शिकायत निवारण की अधिक प्रभावी व्यवस्था बनाई जाए। तीसरा, भारतीय डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र को इतना सशक्त बनाया जाए कि देश के पास वैश्विक मंचों पर वास्तविक विकल्प उपलब्ध हों। प्रतिस्पर्धा ही अंततः सबसे प्रभावी उत्तरदायित्व सुनिश्चित करती है।

आज की सबसे बड़ी चुनौती यह नहीं कि किसी एक वीडियो की दृश्यता कम हुई या नहीं। सबसे बड़ी चुनौती यह है कि क्या भारत भविष्य में ऐसी किसी भी स्थिति के लिए संस्थागत रूप से तैयार है? क्या हमारे पास ऐसे नियम हैं जो किसी भी मंच से पारदर्शिता सुनिश्चित कर सकें? क्या हमारे नागरिक यह जानने का अधिकार रखते हैं कि उनकी सामग्री की पहुँच क्यों सीमित हुई? क्या लोकतंत्र में एल्गोरिद्म भी सार्वजनिक विमर्श के दायरे में आने चाहिए? यही वे प्रश्न हैं जिनका उत्तर आने वाले वर्षों में भारत को देना होगा।

मेटा के लिए यह घटना आत्ममंथन का अवसर है। यदि वास्तव में यह तकनीकी त्रुटि थी, तो उसे केवल खेद व्यक्त करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उसे अपनी प्रणालियों में सुधार, पारदर्शिता और उपयोगकर्ताओं के विश्वास को मजबूत करने के लिए ठोस कदम सार्वजनिक रूप से बताने चाहिए। और भारत के लिए यह समय है कि वह डिजिटल शासन के अगले चरण में प्रवेश करे—जहाँ नवाचार और स्वतंत्रता के साथ-साथ जवाबदेही, पारदर्शिता और राष्ट्रीय हित भी समान रूप से सुरक्षित हों।

स्वतंत्रता केवल सीमाओं की रक्षा से सुरक्षित नहीं रहती; सूचना की स्वतंत्रता, विचारों की निष्पक्ष पहुँच और लोकतांत्रिक संवाद की स्वायत्तता भी उसकी आधारशिला हैं। इक्कीसवीं सदी में भारत की सबसे बड़ी लड़ाइयों में से एक डिजिटल संप्रभुता की भी होगी। यह संघर्ष किसी कंपनी के विरुद्ध नहीं, बल्कि उस सोच के विरुद्ध है जो मानती है कि विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के सार्वजनिक विमर्श पर अंतिम अधिकार कुछ अपारदर्शी एल्गोरिद्म का हो सकता है।

भारत ने राजनीतिक उपनिवेशवाद को पराजित किया, आर्थिक आत्मविश्वास की दिशा में लंबी यात्रा की और अब वह तकनीकी शक्ति बनने की ओर अग्रसर है। अगला चरण डिजिटल स्वराज का है। भारत को दुनिया से जुड़ना है, दुनिया का नेतृत्व भी करना है, लेकिन अपनी लोकतांत्रिक चेतना और राष्ट्रीय संप्रभुता की कीमत पर नहीं। विदेशी तकनीक का स्वागत है, विदेशी निवेश का स्वागत है, वैश्विक सहयोग का भी स्वागत है—परंतु भारत की लोकतांत्रिक आवाज़ पर किसी अदृश्य डिजिटल पहरे का नहीं। यही इक्कीसवीं सदी के भारत का स्पष्ट और आत्मविश्वासी संदेश होना चाहिए।

(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)

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