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धनुयात्रा महोत्सव : आस्था, लोकनाट्य और जनजीवन का उत्सव

Dhanu Yatra Festival: A celebration of faith, folk theatre and public life

द्वापर युग और कंस के अत्याचारी शासन को समाप्त हुए सदियां बीत चुकी  हैं। कंस अब नाटकों,  कथाओ, लीलाओं में ही नजर आता है। परंतु ओड़िशा में अभी भी एक स्थान हैं जंहा प्रति वर्ष कंस ग्यारह दिनों के लिये न केवल जीवित हो जाता है बल्कि अपना  समानांतर शासन भी चलाता है। इस नगर के लोग ग्यारह दिनों तक अपने को कंस की प्रजा मानने में गर्व का अनुभव करते हैं। आज्ञा न मानने पर महाराज कंस लोगों को दंडित भी करता है। फिर श्रीकृष्ण और बलराम मथुरा आकर कंस का वध करते हैं और लोगों को मुक्त कराते हैं। यह सब हिस्सा है अनोखी अनूठी सांस्कृतिक उत्सव धनुजात्रा का।  इसकी आयोजन स्थली है  पश्चिम ओड़िशा के "चावल की हांडी" के रूप में विख्यात बरगढ़ नगर। 
पौष शुक्ल पंचमी को आरंभ होकर पौष पूर्णिमा के बीच ग्यारह दिनो के लिये बरगढ़ बन जाता है मथुरा और यंहा की निवासी हो जाते हैं कंस की प्रजा। यह नगर न केवल मथुरा बन जाता है बल्कि साथ सटा गांव अम्बापली भी गोप नगरी बन जाता है। इन दोनों के बीच बहने वाली जीरा नदी यमुना बन जाती है। इस क्षेत्र के लोग कलाकार, दर्शक बन जाते हैं। 
अपने शासन के दौरान महाराज कंस हाथी पर बैठकर अपने दरबारियों के साथ नगर परिक्रमा करते हैं। वे नगर की विधि व्यवस्था, सफाई व्यवस्था, अतिथियों के रहने, खान पान नजर रखते हैं। गलती होने पर उन्हें दंडित करते है जिसे लोग सहर्ष स्वीकार भी करते हैं। आम लोगों के साथ इनमें सरकारी अधिकारी, विधायक, मंत्री, पर्यटक भी उनके आदेशों का पालन करते हैं। 1994 में तत्कालीन मुख्यमंत्री बीजू पटनायक भी कंस के समक्ष जुर्माना भर चुके हैं
ओड़िशा की समृद्ध लोकसंस्कृति और जीवं परंपराओं में धनुजात्रा एक ऐसा लोकनाट्य महोत्सव है, जो न केवल ओड़िशा बल्कि पूरे विश्व में अपनी विशिष्ट पहचान रखता है। लोकनाटक शैली में आयोजित होने वाले यह नाटक बरगढ़ और साथ सटे अम्बपाली गांव के पांच किलोमीटर परिधि में अभिनीत की जाती है। अपने अद्वितीय स्वरूप के कारण इसे दुनिया का सबसे बड़ा खुला रंगमंच माना जाता है।

इस ग्यारह दिवसीय 

नाट्य महोत्सव की कथावस्तु श्रीमद्भागवत गीता के दसवें अध्याय, अच्युतानंद के हरिवंश पुराण, श्रीकृष्ण बाललीला,  राधा कृष्ण लीला पर आधारित होती है। इसमें देवकी वासुदेव विवाह, श्रीकृष्ण जन्म, उनकी बाललीला, राधा के  साथ रासलीला, असुर वध, अक्रूर के साथ आगमन और कंस का वध आदि का मंचन गांव व नगर के विभिन्न स्थानों पर होता है। 
प्रतिदिन दोपहर 3 बजे से रात 9 बजे तक विभिन्न स्थलों पर सभी प्रसंग मंचित होते हैं। यह मंचन स्थिर नहीं रहता, बल्कि कथा के अनुसार नगर के अलग-अलग हिस्सों में चलता रहता है।
एक तरफ  बरगढ़ मथुरा बन जाता है जंहा कंस  शासन करता हैं दूसरी  ओर नगर के बीच से बहने वाली जीरा नदी यमुना का स्वरूप धारण कर लेती है और उसके उस पार स्थित अम्बापाली गांव पौराणिक गोपपुर (गोकुल) बन जाता है। यहां मंच, पर्दा या दर्शक दीर्घा नहीं होती—पूरा नगर ही रंगमंच बन जाता है।
अम्बपाली गांव (गोप नगरी) में श्री कृष्ण अपनी लीलाएं करते रहते हैं।  इसी गांव के दो ब्राह्मण बालकों को कृष्ण व बलराम की भूमिका के लिये चुना जाता है। गांव के सारे बालक सखा और बालिकाएं गोपियां बन जाती है। यंहा कृष्ण लीला के सारे प्रसंग गोपियों के वस्त्रहरण,  गोवर्धन पर्वत धारण, कालिया नाग दलन, पूतना वध का मंचन किया जाता है। 
धनुजात्रा के ग्यारह दिनों तक अम्बपाली गांव के सभी लोग शाकाहार का पालन करते हैं। 
इस लोकनाटक में कुछ मुख्य कलाकारों का ही चयन किया जाता है।  अन्य लोग स्वत स्फूर्त इसमें शामिल होते हैं। सभी शौकिया होते हैं।  कलाकार कोई अभ्यास नहीं करते हैं। न ही कोई लिखित संवाद कंठस्थ करते हैं। बल्कि समय, स्थान, काल, पात्र अनुसार तत्कालीक बुद्धि का उपयोग कर संवाद बोलते हैं। दर्शक गण एक स्थान से दूसरे स्थान जाते हैं। 
धनुयात्रा की सबसे बड़ी विशेषता इसकी जन–भागीदारी है। यहां केवल कलाकार ही नहीं, बल्कि आम नागरिक भी कथा के पात्र बन जाते हैं। दुकानदार, किसान, छात्र—हर कोई किसी न किसी भूमिका में दिखाई देता है। दर्शक और कलाकार के बीच की दूरी समाप्त हो जाती है और लोकनाट्य जीवन का स्वाभाविक हिस्सा बन जाता है।

कंस: खलनायक नहीं, लोकनायक धनुयात्रा में कंस का पात्र विशेष

आकर्षण का केंद्र होता है। अपनी सशक्त संवाद शैली और तीखे व्यंग्य के माध्यम से कंस समकालीन सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर भी टिप्पणी करता है। उत्सव के दौरान प्रतीकात्मक रूप से बरगढ़ नगर पर कंस का शासन होता है। उसके आदेश लागू माने जाते हैं और वह नागरिकों पर जुर्माना तक लगा सकता है। कई बार मुख्यमंत्री, मंत्री, सांसद और विधायक भी कंस के दरबार में दिखाई देते हैं। कंस का सुसज्जित हाथी पर नगर भ्रमण दर्शकों को विशेष रूप से आकर्षित करता है। उपलब्ध तथ्य अनुसार 1915 में इसकी शुरुआत हुई। पर दो वर्ष बाद बंद हो गया।  फिर 1947- 48 में शुरू हुआ जो अबतक चल रहा है। 

विश्व का सबसे बड़ा खुला रंगमंच

लगभग पाँच वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैली धनुयात्रा दो पूरे गांवों और एक नगर को मंच में बदल देती है। इस अद्वितीय परिकल्पना के कारण इसे गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में भी स्थान प्राप्त है। खुले आकाश के नीचे, वास्तविक परिवेश में मंचित यह लोकनाट्य दर्शकों को इतिहास, संस्कृति और भक्ति के अद्भुत संसार में ले जाता है। वास्तव में, खुले आकाश के नीचे इतने व्यापक स्तर पर आयोजित ऐसा जीवंत लोकनाट्य देश के किसी अन्य हिस्से में दुर्लभ है। धनुयात्रा ओड़िशा की सांस्कृतिक आत्मा का उत्सव है—जहां इतिहास, भक्ति और लोकजीवन एक साथ मंच पर उतर आते हैं।

लोककला का जीवंत संगम

धनुयात्रा केवल धार्मिक आयोजन नहीं है। इसमें लोकनृत्य, लोकसंगीत, संवाद-कला, पारंपरिक वेशभूषा और जीवनशैली का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है। यह उत्सव ओड़िशा की लोकनाट्य परंपरा को जीवित रखने का सशक्त माध्यम है और नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ता है।

 

सतीश शर्मा
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)

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