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भारत में रिकॉर्ड खा‌द्यान्न उत्पादन के बावजूद क्या गेहूं और चावल निर्यात फिर होगा बैन ?

Despite record food grain production in India, will wheat and rice exports be banned again?

 


 सुरेश मनचन्दा

 

भारत आज विश्व की सबसे बड़ी खा‌द्यान्न अर्थव्यवस्थाओं में से एक बन चुका है। देश ने पिछले कुछ वर्षों में लगातार रिकॉर्ड गेहूं, चावल और मक्का उत्पादन कर दुनिया को यह संदेश दिया है कि भारत केवल अपनी 140 करोड़ आबादी का पेट भरने वाला देश नहीं रहा, बल्कि अब वैश्विक खा‌द्यान्न सुरक्षा में भी बड़ी भूमिका निभाने की क्षमता रखता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल रिकॉर्ड उत्पादन ही खाद्यान्न सुरक्षा की गारंटी है? क्या विश्व में बन रहे युद्ध जैसे हालात, अल-निनो, जलवायु परिवर्तन, कच्चे तेल की कीमतों में उछाल और वैश्विक आर्थिक अस्थिरता भारत को एक बार फिर गेहूं और चावल निर्यात पर प्रतिबंध लगाने की ओर धकेल सकते हैं?

आज यह प्रश्न इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि भारत ने 2025-26 में रिकॉर्ड उत्पादन के बाद चावल निर्यात को पूरी तरह खोल दिया और 2026 में 50 लाख टन गेहूं तथा 10 लाख टन गेहूं से बने उत्पादों के निर्यात की अनुमति भी दे दी। इसके साथ सरकार ने गेहूं पर स्टॉक लिमिट हटाकर बाजार को खुला संकेत दिया कि देश खा‌द्यान्न के मामले में पूरी तरह सुरक्षित स्थिति में है। लेकिन इसी समय विश्व बाजार में जो घटनाएं घट रही हैं, वे आने वाले समय के लिए गंभीर चेतावनी भी दे रही हैं।

साल 2021-22 में रूस और यूक्रेन युद्ध शुरु हुआ तो दुनिया के सामने सबसे बड़ा संकट केवल ऊर्जा का नहीं बल्कि खाद्यान्न आपूर्ति का भी पैदा हुआ। रूस और यूक्रेन दुनिया के सबसे बड़े गेहूं निर्यातकों में गिने जाते हैं। युद्ध के कारण काला सागर क्षेत्र से गेहूं की आपूर्ति बाधित हुई और विश्व बाजार में गेहूं की कीमतों में ऐतिहासिक उछाल देखने को मिला।

भारत में भी इसका सीधा असर दिखाई दिया। घरेलू बाजार में गेहूं की कीमतें बढ़कर 3300 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गई। किसानों और व्यापारियों को पहली बार लगा कि भारतीय गेहूं विश्व बाजार में प्रतिस्पर्धा कर सकता है। परिणामस्वरूप भारत से 2021-22 में रिकॉर्ड 72 लाख टन गेहूं निर्यात हुआ। यह भारत के लिए एक बड़ी उपलब्धि थी क्योंकि लंबे समय तक भारत विश्व गेहूं बाजार में बड़ी भूमिका नहीं निभा पाया था।

लेकिन इसके साथ एक दूसरी चिंता भी पैदा हुई। घरेलू बाजार में आटा और गेहूं महंगा होने लगा। सरकार को डर था कि अगर निर्यात ऐसे ही जारी रहा तो देश में खाद्य महंगाई बढ़ सकती है और इसका सीधा असर गरीब उपभोक्ताओं पर पड़ेगा। यही कारण था कि 2022-23 में सरकार ने अचानक गेहूं निर्यात पर रोक लगा दी। बाद में चावल निर्यात पर भी कई प्रकार की पाबंदियां लगा दी गईं।

उस समय सरकार का निर्णय राजनीतिक और आर्थिक दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण था। क्योंकि भारत में खाद्य महंगाई केवल आर्थिक मुद्दा नहीं बल्कि सामाजिक और राजनीतिक स्थिरता से भी जुड़ा हुआ विषय है।

रिकॉर्ड उत्पादन के बावजूद बढ़ती चिंता

साल 2025-26 में भारत ने फिर से नया इतिहास रचा। चावल उत्पादन 1540 लाख टन के साथ विश्व में सबसे ऊपर पहुंच गया। गेहूं उत्पादन 1200 लाख टन के पार चला गया। मक्का उत्पादन 440 लाख टन से अधिक दर्ज किया गया। पहली नजर में ऐसा लगा कि अब भारत पूरी तरह खाद्यान्न सुरक्षित देश बन

चुका है।

इन्हीं आंकड़ों के आधार पर सरकार ने चावल निर्यात को फिर से खोल दिया। गेहूं निर्यात की अनुमति दी गई। स्टॉक लिमिट हटा दी गई। लेकिन इसी समय विश्व बाजार में कई ऐसे संकेत उभरने लगे जिन्होंने नई चिंता पैदा कर दी।

विश्व के कई प्रमुख उत्पादक देशों में मौसम खराब होने लगा। अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में अल-निनो और कमजोर मानसून के चलते उत्पादन घटने की आशंका बढ़ गई। अनुमान लगाए जाने लगे कि इन देशों में गेहूं उत्पादन 15 से 20 प्रतिशत तक कमजोर हो सकता है। रूस में भी उत्पादन को लेकर अनिश्चितता बढ़ने लगी।

भारत में भी मौसम वैज्ञानिकों ने अल-निनो की संभावना 82 प्रतिशत तक बताई। यानी मानसून कमजोर रहने का खतरा बढ़ गया। यदि बारिश कम होती है तो इसका सीधा असर खरीफ फसलों विशेषकर धान पर पड़ेगा। और यदि धान प्रभावित होता है तो अगले रबी सीजन में गेहूं उत्पादन भी दबाव में आ सकता है।

सबसे बड़ी चिंता यह है कि इस बार अल-निनो को "सुपर अल-निनो" कहा जा रहा है। इसका मतलब यह है कि इसका असर केवल एक सीजन तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि 2027 तक कृषि उत्पादन प्रभावित हो सकता है।

क्या भारत फिर उसी स्थिति की

ओर बढ़ रहा है?

भारत के सामने आज सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या रिकॉर्ड उत्पादन के आधार पर निर्यात को पूरी तरह खुला छोड़ देना सही रणनीति होगी? या फिर सरकार को भविष्य के खतरों को देखते हुए सतर्क रहना चाहिए?

आज देश में बफर स्टॉक जरूरत से लगभग तीन गुना अधिक है। भारतीय खाद्य निगम के गोदाम भरे पड़े हैं। लेकिन इतिहास यह बताता है कि खा‌द्यान्न संकट अचानक पैदा होता है। 2007-08 का वैश्विक खाद्य संकट इसका सबसे बड़ा उदाहरण है जब दुनिया भर में चावल की कीमतें अचानक कई गुना बढ़ गई थीं और कई देशों में खा‌द्यान्न दंगे तक देखने को मिले थे।

अगर भारत तेजी से निर्यात करता है और अगले 1-2 वर्षों में उत्पादन प्रभावित हो जाता है तो सरकार के सामने फिर वही स्थिति पैदा हो सकती है

देश के बड़े हिस्से में सिंचाई व्यवस्था मजबूत होने के बावजूद बारिश का महत्व कम नहीं हुआ है। खासतौर पर धान, दालें, तिलहन और मक्का जैसी फसलें सीधे मानसून की स्थिति पर निर्भर करती हैं।

अल-निनो की स्थिति बनने पर सामान्यतः भारत में मानसून कमजोर रहता है। बारिश कम होती है, तापमान बढ़ता है और सूखे जैसे हालात बनते हैं। इसका असर केवल उत्पादन पर नहीं बल्कि फसल की गुणवत्ता पर भी पड़ता है।

यदि धान और गेहूं उत्पादन 10-15 प्रतिशत भी घटता है तो इसका असर केवल घरेलू बाजार तक सीमित नहीं रहेगा। भारत दुनिया का सबसे बड़ा चावल निर्यातक देश है। भारत के निर्यात में कमी आते ही विश्व बाजार में कीमतों में विस्फोटक तेजी देखी जा सकती है।

इसी तरह गेहूं पर भी बढ़ते तापमान का असर स्पष्ट दिखाई देने लगा है। पिछले कुछ वर्षों में मार्च महीने की गर्मी ने गेहूं की पैदावार को प्रभावित किया। समय से पहले गर्म हवाएं चलने लगीं। इससे दाने का आकार छोटा हुआ और उत्पादन प्रभावित हुआ।

अगर आने वाले दो वर्षों तक यही स्थिति रहती है तो भारत का रिकॉर्ड उत्पादन तेजी से नीचे आ सकता है।

वैश्विक युद्ध और आर्थिक संकट का असर

खाद्यान्न बाजार केवल मौसम से नहीं बल्कि भू-राजनीतिक घटनाओं से भी प्रभावित होता है। आज ईरान-अमेरिका तनाव और खाड़ी क्षेत्र में अस्थिरता ने पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करना शुरू कर दिया है।

कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आने लगी है। डॉलर मजबूत हो रहा है। परिवहन लागत बढ़ रही है। इसका असर खाद्यान्न बाजार पर भी पड़ना तय है।

डीजल महंगा होगा तो खेती की लागत बढ़ेगी। उर्वरक महंगे होंगे। ट्रांसपोर्ट महंगा होगा। अंततः खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ेंगी।

विश्व बाजार में रूस का गेहूं पहले ही एक साल के उच्चतम स्तर पर पहुंच चुका है। अमेरिका में 1980 के बाद सबसे कमजोर उत्पादन की चर्चा हो रही है। ऑस्ट्रेलिया में मौसम संकट बना हुआ है।

ऐसी स्थिति में यदि भारत निर्यात जारी रखता है तो घरेलू बाजार में भी तेजी का दबाव बढ़ सकता है।

दालों और खाद्य तेलों में बढ़ती महंगाई

स्थिति केवल गेहूं और चावल तक सीमित नहीं है। देश में चना, दालों और खाद्य तेलों की कीमतों में भी तेजी देखने को मिल रही है।

बीते एक महीने में कई दालों के थोक भाव में 15 प्रतिशत से अधिक की तेजी दर्ज की गई है। खाद्य तेल पहले ही ऊंचे स्तर पर बने हुए हैं।

अगर मौसम खराब रहता है और उत्पादन घटता है तो सरकार को फिर से आयात शुल्क कम करने या हटाने जैसे कदम उठाने पड़ सकते हैं।

यानी आने वाला समय केवल खाद्यान्न नहीं बल्कि संपूर्ण खाद्य सुरक्षा के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

खाड़ी देशों की बढ़ती चिंता

ईरान-अमेरिका तनाव का सबसे ज्यादा असर खाड़ी देशों पर पड़ रहा है। ये देश पहले से ही खाद्यान्न सुरक्षा को लेकर गंभीर रहे हैं क्योंकि उनकी अपनी कृषि क्षमता सीमित है।

लेकिन अब खाड़ी देश केवल अल्पकालिक आयात पर निर्भर रहने के बजाय दीर्घकालिक खाद्यान्न सुरक्षा रणनीति पर काम कर रहे हैं।

वे विदेशों में कृषि भूमि खरीद रहे हैं। भारत, अफ्रीका और एशिया के कई देशों में निवेश बढ़ा रहे हैं। खाद्यान्न भंडारण क्षमता बढ़ा रहे हैं।

इसका मतलब साफ है कि दुनिया आने वाले समय में खा‌द्यान्न को केवल व्यापारिक वस्तु नहीं बल्कि रणनीतिक संसाधन के रूप में देखने लगी है।

(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)

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