जाति-आधारित जनगणना की अच्छाई और बुराई पर देश में कई वर्षों से चर्चा हो रही है। इसके समर्थकों का तर्क है कि जातीय जनगणना से सामाजिक असमानता को दूर करने और संसाधनों के समान वितरण को सुनिश्चित करने के लिए जरुरी आंकड़े मिल सकते हैं। लेकिन गौर से देखने पर महसूस होता है कि इसके बहुत से हानिकारक परिणाम भी हैं। इसे देखते हुए यह जानना जरुरी हो जाता है कि जाति जनगणना भारत के सामाजिक ताने-बाने, प्रशासन और समग्र विकास के लिए हानिकारक क्यों दिखाई देती है। जाति जनगणना के खिलाफ सबसे मजबूत तर्क यह है कि यह भारत में विभाजनकारी जाति व्यवस्था को मजबूत बनाता है। लोगों को उनकी जाति के आधार पर बांटने से यह संदेश जाता है कि अलग-अलग समुदायों के बीच एकता और एकीकरण जरुरी नहीं बल्कि उनकी जातीय पहचान ज्यादा जरुरी है। इससे जाति-आधारित भेदभाव और भी गहरा हो सकता है, जो कि सामाजिक संघर्ष और विभाजन को जन्म देता है। जाति-आधारित जनगणना की वजह से राजनीतिक दांव-पेंच जोर पकड़ सकते है। राजनेता इसके आंकड़ों का उपयोग जाति-आधारित पहचान की राजनीति को बढ़ावा देने और अपने जातिगत वोट बैंक को सुरक्षित करने में कर सकते हैं, जिससे उनकी सत्ता सुरक्षित रहे, भले ही समाज में विभाजन की लकीरें और गहरी हो जाएं। वास्तव में यह नीति-आधारित राजनीति के विकास में बाधा उत्पन्न करेगा और नेताओं को विशिष्ट जातिगत हितों की पूर्ति के लिए फैसले लेने के लिए प्रेरित करेगा। जाति जनगणना के समर्थकों का तर्क है कि इससे संसाधनों के समान वितरण और विकास के कार्यक्रमों को लागू करने में मदद मिलेगी। लेकिन सच तो यह है कि आदर्श स्थिति में संसाधनों का वितरण सामाजिक-आर्थिक कारकों पर आधारित होना चाहिए न कि जाति पर। जाति-आधारित जनगणना से कल्याणकारी योजनाओं के वास्तविक और योग्य लाभार्थियों की पहचान करने में अशुद्धियाँ और कठिनाइयाँ हो सकती हैं। जिसके परिणामस्वरूप संसाधनों का दुरुपयोग हो सकता है। जाति के आधार पर डेटा एकत्र करना महत्वपूर्ण गोपनीयता संबंधी चिंताएँ भी पैदा करता है। इसके दुरुपयोग और भेदभाव की संभावना के कारण व्यक्ति अपनी जाति का खुलासा करने में अनिच्छुक हो सकते हैं। इससे आंकड़ों के एकत्रीकरण में अशुद्धियाँ हो सकती हैं और जनगणना की विश्वसनीयता कम हो सकती है, जिसकी वजह से इसका पूरा उद्देश्य ही विफल हो सकता है।
भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में जाति जनगणना कराना एक बहुत बड़ा प्रशासनिक कार्यक्रम है। जातीय जनगणना की वजह से पड़ने वाला वित्तीय और प्रशासनिक बोझ, स्वास्थ्य, शिक्षा और बुनियादी ढांचे के विकास जैसी अन्य जरूरी कार्यों की प्रगति को धीमा कर सकता है। जाति-आधारित जनगणना से तनाव भड़कने और हिंसा होने की संभावना है, क्योंकि अलग-अलग समूह लाभ पाने के लिए आपस में प्रतिस्पर्धा और संघर्ष पर उतारु हो सकते हैं। भारत में जातीय संघर्षों का लंबा इतिहास रहा है। जिसे देखते हुए जातीय जनगणना आयोजित करने से अनजाने में आक्रोश और संघर्ष की आग भड़क सकती है। नतीजे के तौर पर, हो सकता है कि जाति जनगणना के पीछे नेक इरादे मौजूद हों, जैसे कि ऐतिहासिक अन्याय और असमानताओं को दूर करने की कोशिश करना, लेकिन इससे जुड़े संभावित नुकसान और खतरों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। यह उन विभाजनों को फिर से स्थापित कर सकता है, जिन्हें खत्म करने की सौगंध हमारे संविधान ने उठाई है। यह राजनीतिक उठापटक का एक नया अध्याय शुरु कर सकता है, संसाधनों पर अनावश्यक बोझ डाल सकता है, गोपनीयता से समझौता करता है और यहां तक कि समाज में हिंसा को भी बढ़ावा दे सकता है। सामाजिक असमानता को दूर करने और जाति-आधारित जनगणना का सहारा लिए बिना समान विकास सुनिश्चित करने के लिए वैकल्पिक तरीके खोजना जरुरी है। क्योंकि जातीय जनगणना भारत के सामाजिक ताने-बाने, प्रशासन और समग्र विकास को नुकसान पहुंचा सकता है। इसके बजाय, सामाजिक-आर्थिक स्थितियों पर आधारित समावेशी नीतियों पर ध्यान केंद्रित करने से देश के हितों और आकांक्षाओं को बेहतर ढंग से पूरा किया जा सकता है।

दीपक कुमार रथ
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