लेखक- - सुबोध चंद्र
प्रांत संगठन मंत्री, विश्व हिन्दू परिषद्
इन्द्रप्रस्थ प्रांत
भारत की सभ्यता और संस्कृति का मूल आधार ग्राम्य जीवन रहा है। हमारे गांव केवल निवास के स्थान नहीं थे, बल्कि आत्मनिर्भरता, सामाजिक समरसता, प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता और आर्थिक स्वावलंबन के केंद्र थे। भारतीय जीवन-दृष्टि ने सदैव मनुष्य, प्रकृति और समस्त जीव-जगत के बीच संतुलित संबंध स्थापित करने का प्रयास किया है। इसी कारण यहां गाय को केवल एक पशु के रूप में नहीं, बल्कि ग्राम व्यवस्था, कृषि, पर्यावरण और मानव जीवन की आधारशिला के रूप में देखा गया। यदि भारतीय ग्राम व्यवस्था को एक विशाल वृक्ष माना जाए तो गाय उसकी जड़, प्रकृति उसका आधार और आत्मनिर्भरता उसका फल है। इसीलिए कहा जा सकता है कि गाय, ग्राम और प्रकृति आत्मनिर्भर भारत की त्रिवेणी हैं।
भारतीय संस्कृति में गाय का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। वेदों में गाय को "अघ्या" कहा गया है, अर्थात् जिसे किसी प्रकार की हानि नहीं पहुंचाई जानी चाहिए। ऋग्वेद में कहा गया है-
"गावो विश्वस्य मातरः"
अर्थात् गाय सम्पूर्ण विश्व की माता है।
यह केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं है, बल्कि गाय द्वारा मानव जीवन को मिलने वाले बहुआयामी योगदान का सम्मान भी है। भारतीय समाज ने हजारों वर्षों के अनुभव से यह समझा कि गाय केवल दूध देने वाला पशु नहीं, बल्कि संपूर्ण कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का आधार है।
आज विश्व जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण प्रदूषण, भूमि क्षरण, जल संकट और रासायनिक कृषि के दुष्परिणामों से जूझ रहा है। ऐसे समय में भारत की परंपरागत गो-आधारित कृषि और ग्राम व्यवस्था विश्व को एक व्यवहारिक विकल्प प्रदान कर सकती है। आधुनिक विज्ञान भी अब इस तथ्य को स्वीकार कर रहा है कि टिकाऊ विकास का मार्ग प्रकृति के साथ संघर्ष नहीं, बल्कि उसके साथ सामंजस्य स्थापित करने में निहित है।
भारत में गिर, साहीवाल, थारपारकर, राठी, कांकरेज, लाल सिंधी, हरियाणा, ओंगोल, देवनी, मालवी तथा नागौरी जैसी अनेक उत्कृष्ट देसी नस्लें पाई जाती हैं। इन नस्लों का विकास स्थानीय जलवायु और भौगोलिक परिस्थितियों के अनुरूप हुआ है। देसी गोवंश कम संसाधनों में भी उपयोगी सिद्ध होता है तथा स्थानीय पर्यावरण के साथ सहज सामंजस्य स्थापित करता है। यह हमारी कृषि जैव विविधता और आनुवंशिक धरोहर का अमूल्य भाग है।
कृषि और गाय का संबंध भारत में सदियों से अभिन्न रहा है। रासायनिक खेती के विस्तार से पहले भारतीय कृषि मुख्यतः गोवंश आधारित थी। गोबर और गोमूत्र भूमि की उर्वरता बढ़ाने, पौधों को पोषण देने तथा कीट नियंत्रण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। आज भी प्राकृतिक खेती, जैविक खेती और शून्य बजट प्राकृतिक कृषि जैसी पद्धतियों में गाय की भूमिका केंद्रीय है।
गोबर और गोमूत्र से तैयार जीवामृत, घनजीवामृत तथा पंचगव्य जैसे उत्पाद मिट्टी में सूक्ष्म जीवों की सक्रियता बढ़ाते हैं। इससे भूमि की उर्वरता में वृद्धि होती है, जलधारण क्षमता बढ़ती है और फसल की गुणवत्ता सुधरती है। रासायनिक उर्वरकों के विपरीत ये पदार्थ भूमि को दीर्घकाल तक जीवंत बनाए रखते हैं। कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि स्वस्थ मिट्टी ही स्वस्थ कृषि और स्वस्थ समाज का आधार है।
गाय का गोबर प्रकृति का एक अमूल्य उपहार है। यह केवल खाद ही नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण का प्रभावी साधन भी है। ग्रामीण भारत में सदियों से घरों और आंगनों में गोबर का उपयोग स्वच्छता और कीट नियंत्रण के लिए किया जाता रहा है। आज गोबर से जैविक खाद, बायोगैस, धूपबत्ती, दीये, पेंट, ईंटें और अनेक पर्यावरण-अनुकूल उत्पाद बनाए जा रहे हैं। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर भी उत्पन्न हो रहे हैं।
ऊर्जा के क्षेत्र में भी गोवंश महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है। गोबर गैस संयंत्र स्वच्छ और सस्ती ऊर्जा का उत्कृष्ट स्रोत हैं। इससे रसोई गैस और लकड़ी पर निर्भरता कम होती है। लकड़ी की खपत घटने से वनों की कटाई कम होती है और पर्यावरण संरक्षण को बल मिलता है। बायोगैस के उत्पादन के बाद बचा हुआ अवशेष उत्कृष्ट जैविक खाद के रूप में पुनः कृषि में उपयोग किया जा सकता है। इस प्रकार एक ही संसाधन से ऊर्जा और उर्वरक दोनों प्राप्त होते हैं।
पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से भी गोवंश का महत्व अत्यंत व्यापक है। जैविक खेती और गो-आधारित कृषि प्रणाली भूमि की जलधारण क्षमता को बढ़ाती है, जिससे भूजल स्तर में सुधार होता है। ऐसे क्षेत्रों में पक्षियों, मधुमक्खियों, तितलियों तथा अन्य लाभकारी जीवों की संख्या अधिक पाई जाती है। इससे जैव विविधता का संरक्षण होता है और प्रकृति का संतुलन बना रहता है।
आज दुनिया में सस्टेनेबल डेवलपमेंट" अर्थात् सतत विकास की चर्चा हो रही है। इसका आशय ऐसा विकास है जो वर्तमान की आवश्यकताओं को पूरा करते हुए भविष्य की पीढ़ियों के हितों को सुरक्षित रखे। भारतीय ग्राम व्यवस्था और गो-आधारित जीवन पद्धति इस सिद्धांत का जीवंत उदाहरण प्रस्तुत करती है। यहां उत्पादन और उपभोग का संबंध प्रकृति के साथ संतुलित था। संसाधनों का उपयोग होता था, उनका दोहन नहीं।
महात्मा गांधी ने कहा था कि भारत की आत्मा उसके गांवों में बसती है। आत्मनिर्भर भारत का निर्माण भी तभी संभव है जब गांव आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरणीय दृष्टि से सशक्त बनें। इस लक्ष्य की प्राप्ति में गोवंश की महत्वपूर्ण भूमिका है। दूध उत्पादन के अतिरिक्त जैविक कृषि, ग्रामीण उद्योग, ऊर्जा उत्पादन, प्राकृतिक चिकित्सा तथा पर्यावरण संरक्षण जैसे अनेक क्षेत्रों में गाय उपयोगी सिद्ध हो सकती है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि गोवंश संरक्षण को केवल भावनात्मक विषय न मानकर राष्ट्रीय विकास और पर्यावरणीय सुरक्षा के व्यापक संदर्भ में देखा जाए। देसी नस्लों का संरक्षण, प्राकृतिक खेती को प्रोत्साहन, गोबर आधारित उद्योगों का विकास, बायोगैस संयंत्रों का विस्तार तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था में गोवंश की उपयोगिता को पुनस्र्थापित करना समय की मांग है।
भारतीय संस्कृति ने सदैव प्रकृति को पूज्य माना है। हमारे ऋषियों ने पृथ्वी को माता और समस्त सृष्टि को एक परिवार के रूप में देखा। यही भावना गाय के प्रति सम्मान और संरक्षण में भी दिखाई देती है। यदि हम इस समन्वित दृष्टि को पुनः अपनाने में सफल होते हैं, तो पर्यावरण संरक्षण, ग्रामीण विकास और आत्मनिर्भरता के लक्ष्य को एक साथ प्राप्त कर सकते हैं।
आज मानवता जिस पर्यावरणीय संकट के दौर से गुजर रही है, उसमें भारत की परंपरागत ज्ञान-संपदा और गो-आधारित जीवन पद्धति आशा की नई किरण बन सकती है। गाय, ग्राम और प्रकृति का यह त्रिवेणी संगम केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि भविष्य के भारत का भी मार्गदर्शक है। वास्तव में आत्मनिर्भर, समृद्ध और पर्यावरण-संतुलित भारत का निर्माण गाय, ग्राम और प्रकृति के इसी समन्वय से संभव है।
"गौ संरक्षण, ग्रामोदय और प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता-यही आत्मनिर्भर भारत की सुदृढ़ आधारशिला है।"
Comments (5)
A
Vasudev kutumbakam
R
Great job ????????
H
जय भारत जय गौ माँ
S
Jai ho bhaisahb
R
Ati uttam