logo

स्वयं संयम बरतें वीआईपी

control yourself vip

साल 2023 के मई महीने की एक सुबह...समय करीब आठ बजे सुबह...वाराणसी के काशी विश्वनाथ मंदिर में दर्शन के बाद मंदिर के पीछे की गली स्थित पुरानी चाय की टपरी पर चाय की तलब में इन पंक्तियों का लेखक पहुंचा..काशी विश्वनाथ मंदिर की सुरक्षा और व्यवस्था में तैनात पुलिस टीम की बीती शिफ्ट के साथ ही आगामी शिफ्ट के प्रभारी इंस्पेक्टर कुछ सिपाहियों के साथ चाय पी रहे थे...बीती शिफ्ट के इंचार्ज डेरे पर लौट सोने की तैयारी में थे तो आगामी शिफ्ट इंचार्ज दिनभर के तनावों के लिए तैयार हो रहे थे..चाय का आर्डर देकर इन पंक्तियों का लेखक पुलिस के दोनों अफसरों की ओर मुखातिब हुआ और एक सवाल उछाल दिया..बगैर किसी परिचय के...मंदिर की सुरक्षा और प्रशासनिक व्यवस्था में आपको किन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है...

याद नहीं कि जाती शिफ्ट के इंचार्ज सवाल के जवाब में चुप रहे या आती शिफ्ट के इंचार्ज..लेकिन जवाब आया...जाहिर है कि उन्हीं में से किसी एक था।

‘मंदिर आने वाले श्रद्धालुओं से उन्हें कोई परेशानी नहीं...एक-आध अपवादों को छोड़ दें तो श्रद्धालुओं की ओर से कभी कोई समस्या नहीं हुई..’

कोई परेशानी है भी या नहीं ?

इस सवाल के जवाब में वे बोल पड़े।

‘उनकी असल परेशानी वीआईपी हैं..रोजाना बाबा विश्वनाथ के दर्शन को वीआईपी आते रहते हैं और उनकी सेवा-टहल में उनकी शिफ्ट के आधे सिपाहियों को लगाना शिफ्ट प्रभारी के नाते उनकी मजबूरी है..’

प्रभारी पुलिस इंस्पेक्टर की इस परेशानी में हां मिलाने वाले वहां मौजूद सिपाही ही नहीं, चाय की टपरी वाला था..

महाकुंभ में 29 अक्टूबर को हुए हादसे के बाद ये वाकया याद आ गया।

प्रधानमंत्री मोदी ने सत्ता संभालने के कुछ ही दिनों बाद वीआईपी संस्कृति पर रोक लगाने का फैसला लिया था। तब इस फैसले की बहुत तारीफ हुई थी। लेकिन क्या ऐसा वाकई हो पाया?

निश्चित रूप से इसका जवाब ना में है..

प्रयाग में भगदड़ में मारे गए श्रद्धालुओं के हश्र के लिए पहले वीआईपी को जिम्मेदार ठहराया गया और फिर बाद में संगम पर सोए श्रद्धालुओं को दोषी माना गया। निश्चित तौर पर इस हादसे के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार भारत के रग-रग में बस चुकी वीआईपी संस्कृति है। गृहमंत्री अमित शाह के प्रयाग दौरे के दिन जब सड़कों को एक तरफ से वीआईपी मूवमेंट के लिए रोक दिया गया और लाखों नहीं, करोड़ों श्रद्धालुओं को भेड़-बकरी की तरफ एक तरफ से हांक दिया गया। ऐसे इंतजामों से ही पता चलता है कि भारत में वीआईपी संस्कृति किस कदर हावी है?

कुंभ में गंगा नदी पर पीपे के तीस पुल बने हैं। मौनी अमावस्या के दिन आधे से ज्यादा पुल वीआईपी के लिए रिजर्व करके बंद कर दिए गए थे और आधे से कुछ कम प्रयाग की धरती पर उमड़े करोड़ों श्रद्धालुओं के लिए खोले गए थे। ऐसे में कोई भी व्यवस्था होगी तो चरमराएगी ही। व्यवस्था चरमराई और बेकसूर मौतें हुईं। जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति की चाहत में तीर्थराज के घाट पर पहुंचे मासूम लोग असमय ही अकाल मृत्यु के मुंह में धकेल दिए गए।

भारत में जैसी वीआईपी संस्कृति है, वैसी दुनिया में कहीं नहीं दिखती। विकसित लोकतंत्रों में तो ऐसी स्थिति है ही नहीं। अमेरिका में तो लोग राष्ट्रपति के आधिकारिक निवास ह्वाइट हाउस की दीवारों के पास जाकर सैलानी अंदाज में फोटो खिंचा लेते हैं। लेकिन आधिकारिक रूप से वीआईपी संस्कृति का खात्मा करने वाले अपने देश को देखिए। बेशक सुरक्षा आज का बहुत बड़ा मुद्दा है। चुनौती भी है, लेकिन सड़कों पर से गुजरते राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, उपराष्ट्रपति, गृहमंत्री, मुख्यमंत्री और राज्यपाल के काफिले का अनुभव कीजिए तो पता चलेगा कि आम नागरिक की भारत में क्या हैसियत है। मतदान के दिनों में असल मालिक कही जाने वाली जनता के प्रति सड़क का ट्रैफिक रोकने और वीआईपी की सुरक्षा में तैनात पुलिस वालों को देखिए। वे सभी नागरिकों को तब तक दुश्मन और चींटी ही मानते हैं, जब तक वीआईपी का काफिला गुजर ना जाए। नरसिंह राव जब प्रधानमंत्री थे, तब उनके वीआईपी काफिले में गलती से एक स्कूटर सवार घुस गया था तो पुलिस ने उसे गोली मार दी थी, तब एक वरिष्ठ पत्रकार ने विरोध में लेख लिख मारा था, जिसका शीर्षक था गोया सारा देश दुश्मन है!  

वैसे भी जो वीआईपी है, उस पर ईश्वर की बाकी साधारण नागरिकों की तुलना में ईश्वर और नियति की कुछ ज्यादा ही कृपा है। अगर कृपा नहीं होती तो वह वीआईपी ही भला क्यों बनता। फिर उसे कुंभ नहाने या मंदिर के दर्शन की उतनी जरूरत भी नहीं है। समानता के सिद्धांत के लिहाज से पुण्य लाभ, ईश्वर दर्शन या कुंभ नहान का ज्यादा मौका वीआईपी दौड़ में पीछे रह गए साधारण नागरिकों को वीआईपी लोगों की तुलना में कहीं ज्यादा मिलना चाहिए। ऐसे में वीआईपी लोगों को खुद ही तय कर लेना चाहिए कि वे ऐसी जगहों पर जाने, दर्शन और स्नान से बचें, जहां साधारण नागरिकों की संख्या चींटियों की तरह मौजूद होने की संभावना हो। भारत की सामंती सोच और पुलिस की मानसिकता के चलते वीआईपी के आने के बाद साधारण नागरिकों और श्रद्धालुओं को परेशानी होनी ही है। अभी जो मानस है, जैसी व्यवस्था है, जैसी अधिकारियों और राजनेताओं की सोच है, उसमें कोई बदलाव आने की उम्मीद नहीं है। साधारण नागरिकों को सम्मान जनक समझने की व्यवस्था आएगी भी या नहीं, आएगी भी तो कब आएगी, इसका कोई ठिकाना नहीं। ऐसे में वीआईपी लोगों से ही अनुरोध किया जा सकता है कि भीड़ वाले मौकों और जगहों पर जाने से वे परहेज करें। वे समझें कि ईश्वर ने उन्हें ज्यादा कृपा बख्शी है, इसीलिए वे वीआईपी हैं और दूसरे साधारण नागरिकों से अलग हैं।

आम धारणा यही है कि सरकारें चाहें जिस भी दल की बनें, वीआईपी संस्कृति हकीकत में खत्म होने से रही। सामान्य नागरिक को महत्व देने का बोध प्रशासनिक तंत्र कम से कम मौजूदा स्थिति और प्रशिक्षण के चलते नहीं अपनाने की स्थिति में नहीं लगता। मानसिकता ही है कि एक बार सिविल सेवा में चयनित होने के बाद लगातार उत्पीड़न और गरीबी झेलने वाले परिवारों के बच्चे भी खुद को वीआईपी मानने और अपने ही समाज और वातावरण के लोगों को हेय नजरिए से देखने लगते हैं। इसलिए बेहतर है कि खुद वीआईपी ही संयमित हों, खुद पर लगाम लगाएं, खुद मानें कि ईश्वर का उन पर आशीर्वाद है, इसी वजह से वे वीआईपी हैं और देश की जनता को मौका दें। तभी जाकर कुंभ जैसे हादसों से बचना आसान होगा। तभी असमय काल के गाल में समाने के हालात नहीं बनेंगे। लेकिन लाख टके का सवाल यह है कि क्या वीआईपी इस तथ्य को समझेंगे और स्वीकार करेंगे। 






उमेश चतुर्वेदी
कंसल्टेंट, प्रसार भारती, भारत सरकार

(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)

Leave Your Comment

 

 

Top