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शब्दों के 'संवैधानिक आडंबर' से पैदा होने वाले सियासी बवंडर को आखिर थामेगा कौन!

'Constitutional pomp' of words  political storm arising from  Who will hold it?

लोकसभा में भारत के संविधान की 75 वर्षों की गौरवशाली यात्रा पर चर्चा हुई जिसमें तमाम दलों के नेताओं ने हिस्सा लिया। चाहे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हों, या नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी, चाहे मजे-मजाए रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह हों, या नई नवेली लोकसभा सदस्य प्रियंका गांधी या अन्य दलों के सांसद या मंत्रीगण, सबों ने बातों ही बातों में एक-दूसरे की खूब मीन-मेख निकाली जबकि अपने गिरेबान में झांकने की कोशिश नहीं की। हां, सबने अपने अपने पसंदीदा संविधान निर्माताओं की जमकर तारीफ की।

यह सवाल एक बार फिर निरुत्तर रह गया कि शब्दों के 'संवैधानिक आडंबर' से पैदा होने वाले सियासी बवंडरों को आखिर थामेगा कौन क्योंकि नेताओं की संकीर्ण सियासी सोच ने तो जनमानस को एक बार फिर से निराश किया है. वरिष्ठ पत्रकार उमेश चतुर्वेदी ने तो लिंक्ड इन पर यहां तक लिख दिया कि ‘संविधान पर चर्चा में आरोप-प्रत्यारोप ज़्यादा रहा। बेहतर होता कि सभी पक्ष मूल मुद्दों, समस्याओं और चुनौतियों पर विचार करते। 1997 जैसी चर्चा हो सकती थी. तब आजादी की स्वर्ण जयंती पर बेहतर चर्चा हुई थी।

कहने का तात्पर्य यह कि उन्होंने चर्चा के स्तर पर भी तुलनात्मक सवाल खड़ा कर दिया। स्पष्ट है कि सियासत का स्तर भी गिरा है! ऐसे लोगों से उम्मीद भी क्या की जा सकती है। ऐसे में सुलगता सवाल है कि जो विधान हमारे देश व समाज को तोड़ने के लिए और ब्रिटिश साम्राज्यवादी हित साधने के लिए अंग्रेजों द्वारा बनाए गए थे, उनके अधिकांश नकारात्मक तथ्यों को भारतीय संविधान में भी जगह क्यों दे दी गई?

जरा आजादी से पहले बने विभिन्न अधिनियमों पर गौर कर लीजिए। उनमें से कई हूबहू या थोड़ा हेर-फेर के हमारे संविधान में मिल जाएंगे। समझा जाता है कि इससे आजाद भारत में लोगों में वैचारिक मतभेद बढ़ा, प्रतिक्रिया स्वरूप ब्रेन ड्रेन बढ़ा और जो यहां बच गए वो 'विदेशी एजेंट्स' बनकर भारत को कमजोर करने लगे! इन बातों की शिनाख्त करने और उस पर स्वस्थ बहस करने के बजाय इन लोगों ने संविधान का गला मरोड़ने से लेकर संविधान को बचाने तक के अनेक

दृष्टांत गिनाए।

यक्ष प्रश्न है कि जब संविधान की नौंवी अनुसूची में शामिल विषयों, आपातकाल, जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटाने, गरीबी मिटाने, रोजगार आदि बातें तो रोज टीवी स्क्रीन पर होती हैं तो फिर इसके लिए लोकसभा में भारत के संविधान की 75 वर्षों की गौरवशाली यात्रा पर चर्चा करने जैसी क्या जरूरत आन पड़ी थी, जब घिसे-पिटे सियासी मुद्दों को ही बार बार दुहराना था। चलिए 75 साल में इनको दोहरा लिया तो सही किया लेकिन वह मौलिकता कहाँ दिखी जो यह बताती हो कि हमारे संविधान निर्माताओं ने ये गलतियां कीं जिनकी 21वीं शताब्दी में कोई जरूरत नहीं है. हमारे पूर्व प्रधानमंत्री ने ये-ये भूलें की, जिसे नए भारत में बदल देने की जरूरत है!

इसलिए सवाल उठता है कि आखिर उन शाब्दिक विरोधाभासों की चर्चा हमारे निर्वाचित जनप्रतिनिधियों ने क्यों नहीं की जिससे जाने-अनजाने में भारत कमजोर होता है, भारतीयता संदिग्ध होती है, सवर्ण-ईडब्ल्यूएस, पिछड़ा- अतिपिछड़ा, दलित-महादलित, बहुसंख्यक-अल्पसंख्यक, पसमांदा, भाषाई राज्यों, धर्मनिरपेक्षता-धार्मिक आतंक, समाजवाद-पूंजीवाद जैसे शब्दों के प्रतिक्रिया स्वरूप सामाजिक विरोधाभास बढ़ते हैं।

कहना न होगा कि इन द्विअर्थी शब्दों से निर्वाचित जनप्रतिनिधियों या इस कतार में शामिल लोगों, चयनित नौकरशाहों या इस पंक्ति में प्रतीक्षारत जमात, कृपापात्र उद्यमियों और इनके इर्द गिर्द मंडराने वाले लोगों की तो मौज रहती है लेकिन बाकी बचे लोगों के लिए संघर्ष, षड्यंत्र, संशय और संत्रास की जद्दोजहद ही मुबारक प्रतीत होती है। वहीं कोढ़ में खाज यह कि हमारे देश में सिर्फ वोट का महत्व समान है लेकिन हर व्यक्ति वोट दे पाएगा, इसकी कोई गारंटी नहीं है। इसलिए तो हर चुनाव में कुछ मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से ही गायब मिलते हैं।

सच कहूं तो किसी भी देश में शांति और सुव्यवस्था लोगों की पहली पसंद होती है, जिसे देने में आधुनिक लोकतंत्र और संविधान दोनों विफल साबित हुए हैं। लोगों का पेशेवर अनुभव बताता है कि आतंकवाद, नक्सलवाद और अंडरवर्ल्ड के कारनामों, तस्करों, मिलावटखोरों, प्रशासनिक घूसखोरों और न्यायिक परिसरों में विचरते पढ़े-लिखे षड्यंत्रकारियों के दांवपेचों से आज हर व्यक्ति परेशान है।

आलम है कि 1992 के बाद प्रचलित लाभ आधारित आधुनिक अर्थव्यवस्था की अंधी दौड़ में मानवता का गला हर ओर घोंटा जा रहा है लेकिन प्रशासन इसे रोकने में बेपरवाह है, क्योंकि उसे 'सुविधा शुल्क' तो मिल ही जाता है। वहीं, बाजारू भ्रष्टाचार से हर कोई प्रभावित है जबकि उसे  रोकने में प्रशासन विफल है ! ऐसे में इस लोकतंत्र का, संविधान का, प्रशासन तंत्र का, न्यायिक तंत्र का, मतलब क्या रह जाता है? आप

खुद सोचिए।

उससे भी बड़ा ज्वलंत सवाल यह कि जब विदेशी निवेश के नाम पर विदेशी कम्पनियों के इशारे पर आम भारतीयों के हितों को कमजोर करने वाले कानून हमारे निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के द्वारा ही बनाए जाते हैं तो फिर जनप्रतिनिधियों की भूमिका पर सवाल उठेंगे ही क्योंकि भारत की परिस्थिति और पश्चिमी देशों की परिस्थितियां अलग-अलग हैं, जनसंख्या को लेकर और प्राकृतिक संसाधनों को लेकर भी लेकिन हमारे जनप्रतिनिधिगण इस फर्क को समझने में नाकाम रहे हैं।

लिहाजा, उनके द्वारा बनाए हुए संसदीय कानून, सवाल-जवाब इसी बात की चुगली करते हैं। सच्चे अर्थों में आम भारतीयों की दुर्दशा की असली वजह भी ये ही हैं अन्यथा 75 साल कम नहीं होते। वैसे भी अब बूढ़े हो चले भारतीय संविधान से नवयुवक कितना उम्मीद रखेंगे? सवाल है कि जब हमारे यहां पर्याप्त श्रमबल है तो फिर कार्यों में मशीनीकरण को बढ़ावा क्यों दिया जा रहा है? क्या सिर्फ इसलिए कि निजी कम्पनियों को लाभान्वित किया जाना है?

वहीं, जब ग्रामीण भू-जमींदारी का उन्मूलन किया गया तो शहरी भू-जमींदारी क्यों छोड़ दी गई? और अब कम्पनियों या फर्मों की भू-जमींदारी और बेनामी सम्पत्तियों पर चर्चा क्यों नहीं होती? क्या इसलिए कि भारतीय अभिजात्य वर्गों का प्रतिनिधित्व संसद में है, विधानमण्डलों में है?

वहीं, राष्ट्रीय परिसम्पत्तियों को सिर्फ निजी कम्पनियों को ही क्यों दिया जाता है? बाजारों में आरक्षण क्यों नहीं लागू किया जाता क्योंकि बनिया वर्ग से चुनावी चंदा मिलती है? सवाल बहुत है, पर जवाब नदारद !

 इसके ठीक उलट, सत्ता पक्ष और विपक्ष की शानोशौकत देखिए और फिर आम आदमी की दैनंदिन परिस्थितियों से उसकी तुलना कीजिए। एक तरफ शब्दों की बाजीगरी से ये महान बन गए और इनको वोट देने वाले ज्यादातर फटेहाल!

अब इस देश में भरण-पोषण के साधनों पर गौर कीजिए। गांवों या कस्बाई शहरों में खेती-बाड़ी, पशुपालन, कुटीर उद्योग, स्व-व्यवसाय, नौकरी-पेशा आदि। वहीं शहरों और महानगरों में संगठित व असंगठित क्षेत्रों के काम, फुटकर व थोक कारोबार, सरकारी व निजी क्षेत्र में नौकरी। दोनों जगहों पर दलाली और आउटसोर्स के दांवपेंच का बोलबाला।

जानकार बताते हैं कि कागजों में अधिकांश धंधा घाटे में चलता है, चलाया जाता है, या रणनीतिक मुनाफा दिखाया जाता है क्योंकि मकसद साफ है, आयकर व जीएसटी देने में धांधली तथा वाजिब वेतन देने में आनाकानी। मसलन, इनके जो मानक हैं और उनमें जो धांधली है, उससे आम युवक व आमलोग दोनों प्रभावित होते हैं। समाज में बढ़ते अपराध और भ्रष्टाचार के पीछे की असली वजह भी यही घपलेबाज परिस्थिति है लेकिन सियासी सांठगांठ के चलते कभी इसकी चर्चा तक नहीं होती या बहुत कम होती दिखाई देती है।

एक और महत्वपूर्ण सवाल यह कि आखिर जब हमलोग किसी की मजदूरी या किसी बिजनेस का मूल्य/मुनाफा तय करते हैं तो रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य, सम्मान के अलावा डिजिटल, परिवहन और पारिवारिक जिम्मेदारियों के निर्वहन तक के खर्चों के बारे में क्यों नहीं सोचते? आखिर बनावटी अर्थव्यवस्था से हमारा देश कितना मजबूत होगा? देश-प्रदेश में जारी सब्सिडी के खेल से देश कैसे उबरेगा? जनशिक्षा, जनस्वास्थ्य, जनरक्षा आदि में तो निजी क्षेत्र को प्रवेश देना ही नहीं चाहिए लेकिन दे दिया गया और कोई दूरदर्शी बहस नहीं हुई।

अब यह आम धारणा बन चुकी है कि हमारा लोकतंत्र भले ही स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के मूल्यों की बात करता है, लेकिन भारतीय संविधान के विरोधाभासी शब्दों ने जब समानता और बंधुत्व के मर्म को ही चोटिल कर दिया हो तो फिर स्वतंत्रता का क्या अर्थ रह जाता है, समझना नामुमकिन नहीं है। बानगी स्वरूप सिर्फ इतना ही कहूंगा कि भूखा-नंगा व अल्पशिक्षित व्यक्ति किस बात का सवर्ण है? और अमीरी के सभी पैमानों पर फिट व्यक्ति किस बात का पिछड़ा या दलित, और शहरों में रहने वाला व्यक्ति किस बात से आदिवासी।

वहीं, सड़कों पर नंगा-नाच और कत्लो गारद मचाने वाला आखिर कैसे अल्पसंख्यक? भाषा और क्षेत्र की बात करने वाला किस बात का राष्ट्रवादी। शब्द और सवाल की लंबी श्रृंखला है। वैसे भी ये सवाल तो सिर्फ संसदीय व न्यायिक चेतना पैदा करने के लिए दे रहा हूँ जबकि भारतीयता पर निरन्तर चोट पहुंचाने वाले संवैधानिक शब्दाडम्बरों की कमी नहीं है। इससे अमृतकाल में निपटना ही होगा। समान नागरिक संहिता भी लानी ही होगी और इससे किसी को छूट देना इसकी मूल भावना पर प्रहार होगा। हमारे देश में अक्सर जातिगत जनगणना और आरक्षण की बात छिड़ती है लेकिन किस जाति को कितनी सीट मिलेगी, इसका स्पष्ट मसौदा कोई नहीं देना चाहता। निजी क्षेत्र और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों में आरक्षण कब से लागू होगा, कोई डेट फिक्स नहीं है! जिन्हें एक बार आरक्षण का लाभ मिल गया, उन्हें दोबारा नहीं मिले, यह सच बोलने में नेताओं और जजों की नानी मरने लगती है, यही हकीकत है। काश, इन पर भी बहस होती, सियासी नौटंकी नहीं!

नीतिगत जड़ता देखिए, जिनकी जिंदगी मनरेगा के 100 दिन की मजदूरी, या 5-5 किलो मुफ्त अनाज से चलती है, उन्हें भी 5-5 लाख रुपये का आयुष्मान कार्ड दिया गया है। मतलब पैनल में शामिल अस्पतालों की चांदी। ये नीतिगत घोटाला नहीं तो क्या है? इसलिए लोगों के जेहन में यह सवाल पैदा हुआ है कि आखिर शब्दों के 'संवैधानिक आडंबर' से पैदा होने वाले सियासी बवंडरों को थामेगा कौन, नेताओं ने तो बेहद निराश किया है !




कमलेश पांडेय
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)

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