
बिंदिया कुमारी
BRICS जैसे बड़े अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की मेजबानी हो, दुनिया के प्रमुख देशों के नेता भारत आएं, वैश्विक अर्थव्यवस्था, व्यापार, सुरक्षा, Global South, संयुक्त राष्ट्र सुधार और बदलती विश्व व्यवस्था जैसे गंभीर विषयों पर बातचीत हो—तो एक जिम्मेदार विपक्ष से उम्मीद की जाती है कि वह इन मुद्दों पर सरकार को कठघरे में खड़ा करे। सवाल पूछे कि भारत ने क्या हासिल किया, क्या नहीं कर पाया, किन मुद्दों पर समझौता हुआ और किन पर अपनी बात मनवाई। लेकिन कांग्रेस ने इस ऐतिहासिक अवसर में जो सबसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा खोजा, वह था—डिनर में क्या परोसा गया!
BRICS डिनर में भारतीय शाकाहारी व्यंजन परोसे गए। अगले दिन राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पर लिखा—“For the record: 80% of Indians are non-vegetarian. Indian non-vegetarian food is delicious. As are my sister's chole bhature.” इसके साथ उन्होंने छोले-भटूरे की तस्वीर भी साझा की।
यहीं से सवाल शुरू होता है। आखिर BRICS जैसे अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन की समीक्षा का कांग्रेस का पैमाना क्या है? क्या भारत की कूटनीति अब डिनर की प्लेट से नापी जाएगी? क्या यह देखा जाएगा कि भारत ने Global South के लिए क्या किया, या यह कि विदेशी मेहमान की प्लेट में पनीर था या चिकन? क्या संयुक्त राष्ट्र सुधार पर भारत का रुख महत्वपूर्ण नहीं है? क्या आर्थिक सहयोग, व्यापार, तकनीक और विकास वित्त पर हुई चर्चा से ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि डिनर वेजीटेरियन था?
अगर कांग्रेस को भोजन के मुद्दे पर ही राजनीति करनी थी, तो कम-से-कम उसके पास कोई ठोस तथ्य होना चाहिए था। राहुल गांधी ने “80 प्रतिशत भारतीय नॉन-वेजीटेरियन ” होने की बात कही, लेकिन उनके सार्वजनिक पोस्ट में इस आंकड़े का स्रोत नहीं दिया गया। भारत जैसे विशाल देश में खान-पान के आंकड़े सर्वेक्षण की पद्धति, उम्र, लिंग और “मांसाहारी” की परिभाषा के अनुसार बदलते हैं। इसलिए किसी एक प्रतिशत को पूरे भारत की अंतिम तस्वीर की तरह प्रस्तुत करना गंभीर सार्वजनिक बहस के लिए पर्याप्त नहीं है।
लेकिन मान लीजिए, कांग्रेस का आंकड़ा सही भी हो। तब भी एक बुनियादी सवाल बचता है—तो क्या? क्या इसका मतलब यह है कि भारत सरकार को हर राजनयिक डिनर में मांसाहारी भोजन अनिवार्य रूप से परोसना चाहिए? क्या किसी अंतरराष्ट्रीय अतिथि को भारतीय शाकाहारी व्यंजन परोसना उसकी मेहमाननवाजी में कमी है? क्या भारत की हजारों वर्ष पुरानी शाकाहारी पाक-परंपरा अचानक कम भारतीय हो गई? और अगर किसी दूसरे अवसर पर मांसाहारी भोजन परोसा जाता, तो क्या कांग्रेस तब यह घोषणा करती कि भारत ने अपनी विदेश नीति सफलतापूर्वक संचालित कर ली?

यहां कांग्रेस की राजनीति का एक दिलचस्प विरोधाभास सामने आता है। भारत की विविधता की बात करते-करते जब अवसर आया, तो बहस को ही वेजीटेरियन बनाम नॉन-वेजीटेरियन के द्वंद्व में बदल दिया गया। जबकि भारतीय संस्कृति की असली खूबी यह है कि यहां दोनों परंपराएं मौजूद हैं। किसी को शाकाहारी भोजन पसंद है, किसी को मांसाहारी; कोई धार्मिक कारणों से शाकाहारी है, कोई व्यक्तिगत पसंद से; कोई क्षेत्रीय परंपरा के अनुसार भोजन करता है। भारत इन सबको जगह देता है। तो फिर BRICS के डिनर को राजनीतिक विवाद में बदलने का औचित्य क्या था?
भारत ने विदेशी मेहमानों के सामने अपनी पाक-विविधता रखी। रिपोर्टों के अनुसार मेन्यू में खांडवी, मशरूम गलौटी, पनीर लबाबदार, गुच्ची, दक्षिण भारतीय पोरियल, मिलेट पुलाव और विभिन्न भारतीय मिठाइयां शामिल थीं। यह कोई मामूली बात नहीं थी। भोजन कूटनीति का हिस्सा होता है। राष्ट्राध्यक्षों के बीच औपचारिक बातचीत के बाहर संस्कृति, संगीत, कला और भोजन भी किसी देश की पहचान प्रस्तुत करने के माध्यम होते हैं।
कांग्रेस चाहे तो इस मेन्यू की आलोचना कर सकती है। लोकतंत्र में सरकार के किसी भी निर्णय पर सवाल उठाना विपक्ष का अधिकार है। लेकिन फिर आलोचना का आधार क्या होना चाहिए? अगर किसी विदेशी प्रतिनिधि ने भोजन को लेकर शिकायत की, तो उसे सामने रखा जाए। अगर किसी राजनयिक प्रोटोकॉल का उल्लंघन हुआ, तो तथ्य बताए जाएँ। अगर मेहमानों की भोजन संबंधी आवश्यकताओं की अनदेखी हुई, तो उसका प्रमाण दिया जाए। लेकिन अगर ऐसा कुछ सामने नहीं है, तो केवल “80 प्रतिशत भारतीय नॉन-वेजीटेरियन हैं” कहकर डिनर को राजनीतिक मुद्दा बना देना किस गंभीर राष्ट्रीय प्रश्न का समाधान करता है?
और यही वह जगह है जहां कांग्रेस से एक बड़ा सवाल पूछा जाना चाहिए—क्या उसके पास BRICS को लेकर इससे बेहतर सवाल नहीं थे? क्योंकि BRICS कोई पारिवारिक समारोह नहीं था। यह बदलती वैश्विक व्यवस्था का महत्वपूर्ण मंच है। BRICS का विस्तार हो चुका है। Global South के कई बड़े देश इसके साथ जुड़े हैं। विश्व अर्थव्यवस्था में शक्ति का संतुलन बदल रहा है। अमेरिका, चीन, भारत, यूरोप, रूस और उभरती अर्थव्यवस्थाओं के बीच नए समीकरण बन रहे हैं। व्यापारिक आपूर्ति शृंखलाएं बदल रही हैं। तकनीक और AI नई रणनीतिक शक्ति बन रहे हैं। ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा वैश्विक राजनीति के केंद्रीय प्रश्न बन चुके हैं। ऐसे समय में विपक्ष की राजनीति किस ऊंचाई पर होनी चाहिए?
उसे पूछना चाहिए था कि भारत ने BRICS में अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को कैसे आगे बढ़ाया। उसे पूछना चाहिए था कि ग्लोबल साउथ की आवाज को संस्थागत रूप देने के लिए भारत ने क्या पहल की। उसे व्यापार और निवेश के आंकड़ों पर सरकार को घेरना चाहिए था। उसे यह जानना चाहिए था कि स्थानीय मुद्राओं में व्यापार की दिशा में कितना व्यावहारिक काम हुआ। उसे न्यू डेवलपमेंट बैंक और विकास वित्त की भूमिका पर बहस करनी चाहिए थी। उसे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार के प्रश्न पर सरकार की रणनीति पूछनी चाहिए थी। लेकिन कांग्रेस की राजनीतिक दृष्टि वहां से घूमकर खाने की प्लेट तक पहुंच गई।
यह केवल प्राथमिकता का सवाल नहीं है। यह विपक्ष की राजनीति के स्तर का भी सवाल है। सरकार की आलोचना करना और सरकार के हर कदम को राजनीतिक विवाद में बदल देना—दो अलग चीजें हैं। एक लोकतंत्र में पहला आवश्यक है; दूसरा सार्वजनिक बहस को सतही बना सकता है। कांग्रेस अगर BRICS की आलोचना करना चाहती है तो करे। लेकिन फिर BRICS पर बात करे। बताए कि भारत ने क्या गलत किया। बताए कि कौन-सा समझौता भारत के हित में नहीं था। बताए कि कौन-सी घोषणा कमजोर थी। बताए कि ग्लोबल साउथ के लिए भारत की नीति में क्या कमी रही। बताए कि चीन के बढ़ते प्रभाव के बीच भारत को कौन-सी रणनीति अपनानी चाहिए। बताए कि BRICS और पश्चिमी देशों के साथ भारत के संबंधों में संतुलन कैसे बनाया जाए।
यह बहस होगी। यह विपक्ष की राजनीति होगी। यह जनता के काम की बात होगी। लेकिन “डिनर में मांस क्यों नहीं था?”—यह सवाल तभी राष्ट्रीय महत्व का बनता, जब भारत की विदेश नीति का सबसे बड़ा संकट मेन्यू कार्ड होता। कांग्रेस के लिए समस्या शायद यही है कि BRICS की वास्तविक राजनीति बहुत जटिल है। वहां नारे काम नहीं करते। वहां विदेश नीति की समझ चाहिए। आर्थिक आंकड़े पढ़ने पड़ते हैं। चीन, रूस, अमेरिका, गल्फ देशों, अफ्रीका और ग्लोबल साउथ के अलग-अलग हितों को समझना पड़ता है। वहां हर सवाल का जवाब “कांग्रेस बनाम मोदी” के घरेलू राजनीतिक फ्रेम में नहीं दिया जा सकता।

इसलिए भोजन की प्लेट कहीं अधिक सुविधाजनक राजनीति है। थाली पर ट्वीट करना आसान है। BRICS की आर्थिक संरचना पर गंभीर बहस करना मुश्किल है।शाकाहारी मेन्यू पर व्यंग्य करना आसान है। वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में भारत की भूमिका पर ठोस वैकल्पिक नीति देना मुश्किल है। “80 प्रतिशत” का आंकड़ा लिख देना आसान है। यह बताना मुश्किल है कि भारत को BRICS के भीतर अपने आर्थिक हित कैसे साधने चाहिए। यही फर्क गंभीर विपक्ष और केवल प्रतिक्रिया देने वाली राजनीति के बीच होता है।
और फिर भारतीय भोजन की बात भी कांग्रेस जिस तरह उठाती है, उसमें एक और विचित्रता दिखाई देती है। भारत की संस्कृति को अगर केवल इस आधार पर मापा जाए कि विदेशी मेहमान ने मांस खाया या नहीं, तो हम अपनी ही सभ्यता को कितनी छोटी परिभाषा में बांध रहे हैं? भारत की पाक-परंपरा केवल चिकन या मटन से नहीं बनती और केवल खांडवी या पनीर से भी नहीं बनती। भारत की पहचान दोनों के सह-अस्तित्व में है।
यही भारत है—जहां एक ही शहर में शाकाहारी थाली भी मिलती है और मांसाहारी व्यंजन भी। जहां अलग-अलग समुदायों की अपनी भोजन परंपराएं हैं। जहां भोजन पर बहस हो सकती है, लेकिन किसी एक थाली को पूरे भारत का प्रतिनिधि नहीं कहा जा सकता।
इसलिए अगर कांग्रेस सचमुच भोजन की विविधता की चिंता करती है, तो उसे भारत की इस बहुलता को स्वीकार करना चाहिए। किसी शाकाहारी मेन्यू को देखकर यह संकेत देना कि उसमें मांसाहारी भोजन की अनुपस्थिति कोई राष्ट्रीय समस्या है, अपने आप में भारतीय भोजन की विविधता को सीमित नजर से देखना है।
और अब आइए उस बड़े सवाल पर लौटते हैं जिससे यह पूरा विवाद शुरू हुआ था—BRICS। इतिहास में अंतरराष्ट्रीय शक्ति-संतुलन डिनर के मेन्यू से नहीं बदलता। वह बदलता है आर्थिक ताकत से, व्यापार से, तकनीक से, संस्थाओं से, कूटनीति से और लंबे समय तक चलने वाली रणनीति से। भारत अगर BRICS को ग्लोबल साउथ के लिए अधिक प्रभावी मंच बनाना चाहता है, तो यह गंभीर चर्चा का विषय है। भारत अगर चीन और अमेरिका दोनों के साथ अपने संबंधों को संतुलित करते हुए रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखना चाहता है, तो यह गंभीर चर्चा का विषय है। भारत अगर वैश्विक वित्तीय संस्थाओं में सुधार की मांग करता है, तो उसकी सफलता और सीमाओं पर बहस होनी चाहिए।
लेकिन कांग्रेस ने इन जटिल प्रश्नों की जगह प्लेट को चुना। और राजनीति में प्रतीक बहुत कुछ बताते हैं। BRICS की मेज पर भारत वैश्विक शक्ति-संतुलन, आर्थिक सहयोग और ग्लोबल साउथ की भूमिका पर बातचीत कर रहा था। कांग्रेस उसी मेज पर यह तलाशती दिखाई दी कि खाने में क्या नहीं था।
यही कारण है कि इस पूरे प्रकरण को केवल भोजन की पसंद का विवाद मानना पर्याप्त नहीं होगा। यह इस बात का उदाहरण भी है कि भारत की विदेश नीति जैसे गंभीर विषयों को घरेलू राजनीतिक प्रतिक्रिया के छोटे-से फ्रेम में कैसे समेट दिया जाता है।
विपक्ष को सरकार से कठिन सवाल पूछने चाहिए। जितने कठिन सवाल होंगे, लोकतंत्र उतना मजबूत होगा। लेकिन सवाल कठिन हों, तुच्छ नहीं। आलोचना तीखी हो, लेकिन मुद्दा भी बड़ा हो। BRICS के मंच पर भारत की भूमिका की समीक्षा डिनर की प्लेट से नहीं, राष्ट्रीय हितों के पैमाने से होनी चाहिए। क्योंकि दुनिया जब नई आर्थिक और रणनीतिक व्यवस्था की ओर बढ़ रही हो, तब भारत को यह तय करना है कि वह उस व्यवस्था को आकार देने वालों में रहेगा या केवल उसके परिणामों को देखेगा।
और अगर इस ऐतिहासिक मोड़ पर देश की सबसे पुरानी प्रमुख विपक्षी पार्टी की सबसे चर्चित आपत्ति यह बन जाए कि अंतरराष्ट्रीय डिनर में मांस क्यों नहीं था, तो सवाल कांग्रेस से नहीं, कांग्रेस की राजनीति की प्राथमिकताओं से पूछा जाना चाहिए। BRICS की मेज पर भारत के सामने दुनिया का नक्शा था। कांग्रेस को उसमें अपनी राजनीति की थाली दिखाई दी। फर्क यहीं से समझ में आता है।
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)
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