ट्रंप ने हाल ही में US Congress को सम्बोधित करते हुए कहा, "ऑपरेशन सिन्दूर के दौरान, पाकिस्तान और भारत के बीच परमाणु युद्ध हो जाता।" उन्होंने पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ के हवाले से एक चौंकाने वाला आंकड़ा भी पेश किया — कि भारत के ऑपरेशन सिंदूर के दौरान 3 करोड़ 50 लाख (35 million) लोग मारे जाते, यदि अमेरिका ने युद्धविराम कराने के लिए हस्तक्षेप न किया होता।
मई 2025 की झड़प के दौरान, इस्लामाबाद को एहसास हुआ कि इंडियन आर्म्ड फोर्सेज़ उन्हें परमानेंट इविक्शन नोटिस देने वाली हैं। उन्हें हमारे फोर्सेज से बचाने के लिए सचमुच अंकल सैम को बुलाना पड़ा। लेकिन यहां घर पर, हमारे LoP देश की स्ट्रेटेजिक पोजीशन का समर्थन करने के बजाय JET COUNTS की मांग करने में बिज़ी नज़र आये । और आजकल उनकी नयी गप्पबाज़ी शुरू हुई है। "compromised पीएम " का जो नारा आजकल उनका चल रहा है, उसकी बखिया तो खुद उनके वाशिंगटन वाले बॉसेस उधेड़ रहे हैं। लगभग हर दूसरे दिन उनकी कलाई खुल जाती है। लेकिन compromised का जो राग उन्होंने अलापा है, आज हम उसपे बात करते हैं।
भारतीय राजनीति में सबको यह पता है कि 2004 से 2014 के बीच सत्ता का वास्तविक केंद्र प्रधानमंत्री कार्यालय नहीं, बल्कि 10 जनपथ था। उस दौर में Sonia Gandhi ने राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (NAC) के माध्यम से ऐसी भूमिका निभाई, जिसे आप “सुपर पीएम” की संज्ञा दे सकते हैं। यह कहना भी गलत नहीं होगा की समानांतर सरकार चलाई गई, नीतियाँ तय की गईं और मंत्रिमंडल पर नैतिक-राजनीतिक दबाव बनाकर फैसले प्रभावित किए गए। सवाल यह है कि क्या यह केवल राजनीतिक विमर्श था या फिर कांग्रेस की सत्ता संरचना में वास्तव में दो ध्रुव बन चुके थे? यदि निर्णय लेने की अंतिम शक्ति निर्वाचित प्रधानमंत्री के बजाय एक गैर-सरकारी संरचना के पास केंद्रित हो जाए, तो लोकतांत्रिक जवाबदेही पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
इसी कालखंड में Rajiv Gandhi Foundation को चीन से जुड़े स्रोतों से मिले चंदे को भी देखना जरुरी है । इसे महज आर्थिक लेन-देन नहीं, बल्कि संभावित नीतिगत प्रभाव के रूप में देखना, गलत नहीं होगा। जब किसी राजनीतिक परिवार से जुड़े ट्रस्ट को विदेशी फंडिंग मिलती है, तो पारदर्शिता और राष्ट्रीय हितों के संदर्भ में कठोर सवाल उठते हैं। क्या उस समय भारत-चीन संबंधों के कुछ निर्णयों पर इसका कोई प्रभाव पड़ा? यह प्रश्न स्वाभाविक है । चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के साथ राहुल गाँधी और सोनिआ गाँधी ने जो MoU sign किया था, उसकी सच्चाई आज तक किसी को पता नहीं। उस MoU के माध्यम से कांग्रेस ने देश का क्या क्या compromise किया, यह कौन जानता है? जाहिर है कांग्रेस इन आरोपों को खारिज करती रही है, लेकिन राजनीति में जो चीज़ Transparent नहीं वो Compromised ही समझी जाती है।
अच्छा, एक और बात, Rahul Gandhi की विदेश यात्राओं और उनके बयानों को भी देखना होगा। उन्होंने 247 से अधिक विदेश यात्राएँ कीं और कई बार सुरक्षा एजेंसियों को सूचित नहीं किया। सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता सर्वोपरि होती है। जब एक प्रमुख विपक्षी नेता विदेश में भारत की आंतरिक राजनीति, लोकतंत्र और संस्थाओं पर तीखे बयान देते हैं, तो स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठता है कि क्या यह स्वस्थ आलोचना है या फिर देश की छवि को चोट पहुँचाने वाली राजनीति? आखिर किस मजबूरी के तहत वह अपनी यात्राओं की जानकारी देने से बचते हैं ? कहीं यह उनकी so-called Compromised Mission वाली यात्रायें तो नहीं। क्योंकि अगर आप chronology को देखे तो अक्सर उनकी विदेश यात्रा के बाद भारत में कुछ ना कुछ अनावश्यक विवाद खड़ा होते दीखता है।
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