
नीलाभ कृष्ण
इक्कीसवीं सदी में यदि कोई संकट सबसे तेजी से मानव सभ्यता को चुनौती दे रहा है, तो वह केवल जलवायु परिवर्तन का संकट नहीं है, बल्कि उससे उत्पन्न जल संकट है। कभी बाढ़, कभी सूखा, कभी बादल फटना, कभी महीनों तक वर्षा न होना—प्रकृति का यह असंतुलित व्यवहार अब अपवाद नहीं, बल्कि नई वास्तविकता बन चुका है। भारत जैसे देश, जहाँ लगभग 140 करोड़ से अधिक लोगों की आजीविका, कृषि और अर्थव्यवस्था प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से मानसून पर निर्भर है, वहाँ जलवायु परिवर्तन का सबसे बड़ा प्रभाव जल संसाधनों पर दिखाई दे रहा है। विडम्बना यह है कि जिस देश में विश्व की लगभग 18 प्रतिशत आबादी रहती है, उसके पास वैश्विक मीठे जल का मात्र लगभग 4 प्रतिशत हिस्सा है। ऐसे में यदि उपलब्ध वर्षा जल का संरक्षण नहीं किया गया तो भविष्य का भारत जल संकट, खाद्य संकट और आर्थिक संकट—तीनों का सामना एक साथ कर सकता है।
आज देश का दृश्य अत्यंत विरोधाभासी है। एक ओर असम, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और बिहार जैसे राज्य भीषण बाढ़ का सामना करते हैं, वहीं दूसरी ओर राजस्थान, बुंदेलखंड, मराठवाड़ा, विदर्भ और दक्षिण भारत के अनेक हिस्से पेयजल के लिए संघर्ष करते दिखाई देते हैं। कई बार एक ही राज्य के कुछ जिले बाढ़ में डूबे रहते हैं जबकि अन्य जिले सूखे की मार झेल रहे होते हैं। इसका अर्थ स्पष्ट है कि भारत में पानी की कमी से अधिक समस्या पानी के संरक्षण और प्रबंधन की है। वर्षा का अधिकांश जल कुछ ही दिनों में नदियों के माध्यम से समुद्र में चला जाता है। यदि इस बहते हुए जल को स्थानीय स्तर पर रोका जाए, जमीन में उतारा जाए और भूजल को पुनर्जीवित किया जाए, तो देश की जल समस्या का एक बड़ा समाधान निकल सकता है। यही वह स्थान है जहाँ चेक डैम जैसी छोटी लेकिन अत्यंत प्रभावशाली संरचनाएँ राष्ट्रीय जल नीति का केंद्र बन सकती हैं।
जलवायु परिवर्तन ने मानसून के चरित्र को बदल दिया है। पहले वर्षा कई सप्ताह तक समान रूप से होती थी, जिससे खेतों को पर्याप्त नमी मिलती थी और जल धीरे-धीरे धरती में समा जाता था। अब स्थिति अलग है। कुछ ही घंटों में पूरे महीने की बारिश हो जाती है। परिणामस्वरूप भारी मात्रा में पानी तेज गति से बहकर नदियों में चला जाता है, मिट्टी का कटाव होता है और भूजल का पुनर्भरण नहीं हो पाता। यही कारण है कि भारी वर्षा के बावजूद कुछ ही महीनों बाद जल संकट उत्पन्न हो जाता है।
भारतीय कृषि इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। देश की लगभग आधी कृषि भूमि आज भी वर्षा आधारित है। किसान समय पर मानसून आने की प्रतीक्षा करता है, लेकिन अब वर्षा की अनिश्चितता उसकी सबसे बड़ी चुनौती बन चुकी है। कभी बुआई के समय बारिश नहीं होती, तो कभी कटाई के समय अत्यधिक वर्षा पूरी फसल नष्ट कर देती है। इससे केवल कृषि उत्पादन ही प्रभावित नहीं होता, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था भी संकट में पड़ जाती है। किसानों की आय घटती है, ऋण बढ़ता है और ग्रामीण पलायन तेज होता है। यदि खेतों के आसपास जल संरक्षण की मजबूत व्यवस्था हो, तो किसान केवल मानसून पर निर्भर रहने के बजाय पूरे वर्ष सिंचाई के लिए जल उपलब्ध करा सकता है।
भारत की दूसरी बड़ी चुनौती भूजल का लगातार गिरता स्तर है। विश्व में सबसे अधिक भूजल दोहन भारत में होता है। लाखों ट्यूबवेल और बोरवेल खेती, उद्योग तथा घरेलू उपयोग के लिए पानी निकाल रहे हैं, लेकिन जितना पानी निकाला जा रहा है, उतना वापस जमीन में नहीं पहुँच रहा। पंजाब, हरियाणा, गुजरात, राजस्थान, कर्नाटक, तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश के अनेक जिलों में भूजल स्तर हर वर्ष नीचे जा रहा है। कई स्थानों पर किसानों को पहले जहाँ 100 फीट पर पानी मिल जाता था, आज 500 से 700 फीट तक बोरिंग करनी पड़ रही है। इससे खेती की लागत बढ़ रही है, बिजली की खपत बढ़ रही है और जल संकट और गहरा होता जा रहा है।
जल संकट केवल कृषि तक सीमित नहीं है। भारत के अनेक शहर हर गर्मी में टैंकरों के भरोसे चलने लगते हैं। महानगरों में दूर-दराज़ के जलाशयों से पानी लाया जाता है, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाएँ आज भी कई किलोमीटर दूर से पानी लाने को विवश हैं। औद्योगिक उत्पादन भी पानी की उपलब्धता पर निर्भर है। यदि आने वाले वर्षों में जलवायु परिवर्तन और तीव्र हुआ, तो जल उपलब्धता राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक विकास दोनों के लिए चुनौती बन सकती है।
ऐसे समय में चेक डैम केवल एक निर्माण परियोजना नहीं, बल्कि जल सुरक्षा का सबसे प्रभावी माध्यम बनकर उभरते हैं। चेक डैम किसी नदी, नाले या मौसमी जलधारा पर बनाया जाने वाला अपेक्षाकृत छोटा अवरोध होता है, जिसका उद्देश्य विशाल जलाशय बनाना नहीं, बल्कि बहते हुए पानी की गति को धीमा करना और उसे जमीन में समाने का अवसर देना होता है। जब पानी कुछ समय तक रुकता है, तो उसका बड़ा हिस्सा धीरे-धीरे धरती में रिसकर भूजल भंडार को पुनर्जीवित करता है। इससे आसपास के कुएँ, हैंडपंप और बोरवेल फिर से भरने लगते हैं।
चेक डैम की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इनकी लागत बड़े बाँधों की तुलना में बहुत कम होती है। इनके निर्माण में विशाल भूमि अधिग्रहण की आवश्यकता नहीं होती, विस्थापन नहीं होता और पर्यावरणीय क्षति भी न्यूनतम रहती है। यही कारण है कि विश्व के अनेक जल विशेषज्ञ अब बड़े बाँधों के साथ-साथ विकेंद्रीकृत जल संरक्षण संरचनाओं पर विशेष बल दे रहे हैं। जलवायु परिवर्तन के इस दौर में छोटे-छोटे जल संचयन ढाँचे ही दीर्घकालिक जल सुरक्षा की कुंजी बन सकते हैं।
भारत स्वयं इसके सफल उदाहरण प्रस्तुत कर चुका है। गुजरात में पिछले दो दशकों के दौरान हजारों चेक डैम और जल संरक्षण संरचनाओं के निर्माण ने कई सूखाग्रस्त क्षेत्रों की तस्वीर बदल दी। जहाँ कभी पेयजल के लिए टैंकर भेजने पड़ते थे, वहीं आज कई क्षेत्रों में भूजल स्तर उल्लेखनीय रूप से बढ़ा है। किसानों ने एक फसल से दो और तीन फसलें लेना शुरू किया। बागवानी बढ़ी, डेयरी उत्पादन बढ़ा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में नई जान आई।
राजस्थान में भी पारंपरिक जल संरक्षण प्रणालियों के पुनर्जीवन और छोटे जल अवरोधों के निर्माण ने अनेक सूखी नदियों को फिर से प्रवाहित किया। जल संरक्षण कार्यों ने केवल पानी ही नहीं लौटाया, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को पुनर्जीवित किया। जहाँ पहले बंजर भूमि थी, वहाँ हरियाली लौटी, वन्यजीव लौटे और ग्रामीणों का पलायन कम हुआ। यह सिद्ध करता है कि जल संरक्षण केवल पानी बचाने का कार्यक्रम नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक पुनर्निर्माण का भी माध्यम है।
चेक डैम बाढ़ नियंत्रण में भी अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं। जब अत्यधिक वर्षा होती है, तब पानी तीव्र गति से नीचे की ओर बहता है और निचले क्षेत्रों में बाढ़ की स्थिति उत्पन्न करता है। यदि ऊपरी क्षेत्रों में पर्याप्त संख्या में चेक डैम हों, तो वे पानी की गति को धीमा करते हैं, उसके प्रवाह को नियंत्रित करते हैं और बड़ी मात्रा में पानी को जमीन में समा जाने देते हैं। इससे एक ओर बाढ़ का खतरा कम होता है और दूसरी ओर वही पानी गर्मियों में भूजल के रूप में उपलब्ध रहता है। अर्थात एक ही संरचना बाढ़ और सूखे—दोनों समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करती है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि भारत जल संरक्षण को केवल किसी विभाग की जिम्मेदारी न माने, बल्कि इसे राष्ट्रीय जलवायु नीति का केंद्रीय तत्व बनाए। जिस प्रकार राष्ट्रीय राजमार्ग, डिजिटल इंडिया या हर घर जल जैसी योजनाओं को मिशन मोड में लागू किया गया, उसी प्रकार पूरे देश में एक राष्ट्रीय चेक डैम मिशन प्रारम्भ किया जाना चाहिए। इसका उद्देश्य केवल संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि वैज्ञानिक आधार पर प्रत्येक जलग्रहण क्षेत्र की आवश्यकता के अनुसार चेक डैमों का निर्माण करना होना चाहिए।
राष्ट्रीय चेक डैम मिशन केवल निर्माण का कार्यक्रम नहीं होना चाहिए, बल्कि यह देश की दीर्घकालिक जल सुरक्षा रणनीति का आधार बने। इसके लिए सबसे पहले भारत के प्रत्येक जलग्रहण क्षेत्र (वाटरशेड) का वैज्ञानिक मानचित्रण किया जाना चाहिए। आज उपग्रह चित्रों, ड्रोन सर्वेक्षण, रिमोट सेंसिंग, भू-स्थानिक सूचना प्रणाली (GIS) तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसी आधुनिक तकनीकों की सहायता से यह आसानी से निर्धारित किया जा सकता है कि किस स्थान पर चेक डैम बनने से अधिकतम भूजल पुनर्भरण होगा। अक्सर यह देखा गया है कि बिना वैज्ञानिक अध्ययन के बनाए गए जल ढाँचे कुछ वर्षों में बेकार हो जाते हैं या अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाते। इसलिए जल संरक्षण केवल निर्माण का विषय नहीं, बल्कि वैज्ञानिक नियोजन का विषय भी है।
इसके साथ ही यह भी आवश्यक है कि जल संरक्षण की जिम्मेदारी केवल सरकार तक सीमित न रहे। भारत में जल प्रबंधन की सबसे सफल कहानियाँ वहीं देखने को मिली हैं जहाँ स्थानीय समुदायों ने स्वयं इसकी जिम्मेदारी उठाई। पंचायतें, स्वयं सहायता समूह, किसान समितियाँ, जल उपयोगकर्ता संघ और स्थानीय सामाजिक संस्थाएँ यदि चेक डैमों के निर्माण और रखरखाव में सहभागी बनें, तो इनकी उपयोगिता कई गुना बढ़ सकती है। पानी का संरक्षण तभी स्थायी होगा जब समाज उसे अपनी सामूहिक संपत्ति माने, न कि केवल सरकारी परियोजना। भारत की पारंपरिक जल संस्कृति भी इसी सिद्धांत पर आधारित रही है। गाँवों के तालाब, बावड़ियाँ, जोहड़, आहर-पाइन प्रणाली, कुंड और नाड़ियाँ केवल जल संग्रहण की संरचनाएँ नहीं थीं, बल्कि सामुदायिक जीवन का केंद्र भी थीं। आधुनिक भारत को अपनी उसी परंपरा से प्रेरणा लेने की आवश्यकता है।
देश में जल संरक्षण की दिशा में पिछले वर्षों में अनेक महत्त्वपूर्ण पहलें भी हुई हैं। जल शक्ति मंत्रालय की स्थापना ने जल प्रबंधन को एकीकृत दृष्टिकोण प्रदान किया। जल शक्ति अभियान, अटल भूजल योजना, कैच द रेन अभियान, अमृत सरोवर मिशन और जल जीवन मिशन जैसी योजनाओं ने जल संरक्षण और ग्रामीण पेयजल उपलब्धता के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किया है। विशेष रूप से "कैच द रेन" अभियान ने यह संदेश दिया कि वर्षा की हर बूंद वहीं रोकी जानी चाहिए जहाँ वह गिरती है। इसी सोच को अगले स्तर पर ले जाने की आवश्यकता है। यदि इन सभी योजनाओं को एक व्यापक राष्ट्रीय चेक डैम नीति के साथ जोड़ा जाए, तो देश में जल संचयन की क्षमता कई गुना बढ़ाई जा सकती है।
भारत में मनरेगा जैसी योजनाएँ भी इस दिशा में अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो सकती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में लाखों श्रमिकों को रोजगार उपलब्ध कराने वाली यह योजना यदि बड़े पैमाने पर जल संरक्षण संरचनाओं के निर्माण से जुड़ जाए, तो दोहरे लाभ प्राप्त हो सकते हैं। एक ओर ग्रामीणों को स्थानीय स्तर पर रोजगार मिलेगा, दूसरी ओर जल संरक्षण की स्थायी परिसंपत्तियाँ तैयार होंगी। रोजगार सृजन और जल सुरक्षा—दोनों उद्देश्य एक साथ पूरे हो सकते हैं। यही सतत विकास का वास्तविक मॉडल है।
कृषि क्षेत्र में चेक डैमों का प्रभाव सबसे व्यापक होगा। जब भूजल स्तर सुधरेगा, तो किसानों की सिंचाई लागत घटेगी। उन्हें गहरे बोरवेल खोदने या अत्यधिक बिजली खर्च करने की आवश्यकता कम पड़ेगी। पर्याप्त पानी उपलब्ध होने पर किसान केवल धान और गेहूँ जैसी परंपरागत फसलों पर निर्भर रहने के बजाय बागवानी, फल, सब्जियाँ, दलहन और तिलहन जैसी अधिक लाभकारी फसलों की ओर भी बढ़ सकेंगे। इससे उनकी आय बढ़ेगी और कृषि अधिक टिकाऊ बनेगी। जल उपलब्धता बढ़ने से पशुपालन और डेयरी क्षेत्र को भी लाभ होगा, जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था का महत्त्वपूर्ण आधार है।
जल संरक्षण का सीधा संबंध पर्यावरण संरक्षण से भी है। जब भूजल स्तर बढ़ता है, तो आसपास की वनस्पतियाँ स्वतः विकसित होने लगती हैं। सूखते हुए तालाब पुनर्जीवित होते हैं, पक्षियों और वन्यजीवों की वापसी होती है और स्थानीय जैव विविधता मजबूत होती है। मिट्टी में नमी बनी रहने से मरुस्थलीकरण की प्रक्रिया धीमी पड़ती है। वृक्षों की संख्या बढ़ती है, जिससे कार्बन अवशोषण भी बढ़ता है। इस प्रकार चेक डैम केवल जल संरक्षण का माध्यम नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध प्रकृति आधारित समाधान (Nature-based Solution) भी हैं।
शहरी भारत को भी इस दिशा में गंभीरता से सोचने की आवश्यकता है। आज अधिकांश महानगर दूर-दराज़ के बाँधों और जलाशयों पर निर्भर हैं। दूसरी ओर, शहरों में कंक्रीट का विस्तार इतना अधिक हो चुका है कि वर्षा का पानी जमीन में समाने के बजाय सीधे नालों के माध्यम से नदियों में चला जाता है। परिणामस्वरूप एक ही शहर में बारिश के समय बाढ़ और गर्मियों में जल संकट दोनों देखने को मिलते हैं। यदि शहरों के आसपास के जलग्रहण क्षेत्रों में चेक डैम, पुनर्भरण संरचनाएँ और वर्षा जल संचयन को अनिवार्य किया जाए, तो भूजल स्तर सुधरेगा और नगरों की जल निर्भरता कम होगी। भविष्य के स्मार्ट शहर केवल डिजिटल तकनीक से नहीं, बल्कि जल सुरक्षा से भी स्मार्ट बनेंगे।

भारत की प्राचीन सभ्यता जल संरक्षण की अद्भुत परंपराओं पर आधारित रही है। सिंधु घाटी सभ्यता से लेकर दक्षिण भारत के विशाल टैंक सिस्टम, राजस्थान की बावड़ियाँ, गुजरात के वाव, महाराष्ट्र के बंधारे और बिहार की आहर-पाइन प्रणाली तक, हमारे पूर्वजों ने जल को संग्रहित करने की ऐसी प्रणालियाँ विकसित की थीं जो स्थानीय भूगोल और जलवायु के अनुरूप थीं। आधुनिक विकास की दौड़ में हमने इन परंपराओं की उपेक्षा की और बड़े बाँधों को ही जल प्रबंधन का प्रमुख साधन मान लिया। बड़े बाँधों का अपना महत्त्व है और वे सिंचाई, जलविद्युत तथा बाढ़ नियंत्रण के लिए आवश्यक भी हैं, किंतु वे अकेले भारत की जल समस्या का समाधान नहीं कर सकते। भारत जैसे विशाल और विविध भौगोलिक परिस्थितियों वाले देश में विकेंद्रीकृत जल संरक्षण को समान महत्व देना होगा।
यह भी ध्यान रखना होगा कि चेक डैम कोई जादुई समाधान नहीं हैं। यदि भूजल का अंधाधुंध दोहन जारी रहेगा, यदि जल की बर्बादी होती रहेगी, यदि फसल चक्र में सुधार नहीं होगा और यदि सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों का विस्तार नहीं होगा, तो केवल चेक डैम बनाकर समस्या का समाधान संभव नहीं है। इसलिए जल संरक्षण नीति बहुआयामी होनी चाहिए। ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई, जल पुनर्चक्रण, अपशिष्ट जल का उपचार, वर्षा जल संचयन, नदी पुनर्जीवन और भूजल प्रबंधन—इन सभी को एक समेकित रणनीति का हिस्सा बनाना होगा। किंतु इस पूरी रणनीति का सबसे मजबूत स्तंभ स्थानीय जल संचयन ही रहेगा।
आज विश्व के अनेक देश जलवायु परिवर्तन के अनुकूलन (Climate Adaptation) के लिए प्रकृति आधारित समाधानों में निवेश कर रहे हैं। भारत के पास इस क्षेत्र में नेतृत्व करने का अवसर है। यदि देश बड़े पैमाने पर चेक डैमों, जलग्रहण विकास और भूजल पुनर्भरण की नीति अपनाता है, तो यह केवल जल संकट का समाधान नहीं होगा, बल्कि वैश्विक स्तर पर जलवायु अनुकूलन का एक सफल मॉडल भी बन सकता है। इससे अंतरराष्ट्रीय जलवायु वित्त (Climate Finance) और हरित निवेश आकर्षित करने की संभावनाएँ भी बढ़ेंगी।
वर्ष 2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य केवल आर्थिक वृद्धि से प्राप्त नहीं होगा। इसके लिए जल सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा और पर्यावरणीय स्थिरता समान रूप से आवश्यक हैं। यदि देश के गाँवों में पानी नहीं होगा, तो कृषि नहीं बचेगी; यदि कृषि नहीं बचेगी, तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था कमजोर होगी; और यदि जल संकट गहराया, तो उद्योग, शहर और सामाजिक स्थिरता—सब प्रभावित होंगे। इसलिए पानी का प्रश्न अब केवल पर्यावरण का विषय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय विकास, आर्थिक सुरक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा का भी विषय बन चुका है।
सबसे बड़ी चुनौती हमारी सोच में परिवर्तन की है। भारत में अक्सर बाढ़ आने पर राहत कार्यों की चर्चा होती है और गर्मियों में जल संकट आने पर टैंकरों की व्यवस्था की जाती है। लेकिन समस्या का स्थायी समाधान इन दोनों के बीच छिपा है। जिस पानी को हम बाढ़ के समय अभिशाप मानते हैं, वही यदि चेक डैमों और जल संरक्षण संरचनाओं के माध्यम से धरती में उतार दिया जाए, तो वही पानी गर्मियों में जीवनदाता बन सकता है। प्रकृति हमें हर वर्ष पर्याप्त वर्षा देती है; कमी हमारी तैयारी और प्रबंधन में है।
अब समय आ गया है कि भारत जलवायु परिवर्तन को केवल वैश्विक मंचों पर उठाने वाला मुद्दा न बनाए, बल्कि उसके समाधान के लिए अपने गाँवों, खेतों और जलधाराओं में ठोस परिवर्तन भी करे। जिस प्रकार हरित क्रांति ने भारत को खाद्यान्न के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाया और श्वेत क्रांति ने दुग्ध उत्पादन में विश्व का अग्रणी राष्ट्र बनाया, उसी प्रकार आने वाले दशक में "चेक डैम क्रांति" भारत को जल सुरक्षा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बना सकती है। यह केवल एक निर्माण कार्यक्रम नहीं होगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य में किया गया निवेश होगा।
जलवायु परिवर्तन की इस अनिश्चित दुनिया में सबसे बड़ा संसाधन वही होगा, जिसने पानी को बचा लिया। भारत के पास अभी भी अवसर है कि वह हर वर्ष गिरने वाली वर्षा की प्रत्येक बूंद को अपनी धरती में समाहित करने का राष्ट्रीय संकल्प ले। यदि केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर वैज्ञानिक योजना, पर्याप्त वित्तीय निवेश, आधुनिक तकनीक और जनभागीदारी के आधार पर एक व्यापक राष्ट्रीय चेक डैम नीति लागू करें, तो आने वाले वर्षों में देश की जल तस्वीर बदल सकती है। जल संकट से जूझता भारत तब जल सुरक्षा की दिशा में एक नया अध्याय लिखेगा, और यही अध्याय विकसित भारत की सबसे मजबूत नींव सिद्ध होगा।
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)
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