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चंद्रयान की कामयाबी बदल रही नजरिया

Chandrayaan's success is changing the outlook

हर सफलता कई के लिए गर्व और खुशी की वजह होती है तो कुछ लोगों के लिए वह ईर्ष्या और जलन का भी कारण होती है। चंद्रयान तीन की सफलता के साथ भी ऐसा ही हो रहा है। कुछ इसी तरह चंद्रयान की कामयाबी को लेकर आलोचनाओं और प्रशंसाओं के दौर चल रहे हैं। चंद्रयान की सफलता ने भारत की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक ताकत को विमर्श के केंद्र में लाने में बड़ी भूमिका निभाई है। इसकी वजह बने हैं भारत के अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो के वैज्ञानिक और उनकी आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक सोच। भारत में एक बहस बहुत पुरानी है। भारत को संपेरों,अंधविश्वासों और पाखंडियों के देश के तौर पर पश्चिमी दुनिया देखती रही है। भारतीय अध्यात्म, सांस्कृतिक विरासत और परंपरा पर कथित पश्चिमी नजरिए से बुरा और गड़बड़ तौर पर ही देखा जाता रहा है। लेकिन चंद्रयान अभियान से जुड़े वैज्ञानिकों और तकनीशियनों की धार्मिकता लोगों में यह संदेश देने में सफल हो रही है कि भारतीय अध्यात्म और सांस्कृतिक परंपराओं का पालन ढपोरशंख नहीं है।

इसरो के प्रमुख एस सोमनाथ ने चंद्रयान को अंतरिक्ष में भेजे जाने के पहले आंध्र प्रदेश के मशहूर तिरूपति बालाजी मंदिर का दौरा किया था। चंद्रयान के चंद्रमा पर पहुंचने और विक्रम लैंडर के सफलता पूर्वक पहुंचने के बाद सोमनाथ ने केरल के भद्रकाली मंदिर का दौरा किया। इसकी फोटो भी बाकायदा अखबारों में छपी। चूंकि चंद्रयान की  सफलता इतनी बड़ी है कि इसरो प्रमुख का चलना-फिरना तक आज के दौर में खबर का विषय बन चुका है। ऐसे में उनकी मंदिर यात्रा पर समाचार बनने ही थे। इसकी उन तत्वों ने आलोचना भी की, जो अपनी परंपराओं से हीनताबोध का अनुभव करते रहे हैं। उन्हें यह बात पच नहीं रही थी कि शुद्ध विज्ञान की बात करने वाला व्यक्ति, वैज्ञानिक तरीके से वैज्ञानिक दुनिया की सर्वोच्च समझी जाने वाली सफलता हासिल करने वाला व्यक्ति आखिर अध्यात्म और धर्म की शरण में क्यों चला गया।

इन आलोचकों को जवाब दिया है, इसरो के ही प्रमुख रहे जी माधवन नायर ने। जी माधवन नायर ने कहा है कि  यह मूल रूप से मौलिक सत्य की खोज का सवाल है। कोई बाहरी दुनिया को देखता है, समझने की कोशिश करता है कि यह क्या है। दूसरा आंतरिक रूप से देख रहा है और यह समझने की कोशिश कर रहा है कि स्वयं क्या है और यह कहां विलीन हो जाता है।

माधवन नायर यहीं नहीं रूके। उन्होंने यह भी कहा कि अल्बर्ट आइंस्टीन जैसे महान वैज्ञानिकों का भी मानना था कि ब्रह्मांड से परे भी कुछ है और उन्होंने इसे भगवान या निर्माता के रूप में संदर्भित किया है। माधवन नायर का यह भी कहना है कि स्वयं को तनाव मुक्त रखने के लिए प्रार्थना करने और पूजा स्थलों पर जाना सही है। उन्होंने कहा कि 'प्रार्थनाएं मानसिक संतुष्टि पाने के लिए होती हैं। जब भी हम एक जटिल वैज्ञानिक मिशन का पालन कर रहे होते हैं, तो बहुत सारी बाधाएं और समस्याएं होती हैं और चीजें किसी भी समय गलत हो सकती हैं। इसलिए शांत दिमाग रखें और फिर देखें कि वास्तविक समय में क्या हो रहा है, ताकि आपके निर्णय लेने की प्रक्रिया सटीक और समय पर हो सके, प्रार्थना और पूजा और ये सभी चीजें मदद करती हैं।

नायर ने कहा कि इस तरह की प्रार्थनाएं और मान्यताएं किसी विशेष धर्म तक सीमित नहीं हैं और कोई भी पूजा करने के अपने तरीकों का पालन कर सकता है। उन्होंने कहा कि देश में हर नागरिक को अपनी सोच का पालन करने, मन के बारे में दार्शनिक सोच और किसी विशेष दर्शन का अनुसरण करने से प्राप्त होने वाली आत्म-संतुष्टि का अपना अधिकार है।

माधवन नायर के बयान से साफ है कि अध्यात्म और धर्म की दुनिया मन और इहलोक से इतर की दुनिया है। वे साफ करते हैं कि ब्रह्मांड में जो सिर्फ विज्ञान ही नहीं है, बल्कि उससे भी इतर कोई दुनिया है। इसरो प्रमुख सोमनाथ की आस्था हो या फिर चंद्रयान अभियान में शामिल महिला वैज्ञानिकों का परंपरा का पूरी शिद्दत से पालन करना मामूली बात नहीं है। चूंकि चंद्रयान ने इतिहास रचा है, मील का पत्थर बना है। इसलिए उससे जुड़े लोगों से व्यापक जनसमुदाय का प्रेरित और प्रभावित होना लाजमी है। बड़े और सफल लोगों से लोग प्रेरित होते ही हैं। इसरो प्रमुख जैसी वैज्ञानिक हस्तियों की आस्था के चलते आस्था का विरोध करने वाले लोगों को एक तरह से निरूत्तर किया है। इसकी वजह से भारत की धार्मिकता और आध्यात्मिकता को नई पहचान मिली है। सदियों से भारत की अध्यात्म,संस्कृति और धर्म में आस्था रखने वाली जनता की सोच बदलने में इससे मदद मिलेगी। अब भारत की आध्यात्मिक ताकत को दकियानुसी या ढपोरशंखी नहीं माना जाएगा। अपनी आस्था और धार्मिकता के चलते खुद को हीन मानने वाली सोच भी इससे खत्म होगी और लोगों में नए तरह का आत्मविश्वास भी पैदा होगा। जिससे भारत की आध्यात्मिक ताकत को नई पहचान मिलेगी।

जिस लोक अविश्वास की बुनियाद पर भारत का विभाजन हुआ, उसकी वजह से भारत और पाकिस्तान के लोगों की जो सोच विकसित हुई, उसमें सिर्फ और सिर्फ अंधविरोध के लिए ही गुंजाइश रही है। पाकिस्तान की एक पीढ़ी तो भारत को गाली देते और भारत को अपने से कमतर मानते हुए गुजर चुकी है या खत्म होने के कगार पर है। लेकिन चंद्रयान की सफलता ने भारत को लेकर पाकिस्तान की नई पीढञ़ी की सोच बदलने में मदद मिली है। पाकिस्तान की नई पीढ़ी अब खुलकर कहने लगी है कि 1947 से पहले तक एक ही इतिहास वाले भारत और पाकिस्तान की आजादी के बाद की यात्रा में काफी अंतर आ चुका है। पाकिस्तान की नई पीढ़ी मानने लगी है कि भारत ने सिर्फ आर्थिक तरक्की ही नहीं हासिल की है, बल्कि वैज्ञानिक तरक्की के दम पर वह चंद्रमा तक पहुंच चुका है। पाकिस्तान की नई पीढ़ी भारत की इस कामयाबी को अब स्वीकार भी करने लगी है और खुलकर कहने लगी है कि पाकिस्तानी अवाम औल राजनीति को अब खुलकर भारत को ऐसी सफलताओं को लिए बधाई देनी चाहिए। पाकिस्तान की नई पीढ़ी मानने लगी है कि पाकिस्तान में अंधभारत विरोध का कोई मतलब नहीं है। अब वक्त आ गया है कि अपने ही पुराने टुकड़े से तरक्की के गुर सीखे जाएं। भारतीय चंद्रयान की कामयाबी के बाद पाकिस्तान की नई पीढ़ी की सोच में आया यह बदलाव यह बताने के लिए काफी है कि चंद्रयान की सफलता ने किस मर्म पर चोट पहुंचाई है।

समाजवादी नेता राममनोहर लोहिया एक दौर में भारत और पाकिस्तान के बीच एकता की उम्मीद पाले बैठे थे। भारत और पाकिस्तान के बीच अविश्वास और विरोध की ऐसी खाई इस दौर में विकसित हो चुकी है कि लोहिया की वह सोच अब जमीनी हकीकत बनती नजर नहीं आती। भारत और पाकिस्तान का निकट भविष्य में जर्मनी की तरह एक होना संभव नहीं लगता। लेकिन चंद्रयान की सफलता ने एक काम जरूर किया है। भारत को लेकर पाकिस्तान की एक पीढ़ी का नजरिया बदलने लगा है। इसे सकारात्मक रूप से देखा जाना चाहिए। क्योंकि दोनों देश भले ही एक ना हो सकें, लेकिन दोनों पड़ोसी कम से कम सहज तो हो सकते हैं। पाकिस्तान में भारत विरोध की ग्रंथि अगर कमजोर पड़ेगी तो निश्चित मानिए, सीमाओं पर शांति आएगी। सीमाओं की शांति सीमा के दोनों ओर की समृद्धि का वाहक बनेगी। यह दोनों ही देशों की अवाम के हित में होगा। वैसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शपथ लेते ही पाकिस्तान की ओर हाथ बढ़ाकर संदेश यही दिया था कि अंध विरोध का कोई भविष्य नहीं है। लेकिन पाकिस्तान के हुक्मरान और सेना ने इसे सहजता से स्वीकार नहीं किया। अगर चंद्रयान की कामयाबी से उनका नजरिया बदलता है, अंधविरोध की राह से वे अलग हटते हैं तो हम उम्मीद कर सकते हैं कि भारत और पाकिस्तान के रिश्तों बीच की बर्फ पिघलेगी और चंद्रयान की कामयाबी की बुनियाद पर इस तरफ आगे बढ़ने में पाकिस्तान की नई पीढ़ी बड़ी मददगार हो सकती है। चंद्रयान की कामयाबी से आध्यात्मिकता की ताकत का बढ़ना और सीमाओं के दोनों ओर सहजता स्थापित होने की सोच बनना मामूली बात नहीं है। चंद्रयान की सफलता को भी इस दृष्टिकोण से भी देखा जाना चाहिए।

 

 


उमेश चतुर्वेदी
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)

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