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कनाडा या दहशतगर्दों का अड्डा

Canada or a hub of terrorists

अभी हाल में भारत के, एक कूटनीतिज्ञ, पवन कुमार राय को कनाडा के जस्टिन ट्रूडो सरकार ने देश से निष्कासित किया। उन पर ये आरोप लग गया कि वो एक हरदीप सिंह निज्जर की 18 जून 2023 को हुई हत्या के षड्यंत्र में शामिल थे। निज्जर, एक खालिस्तानी दशहतगर्द था और खालिस्तानी टाइगर फोर्स का नेता था। वह भारत में कई हत्याओं के लिए ज़िम्मेदार था। यहां तक कि वो भारत के अंदर पैरा-ग्लाइडर से गोला-बारूद भेजने की योजना बना रहा था। कनाडा में रह रहे ऐसे खालिस्तानी तत्त्वों के बारे में ट्रूडो के स्तर पर शिकायत कई बार दर्ज कराई थी। पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने ये बात ट्रूडो के समक्ष उठाई थी। उन्होंने ट्रूडो को एक 'मोस्ट वांटेड' लिस्ट सौंपी थी, जिसमें निज्जर का नाम प्रमुख था।

जालंधर वासी, हरदीप सिंह निज्जर, ने पहली बार 1997 में गैर कानूनी तरीके से कनाडा जाने की कोशिश की थी। इसके लिए उसने कहानी रची कि वो, और उसका परिवार भारतीय शासन की प्रताड़ना का शिकार है, उसके लिए, उसके पिता और चाचा को पुलिस ने बुरी तरह पीटा, इत्यािद। इस किस्से का अप्रवास प्राधिकारियों (इमीग्रेशन ऑथोरिटी) पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। फिर उसने एक कनाडाई नागरिक महिला को अपनी पत्नी बनाकर प्राधिकारियों के सामने पेश किया। अधिकारियों ने पाया के महिला पहले से ही शादीशुदा थी। आख़िर में, 2007 में, वो कनाडा के ब्रिटिश कोलंबिया पहुँचने में कामयाब हो गया। साल 2017-2018 में भारत सरकार ने निज्जर के देशव्यापी अपराधी गतिविधियों को लेकर कैनेडियन अधिकारों को एक पूरा डोजियर सौंपा था, लेकिन कैनेडियन सरकार ने इसका कोई खास संज्ञान नहीं लिया। निज्जर को महज़ "नो फ्लाई लिस्ट" पर डाला। 2021 में निज्जर, ब्रिटिश कोलंबिया के सारे गुरुद्वारों का जबरन बाहुबल से अध्यक्ष बन गया, गुरुद्वारे को फिर इसने खालिस्तानियों के अड्‌डे में तब्दील कर दिया।

ट्रूडो एक ऐसे फ़रेबी और अपराधी व्यक्ति के लिए, जिसका नाम इंटरपोल में दर्ज हो, उसके लिए भारत सरकार से संबंध तोड़ने पर तुले हुए हैं। आख़िर कौन सी मजबूरी है? कहीं वो ब्लैकमेल तो नहीं हो रहे?

यकीनन वो ब्लैकमेल हो रहे हैं। अगर कनाडा की संसद का बनावट देखा जाए तो ब्लैकमेल वाली बात साफ जाहिर है। संसद में 338 सीटें हैं, जिसमें ट्रूडो की लिबरल पार्टी के 157 हैं, कंजर्वेटिव पार्टी के 121 और न्यू डेमोक्रेटिक पार्टी (एनडीपी) के 24 हैं। एनडीपी का मुखिया एक जगमीत सिंह धालीवाल है, जो खालिस्तानियों का भी सरगना है। एनडीपी के समर्थन से ही ट्रूडो की सरकार टिकी हुई है। ये कहना भी गलत नहीं होगा कि कनाडा की सरकार, खालिस्तानी चला रहे हैं।

हाल ही में जब भारत के पंजाब में अमृतपाल सिंह के खिलाफ मुहिम चली, तब जगमीत सिंह बेचैन होकर ट्रूडो के पास गए और उसने भारत द्वारा मानव अधिकारों का हनन का मुद्दा बनकर, जल्दबाजी करने को कहा।

2018 में भी ट्रूडो ने भारत की यात्रा की थी और उनका स्वागत बहुत ठंडे दिल से किया गया। असल में, भारत, उनके खालिस्तान परस्त रवैये से बहुत ज्यादा परेशान था। इस बात का ट्रूडो को काफी झटका लगा था। उन्हें खालिस्तान को लेकर अपनी नीति में परिवर्तन का संकेत दिया। कनाडा सरकार ने देश की सुरक्षा को लेकर एक रिपोर्ट जारी की, जिसमें 'खालिस्तानी उग्रवाद' को खतरा बताया गया। इसको लेकर खालिस्तानी राजनीति राजनीतिज्ञों द्वारा भारी हंगामा किया गया और ट्रूडो ने उस रिपोर्ट को वापस ले लिया।

ट्रूडो की भारत से नफ़रत खानदानी है। इनके पिता, पियरे ट्रूडो जो कि प्रधान मंत्री थे, भारत के प्रति नफ़रत से भरे हुए थे। अगर बेटे ने निज्जर को पनाह और इज्जत दी तो उसके पिता ने, तलविन्दर सिंह परमार, जिसने एयर इंडिया के विमान को दहशतगर्दी का शिकार बनाया था, को कनाडा में सुरक्षित रखा। 1985 के उस विमान के विस्फ़ोट में, 300 से ज्यादा यात्री परमार के दहशतगर्दी का शिकार बने। अगर पियरे ट्रूडो, 1982 में, इंदिरा गांधी के आग्रह पर परमार का प्रत्यर्पण कर लिया होता तो ये त्रासदी ना होती। परमार खुलकर हिंदुओं के नरसंहार की बात करता रहा, भारतीय दूतवास पर हमले के लिए खालिस्तानियों को उकसाता रहा, परंतु इसका कोई असर पियरे ट्रूडो पर नहीं पड़ा। परमार ने भी, पंजाब में दो पुलिसकर्मियों की हत्या करके, कनाडा में पनाह ले ली थी।

पियरे ट्रूडो ने ना केवल परमार को भारत प्रत्यर्पण करने से मना कर दिया, बल्कि जब खालिस्तानी उसे शहीद का दर्जा दे रहे थे तो उसने कोई आपत्ति नहीं जताई, और अब वही दर्जा हरदीप सिंह निज्जर को दिया जा रहा है और जस्टिन ट्रूडो अंदर ही अंदर उसका समर्थन कर रहा है। निज्जर के हत्या के दो दिन पहले, कनाडा के एक खालिस्तानी रैली में परमार के पोस्टर चमक रहे थे। आज जस्टिन ट्रूडो निज्जर की हत्या पर इतना मातम मना रहा है, लेकिन जब प्रमुख बलूच स्वतंत्रता सेनानी, करीमा बलूच, 2020 में, कनाडा में हत्या हुई तब ट्रूडो की आत्मा को तनिक ठेस नहीं पहुंची, क्योंकि वह जानता था कि उसके मित्र देश पाकिस्तान की आईएसआई ने उसके मौत को अंजाम दिया था। खालिस्तानी, कनाडा और पाकिस्तान दोनों के साझा हथियार हैं।

मशहूर पत्रकार स्टीवर्ट बेल ने एक किताब लिखी है "कोल्ड टेरर: हाउ कैनाडा नर्चर एंड एक्सपोर्ट टेररिज्म अराउंड द वर्ल्ड", यानि कि किस तरह से कैनेडा दहशतगर्दी को पालता और दुनिया भर में निर्यात करता है। लेखक ने किताब में खुलासा किया है कि किस तरह कनाडा, सिख, तमिल और इस्लामिक दहशतगर्दों को अपनी मिट्टी में पनाह दिया और वहां से फिर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उन्हें दहशतगर्दी के संचालन के लिए संरक्षण और सुविधा दिया। किताब की शुरुआत कैनेडियन सिक्योरिटी एंड इंटेलिजेंस सर्विस (सीएसआईएस) के भूतपूर्व प्रमुख कथन (उद्धरण) से शुरू होता है जिसमें वो कहते हैं कि शायद अमेरिका को छोड़, सभी देशों की तुलना में, यहां (कनाडा) में, सबसे ज्यादा दहशतगर्द सक्रिय हैं। उसने उन दहशतगर्दी की घटनाओं का जिक्र किया, जिसमें किसी न किसी रूप में कनाडा के नागरिक शामिल थे, जैसे कि 1985 का कनिष्क बम विस्फोट, 1990 में राजीव गांधी की हत्या, 1993 में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर में बम विस्फोट, 1993 में कोलंबो में रणसिंघे प्रेमदासा की हत्या, 1997 में श्रीलंका में ट्रक धमाका जिसमें 100 लोगों की मौत हुई थी और 2002 में बाली में बमबारी। अमेरिका में कुछ अधिकारों का मनाना है कि 9/11 को कार्यान्वित करने वाले जिहादी दहशतगर्दों ने कनाडा के ही रास्ते, अमेरिका में प्रवेश किया था। स्टीवर्ट बेल का मानना है कि अगर कनाडा को "Axis of Evil" यानी 'दुष्टों के समूह' में शामिल किया जाए तो गलत नहीं होगा।

पियरे ट्रूडो के नफ़रत की वजह 1974 के भारत का पहला परमाणु परीक्षण था। उनका मानना था कि भारत ने कनाडा से CANDU रिएक्टरों को शांतिपूर्ण उद्देश्य के लिए भेजा, परन्तु भारत ने सैन्य प्रयोजन के लिए इस्तेमाल किया। वो दौर ऐसा था, जिस समय खालिस्तान उग्रवाद पनप रहा था। पाकिस्तान और उसका रक्षक अमेरिका, 1971 के युद्ध में पाकिस्तान की हार के बाद, भारत को सबक सिखाना चाहता था। दोनों ने मिलकर खालिस्तान अलगाववाद को खूब हवा दिया। अमेरिका के गुलाम ब्रिटेन और कनाडा जैसे पश्चिमी देश भी इस मुहिम का हिस्सा बन गए। फिर जब जिया-उल-हक ने पाकिस्तान की सत्ता पर कब्ज़ा किया, तो उसने भारत के सिखों के तीर्थ के लिए अपने दरवाजे खोल दिये। धीरे-धीरे ये तीर्थ स्थल, आईएसआई के द्वारा, खालिस्तान उग्रवाद के लिए भर्ती का केंद्र बन गए। तीर्थ स्थलों पर पश्चिम में बसे सिखों का भी आवागमन शुरू हो गया। भारत के छटे हुए खालिस्तानी देशभक्त और अपराधी, पाकिस्तान के जरिये, कनाडा जाने लगे। वहां पहुंचकर ये अपने आपको राजनीतिक रूप से पीड़ित समुदाय जताकर सहानुभूति बटोरना चाहते थे। कनाडा की नीतियाँ ऐसी रही की, वहां हर आपराधिक तत्व को मानव अधिकारो के नाम पर आश्रय मिल जाता था, और फिर ये नागरिकता में परिवर्तन हो जाता था। ऐसे तत्त्वों का फिर वहां के गुरुद्वारों पर कब्ज़ा होने लगा, और गुरुद्वारों से बटोरे पैसे से, खालिस्तान उग्रवाद और उग्र रूप धारण कर लिया। पैसा और कनाडा सरकार के मजबूत संरक्षण ने उनमें एक अजेयता की भावना पैदा कर दी। कनाडा, खालिस्तान उग्रवाद और दहशतगर्दी का मुख्य केंद्र बन गया।

इसी अजेयता की भावना ने पश्चिम देश, खासकर कनाडा, खालिस्तानियों को, आई.एस.आई और चीन से गठजोड़ बनाकर, भारत के पंजाब की राजनीति में एक बड़ी भूमिका के लिए प्रेरित किया। एक राजनीतिक पार्टी के फ़ायदे के लिए पैसा बरसाने लगा। इस पार्टी के समर्थन में जहाज भर-भर के खालिस्तानी, कनाडा से पंजाब के चुनाव में प्रचार के लिए आते रहे और पानी की तरह पैसा बहाया। आज पंजाब में उसी पार्टी की सरकार है।

इन्हीं खालिस्तानियों और कनाडा के पैसों से 2021 में किसान आंदोलन चलाया। लाल किला पर भारत के झंडे का अपमान किया। उस समय ट्रूडो ने वक्तव्य दिया कि वो भारत में किसानों और उनके परिवार के सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं। उन्होंने ये भी कहा कि किसानों के द्वारा दिल्ली की नाकाबंदी और घेराबंदी  एक जायज़ लोकतांत्रिक तरीका है। परन्तु कुछ ही महीने बाद, फरवरी 2022 में, कनाडा के ट्रक चालकों ने, 2700 ट्रक द्वारा अलोकतांत्रिक कोविड नीति के खिलाफ, ओटावा शहर को आर्थिक रूप से ठप कर दिया। तब ट्रूडो ने इसे अलोकतांत्रिक बातकर आपातकाल की घोषणा कर दी।

पूरे किसान आंदोलन की योजना और षड्यंत्र, खालिस्तान और कनाडा सरकार के मिलीभगत से प्रायोजित था। वो भी दाल के कारण। कनाडा, दो दशक से भारत को सबसे बड़ा दाल का निर्यातक था। भारत, अपनी नई कृषि नीति के अनुरूप अपने ही देश में दाल के उत्पादन में वृद्धि कर आत्मनिर्भरता की तरफ अग्रसर था। इस किसान आंदोलन से भारत का 77000 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। इन किसान आंदोलनकारियों ने बाद में प्रधानमंत्री की फिरोजपुर में जान लेने की भी कोशिश की थी। क्या इस सबके लिए ट्रूडो जिम्मेदार नहीं हैं?

खालिस्तानियों के संदर्भ में, भारत के खिलाफ, पाकिस्तान और कनाडा का सहयोग और षड़यंत्र स्थापित हो चुका है। कई ऐसे संकेत और तथ्य हैं, कि, 2019 के कनाडा के चुनाव में ट्रूडो के समर्थन में चीन ने भारी पैसा लगाया था। इस इल्जाम से ट्रूडो तभी बाहर निकल सका, जब इस मुद्दे पर उन्हें जगमीत सिंह धालीवाल का समर्थन

प्राप्त हुआ।

कांग्रेस के लोकसभा सदस्य, रवनीत सिंह बिट्टू, ने ये इल्जाम लगाया कि पंजाब में नशीले पदार्थों में धंधा करने वाले गिरोह, ट्रूडो की पार्टी को वित्तीय सहायता कर रहे हैं, इसी कारण से वो खालिस्तानियों का पक्ष ले रहे हैं। ज्ञात हो कि बिट्टू के दादा, बेअंत सिंह, पंजाब के मुख्यमंत्री थे, जिनकी हत्या खालिस्तानियों ने 1995 में की थी। पंजाब और हरियाणा के रिकॉर्ड्स के मुताबिक, 2013 में, पंजाब के अंदर, सुरक्षा एजेंसियों ने 6000 करोड़ रुपये का ड्रग्स बरामद किया। दोषियों में 16, कनाडा में रह रहे भारत के एन.आर.आई. (NRI) शामिल थे। लेकिन कनाडा सरकार ने तरह-तरह के बहाने बनाकर, उनका प्रत्यर्पण नहीं किया। माना जाता है कि इस NRI गिरोह में बड़े रसूख वाले लोग थे।

इसलिए खालिस्तान उग्रवाद और अलगाववाद के मुद्दे पर, कनाडा, पाकिस्तान और चीन के बीच घनिष्ठ आपसी सहयोग है। इसमें नारकोटिक्स उद्योग भी लिप्त है। ट्रूडो को यह बात समझनी चाहिए कि भारत माता के अगर कुछ कपूत हैं, तो उससे ज्यादा कहीं सपूत हैं। कनाडा में कपूत और सपूत के द्वंद को अंतरराष्ट्रीय मुद्दा ना बनाएं। वॉशिंगटन स्थित, प्यू रिसर्च सेंटर (Pew Research Centre) ने 2021 में खालिस्तान समर्थकों का अांकलन करने के लिए सिख समुदाय में सर्वेक्षण किया, और पाया कि 95 प्रतिशत सिख भारतीय होने पर बहुत गर्व करते हैं। 70 प्रतिशत तो यहां तक मानते हैं कि जो सिख, भारत का अपमान करता है वह सिख हो ही नहीं सकता। इतने कम समर्थन के बावजूद, अगर खालिस्तानी उग्रवाद पनप रहा है तो उसका कारण है पाकिस्तान का समर्थन, प्रशिक्षण और वित्तीय सहायता और कनाडा, ब्रिटेन, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और कुछ हद तक न्यूज़ीलैंड का नीतिगत सहयोग।

कनाडा में अमेरिका के राजदूत, डेविड कोहेन, ने कहा कि फाइव आइज़ (Five Eyes) के आपस में इंटेलिजेंस के आदान-प्रदान से यह स्थापित हुआ कि हरदीप सिंह निज्जर की हत्या में भारत का हाथ है। 'फाइव आइज़' अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और न्यूज़ीलैंड के बीच इंटेलिजेंस के आदान-प्रदान की व्यवस्था का नाम है।

1985 में कनिष्क विमान, खालिस्तानी दहशतगर्दी का शिकार बना। लेकिन आज भी कनाडा इसकी चर्चा तक नहीं कर सकता। वो 329 जानों को खोने का दर्द, मृतकों के परिवारों के लिए संजीदगी और उनकी विकसित आत्मा को, जिसका वो दावा करते हैं, छू भी नहीं सका। एक 9/11 हुआ तो पूरे अफगानिस्तान को अमेरिका ने पश्चिम देशों के समर्थन से, पूरे अफगानिस्तान को रौंद डाला था। इस सैनिक अभियान में, 2014 तक, कुल मिलाकर 40000 कनाडा के सैनिक ने हिस्सा लिया, जिसमें 158 शहीद हुए। 9/11 जिहादी हमले में 24 कनाडा के नागरिक मारे गए थे। कनिष्क विमान के पीड़ितों के लिए शायद इसलिए पीड़ा नहीं हुई क्योंकि इसमें 268 कनाडा के नागरिक थे, जिसमें ज्यादातर भारतीय मूल के थे। कनिष्क विमान दुर्घटना  बावजूद, 9/11 में दहशतगर्दी का शिकार होने के बावजूद, इन पश्चिमी देशों ने खालिस्तानियों को समर्थन जारी रखा।

इन देशों में स्थित खालिस्तानियों की दहशतगर्द गतिविधियाँ बढ़ती गई, परंतु उसको रोका ना गया। फलस्वरूप वो दूतावासों और मंदिरों पर हमला करने लगे। भारतीय कूटनीतज्ञों को धमकी देते रहे। भारत इसके खिलाफ गुहार लगाता रहा, लेकिन उसका नज़रअंदाज़ होता रहा। कभी खालिस्तानियों को भारतीय उच्चायोग पर हमला करने से नहीं रोका गया। सैन-फ्रांसिस्को में भारतीय वाणिज्य दूतावास पर हमला रोकने का अमेरिकी तंत्र ने कोई प्रयास नहीं किया, और कनाडा में इंदिरा गांधी के हत्यारों को एक जुलूस में, झांकी के द्वारा, महिमामंडन के लिए प्रोत्साहित किया।

भारत एक तरफ पश्चिमी दुनिया के "इंडो-पैसिफिक" रणनीति का हिस्सा है, दूसरी तरफ यही पश्चिमी देश, खालिस्तानियों का भारत के खिलाफ हथियारकरण कर रहे हैं। आज कनाडा का ब्रिटिश कोलंबिया, खालिस्तानी दहशतगर्दी और आपराधिक गतिविधियों का केंद्र बन चुका है। ट्रूडो जब तक इसको ध्वस्त नहीं करते, भारत और कनाडा के बीच रिश्ते सामान्य नहीं होने चाहिए।

 

 

आर.एस.एन. सिंह

(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)

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