
उमेश चतुर्वेदी
दुनिया की चालीस फीसद जीडीपी, 49.5 प्रतिशत आबादी और विश्व व्यापार में 26 प्रतिशत की हिस्सेदारी के साथ ब्रिक्स समूह नई विश्व व्यवस्था का प्रतीक बनकर उभरा है। बीते 12 और 13 सितंबर को दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स के सम्मेलन ने एक ध्रुवीय हुई विश्व व्यवस्था के सामने मजबूत चुनौती बनकर उभरा है। चौथी बार भारत की अध्यक्षता में ब्रिक्स ने वैश्विक मुद्दों को संबोधित करते हुए जो 140 सूत्रीय ‘नई दिल्ली घोषणा पत्र’ जारी किया है, उसने अमेरिकी वर्चस्व वाली वैश्विक ताकतों को बड़ी चुनौती पेश की है। शीत युद्ध काल के पहले दो ध्रुवों में बंटी विश्व व्यवस्था को गुटनिरपेक्ष आंदोलन एक तरह से चुनौती पेश करता था। लेकिन सोवियत संघ के बिखराव के बाद गुटनिरपेक्ष आंदोलन भी किनारे होता चला गया। लेकिन नई दिल्ली में हुए ब्रिक्स सम्मेलन ने जिस तरह नई तरह की विश्व व्यवस्था प्रस्तुत की है, उसने गुटनिरपेक्ष आंदोलन की याद दिला दी है। इसने ट्रंप की अगुआई वाले अमेरिकी वर्चस्व को भी ना सिर्फ चुनौती पेश की है, बल्कि दुनिया को यह संदेश दिया है कि युद्ध से बचते दुनिया को आर्थिक विकास की जरूरत है, गरीबों की आंखों के आंसू पोंछने की आवश्यकता है। इसके साथ ही ग्लोबल साउथ यानी अफ्रीकी और लैटिन अमेरिकी देशों की आवाज को भी वैश्विक मंच पर महत्ता प्रदान की है।
ब्रिक्स की शुरूआत कैसे हुई, इस अवसर पर इसे भी जान लेना चाहिए। सबसे पहले ब्रिक शब्द का इस्तेमाल साल 2001 में गोल्डमैन सैक्स के ग्लोबल इकोनॉमिक्स पेपर ‘ द वर्ल्ड नीड्स बेटर इकोनॉमिक ब्रिक’ में हुआ था। इकोनॉमिक विश्लेषण पर आधारित इस शोध-पत्र में अनुमान लगाया गया था कि ब्राजील, रूस, भारत और चीन अगले पाँच दशकों में दुनिया की सबसे ताकतवर अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होंगे। इन देशों की बढ़ती आर्थिक शक्ति और तीन महाद्वीपों में फैली विशाल भौगोलिक पहुँच और उनके वैश्विक महत्व को भी इस शोध पत्र में रेखांकित किया गया था। इसी के साथ ही ब्रिक की अवधारणा को औपचारिक समूह के रूप में विकसित करने की बात चली। चारों देश एक मंच पर आने को तैयार हुए। साल 2010 में इस समूह में दक्षिण अफ्रीका भी शामिल हो गया और इसके साथ ही यह समूह बड़ा होकर ब्रिक्स बन गया। यह बदलाव आर्थिक समूह से आगे बढ़कर ना सिर्फ राजनीतिक, बल्कि आर्थिक और विकास आधारित सहयोग के औपचारिक मंच के रूप में स्थापित हो गया।
आज ब्रिक्स में 11 देश शामिल हैं, ब्राजील, चीन, मिस्र, इथियोपिया, भारत, इंडोनेशिया, ईरान, रूस, सऊदी अरब, दक्षिण अफ्रीका और संयुक्त अरब अमीरात। ब्रिक्स के विस्तारित सदस्य-समूह की पहुंच एशिया, अफ्रीका, मध्य पूर्व और लैटिन अमेरिका तक है। सदस्य देशों की विविध रंगी संस्कृति, आर्थिकी, उनके बड़े बाजार, प्राकृतिक संसाधन, तकनीकी क्षमता और विकास की गति ने मिलकर ऐसा साझा मंच तैयार किया है, जिसके सामने दुनिया की दूसरी व्यवस्थाएं चुनौती महसूस कर रही हैं। दुनिया की उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं के बीच ब्रिक्स आर्थिक नीतियों के समन्वय के महत्वपूर्ण मंच के रूप में उभरा है। इस मंच पर ये देश ग्लोबल गवर्नेंस से जुड़े मुद्दों पर साझा दृष्टिकोण तैयार कर रहे हैं। आपसी और लगातार संवाद के माध्यम से ब्रिक्स बहुपक्षीय संस्थाओं के भीतर ग्लोबल साउथ के हितों को आगे बढ़ाने का प्रभावी माध्यम बन गया है। ब्रिक्स का एजेंडा विकास, वित्त, प्रौद्योगिकी, व्यापार तथा उनके नागरिकों के आपसी संपर्क जैसे व्यापक क्षेत्रों तक फैला हुआ है। यह समूह विश्व स्तर पर उभरती अर्थव्यवस्थाओं के बढ़ते आर्थिक प्रभाव और उनकी आकांक्षाओं को प्रतिबिंबित करता है। साथ ही, यह सदस्य देशों को अपने अनुभव साझा करने और साझा चुनौतियों का मिलकर समाधान तलाशने के लिए एक सशक्त मंच प्रदान करता है।
हाल ही में हुआ ब्रिक्स सम्मेलन 18वां था। यह चौथा मौका रहा, जब भारत को इस प्रतिष्ठित संगठन की अध्यक्षता का अवसर मिला। इस बार के सम्मेलन का विषय रहा, “सुदृढ़शीलता, नवाचार, सहयोग और सतत विकास के लिए निर्माण”। यह विषय भारत की मौजूदा उपलब्धियों को मजबूत करने और उसकी संस्थागत प्रभावशीलता केंद्रित नजरिए का प्रतीक है। इस बार की बैठक में विकास, स्थिरता और नवाचार को एजेंडे के केंद्र में रखा गया था। इस सम्मेलन का लक्ष्य, ग्लोबल साउथ की आकांक्षाओं को भी स्वर देना रहा। इसमें यह सफल भी रहा। वैसे भारत का घोषित उद्देश्य ब्रिक्स को रचनात्मक, समाधान-केंद्रित और परिणामोन्मुख मंच के रूप में और अधिक सशक्त बनाना है। कहना न होगा कि नई दिल्ली सम्मेलन इस लक्ष्य को हासिल करने में सफल रहा।
ब्रिक्स की नई दिल्ली बैठक में संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने जो कहा, उससे भी साफ है कि ब्रिक्स बड़ी ताकत बनकर उभर रहा है। उन्होंने कहा कि 1945 के बाद से दुनिया बहुत बदल चुकी है और वैश्विक संस्थाओं को भी इस बदलाव को प्रतिबिम्बित करना चाहिए। इसमें दो राय नहीं कि आज की आर्थिक, जनसांख्यिकीय और भू-राजनैतिक वास्तविकताएँ 1945 जैसी नहीं हैं। लेकिन अब दुनिया तेज़ी से बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ रही है। गुटेरेश का यह कहना कि बहुध्रुवीयता वैश्विक व्यवस्थाओं और संस्थाओं में सन्तुलन और समानता लाने में मदद करती है, समीचीन ही है। ब्रिक्स सम्मेलन इस संतुलन और समानता का भी मंच बन कर उभरा है। आज दुनिया की जरूरत सतत विकास लक्ष्यों को हासिल करना भी है। इसके लिए विकासशील देशों को बड़े पैमाने पर अन्तरराष्ट्रीय समर्थन की ज़रूरत भी है। ब्रिक्स उस समर्थन का भी आधार बनकर उभरा है। ब्रिक्स की इस बैठक में कृत्रिम बुद्धिमत्ता का सवाल भी उठा, जिसे हम एआई के नाम से जानते हैं। निश्चित रूप से एआई विकास की रफ़्तार को बहुत तेज़ कर सकती है, लेकिन इसके फ़ायदे अभी कुछ कम्पनियों और देशों तक ही सीमित हैं। हालांकि मानव के लिए एक रूप में यह चुनौती बनकर भी उभरी है। निश्चित तौर पर एआई “दशकों के विकास को कुछ वर्षों में समेट सकती है”, लेकिन इसे अनियन्त्रित छोड़ दिया गया, तो एआई की खाई आय,अवसर, सुरक्षा और सम्प्रभुता सहित हर दूसरी खाई को और चौड़ा कर देगी। ब्रिक्स में एआई पर चिंतन इस नजरिए से भी हुआ। ब्रिक्स की बैठक में जलवायु संकट की बढ़ती गम्भीरता पर भी चिंताएं जाहिर की गईं। इस साल पड़ी झुलसाने वाली गर्मी, पिघलते हिमनद, जंगलों में लगी भीषण आग और विनाशकारी बाढ़ का उल्लेख करते हुए आने वाले प्राकृतिक खतरों की भी चर्चा इस बैठक में हुई। इस बैठक में वैश्विक तापमान में वृद्धि और उसके जल्द ही 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा पार करने की आशंका को लेकर भी चर्चा हुई। इस बैठक में वैश्विक भलाई के लिए नवीकरणीय ऊर्जा की दिशा में आगे बढ़ने मीथेन उत्सर्जन घटाने, प्रकृति की रक्षा करने और विकासशील देशों में निवेश बढ़ाने को लेकर भी राय बनी।
बारह सितंबर को जारी नई दिल्ली घोषणा पत्र में ब्रिक्स ने ग़ाज़ा, मध्य पूर्व, यूक्रेन और सूडान में जारी हिंसक टकरावों का ज़िक्र भी हुआ और वहां शान्ति की ज़रूरत पर भी जोर दिया गया। सभी देशों से संयुक्त राष्ट्र चार्टर और अन्तरराष्ट्रीय क़ानून का सम्मान करने का आग्रह भी किया गया। सभी देशों की सम्प्रभु समानता, उनकी क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान और विवादों के शान्तिपूर्ण समाधान पर भी चर्चा की गई। ब्रिक्स नेताओं ने जो नई दिल्ली घोषणापत्र अपनाया, उसमें बहुपक्षीय व्यवस्था को मज़बूत करने, वैश्विक संस्थाओं में सुधार और विकासशील देशों की भूमिका व प्रतिनिधित्व बढ़ाने पर ज़ोर दिया गया। घोषणापत्र में एआई, जलवायु सहनसक्षमता और विकास सहयोग को आगे बढ़ाने के साथ-साथ अन्तरराष्ट्रीय विवादों के शान्तिपूर्ण समाधान का भी समर्थन किया गया है।
भारत की मेज़बानी में आयोजित इस वर्ष के शिखर सम्मेलन में कई देशों के शीर्ष नेताओं मसलन चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग, रूस के राष्ट्पति ब्लादीमीर पुतिन, ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन, मलयेशिया के प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम, दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामफोसा, इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांटो, मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फत्ताह अल-सिसी, इथियोपिया के प्रधानमंत्री अबी अहमद अली, फिलीपींस के राष्ट्रपति फर्डिनेंड आर मार्कोस जूनियर, कजाकिस्तान के राष्ट्रपति कासिम-जोमार्त तोकायेव और बुरुंडी के राष्ट्रपति एव्हरिस्ट एनडायेशिमि के साथ ही संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव एंटोनियो गुंटेरेश,
विश्व स्वास्थ्य संगठन और विश्व व्यापार संगठन के प्रमुख भी शामिल हुए। ब्रिक्स की नई दिल्ली बैठक से स्पष्ट हुआ कि यह समूह बहुध्रुवीय और न्यायसंगत 'नई विश्व व्यवस्था' के निर्माण में महत्वपूर्ण वैश्विक मंच बनकर उभरा है। नई दिल्ली सम्मेलन ने यह स्पष्ट कर दिया कि यह संगठन अब पश्चिमी प्रभुत्व वाली वैश्विक व्यवस्था को चुनौती देने और 'ग्लोबल साउथ' की आवाज को मजबूत करने का मुख्य जरिया बन चुका है। मोटे तौर पर देखें तो
नई विश्व व्यवस्था के संदर्भ में ब्रिक्स ना सिर्फ बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था पर जोर देता है, बल्कि किसी एक देश या गुट, मसलन अमेरिका या पश्चिमी देशों के वैश्विक एकाधिकार को समाप्त भी करना है। ब्रिक्स देश ऐसी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की वकालत कर रहे हैं, जिसके तहत विकासशील देशों को भी निर्णय लेने में महत्वपूर्ण और समान भूमिका हासिल हो। ब्रिक्स का नई दिल्ली घोषणापत्र इसी बहुपक्षवाद को मजबूत करने और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद जैसी वैश्विक संस्थाओं में तत्काल सुधार करने की प्रतिबद्धता पर जोर देता है। ब्रिक्स का मानना है कि ऐसा करने से ही ये संस्थाएं अधिक समावेशी बन सकती हैं। ब्रिक्स का एक और मकसद, वैश्विक व्यापार और वित्तीय प्रणाली में अमेरिकी डॉलर के दबदबे को कम करना भी है। ब्रिक्स के सदस्य देश अब द्विपक्षीय और बहुपक्षीय व्यापार के लिए अपनी स्थानीय मुद्राओं के उपयोग को लगातार बढ़ावा दे रहे हैं। इसके साथ ही ब्रिक्स देशों का अपना न्यू डेवलपमेंट बैंक पश्चिमी नियंत्रण वाले आईएमएफ और वर्ल्ड बैंक के विकल्प के रूप में उभर रहा है। यह बैंक सदस्य देशों विशेषकर, विकासशील देशों को बिना किसी कठोर राजनीतिक शर्तों के बुनियादी ढांचे के लिए ऋण प्रदान कर रहा है। नई दिल्ली घोषणापत्र में पश्चिमी देशों द्वारा लगाए जाने वाले एकतरफा आर्थिक और द्वितीयक प्रतिबंधों की कड़ी निंदा की गई है।
विश्व व्यवस्था में ब्रिक्स की अहमियत और ताकत को इसी समझा जा सकता है कि अब यह ग्लोबल साउथ की मजबूत आवाज बनकर उभरा है। ब्रिक्स का दायरा अब केवल पांच मूल देशों, ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका तक ही सीमित नहीं रहा। बल्कि इस संगठन का विस्तार होकर अब इसमें मिस्र, इथियोपिया, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात और इंडोनेशिया जैसे देश शामिल हो चुके हैं। इसके अलावा मलेशिया और थाईलैंड जैसे कई देश 'सहयोगी देश' के रूप में भी जुड़ चुके हैं। ब्रिक्स के इस विस्तार से जाहिर है कि दुनिया की बड़ी आबादी और वैश्विक अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा अब इस मंच के जरिए वैश्विक नीतियों को प्रभावित कर रहा है। इस नई विश्व व्यवस्था में भारत की भूमिका अत्यंत विशिष्ट है। विशेषज्ञों के अनुसार, भारत ब्रिक्स के माध्यम से न तो पूरी तरह पश्चिम का पिछलग्गू बनना चाहता है और ना ही चीन या रूस के नेतृत्व वाले किसी वैचारिक मोर्चे का हिस्सा। दरअसल भारत ऐसी व्यवस्था का समर्थन करता है, जहां संवाद और संप्रभुता का सम्मान बना रहे और वैश्विक व्यापार टूटे बिना सभी को समान अवसर मिलें।
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)
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