
नीलाभ कृष्ण
कभी दुनिया की ताकत का नक्शा बहुत सीधा दिखाई देता था। शीत युद्ध खत्म हुआ तो अमेरिका और उसके सहयोगी वैश्विक राजनीति, वित्त, तकनीक और सुरक्षा से जुड़ी प्रमुख संस्थाओं में सबसे प्रभावशाली शक्ति बनकर उभरे। विकासशील देशों के सामने विकल्प सीमित थे। नियम कहीं और बनते थे और बाकी दुनिया उन नियमों के भीतर अपना रास्ता तलाशती थी। असहमति जरूर थी, लेकिन उस असहमति को एक साथ आवाज देने वाला कोई बड़ा और प्रभावी मंच नहीं था। इसी माहौल में ब्रिक्स का जन्म हुआ। उद्देश्य था कि दुनिया की उभरती अर्थव्यवस्थाएं अपनी आर्थिक ताकत के अनुपात में वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में अपनी जगह मांग सकें।
आज बीस साल बाद तस्वीर बदल चुकी है। ब्रिक्स अब पांच देशों का छोटा समूह नहीं है। भारत, ब्राजील, रूस, चीन और दक्षिण अफ्रीका से शुरू हुआ यह समूह अब मिस्र, इथियोपिया, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात, इंडोनेशिया और सऊदी अरब तक पहुंच चुका है। यानी एशिया, अफ्रीका, मध्य पूर्व और लैटिन अमेरिका के बड़े हिस्से को जोड़ने वाला एक व्यापक मंच सामने है। भारत सरकार के अनुसार, ये 11 देश दुनिया की करीब 49.5 प्रतिशत आबादी, 40 प्रतिशत वैश्विक जीडीपी और 26 प्रतिशत वैश्विक व्यापार का प्रतिनिधित्व करते हैं। केवल ये आंकड़े ही बता देते हैं कि ब्रिक्स को अब अंतरराष्ट्रीय राजनीति के हाशिये पर बैठा कोई कूटनीतिक क्लब समझना मुश्किल है।
नई दिल्ली में 12 और 13 सितंबर 2026 को हुआ 18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन इसलिए महत्वपूर्ण है कि यहां केवल सदस्य देशों की संख्या नहीं बढ़ी, बल्कि चर्चा का दायरा भी लगातार बड़ा हुआ है। सवाल अब यह नहीं है कि ब्रिक्स में कौन-कौन देश हैं। असली सवाल यह है कि ये देश मिलकर दुनिया की मौजूदा व्यवस्था में कितना बदलाव ला सकते हैं।
नई दिल्ली घोषणा में अधिक प्रतिनिधित्व वाली, अधिक न्यायपूर्ण अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की बात कही गई है। बहुपक्षीय संस्थाओं में सुधार की मांग दोहराई गई है। राजनीतिक और सुरक्षा मामलों से लेकर व्यापार, वित्त, तकनीक, स्वास्थ्य, जलवायु और लोगों के बीच संपर्क तक सहयोग बढ़ाने की बात हुई है। यानी ब्रिक्स अब केवल उभरती अर्थव्यवस्थाओं की आपसी बातचीत का मंच नहीं रह गया। यह ग्लोबल साउथ के लिए अपनी समस्याएं और अपनी प्राथमिकताएं सामने रखने का एक बड़ा मंच बनता जा रहा है।
लेकिन यहां एक बात साफ रखना जरूरी है। ब्रिक्स को नाटो जैसा सैन्य गठबंधन समझना गलत होगा। इसकी कोई साझा विदेश नीति नहीं है। कोई साझा मुद्रा नहीं है। कोई संयुक्त सुरक्षा सिद्धांत नहीं है। न ही कोई ऐसी सर्वोच्च संस्था है जो सदस्य देशों के ऊपर बैठकर आदेश दे सके। ब्रिक्स के सदस्य देशों के अपने-अपने राजनीतिक और आर्थिक मॉडल हैं और उनके राष्ट्रीय हित भी हमेशा एक जैसे नहीं होते। भारत और चीन एक ही मंच पर बैठते हैं, लेकिन दोनों के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा और सीमा संबंधी विवाद भी हैं। रूस और पश्चिमी देशों के संबंधों की अपनी जटिलताएं हैं।
फिर ब्रिक्स की ताकत क्या है? यही कि यह किसी एक गुट की तरह नहीं, बल्कि कई शक्ति केंद्रों को एक मंच पर लाने की कोशिश है। दुनिया अगर बहुध्रुवीय हो रही है तो ऐसे मंचों का महत्व अपने आप बढ़ता है।
सवाल सिर्फ आवाज का नहीं, हिस्सेदारी का है
विकासशील देशों की शिकायत पुरानी है। दुनिया की आबादी और अर्थव्यवस्था में उनका हिस्सा बढ़ता गया, लेकिन अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में उनका प्रतिनिधित्व उसी अनुपात में नहीं बढ़ा। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष हो, विश्व बैंक हो या संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद—वैश्विक शासन की बड़ी संस्थाओं में सुधार की मांग लगातार उठती रही है। ब्रिक्स इसी असंतोष को एक संस्थागत मंच देता है।
यहां अंतर समझना जरूरी है। ब्रिक्स का मतलब यह जरूरी नहीं कि मौजूदा अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को पूरी तरह खत्म कर नई व्यवस्था खड़ी कर दी जाए। ज्यादा व्यावहारिक सवाल यह है कि क्या मौजूदा व्यवस्था में नियम बनाने की प्रक्रिया में विकासशील देशों की हिस्सेदारी बढ़ाई जा सकती है?
भारत की 2026 की अध्यक्षता में इसी बात पर जोर दिखाई दिया। नई दिल्ली ने ब्रिक्स को पश्चिम-विरोधी गठबंधन के रूप में पेश करने के बजाय व्यापक बहुपक्षीय व्यवस्था का पूरक बताया। संदेश साफ था—दुनिया में किसी एक शक्ति के सामने दूसरी शक्ति खड़ी करने से ज्यादा जरूरी है कि दुनिया के अधिक से अधिक देशों की आवाज निर्णय प्रक्रिया में सुनी जाए।
ब्रिक्स का विस्तार इस कोशिश को और बड़ा बनाता है। इंडोनेशिया के पूर्ण सदस्य बनने और अन्य देशों के साझेदार बनने के बाद इसका भूगोल कहीं ज्यादा व्यापक हो गया है। अब यह केवल मूल ब्रिक्स देशों का समूह नहीं है। यह एशिया से अफ्रीका और मध्य पूर्व से लैटिन अमेरिका तक फैले देशों के लिए सहयोग का संभावित नेटवर्क बन रहा है।
डॉलर का क्या होगा?
ब्रिक्स की चर्चा होते ही एक सवाल उछलता है—क्या ब्रिक्स डॉलर को खत्म कर देगा? इसका सीधा जवाब है कि अभी ऐसा निष्कर्ष निकालना वास्तविकता से आगे निकलना होगा।
2026 की नई दिल्ली घोषणा किसी साझा ब्रिक्स मुद्रा की घोषणा नहीं करती। इसके बजाय स्थानीय मुद्राओं में व्यापार, सीमा-पार भुगतान की पारस्परिक व्यवस्था और वित्तीय सहयोग को आगे बढ़ाने की बात करती है। घोषणा खुद मानती है कि इस मामले में सभी देशों के लिए एक जैसा मॉडल संभव नहीं है। यह व्यावहारिक भी है। भारत, चीन, ब्राजील, रूस, सऊदी अरब और दक्षिण अफ्रीका जैसी अलग-अलग अर्थव्यवस्थाओं के लिए एक साझा मुद्रा बनाना कोई छोटी बात नहीं होगी। इसके लिए मौद्रिक नीति, वित्तीय प्रणाली और राजनीतिक हितों में बहुत गहरे समन्वय की जरूरत होगी।
इसलिए फिलहाल बात डॉलर को हटाने से ज्यादा विकल्प बढ़ाने की है। अगर दो देश अपने व्यापार का ज्यादा हिस्सा सीधे अपनी राष्ट्रीय मुद्राओं में कर सकें, अगर सीमा-पार भुगतान के लिए ज्यादा रास्ते उपलब्ध हों और अगर विकास के लिए वित्त जुटाने के विकल्प बढ़ें, तो किसी एक मुद्रा या एक वित्तीय चैनल पर निर्भरता कुछ हद तक कम हो सकती है। और यही आर्थिक स्वायत्तता का सवाल है। किसी देश को किसी व्यवस्था से बाहर निकलना ही स्वतंत्रता नहीं देता। कई विकल्प उपलब्ध होना भी स्वतंत्रता का एक महत्वपूर्ण रूप है।
असली लड़ाई व्यापार के नियमों पर
मुद्रा की बहस से ज्यादा महत्वपूर्ण शायद व्यापार के नियमों की बहस है। नई दिल्ली घोषणा में एकतरफा टैरिफ और गैर-टैरिफ बाधाओं को लेकर चिंता व्यक्त की गई है। विश्व व्यापार संगठन को अधिक मजबूत और उत्तरदायी बनाने की बात कही गई है। विकासशील देशों के हितों को वैश्विक व्यापार व्यवस्था में अधिक महत्व देने की मांग भी सामने आई है।
दुनिया का व्यापार तेजी से बदल रहा है। कंपनियां अब केवल सस्ता उत्पादन देखने के बजाय भू-राजनीतिक जोखिम, आपूर्ति शृंखला की सुरक्षा, तकनीकी निर्भरता और रणनीतिक संसाधनों को भी ध्यान में रख रही हैं। टैरिफ, निर्यात नियंत्रण, तकनीकी प्रतिबंध और औद्योगिक नीतियां व्यापार के सामान्य औजारों से आगे बढ़कर रणनीतिक हथियारों की तरह इस्तेमाल होने लगी हैं।
ऐसे समय में ब्रिक्स देशों के लिए साथ बैठकर इन समस्याओं पर बात करने का महत्व बढ़ जाता है। लेकिन यहां भी चुनौती कम नहीं है। चीन दुनिया की बड़ी विनिर्माण शक्तियों में है। भारत विनिर्माण और डिजिटल सेवाओं को विस्तार देने की कोशिश कर रहा है। खाड़ी के देश ऊर्जा उत्पादक और बड़े निवेशक हैं। ब्राजील कृषि क्षेत्र में बड़ी ताकत है। रूस ऊर्जा और कमोडिटी का प्रमुख स्रोत है। अफ्रीकी सदस्य देशों की विकास संबंधी जरूरतें अलग हैं। इन सबके हित हर मामले में एक जैसे नहीं होंगे। ब्रिक्स की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह इस विविधता को कमजोरी बनने देता है या उसे सहयोग की ताकत में बदल पाता है।
ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा का नया समीकरण
ब्रिक्स का विस्तार ऊर्जा और रणनीतिक संसाधनों के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है। समूह में बड़े तेल और गैस उत्पादक देश हैं। प्रमुख कृषि उत्पादक देश हैं। महत्वपूर्ण खनिज और अन्य रणनीतिक संसाधन रखने वाले देश भी हैं। इसका मतलब है कि ऊर्जा सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा, उर्वरक, आपूर्ति शृंखला और बुनियादी ढांचे में सहयोग की बड़ी संभावनाएं मौजूद हैं। लेकिन यही स्थिति परस्पर निर्भरता भी पैदा करती है। कोई देश एक क्षेत्र में प्रतिस्पर्धी हो सकता है और दूसरे क्षेत्र में साझेदार। यही अंतरराष्ट्रीय राजनीति की वास्तविक जटिलता है।
भारत की रणनीतिक स्वायत्तता की सोच इसी वास्तविकता को स्वीकार करती है। इसका मतलब किसी एक खेमे में स्थायी रूप से बैठ जाना नहीं, बल्कि अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार अलग-अलग शक्ति केंद्रों के साथ काम करने की क्षमता बनाए रखना है। ब्रिक्स इस दृष्टिकोण के लिए स्वाभाविक मंच उपलब्ध कराता है।

असली रणभूमि शायद तकनीक होगी
ब्रिक्स की पूरी कहानी में तकनीक को शायद सबसे कम समझा गया है। भविष्य की ताकत केवल मिसाइलों, विमानवाहक पोतों और विदेशी मुद्रा भंडार से तय नहीं होगी। कंप्यूटिंग क्षमता किसके पास है? सेमीकंडक्टर की आपूर्ति श्रृंखला पर किसका नियंत्रण है? डेटा कहां है? कृत्रिम बुद्धिमत्ता की क्षमता किसके पास है? डिजिटल भुगतान, दूरसंचार और उन्नत विनिर्माण में कौन आगे है? इन सवालों के जवाब आने वाले दशकों की वैश्विक शक्ति तय करेंगे।
2026 की नई दिल्ली घोषणा में एआई, डिजिटल परिवर्तन, साइबर सुरक्षा, फिनटेक और उभरती तकनीकों पर जोर दिया गया है। एआई शासन के क्षेत्र में सहयोग की बात की गई है, जिसमें सुरक्षा, पहुंच, समावेशिता और ग्लोबल साउथ की जरूरतों पर ध्यान देने की बात है।
यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि डिजिटल असमानता भविष्य में वही भूमिका निभा सकती है, जो कभी औद्योगिक और आर्थिक असमानता ने निभाई थी। अगर एआई की आधारभूत संरचना और उन्नत तकनीक कुछ ही देशों तक सीमित रह गईं तो विकासशील देश तकनीक बनाने वाले नहीं, केवल तकनीक इस्तेमाल करने वाले बन सकते हैं। ब्रिक्स तकनीकी क्षमता साझा करने, मानक विकसित करने और क्षमता निर्माण में सहयोग का रास्ता खोल सकता है। अगर ऐसा हुआ तो इसका असर केवल तकनीकी क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा।
जलवायु की राजनीति भी विकास की राजनीति है
जलवायु परिवर्तन को लेकर विकासशील देशों की अपनी चिंता है। वे जलवायु जोखिमों से बचना चाहते हैं, लेकिन साथ ही गरीबी कम करनी है, ऊर्जा की पहुंच बढ़ानी है और आर्थिक विकास भी करना है। यही कारण है कि ब्रिक्स में जलवायु चर्चा केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं है। सवाल यह भी है कि हरित संक्रमण की लागत कौन उठाएगा? भारत, ब्राजील, अफ्रीकी देशों और दूसरे विकासशील देशों के लिए जलवायु वित्त, तकनीकी हस्तांतरण और अनुकूलन वित्त महत्वपूर्ण मुद्दे हैं। ब्रिक्स इन मुद्दों पर सामूहिक बातचीत का मंच बन सकता है।
इसी तरह स्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा भी अब वैश्विक शक्ति की चर्चा का हिस्सा बन रहे हैं। डिजिटल स्वास्थ्य, वैक्सीन, चिकित्सा उत्पादन, सार्वजनिक स्वास्थ्य और अनुसंधान में सहयोग का विस्तार यह बताता है कि ब्रिक्स की चर्चा केवल राजधानियों और कूटनीतिक गलियारों तक सीमित नहीं रहना चाहती।
सुरक्षा से बचना संभव नहीं
ब्रिक्स कोई सुरक्षा गठबंधन नहीं है। फिर भी दुनिया की वास्तविक राजनीति में सुरक्षा के सवाल से बचा नहीं जा सकता। 2026 की घोषणा में आतंकवाद, संघर्ष, परमाणु जोखिम, शांति स्थापना और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों को शामिल किया गया। जम्मू-कश्मीर में अप्रैल 2025 के आतंकवादी हमले की निंदा की गई और आतंकवाद के वित्तपोषण तथा सीमा-पार आतंकवादियों की आवाजाही के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय सहयोग मजबूत करने की बात कही गई। लेकिन यहां भी ब्रिक्स के सामने चुनौती है। सदस्य देशों के सभी संघर्षों और सुरक्षा मुद्दों पर समान दृष्टिकोण नहीं हैं। इसलिए सहमति बनाना आसान नहीं होगा।
भारत के लिए यह मंच इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उसकी विदेश नीति का एक प्रमुख तत्व रणनीतिक स्वायत्तता है। भारत रूस के साथ संबंध रख सकता है, चीन के साथ एक ही मंच पर बैठ सकता है, खाड़ी देशों के साथ आर्थिक साझेदारी कर सकता है, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका से जुड़ सकता है और साथ ही अमेरिका, यूरोप और जापान के साथ भी अपने संबंध मजबूत रख सकता है। आज की बहुध्रुवीय दुनिया में यही वास्तविकता है। संबंधों को एक ही खांचे में बंद करके नहीं देखा जा सकता।
और चीन?
ब्रिक्स की चर्चा चीन के बिना अधूरी है। ब्रिक्स में चीन सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। समूह के भीतर उसके व्यापार और निवेश का वजन बड़ा है। स्वाभाविक रूप से उसका प्रभाव भी बड़ा है। लेकिन भारत और चीन के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा और सीमा संबंधी विवाद मौजूद हैं। यहीं ब्रिक्स के सामने बड़ा सवाल आता है—क्या यह मंच व्यापक ग्लोबल साउथ की आवाज बना रह सकता है, या धीरे-धीरे किसी एक बड़े सदस्य की रणनीतिक प्राथमिकताओं से जोड़कर देखा जाने लगेगा?
भारत की भूमिका यहां महत्वपूर्ण है। नई दिल्ली घोषणा में संप्रभु समानता, पारस्परिक सम्मान, खुलेपन, समावेशिता और सहमति पर जोर दिया गया है। यही सिद्धांत यह तय करेंगे कि विस्तार के बाद ब्रिक्स कितना संतुलित रह पाता है।
जितना बड़ा समूह, उतनी बड़ी चुनौती
ब्रिक्स का विस्तार उसकी ताकत भी है और चुनौती भी। ज्यादा देश मतलब ज्यादा आर्थिक वजन। ज्यादा आबादी। ज्यादा संसाधन। ज्यादा बाजार। लेकिन ज्यादा देश मतलब ज्यादा हित और ज्यादा मतभेद भी। अगर ब्रिक्स केवल बड़ी-बड़ी घोषणाएं करता रहा और उनके अमल के लिए प्रभावी संस्थागत व्यवस्था नहीं बना पाया तो उसका विस्तार अंततः उसे एक और बड़े कूटनीतिक मंच में बदल सकता है।
लेकिन अगर भुगतान, विकास वित्त, तकनीक, स्वास्थ्य, जलवायु और व्यापार जैसे क्षेत्रों में ठोस संस्थाएं और तंत्र खड़े किए गए, तो यही विस्तार उसकी सबसे बड़ी ताकत बन सकता है। इसलिए असली सवाल यह नहीं है कि सम्मेलन की मेज पर कितने देशों के झंडे लगे हैं। असली सवाल यह है कि दो सम्मेलनों के बीच क्या हुआ।
क्या नई विश्व व्यवस्था आ रही है?
अगर नई वैश्विक व्यवस्था का मतलब यह है कि ब्रिक्स जल्द ही अमेरिका और पश्चिमी संस्थाओं को हटाकर उनकी जगह ले लेगा, तो ऐसा कहना जल्दबाजी होगी। ब्रिक्स में अभी न तो वह संस्थागत एकजुटता है और न साझा रणनीतिक उद्देश्य, जो इतनी बड़ी व्यवस्था को बदल सके।
लेकिन अगर नई वैश्विक व्यवस्था का मतलब ऐसी दुनिया है जिसमें शक्ति कई केंद्रों में बंटी हो, तो बदलाव साफ दिखाई देता है। एक विकास बैंक बन रहा है। स्थानीय मुद्राओं में व्यापार के रास्ते तलाशे जा रहे हैं। वैश्विक संस्थाओं में अधिक प्रतिनिधित्व की मांग उठ रही है। तकनीकी साझेदारियां बढ़ रही हैं। दक्षिण-दक्षिण व्यापार पर जोर बढ़ रहा है। स्वास्थ्य, जलवायु और विकास के मुद्दों पर समन्वय हो रहा है। इनमें से कोई एक चीज अकेले दुनिया नहीं बदलती। लेकिन इन सबका लगातार जुड़ना शक्ति संतुलन को धीरे-धीरे प्रभावित कर सकता है। यही ब्रिक्स 2026 की सबसे महत्वपूर्ण कहानी है।
दुनिया रातोंरात एक व्यवस्था से दूसरी व्यवस्था में नहीं बदलती। परिवर्तन धीरे-धीरे होता है। व्यापार के रास्ते बदलते हैं। वित्तीय विकल्प बढ़ते हैं। तकनीक का प्रसार होता है। विकासशील देशों की सौदेबाजी की क्षमता बढ़ती है। और धीरे-धीरे अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं पर दबाव बढ़ता है कि वे दुनिया की बदलती वास्तविकताओं को स्वीकार करें।
भारत ने 2026 में ब्रिक्स की अध्यक्षता करते हुए इसी दिशा में इसे पश्चिम-विरोधी मंच के बजाय लचीलापन, नवाचार, स्थिरता और उभरती अर्थव्यवस्थाओं की आवाज के मंच के रूप में प्रस्तुत किया। अध्यक्षता के दौरान 30 भारतीय शहरों में 400 से अधिक बैठकें और कार्यक्रम हुए। इससे यह संकेत मिलता है कि ब्रिक्स को केवल नेताओं की सालाना बैठक से आगे ले जाकर व्यापक संस्थागत नेटवर्क बनाने की कोशिश हुई।
अब परीक्षा घोषणाओं की नहीं, डिलीवरी की है। किसी मंच से यह कह देना कि दुनिया अधिक न्यायपूर्ण होनी चाहिए, आसान है। असली काम तब शुरू होता है जब उसके लिए संस्थाएं बनती हैं, भुगतान के विकल्प तैयार होते हैं, व्यापार बढ़ता है, तकनीक साझा होती है, विकास के लिए पूंजी उपलब्ध होती है और विकासशील देशों की आवाज वास्तव में निर्णय प्रक्रिया को प्रभावित करने लगती है।
इसलिए ब्रिक्स 2026 को नई विश्व व्यवस्था का जन्म कहना शायद अभी जल्दबाजी होगी। लेकिन इसे बहुध्रुवीय विश्व की नींव मजबूत होने के एक महत्वपूर्ण पड़ाव के रूप में जरूर देखा जा सकता है। सवाल अब यह नहीं है कि ग्लोबल साउथ अपनी आवाज चाहता है या नहीं। वह आवाज अब पहले से कहीं अधिक स्पष्ट है। असली सवाल यह है कि क्या ब्रिक्स उस आवाज को स्थायी संस्थाओं, ठोस सहयोग और वास्तविक प्रभाव में बदल पाएगा। यही तय करेगा कि ब्रिक्स आने वाले वर्षों में केवल एक महत्वाकांक्षी कूटनीतिक मंच रहेगा या फिर उस वैश्विक व्यवस्था की प्रमुख आधारशिलाओं में शामिल होगा, जो धीरे-धीरे हमारे सामने आकार ले रही है।
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)
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