महासागरों की गहराइयों में छिपा हुआ जीवन हमेशा से मानव के लिए एक रहस्य रहा है, लेकिन हाल के वर्षों में विज्ञान ने यह समझना शुरू किया है कि समुद्री पारिस्थितिकी केवल जैव विविधता का घर नहीं है, बल्कि पृथ्वी की जलवायु को स्थिर बनाए रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जलवायु परिवर्तन की तीव्र होती चुनौती के बीच वैज्ञानिकों ने जिन प्राकृतिक प्रणालियों पर अधिक ध्यान केंद्रित किया है, उनमें ब्लू कार्बन इकोसिस्टम प्रमुख है।
ब्लू कार्बन इकोसिस्टम मैंग्रोव वन, समुद्री घास के मैदान और ज्वारीय नमभूमियों से मिलकर बना होता है, जिनमें वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड को पकड़ने और हजारों वर्षों तक सुरक्षित रखने की असाधारण क्षमता होती है। इस कार्बन को ब्लू कार्बन कहा जाता है और यह तटीय मिट्टी और समुद्री गाद की गहरी परतों में जमा रहता है।
इस कार्बन संग्रहण की क्षमता भूमि पर पाए जाने वाले जंगलों से कई गुना अधिक होती है, इसलिए यह धीरे-धीरे दुनिया की जलवायु नीति और संरक्षण प्रयासों का केंद्र बन रहा है। ब्लू कार्बन इकोसिस्टम की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि यह दोहरी सुरक्षा प्रदान करता है। एक ओर यह वातावरण से कार्बन अवशोषित करके जलवायु परिवर्तन की गति को धीमा करता है, दूसरी ओर यह तटीय क्षेत्रों में रहने वाले समुदायों को तूफानों, बाढ़, समुद्री कटाव और लहरों के प्रकोप से बचाता है। मैंग्रोव की जटिल जड़ें लहरों की ऊर्जा को कम करती हैं, समुद्री घास समुद्र के तल को स्थिर रखती है और ज्वारीय नमभूमियाँ निचले क्षेत्रों में अतिरिक्त पानी अवशोषित करती हैं। इस तरह यह प्राकृतिक तट-रक्षक बन जाते हैं। लेकिन अत्यंत दुर्भाग्य की बात यह है कि पिछले कुछ दशकों में इन तंत्रों को मानव गतिविधियों, प्रदूषण और अनियोजित तटीय विकास ने भारी क्षति पहुँचाई है। मैंग्रोव की कटाई, बंदरगाह निर्माण, औद्योगिक कचरे का समुद्र में प्रवाह, प्लास्टिक प्रदूषण, बोटिंग और अति-मत्स्यन ने इन संवेदनशील पारिस्थितिक तंत्रों को गंभीर रूप से कमजोर कर दिया है।
अनुमान है कि दुनिया के लगभग एक तिहाई मैंग्रोव वन पिछले 50 वर्षों में नष्ट हो चुके हैं। समुद्री घास के मैदान 1.5 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से लुप्त हो रहे हैं, जो जलवायु संरक्षण के लिए चिंताजनक संकेत है। जब ये तंत्र नष्ट होते हैं, तो केवल उनकी कार्बन-संग्रहण क्षमता खत्म नहीं होती, बल्कि मिट्टी में जमा कार्बन भी वापस वातावरण में पहुँच जाता है, जिससे ग्रीनहाउस गैसों में वृद्धि होती है। इसलिए ब्लू कार्बन इकोसिस्टम का संरक्षण और पुनर्स्थापन केवल पर्यावरणीय जिम्मेदारी नहीं बल्कि वैश्विक जलवायु नियंत्रण की आवश्यकता बन चुका है।
पुनर्स्थापन का अर्थ केवल पेड़-पौधे लगाना नहीं है। यह एक वैज्ञानिक, जटिल और बहु-स्तरीय प्रक्रिया है जिसमें स्थानीय भू-आकृति, जलस्तर, खारापन, जैव विविधता और समुदायों की भागीदारी सभी को ध्यान में रखना पड़ता है। मैंग्रोव पुनर्स्थापन में सबसे पहले उन क्षेत्रों की पहचान की जाती है जहाँ प्राकृतिक परिस्थितियाँ मैंग्रोव के अनुकूल हों। कई बार जल-प्रवाह बाधित हो जाने से मैंग्रोव बढ़ नहीं पाते, इसलिए पुनर्स्थापन के तहत पुराने जलमार्ग बहाल किए जाते हैं ताकि खारा पानी स्वाभाविक रूप से अंदर आ सके। उसके बाद स्थानीय प्रजातियों के पौधे लगाए जाते हैं क्योंकि विदेशी प्रजातियाँ अक्सर पारिस्थितिक संतुलन को बिगाड़ देती हैं। यह भी सुनिश्चित करना पड़ता है कि किन तटीय क्षेत्रों में किस प्रजाति का मैंग्रोव उपयुक्त है, क्योंकि सभी प्रजातियाँ समान परिस्थितियों में नहीं पनपतीं। पुनर्स्थापन के बाद इन क्षेत्रों की निरंतर निगरानी की जाती है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि पौधे जड़ों के साथ विकसित हो रहे हैं और उनकी मिट्टी में कार्बन-जमाव बढ़ रहा है।

सी-ग्रास पुनर्वास उससे भी अधिक संवेदनशील प्रक्रिया है। समुद्री घास समुद्र के तल पर उगती है और हल्की भी गड़बड़ी से क्षतिग्रस्त हो सकती है। बोटों के एंकर, जहाजों की आवाजाही और बालू खनन से समुद्री तल अस्थिर हो जाता है, जिससे सी-ग्रास नष्ट होने लगता है। पुनर्स्थापन में पहले समुद्री तल को स्थिर करना पड़ता है, प्रदूषण कम करना पड़ता है और फिर सी-ग्रास को सावधानीपूर्वक प्रतिरोपित किया जाता है। यह वैज्ञानिक टीमों द्वारा गोताखोरी या विशेष सबमर्सिबल उपकरणों की मदद से किया जाता है। कई देशों में सी-ग्रास की रोपाई के लिए विशेष तकनीक विकसित की गई है जिसमें जड़ सहित गुच्छे लेकर उन्हें प्राकृतिक ढंग से समुद्र तल में लगाया जाता है। सी-ग्रास के पुनर्वास के साथ-साथ यह भी जरूरी होता है कि आसपास के समुद्री जीवों को संरक्षण मिले, क्योंकि जैव विविधता जितनी समृद्ध होगी, सी-ग्रास की वृद्धि उतनी ही स्थिर रहेगी।
ज्वारीय नमभूमियों के पुनर्स्थापन में जल-प्रवाह बहाल करना सबसे महत्वपूर्ण कदम है। कई स्थानों पर तटबंध, सड़कें और निर्माण कार्यों ने ज्वारीय जल के प्राकृतिक आवागमन को रोक दिया है, जिससे वहाँ का पूरा पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ जाता है। वैज्ञानिक इन क्षेत्रों में बाधाएँ हटाते हैं, मिट्टी की संरचना सुधारते हैं और स्थानीय वनस्पतियों को फिर से विकसित होने देते हैं। कुछ स्थानों पर मिट्टी की ऊँचाई भी समुद्र-स्तर में वृद्धि के अनुसार बढ़ाई जाती है ताकि भविष्य में नमभूमियाँ डूब न जाएँ। यह प्रक्रिया धीमी और दीर्घकालिक है, परंतु इसका प्रभाव पीढ़ियों तक महसूस किया जा सकता है।
दुनिया में कई देशों ने ब्लू कार्बन को जलवायु नीति का हिस्सा बनाना शुरू कर दिया है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा जारी कई रिपोर्टों में इसे कार्बन-क्रेडिट बाजार से जोड़ने की सिफारिश की गई है। संयुक्त अरब अमीरात बड़े पैमाने पर मैंग्रोव रोपण अभियान चला रहा है। इंडोनेशिया और फिलीपींस ने समुद्री घास संरक्षण में उल्लेखनीय प्रयास किए हैं। ऑस्ट्रेलिया ने “ब्लू कार्बन फ्यूचर” कार्यक्रम के तहत व्यापक शोध और निगरानी प्रणाली विकसित की है। ये सभी पहल इस बात की ओर संकेत करती हैं कि भविष्य में ब्लू कार्बन वैश्विक जलवायु रणनीति का आधार बन सकता है।
भारत भी इस दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। सुंदरबन विश्व के सबसे बड़े मैंग्रोव वनों में से एक है और यह न केवल जैव विविधता का केंद्र है बल्कि लाखों लोगों की जीवन-रेखा है। अंडमान-निकोबार द्वीप समृद्ध समुद्री घास के मैदानों के लिए जाने जाते हैं जहाँ दुर्लभ डुगोंग पनपती है। गुजरात का कच्छ मैंग्रोव पुनर्स्थापन का एक सफल उदाहरण है जहाँ समुदायों ने स्वयं मिलकर मैंग्रोव लगाने और उनकी रक्षा करने की पहल की है। हाल के वर्षों में भारत ने ब्लू इकोनॉमी और ब्लू कार्बन को अपनी राष्ट्रीय जलवायु नीतियों में शामिल किया है, जिससे भविष्य के लिए उम्मीद बढ़ती है।
ब्लू कार्बन इकोसिस्टम का महत्व केवल जलवायु नियंत्रण तक सीमित नहीं है। यह लाखों तटीय लोगों को आजीविका देता है, मछलियों और समुद्री जीवों के प्रजनन स्थल प्रदान करता है, समुद्र में पोषक तत्वों के संतुलन को बनाए रखता है और तटीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करता है। यह समुद्र और मानव के बीच प्राकृतिक पुल की तरह है जो दोनों को एक संतुलित और स्थायी रूप में जोड़ता है।
भविष्य में यदि दुनिया जलवायु परिवर्तन को वास्तव में नियंत्रित करना चाहती है, तो महासागरों के इस नीले खजाने को सुरक्षित रखना अनिवार्य है। ब्लू कार्बन इकोसिस्टम का पुनर्स्थापन केवल वैज्ञानिक प्रयास नहीं बल्कि मानवता के अस्तित्व से जुड़ी जिम्मेदारी है। प्राकृतिक तंत्रों पर भरोसा करके ही हम एक स्थायी और सुरक्षित जलवायु भविष्य की ओर बढ़ सकते हैं, क्योंकि महासागरों की यही नीली धरती पृथ्वी को सांस देती है, तापमान नियंत्रित रखती है और जीवन के हर रूप को एक संतुलित वातावरण प्रदान करती है। यह वही तंत्र है जो हजारों वर्षों से चुपचाप पृथ्वी की रक्षा करता आया है और यदि हम चाहें तो आने वाले समय में भी यह हमारी सबसे बड़ी आशा बन सकता है।

डॉ दीपक कोहली
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)
Leave Your Comment