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बिहार का चुनावी पिटारा

Bihar's election campaign

6 नवंबर को पहले दौर का मतदान खत्म  होने के साथ बिहार का राजनीतिक रणक्षेत्र एक ऐसे मुकाबले के लिए तैयार हो गया है जो इसकी नियति तय करेगा। राज्य में 2025 का विधानसभा चुनाव एक सामान्य राजनीतिक कवायद से कहीं बढ़कर होता जा रहा है। यह राज्य में शासन के भविष्य की दिशा में एक बुनियादी जनमत संग्रह है। मूलतः यह चुनाव एक स्पष्ट विकल्प प्रस्तुत करता है कि क्या बिहार एक बार फिर लोकलुभावन नारों के चिर-परिचित आराम में डूब जाएगा या फिर जवाबदेह प्रगति की ओर एक नया रास्ता तैयार कर पाएगा? राज्य में चुनाव प्रचार के आख्यान एक स्पष्ट द्वंद्व में तब्दील होते जा रहे हैं। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) का नेतृत्व कर रही भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने अपने संदेश को धोखे के बजाय विकास के द्वैत के इर्द-गिर्द गढ़ा है। इसका अभियान सशक्तिकरण के माध्यम से रोज़गार की वकालत करता है, बुनियादी ढाँचे, रोज़गार सृजन पर ध्यान केंद्रित करता है और राज्य की दिशा को केंद्र के 'विकसित भारत' के दृष्टिकोण के साथ जोड़ता है। यह रणनीति एक दूरदर्शी, प्रदर्शन-आधारित अपील के रूप में पेश की गई है, जो अतीत के "जंगल राज" को खत्म करने के लिए जनादेश मांग रही है। वहीं विपक्षी महागठबंधन, जिसका नेतृत्व कर रही राष्ट्रीय जनता दल (राजद) एक ऐसा अभियान चला रही है जिसके बारे में आलोचकों का कहना है कि यह भावनात्मक हेरफेर पर आधारित है। इसकी बयानबाजी जाति जनगणना के आंकड़ों और सामाजिक न्याय के मुद्दे का भरपूर इस्तेमाल करती है, जिसे अक्सर 'एम-वाई' (मुस्लिम-यादव) गठबंधन और आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों के अधिकारों की लड़ाई के रूप में पेश किया जाता है। हालाँकि यह आख्यान इसके मूल आधार से मेल खाता है, विरोधी इसे स्थायी विकास के ठोस ढ़ांचे की बजाय, खैरात और विभाजनकारी राजनीति के ज़रिए अस्थायी संतुष्टि देने का आरोप लगाते हैं। लेकिन इन दोनों दिग्गजों के इस टकराव के बीच, एक संभावित विघटनकारी उभर कर सामने आया है। प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी (जेएसपी) राजनीतिक विमर्श में नए विचारों की एक तीसरी धुरी स्थापित करने की कोशिश कर रही है। अपनी व्यापक पदयात्राओं और ज़मीनी मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करने के साथ, प्रशांत किशोर का लक्ष्य बिहार में राजनीतिक विमर्श की प्रकृति को ही चुनौती देना है। हालाँकि यह हाशिये पर चल रहे कथानक को प्रभावित कर सकता है, फिर भी 2025 की बड़ी लड़ाई मुख्य रूप से प्रमुख गठबंधनों द्वारा परिभाषित सत्य बनाम असत्य के स्थापित ध्रुवों के इर्द-गिर्द ही घूमेगी। जन सुराज पार्टी की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह अपने ज़मीनी जुड़ाव के जरिए कैसे ठोस चुनावी प्रभाव तैयार कर पाती है।

इस पृष्ठभूमि में, यह कहना गलत नहीं होगा कि अंततः निर्णय लेने की शक्ति बिहार की जनता के पास है—एक ऐसी जनता जो दशकों के राजनीतिक उथल-पुथल, आर्थिक गतिरोध और टूटे वादों से त्रस्त है। बिहार का मतदाता चतुर है और जुमलेबाजी तथा हकीकत में अंतर करने में सक्षम है। मतदान केंद्र में उनका निर्णय एक गंभीर प्रश्न का उत्तर देगा: क्या पहचान-आधारित आश्वासनों और अल्पकालिक राहत का आकर्षण दीर्घकालिक, स्थायी परिवर्तन के वादे से ज़्यादा मज़बूत है? इस चुनाव का महत्व बिहार की सीमाओं से कहीं आगे तक जाता है। भारत की आबादी में एक महत्वपूर्ण हिस्सेदारी वाले एक अग्रणी राज्य के रूप में, बिहार के राजनीतिक फैसले को अक्सर राष्ट्रीय मनोदशा का प्रतिबिंब माना जाता है। भारतीय लोकतंत्र की विश्वसनीयता स्वयं कई मायनों में परीक्षा की घड़ी में है। पारदर्शी, जवाबदेह शासन के लिए मतदान उस लोकतांत्रिक आदर्श को पुष्ट करेगा कि प्रदर्शन सर्वोपरि है। इसके विपरीत, विशुद्ध रूप से लोकलुभावन राजनीति की ओर वापसी, मतदाताओं द्वारा स्थायी प्रगति की तुलना में तात्कालिक संतुष्टि को प्राथमिकता देने पर सवाल खड़े करेगी। इस साल यानी 2025 में, बिहार एक दोराहे पर खड़ा है। एक रास्ता भावनात्मक राजनीति के जाने-पहचाने, परिचित धरातल की ओर वापस ले जाता है। दूसरा रास्ता सशक्त विकास के एक महत्वाकांक्षी भविष्य की ओर इशारा करता है। लाखों लोगों का भाग्य और भारतीय लोकतंत्र की आत्मा इस फैसले का इंतज़ार कर रही है।





दीपक कुमार रथ

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