logo

बिहार चुनाव 2025 : जनकल्याण बनाम जनता से धोखे की राजनीति

Bihar Elections 2025: Public Welfare vs. Politics of Deception

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 राज्य की राजनीति के लिए एक निर्णायक मोड़ साबित होने जा रहा है। इस बार का चुनाव केवल तीन राजनीतिक दलों — भारतीय जनता पार्टी (भाजपा), महा गठबंधन (राजद, कांग्रेस और वाम दलों), और प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी — के बीच की प्रतिस्पर्धा नहीं है, बल्कि यह बिहार के भविष्य की दिशा तय करने वाला वैचारिक संघर्ष भी है। एक ओर भाजपा अपने विकास-आधारित शासन मॉडल और सुशासन की नीतियों पर जनता से समर्थन मांग रही है, तो दूसरी ओर महागठबंधन पुराने वादों और जातीय समीकरणों के भरोसे जनता को आकर्षित करने की कोशिश में जुटा है। वहीं प्रशांत किशोर अपनी जन सुराज पार्टी के ज़रिए एक “तीसरे विकल्प” की राजनीति को आकार देने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन इन सबके बीच सबसे ज्यादा चर्चा में है राजद नेता तेजस्वी यादव का दावा कि अगर उनकी पार्टी सत्ता में आती है तो बिहार के हर परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी दी जाएगी।

तेजस्वी यादव का यह वादा सुनने में जितना लुभावना लगता है, वास्तविकता में यह उतना ही असंभव और आर्थिक दृष्टि से विनाशकारी है। बिहार की कुल जनसंख्या लगभग 13 करोड़ है और राज्य में करीब दो करोड़ परिवार हैं। यदि हर परिवार को एक सरकारी नौकरी देने का वादा पूरा किया जाए, तो सरकार को करीब दो करोड़ नई भर्तियाँ करनी होंगी। वर्तमान में बिहार में कुल सरकारी कर्मचारियों की संख्या महज 5.5 लाख है और इन पर ही राज्य सरकार का सालाना खर्च लगभग 80,000 करोड़ रुपये है। अब अगर तेजस्वी का वादा लागू किया जाए, तो राज्य को अपने वर्तमान बजट का कई गुना अधिक, यानी कम से कम 7 से 8 लाख करोड़ रुपये अतिरिक्त खर्च करने होंगे। बिहार का कुल वार्षिक बजट ही 2.6 लाख करोड़ रुपये के आसपास है, इसलिए यह दावा आर्थिक दृष्टि से पूरी तरह अव्यवहारिक है।

यह पहली बार नहीं है जब तेजस्वी यादव ने ऐसे अवास्तविक वादे किए हैं। 2022 में उपमुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने 10 लाख नौकरियों की घोषणा की थी, लेकिन वह घोषणा कागज़ों और भाषणों से आगे कभी नहीं बढ़ी। न तो पर्याप्त भर्ती प्रक्रियाएँ शुरू की गईं, न ही नई औद्योगिक नीति बनाई गई। बिहार में निवेश बढ़ाने, उद्योगों को प्रोत्साहित करने या युवाओं को कौशल प्रशिक्षण देने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। नतीजतन, बेरोजगारी की समस्या जस की तस रही और राज्य के लाखों युवा अब भी रोज़गार के लिए दूसरे राज्यों का रुख करने को मजबूर हैं। तेजस्वी का यह नया वादा भी उसी तरह का एक झूठा राजनीतिक जाल प्रतीत होता है, जो केवल चुनावी लाभ के लिए बुना गया है।

भाजपा ने इस बार चुनाव में इस “हर घर नौकरी” के वादे का ठोस आर्थिक और तर्कसंगत आधार पर विरोध किया है। पार्टी का कहना है कि रोजगार सृजन का समाधान केवल सरकारी नौकरियों में नहीं, बल्कि निजी निवेश, औद्योगिक विकास और कौशल आधारित अर्थव्यवस्था में छिपा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पिछले दशक में बिहार में बुनियादी ढाँचे का काफी विस्तार हुआ है। बिजली, पानी, सड़क, डिजिटल कनेक्टिविटी और स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में केंद्र सरकार की योजनाओं ने लोगों के जीवन स्तर में सुधार किया है। भाजपा का तर्क है कि वास्तविक रोजगार वही हैं जो उद्योगों, सेवा क्षेत्र और स्टार्टअप्स के ज़रिए पैदा हों, न कि वे जो केवल चुनावी घोषणाओं की फाइलों में रह जाएँ।

बिहार का आर्थिक ढाँचा भी तेजस्वी यादव के वादे की वास्तविकता पर प्रश्नचिह्न लगाता है। राज्य का सकल घरेलू उत्पाद लगभग 8.5 लाख करोड़ रुपये है, जबकि प्रति व्यक्ति आय मात्र 58,000 रुपये के आसपास है। इस आर्थिक स्थिति में यदि सरकार हर परिवार को नौकरी देने लगे तो न केवल प्रशासनिक खर्च कई गुना बढ़ जाएगा, बल्कि विकास योजनाओं के लिए धनराशि खत्म हो जाएगी और राज्य एक गहरे वित्तीय संकट में फँस जाएगा। पंजाब और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों की वर्तमान वित्तीय स्थिति इसका उदाहरण है, जहाँ वेतन और पेंशन का बोझ विकास परियोजनाओं को ठप कर चुका है।

तेजस्वी यादव का यह वादा न केवल आर्थिक रूप से असंभव है बल्कि नैतिक रूप से भी गैरजिम्मेदाराना है, क्योंकि यह बेरोजगार युवाओं की भावनाओं से खेलने का एक प्रयास है। यह राजद की पुरानी राजनीतिक शैली का ही हिस्सा है — बड़े-बड़े वादे करना, चुनाव जीतना और फिर शासन की जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेना। इसी के विपरीत भाजपा ने विकास को अपने अभियान का केंद्र बनाया है। पार्टी का मानना है कि बिहार को स्थायी रोजगार देने के लिए निवेश को आकर्षित करना, स्टार्टअप संस्कृति को बढ़ावा देना, और युवाओं को कौशल प्रशिक्षण से जोड़ना ही सबसे व्यावहारिक रास्ता है।

प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी भी इस चुनाव में चर्चा का विषय है। हालांकि उनका संगठन अभी राज्यस्तर पर बहुत मजबूत नहीं है, परंतु उनकी जनसंवाद यात्राओं और परिवर्तन की भाषा ने बिहार की राजनीति में नई ऊर्जा भर दी है। जन सुराज का असर सीमित भले हो, लेकिन यह राजद के पारंपरिक वोट बैंक — विशेषकर युवाओं और शिक्षित वर्ग — में सेंध लगा सकता है।

तेजस्वी यादव “नई पीढ़ी की राजनीति” की बात करते हैं, पर जनता अब भी उनके परिवार के शासनकाल को याद करती है — वह दौर जब अपहरण उद्योग, जातीय हिंसा और भ्रष्टाचार बिहार की पहचान बन गए थे। जनता के मन में यह डर अब भी कायम है कि यदि राजद सत्ता में लौटता है, तो कहीं “जंगलराज” की वापसी न हो जाए। भाजपा इस मनोविज्ञान को बखूबी समझती है और इसलिए वह अपने प्रचार में कानून-व्यवस्था और सुशासन को प्राथमिकता दे रही है।

बिहार की राजनीति का एक और महत्वपूर्ण पहलू है जाति आधारित समीकरण। राजद आज भी “एमवाई समीकरण” — मुस्लिम-यादव गठजोड़ — पर निर्भर है, जबकि भाजपा ने पिछले एक दशक में गैर-यादव पिछड़ों, दलितों और महादलितों में अपनी पैठ मजबूत की है। केंद्र की कल्याणकारी योजनाओं जैसे उज्ज्वला, आवास, आयुष्मान और जल जीवन मिशन ने जातीय सीमाओं से ऊपर उठकर लाभ पहुँचाया है, जिससे जनता का भरोसा सामाजिक समीकरणों की बजाय विकास आधारित राजनीति पर बढ़ा है।

बिहार का युवा वर्ग अब “नौकरी” नहीं बल्कि “अवसर” चाहता है। उसे सरकारी तंत्र में समाने के बजाय आत्मनिर्भर बनने का मौका चाहिए। केंद्र सरकार की “मेक इन इंडिया”, “डिजिटल इंडिया” और “स्टार्टअप इंडिया” जैसी योजनाएँ इसी सोच को मज़बूती देती हैं। बिहार की वास्तविक तरक्की इन्हीं कार्यक्रमों से होगी, न कि तेजस्वी यादव जैसे नेताओं के खोखले वादों से।

आखिरकार, बिहार चुनाव 2025 एक ऐसा मोड़ है जहाँ जनता को यह तय करना होगा कि वह भ्रम और झूठ की राजनीति को चुनेगी या विकास और स्थिरता की दिशा को। तेजस्वी यादव का “हर घर नौकरी” वाला वादा जनता को लुभाने का प्रयास जरूर है, पर यह बिहार को आर्थिक संकट की ओर धकेलने वाला खतरनाक सपना है। भाजपा का रुख स्पष्ट है — विकास से ही रोजगार आएगा, झूठे वादों से नहीं।

बिहार की जनता ने पहले भी अंधकार से उजाले की यात्रा की है, जब उसने जंगलराज को नकारकर सुशासन को अपनाया था। आज फिर वही स्थिति है — एक ओर भ्रम और जातिवाद की राजनीति, दूसरी ओर विकास और आत्मनिर्भरता की दिशा। तेजस्वी यादव चाहे जितने भी आकर्षक वादे करें, बिहार की जनता अब सच और छल के बीच का फर्क समझ चुकी है। यह चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का नहीं, बल्कि बिहार के भविष्य की दिशा तय करने का अवसर है — और उम्मीद यही है कि बिहार अब विकास की राह से भटककर फिर से पुराने अंधकार में नहीं जाएगा।

बिहार 2025: जनता किसे चाहती है? मीडिया रिपोर्टों से उभरता जनमत
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के करीब आते ही यह सवाल पूरे राज्य में गूंज रहा है — आखिर जनता किसे चाहती है? अख़बारों की रिपोर्टों, टीवी बहसों, यूट्यूब व्लॉग्स और राजनीतिक ब्लॉग्स के विश्लेषण से जो तस्वीर उभरती है, वह काफी दिलचस्प है। बिहार की जनता अब केवल भावनाओं, जातीय समीकरणों या नारेबाज़ी से प्रभावित नहीं होती। आज मतदाता समझदारी से यह तय करना चाहता है कि कौन-सी पार्टी उसके जीवन में वास्तविक बदलाव ला सकती है। तेजस्वी यादव की लोकप्रियता और उनके वादों का असर ज़रूर दिखता है, लेकिन लोगों के भीतर यह संशय भी उतना ही गहरा है कि क्या उनके “हर परिवार को सरकारी नौकरी” जैसे वादे व्यावहारिक रूप से संभव हैं। कुल मिलाकर मीडिया का निष्कर्ष यही है कि जनता अब केवल वादों से नहीं, बल्कि उनकी विश्वसनीयता से प्रभावित होती है।

राष्ट्रीय और क्षेत्रीय मीडिया रिपोर्टों से यह स्पष्ट झलकता है कि स्थिरता और सुशासन के मामले में जनता का झुकाव भाजपा और एनडीए गठबंधन की ओर अधिक है। टाइम्स ऑफ इंडिया, हिन्दुस्तान, प्रभात खबर और कई डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म्स द्वारा प्रकाशित सर्वेक्षण यह दिखाते हैं कि सीटों के अनुमान में भाजपा को मामूली बढ़त मिल रही है। इन रिपोर्टों का तर्क है कि भाजपा के पास मजबूत संगठनात्मक ढाँचा, केंद्र सरकार की योजनाओं के लाभार्थियों का समर्थन और विकास की निरंतरता की कहानी है। वहीं तेजस्वी यादव की व्यक्तिगत लोकप्रियता उच्च स्तर पर बनी हुई है, खासकर बेरोजगार युवाओं और ग्रामीण इलाकों में, लेकिन उनके वादों पर जनता की विश्वसनीयता उतनी मज़बूत नहीं दिखती।

विभिन्न यूट्यूब व्लॉग्स और ज़मीनी रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों की कवरेज में यह विभाजित जनभावना साफ़ दिखती है। कई स्वतंत्र पत्रकारों और ब्लॉगरों ने अपने वीडियो में ग्रामीण इलाकों के युवाओं को यह कहते हुए दिखाया है कि वे तेजस्वी की बातों से प्रभावित तो हैं, परंतु यह भी जानते हैं कि पहले किए गए वादे कभी पूरे नहीं हुए। 2022 में तेजस्वी यादव ने 10 लाख नौकरियों का ऐलान किया था, लेकिन भर्ती प्रक्रिया अधूरी ही रह गई। वहीं बुजुर्ग और मध्यम वर्गीय मतदाता, खासकर छोटे शहरों और कस्बों में, केंद्र की योजनाओं — प्रधानमंत्री आवास योजना, जल जीवन मिशन और उज्ज्वला जैसी — से मिली सुविधाओं को भाजपा के पक्ष में एक बड़ा कारण मानते हैं। यही विरोधाभास बिहार के राजनीतिक मानस की जटिलता को दर्शाता है — भावनाओं का आकर्षण राजद के साथ है, लेकिन प्रशासनिक भरोसा भाजपा के साथ।

ब्लॉग्स और विश्लेषणात्मक लेखों में भी यही दोहराया जा रहा है कि जनता का मन दो दिशाओं में बँटा हुआ है। एक ओर युवा वर्ग तेजस्वी की भाषा और जोश से जुड़ाव महसूस करता है, तो दूसरी ओर बुज़ुर्ग मतदाता “जंगलराज” की वापसी को लेकर चिंतित हैं। अर्थशास्त्रियों और पत्रकारों के लेख बताते हैं कि बिहार का वार्षिक बजट लगभग ₹2.6 लाख करोड़ है, जिसमें से अधिकतर हिस्सा पहले से ही वेतन और पेंशन में खर्च हो जाता है। ऐसे में हर परिवार को सरकारी नौकरी देने का वादा न केवल अव्यवहारिक है बल्कि राज्य की अर्थव्यवस्था को दिवालिया करने वाला हो सकता है। यही तर्क अब आम जनता भी समझ रही है, और यही कारण है कि भावनात्मक समर्थन के बावजूद राजद के प्रति विश्वास कमजोर दिखाई देता है।

इसी बीच प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी ने बिहार के राजनीतिक समीकरणों में एक नया मोड़ जोड़ दिया है। मीडिया रिपोर्टें उन्हें एक “सुधारवादी विकल्प” के रूप में पेश करती हैं, जो व्यवस्था परिवर्तन की बात करते हैं। उनके लगातार गाँव-गाँव के पदयात्रा अभियानों ने शिक्षित और प्रथम-बार वोट करने वाले युवाओं में एक वैकल्पिक सोच जगाई है। हालांकि, राजनीतिक विश्लेषक यह मानते हैं कि जन सुराज संगठनात्मक रूप से अभी कमजोर है और उसका असर सीटों के लिहाज से सीमित रहेगा। अधिकतर रिपोर्टें यह भी संकेत देती हैं कि जन सुराज का असर विपक्षी मतों में विभाजन के रूप में सामने आ सकता है, जिससे अप्रत्यक्ष रूप से भाजपा को लाभ हो सकता है।

टीवी चैनलों की बहसें और ग्राउंड रिपोर्टिंग बताती हैं कि बिहार के मतदाता अब बहुत व्यावहारिक सोच के हो गए हैं। वे भावनाओं में नहीं बहते, बल्कि यह देखना चाहते हैं कि कौन सा वादा लागू किया जा सकता है और कौन-सा सिर्फ भाषणों तक सीमित रहेगा। जब रिपोर्टर जनता से पूछते हैं कि क्या तेजस्वी यादव का “हर परिवार को नौकरी” वाला वादा संभव है, तो अधिकतर जवाब यही मिलता है — “सोच अच्छी है, पर हकीकत में नामुमकिन।” वहीं जब भाजपा के बारे में पूछा जाता है, तो लोग कहते हैं, “कम से कम कुछ काम तो होता है।” यही व्यवहारिक दृष्टिकोण इस बार के चुनाव में निर्णायक साबित हो सकता है।

कुल मिलाकर, मीडिया रिपोर्टों, ब्लॉग्स और व्लॉग्स से जो तस्वीर उभरती है, वह यह है कि बिहार की जनता बदलाव तो चाहती है, लेकिन वह बदलाव ठोस और वास्तविक होना चाहिए, न कि खोखले वादों पर आधारित। तेजस्वी यादव के वादे भावनात्मक रूप से आकर्षक ज़रूर हैं, लेकिन जनता अब वादों की नहीं, विश्वसनीयता की राजनीति चाहती है। फिलहाल अधिकांश विश्लेषणों का निष्कर्ष यही है कि जनता उस सरकार को प्राथमिकता देगी जो विकास और स्थिरता की गारंटी दे सके। 2025 का बिहार नारेबाज़ी की नहीं, बल्कि नीति और परिणाम की राजनीति की ओर बढ़ रहा है — जहाँ जनता अब केवल सुनना नहीं, बल्कि देखना चाहती है कि कौन वादा निभाएगा।

 

 

 


नीलाभ कृष्ण

(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)

Leave Your Comment

 

 

Top