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धार्मिक शोषण और लापरवाही से सावधान

Beware of religious exploitation and negligence

उत्तर प्रदेश के हाथरस में मंगलवार अर्थात् 02 जुलाई को एक धार्मिक समागम के समापन समारोह के दौरान हुई भगदड़ ने पूरे देश को झकझोर दिया। इस दर्दनाक हादसे में 121 लोगों की जान चली गई और सैकड़ों लोग घायल हो गए। ऐसी घटनाएं न केवल प्रशासनिक लापरवाही और गैरजिम्मेदारी को उजागर करती हैं, बल्कि धर्म के नाम पर दिखावटीपन, अंधविश्वास और पाखंड के बढ़ते चलन से भी पर्दा उठाती हैं। इस तरह के हादसे न केवल धोखेबाज़ बाबाओं द्वारा किए जा रहे क्रूर शोषण को उजागर करते हैं, बल्कि ऐसे स्वयंभू धर्मगुरुओं को  बिना किसी जाँच के आस्था से जोड़ने से सनातन धर्म की प्रतिष्ठा भी धूमिल होती हैं। हाथरस की यह घटना कई सवाल खड़े करती है। जैसे कि- इतने बड़े पैमाने के आयोजन में सुरक्षा उपायों की अनदेखी क्यों की गई? किस अधिकारी ने बिना पर्याप्त व्यवस्था के इतने बड़े जमावड़े की अनुमति दी? क्या सुरक्षा मानकों का पालन किया गया? क्या गर्मी से होने वाली घटनाओं को रोकने के लिए पर्याप्त निकास, पानी, हवा, चिकित्सा सुविधाएँ और चिकित्सा कर्मी नहीं होने चाहिए थे? इस भगदड़ में हुई जानमाल की हानि के लिए जवाबदेही तय की जानी चाहिए। लेकिन देखा जा रहा है कि मासूम लोगों की भावनाओं से छेड़छाड़ करने और राजनीतिक रूप से एक-दूसरे पर उंगली उठाने के प्रयास शुरु हो गए हैं। इतना तो निश्चित है कि ऐसे फर्जी बाबाओं का धंधा राजनेताओं की मौन सहमति के बिना नहीं चल सकता। यह घटना हाथरस के सिकंदराराऊ के पास पुलराई गांव के पास साकार नारायण हरि उर्फ भोले बाबा के नेतृत्व में आयोजित एक दिवसीय धार्मिक समागम के दौरान हुई। इस बाबा को गौर से देखें, तो उसके पूरे चरित्र में कई तरह की विसंगतियां मिलती हैं। यह बाबा सफेद सूट, टाई  और चमकदार जूते पहनता  है। भला कौन धर्मगुरु जूते पहनकर प्रवचन करता है? इस बाबा को वेद-पुराणों-शास्त्रों का कितना ज्ञान है? वह किस परंपरा से ताल्लुक रखता है? उसके गुरु कौन हैं? ऐसे कई अनुत्तरित सवाल बाबा पर गहरा संदेह पैदा करते हैं। आखिर साकार नारायण हरि उर्फ भोले बाबा को हिंदू बाबा कैसे कहा जा सकता है? क्या हिंदू धर्म इसकी इजाजत देता है?

यहाँ यह बताना ज़रूरी है कि यह बाबा पहले पुलिस में था और मैनपुरी में इसका एक आलीशान आश्रम है। घटना के बाद से यह एडिट लिखे जाने तक यह बाबा फरार है और पुलिस इसकी तलाश कर रही है। इन दिनों भारत में ऐसे धोखेबाज़ बाबाओं की बाढ़ सी आ गई है जो भोले-भाले लोगों को धोखा देकर गुमराह करते हैं। ऐसी घटनाओं से न सिर्फ़ आम लोगों को नुकसान होता है बल्कि देश और धर्म की बदनामी भी होती है। यह एक भयावह और असंवेदनशील सच्चाई है कि हम धर्म और अध्यात्म से जुड़ी ऐसी पिछली घटनाओं से कोई सबक नहीं लेते। यहाँ तक कि हाल के दिनों में भीड़-भाड़ वाले कई धार्मिक आयोजनों में भगदड़ की घटनाएँ भी बढ़ी हैं। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि भीड़ के बीच ऐसी घटनाओं को कैसे रोका जा सकता है। दो साल पहले माता वैष्णो देवी मंदिर में भगदड़ में बारह तीर्थयात्रियों की मौत हो गई थी। 2016 में वाराणसी में भगदड़ में चौबीस लोगों की मौत हो गई थी। 2022 में खाटू श्याम में भीड़ में भगदड़ में तीन लोगों की मौत हो गई थी। पिछले साल इंदौर में रामनवमी पर छत गिरने से 35 लोगों की मौत हो गई थी। 2016 में केरल के कोल्लम में एक मंदिर में आग लगने से 108 लोगों की मौत हो गई थी और कई लोग घायल हो गए थे। अमृतसर में दशहरे के दौरान रावण दहन देखते समय ट्रेन की चपेट में आकर साठ लोगों की मौत हो गई थी। भारत में सत्तर प्रतिशत भगदड़ धार्मिक आयोजनों के दौरान होती है। यह चिंता की बात है कि इन भयावह घटनाओं से न तो आम जनता कुछ सीखती है और न ही प्रशासन। यह आश्चर्य की बात है कि किसी ने यह देखने की कोशिश नहीं की कि भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पर्याप्त इंतजाम हैं या नहीं। आमतौर पर ऐसा लगता है कि ऐसे मामलों में जवाबदेही के नाम पर कोई कार्रवाई नहीं होती। नतीजतन, ऐसी घटनाएं होती रहती हैं, जिनमें अक्सर बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की जान चली जाती है। उम्मीद है कि प्रशासन हाथरस की इस घटना के बाद अब सबक सीखेगा।

 




दीपक कुमार रथ

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