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जलता हुआ बंगाल ममता बनर्जी के शासन में धधकती राज्य व्यवस्था

Bengal on fire: State system blazing under Mamata Banerjee's rule

कभी रवींद्रनाथ ठाकुर और नेताजी सुभाष चंद्र बोस की धरती कहलाने वाला पश्चिम बंगाल आज अपने ही अस्तित्व से जूझ रहा है—संस्कृति से, चेतना से, और अब संविधान से भी। ममता बनर्जी और उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के शासन में वह राज्य जो कभी देश की बौद्धिक राजधानी माना जाता था, आज हिंसा, डर और अराजकता की गिरफ्त में है। चाहे वह मुर्शिदाबाद में हालिया सांप्रदायिक दंगे हों, संदेशखाली की शर्मनाक घटना हो, या फिर चुनावी हिंसा का अंतहीन सिलसिला—बंगाल आज खुद के खिलाफ एक जंग लड़ रहा है।


मुर्शिदाबाद दंगे: चिंगारी से उठी communal आग

मुर्शिदाबाद, जो हमेशा साम्प्रदायिक सौहार्द और तनाव के बीच झूलता रहा है, हाल ही में ऐसी हिंसा का गवाह बना जिसने राज्य को झकझोर कर रख दिया। एक संवैधानिक संशोधन के विरोध का जुलूस और उससे जुड़ा मामूली विवाद इतना बढ़ गया कि भीड़ ने घरों पर हमला कर दिया, दुकानों में आग लगा दी, और पुलिस के साथ हिंसक झड़पें हुईं। कई लोगों की जान चली गई, दर्जनों घायल हुए और सैकड़ों को पलायन करना पड़ा। सबसे चिंताजनक बात यह रही कि स्थानीय टीएमसी नेताओं की भूमिका पर सवाल उठे। प्रत्यक्षदर्शियों ने आरोप लगाया कि पुलिस समय पर नहीं पहुंची या मूकदर्शक बनी रही। राज्य सरकार की चुप्पी ने इस बात को और बल दिया कि राजनीतिक लाभ के लिए ममता सरकार कानून व्यवस्था को नजरअंदाज कर रही है। अगर हिंसा के समय सरकार निष्क्रिय रहती है, तो यह तटस्थता नहीं, बल्कि प्रशासनिक विफलता है।


संदेहखाली कांड: सत्ता संरक्षित उत्पीड़न?

सांप्रदायिक तनाव से इतर संदेशखाली की घटना एक और भयावह परत खोलती है। उत्तर 24 परगना के इस दूरदराज इलाके में टीएमसी नेता शाहजहां शेख और उनके सहयोगियों पर महिलाओं के यौन शोषण और जमीन कब्जाने के आरोप लगे। दर्जनों महिलाओं ने सामने आकर आरोप लगाए कि वर्षों से उन्हें उत्पीड़न और धमकियों का सामना करना पड़ रहा है।

प्रारंभ में राज्य सरकार का रवैया उदासीन रहा। ममता बनर्जी ने इस मुद्दे को भाजपा की साजिश बताकर खारिज करने की कोशिश की। लेकिन जब पूरे देश में इस घटना को लेकर आक्रोश फैल गया और मीडिया ने इसे उठाया, तब जाकर सरकार हरकत में आई और शाजाहान की गिरफ्तारी हुई—वो भी हफ्तों बाद।

यह घटना दर्शाती है कि जब सत्ता का संरक्षण अपराधियों को मिलता है, तो न्याय और नैतिकता का गला घोंट दिया जाता है। संदेहखाली बंगाल में राजनीतिक ताकत और अपराध के खतरनाक गठजोड़ का जीवंत उदाहरण बन गया है।


चुनावी हिंसा: लोकतंत्र पर लटकी तलवार
बंगाल में चुनाव अब लोकतंत्र का उत्सव नहीं, बल्कि खून-खराबे का त्योहार बन चुके हैं। हर बार जब चुनाव नजदीक आते हैं—चाहे वो पंचायत हो, विधानसभा या छात्र संघ—राज्य हिंसा की चपेट में आ जाता है। 2023 के पंचायत चुनावों में 50 से ज्यादा लोगों की जान गई। गांवों में गोलियां चलीं, बम फटे और लोग डर के साये में वोट डालने पहुंचे।

टीएमसी, जिसने कभी "माँ, माटी, मानुष" के नारे पर सत्ता हासिल की थी, अब "मसल, मर्डर और मैनेजमेंट" के सहारे सत्ता में बने रहने की कोशिश कर रही है। विपक्षी उम्मीदवारों को नामांकन से रोका जाता है, बूथ लूटे जाते हैं, मतदाताओं को धमकाया जाता है और पुलिस मूकदर्शक बनी रहती है।


मुर्शिदाबाद दंगे: कट्टरपंथ, राजनीतिक मिलीभगत और अवैध घुसपैठ के गठजोड़ की गहरी पड़ताल
हालिया मुर्शिदाबाद दंगों ने पश्चिम बंगाल की राजनीति और कानून व्यवस्था पर गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं। जो घटना शुरुआत में केंद्र सरकार के वक्फ संशोधन विधेयक के विरोध में एक प्रदर्शन के रूप में सामने आई थी, वह एक सुनियोजित और समन्वित हिंसा में तब्दील हो चुकी है। इस हिंसा के पीछे जमीअत उलेमा-ए-हिंद, बांग्लादेशी चरमपंथी संगठन हिज्ब उत-तहरीर, और पश्चिम बंगाल की सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की कथित मौन सहमति की भूमिका सामने आ रही है।

केंद्रीय खुफिया एजेंसियों से जुड़े सूत्रों के अनुसार, हिंसा से कुछ दिन पहले ही मुर्शिदाबाद में हिज्ब-उल-तहरीर की 40 से अधिक स्लीपर सेल सक्रिय थीं। बांग्लादेश से सटी यह सीमावर्ती ज़िला लंबे समय से अवैध घुसपैठ और सीमा पार आतंकवाद की चपेट में रहा है। इन स्लीपर सेल्स का आना अचानक नहीं था, ये धीरे-धीरे प्रवासी मजदूरों के रूप में राज्य प्रशासन की आंखों के सामने घुस आईं—एक ऐसा तथ्य जो या तो प्रशासनिक निष्क्रियता दर्शाता है या फिर मिलीभगत को उजागर करता है।

राजनीतिक परिप्रेक्ष्य और भी ज्यादा चिंताजनक है। केंद्र द्वारा वक्फ संशोधन विधेयक पारित करने के तुरंत बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सार्वजनिक रूप से इसका विरोध किया और ऐलान किया कि राज्य में इसे लागू नहीं होने देंगी। जमीअत उलेमा-ए-हिंद के राज्य अध्यक्ष और टीएमसी मंत्री सिद्दीकुल्लाह चौधरी ने दावा किया कि ममता बनर्जी ने प्रदर्शनकारियों की भीड़ देखकर “खुशी” जाहिर की। उनका कहना था कि मुख्यमंत्री कार्यालय से आया संदेश यह था कि वह “इतनी बड़ी भीड़ देखकर बहुत खुश हैं।”

दंगा सुनियोजित ढंग से अंजाम दिया गया। शुक्रवार की नमाज़ के बाद जमीअत उलेमा-ए-हिंद और अन्य संगठनों के नेतृत्व में एक अनधिकृत जुलूस मुर्शिदाबाद की सड़कों पर निकला। जब यह जुलूस एक हिंदू मंदिर के पास पहुंचा, तो कथित तौर पर इसमें शामिल भीड़ ने मंदिर में तोड़फोड़ की, मूर्तियों को नुकसान पहुंचाया और मंदिर परिसर को क्षतिग्रस्त कर दिया। यह घटना विरोध से दंगे की ओर बढ़ने का स्पष्ट संकेत थी, जिसमें हिज्ब-उल-तहरीर की स्लीपर सेल्स के कथित सदस्यों की संलिप्तता की बात सामने आई, जो आम प्रदर्शनकारियों के वेश में भीड़ में शामिल थे।

हिंसा का यह तरीका वही है जो हिज्ब-उल-तहरीर ने बांग्लादेश में अपनाया था—हिंदू दुकानों और धार्मिक स्थलों पर लक्षित हमले। स्थिति तेजी से बिगड़ गई—कई वाहन जलाए गए, पुलिस वैन पर हमला हुआ और कम से कम दस पुलिसकर्मी घायल हुए। यहां तक कि भीड़ ने सीमा सुरक्षा बल (BSF) तक पर हमला कर दिया, जो कि एक हथियारबंद अर्धसैनिक बल है। इससे यह संदेह पुख्ता होता है कि इस हिंसा को अंजाम देने वाले केवल आम नागरिक नहीं थे, बल्कि प्रशिक्षित तत्व भी शामिल थे।

दंगे के दौरान राज्य पुलिस मूक दर्शक बनी रही- या तो वह असहाय थी या जानबूझकर निष्क्रिय रही। इससे राज्य सरकार की भूमिका पर गंभीर सवाल उठते हैं। सिद्दीकुल्लाह चौधरी ने हाल ही में दक्षिण कोलकाता के कुछ हिस्सों को वक्फ संपत्ति घोषित करने का दावा भी किया, जिससे साम्प्रदायिक तनाव और भड़क गया।

एक और चौंकाने वाले बयान में, एक स्थानीय धार्मिक नेता को यह कहते हुए वीडियो में देखा गया—“हमारी लड़ाई क़यामत तक चलेगी,”—इस बयान को कुछ विश्लेषकों ने ट्रिपल तलाक बिल और कथित मुस्लिम-सिख उत्पीड़न जैसे मुद्दों से जोड़ते हुए एक बड़े वैचारिक गठजोड़ का संकेत माना है, जिसमें इस्लामी चरमपंथी और खालिस्तानी समर्थक एकजुट हो रहे हैं।

इस घटना ने एक बार फिर इस बात पर बहस को हवा दे दी है कि केंद्र सरकार अभी तक पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति शासन लागू क्यों नहीं की? भाजपा के कई नेता और हिंदू संगठनों का कहना है कि 2021 के चुनाव बाद हुई हिंसा, सन्देशखाली यौन उत्पीड़न प्रकरण और अब मुर्शिदाबाद दंगों के बावजूद केंद्र सरकार ने अनुच्छेद 356 के अंतर्गत कोई हस्तक्षेप क्यों नहीं किया।

अवैध घुसपैठ और वोट बैंक की राजनीति से प्रभावित जिलों—मालदा, मुर्शिदाबाद, नदिया, दिनाजपुर, बीरभूम और हावड़ा—में जनसांख्यिकीय परिवर्तन हो रहा है, जिससे सामाजिक असंतुलन और वैचारिक कट्टरता बढ़ रही है। मुर्शिदाबाद से आ रही रिपोर्टों के मुताबिक धूलियन इलाके से 400 से अधिक हिंदुओं को अपने घरों से विस्थापित होना पड़ा है—कुछ तो सड़कों पर शरण लेने को मजबूर हैं।

केंद्र सरकार के समक्ष अब एक निर्णायक मोड़ आ चुका है। यदि हिज्ब उत-तहरीर जैसे आतंकी संगठनों की संलिप्तता, टीएमसी की राजनीतिक शह और जमीअत उलेमा-ए-हिंद जैसी संस्थाओं की उग्र भूमिका की पुष्टि होती है, तो न सिर्फ कानून-व्यवस्था की बहाली, बल्कि देश की सुरक्षा और एकता को बनाए रखने के लिए भी कड़ी कार्रवाई करना आवश्यक है।


यह लोकतंत्र नहीं, बल्कि चुनाव के नाम पर आतंक का तंत्र है
संस्थानों का पतन

ममता सरकार के कार्यकाल में एक और गंभीर समस्या रही है—संवैधानिक संस्थाओं का ह्रास। पुलिस को अक्सर टीएमसी का एजेंट कहा जाता है। राज्य चुनाव आयोग कई बार निष्पक्षता के बजाय शासन के प्रति नरमी दिखाता रहा है। न्यायपालिका भी कई बार सुस्त प्रतिक्रिया और विलंबित फैसलों के लिए आलोचना का शिकार हुई है।

साथ ही, असहमति को दबाने का चलन भी तेजी से बढ़ा है। विपक्षी नेताओं पर झूठे मुकदमे, छात्रों को धमकाना, और सरकार विरोधी पत्रकारों पर दबाव—ये सब पश्चिम बंगाल की नई पहचान बनते जा रहे हैं। जनता के असली मुद्दे जैसे बेरोजगारी, ग्रामीण संकट, और भ्रष्टाचार, इन सब के नीचे दबकर रह गए हैं।


सत्ता की गणित और रणनीति
ममता बनर्जी की सत्ता नीति तीन स्तंभों पर टिकी है—पहचान की राजनीति, मुफ्त योजनाएं, और स्थानीय स्तर पर सत्ता का विकेंद्रीकरण। टीएमसी ने ज़िला स्तर पर "स्थानीय दादा" तैयार किए हैं, जो सरकारी योजनाओं और संसाधनों पर नियंत्रण रखते हैं, लेकिन उन्हें कोई कानूनी डर नहीं होता। यही वजह है कि संदेहखाली जैसी घटनाएं बार-बार होती हैं।

इसके अलावा, मुस्लिम वोट बैंक को साधने की राजनीति ने भी बंगाल को सांप्रदायिक खाई में धकेल दिया है। अल्पसंख्यकों का समर्थन पाने की कोशिश में सरकार ने कई बार कट्टरपंथी ताकतों के खिलाफ कार्रवाई करने से परहेज किया है। इसका नतीजा है—मुर्शिदाबाद जैसे सांप्रदायिक दंगे, जिनकी आग केवल राजनीति तक सीमित नहीं रहती, बल्कि समाज के ताने-बाने को भी जला डालती है।


जनमत और संभावित बदलाव
बंगाल की जनता, जो कभी ममता को "दीदी" कहकर सम्मान देती थी, अब खुद को ठगा हुआ महसूस कर रही है। शहरी मध्यवर्ग से लेकर ग्रामीण महिलाएं तक, हर वर्ग में असंतोष बढ़ रहा है। "परिवर्तन" का जो सपना 2011 में टीएमसी के साथ जुड़ा था, वह आज खंडहर में तब्दील हो गया है।

इस असंतोष का लाभ भाजपा उठा रही है, जिसने राज्य में अपनी उपस्थिति मज़बूत की है। हालांकि भाजपा की राह भी आसान नहीं है, लेकिन जनता उसे एक विकल्प के रूप में देखने लगी है। बंगाल की राजनीति अब एक निर्णायक मोड़ पर है।


निष्कर्ष: बंगाल की पहचान का संकट
पश्चिम बंगाल आज एक गहरे संकट में है, वह अपनी पहचान, लोकतंत्र और संविधान को बचाने की लड़ाई लड़ रहा है। ममता बनर्जी, जो कभी बदलाव की प्रतीक मानी जाती थीं, अब खुद सत्ता के उसी दमनचक्र का हिस्सा बन चुकी हैं जिसके खिलाफ उन्होंने संघर्ष किया था।

अगर बंगाल को फिर से प्रगति, संस्कृति और लोकतंत्र की ओर लौटाना है, तो उसे इस अराजकता से बाहर निकलने के लिए साहसिक कदम उठाने होंगे। संदेहखाली को न्याय चाहिए, मुर्शिदाबाद को शांति, चुनावों को निष्पक्षता और संस्थाओं को स्वतंत्रता।

बंगाल जल रहा है। अगर इसे न्याय और सुधार की नदियों से नहीं बुझाया गया, तो यह आग उस धरती को राख कर देगी, जिसने कभी पूरे भारत को चेतना और विचारों की रोशनी दी थी।




नीलाभ कृष्ण
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)

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