
आर.एस.एन. सिंह
प्रदर्शन और आंदोलन लोकतंत्र के अंतर्निहित अंग हैं, लेकिन इन लोकतांत्रिक विकल्पों का प्रयोग संवैधानिक सीमाओं और सार्वजनिक मानदंडों के भीतर ही किया जाना चाहिए। निर्धारित अधिकारियों से अनुमति लेनी होती है, क्योंकि अंततः सरकार प्रदर्शनकारियों और जनता—दोनों के प्रति उत्तरदायी होती है; अर्थात् प्रदर्शनकारियों को सुरक्षा और जनता के लिए प्रशासनिक सुविधा। यह भी सरकार की जिम्मेदारी है कि प्रदर्शन अनियंत्रित भीड़ में न बदलें या हिंसा और अराजकता के औजार न बन जाएं। प्रदर्शन और प्रदर्शन करने के संवैधानिक अधिकार का अंतिम निर्णायक न्यायपालिका है।
बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका और यूक्रेन जैसे सभी मामलों में, जहां प्रदर्शन अनियंत्रित भीड़ में बदल गए और तख्तापलट तक पहुंचे, वह मुख्यतः न्यायपालिका की चूक और अतिक्रमण के कारण हुआ। एक बार न्यायपालिका समझौता-ग्रस्त हो जाए, तो देश बिखर जाता है। हमारे देश में राहुल गांधी और अन्य राष्ट्र-विरोधी तत्वों ने उच्चतम न्यायालय (SC) के पवित्र द्वारों का भौतिक रूप से उल्लंघन किया है। अभी सबसे बुरा बाकी है।
उच्चतम न्यायालय के द्वार किसके लिए खुले हैं?
भारत के माननीय मुख्य न्यायाधीश (CJI) ने कहा कि उच्चतम न्यायालय के द्वार सबके लिए खुले हैं। वास्तव में, वे खुले होने चाहिए, लेकिन वास्तविक वादकारियों के लिए। कानून के समक्ष समता का संवैधानिक प्रावधान यही कहता है। इसे राष्ट्र-विरोधी एजेंडा रखने वाली राजनीतिक भीड़ों तक नहीं बढ़ाया जा सकता। यदि यह केवल राजनीतिक एजेंडा होता, तो निर्धारित तरीके से याचिका दाखिल करके उद्देश्य बेहतर ढंग से पूरा किया जा सकता था। लेकिन निश्चित रूप से इस मामले में उद्देश्य डराना और उल्लंघन करना था। यदि इस उल्लंघन को अब नहीं रोका गया, तो यह केवल और बढ़ेगा।
स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद भारत की राजनीतिक और भू-राजनीतिक यात्रा में कई कठिन और चुनौतीपूर्ण क्षण आए हैं, जैसे आपातकाल, गोहत्या के विरुद्ध साधुओं का आंदोलन, पंजाब में उग्रवाद, अन्ना आंदोलन, शाहीन बाग, दिल्ली दंगे और तथाकथित किसान आंदोलन। संसद और लाल किले पर हमले करने के प्रयास हुए हैं, लेकिन उच्चतम न्यायालय की पवित्रता का कभी उल्लंघन नहीं हुआ।
एक नया प्रतिमान
‘माय लॉर्ड्स’ ने प्रदर्शनों और आंदोलनों के संबंध में एक नए मिसाल को अनुमति दी है, बल्कि न्योता दिया है। भारत में प्रदर्शनों के अभ्यास और संस्कृति में एक नया प्रतिमान पेश किया गया है। यह यहीं नहीं रुकेगा। इसका श्रृंखलाबद्ध प्रभाव पड़ेगा। उच्च न्यायालयों को इससे बदतर स्थिति का सामना करना पड़ सकता है, और देश के हर कोने में स्थित अधीनस्थ न्यायालयों को और भी बदतर परिणामों का सामना करना पड़ सकता है।
उच्चतम न्यायालय के साथ एक गरिमा जुड़ी हुई थी। उसका परिसर अभेद्य था और सबसे बड़ा निरोधक था। वह एक पवित्र द्वार था। उसके साथ एक आभा थी, जिसे बड़ी चोट पहुंची है।
न्यायपालिका के स्तंभों में वकील भी शामिल हैं। दुर्भाग्य से, वे भी राहुल गांधी के उच्चतम न्यायालय पर हमले का हिस्सा थे—वही संस्थान जो उन्हें उनकी आजीविका देता है। क्या वकीलों का यह नया प्रतिमान—यानी अदालत के अंदर बहस और बाहर हमला—स्वीकार्य है?
भारत इस मोड़ तक कैसे पहुंचा?
भारत में प्रदर्शनों की वह प्रकृति, जो अराजकता और तख्तापलट के करीब है, उसका जनक सोनिया गांधी हैं। एक भारतीय के सहज लोकतांत्रिक चरित्र से वंचित, जो दार्शनिक रूप से राजनीतिक सत्ता और विपक्ष की भूमिका को एक ही सिक्के के दो पहलू मानता है, उन्होंने सत्ता में निर्ममता और विपक्ष में लोकतंत्र के प्रति घृणा दिखाई है।
वास्तव में राजनीतिक सत्ता का मोह ही उन्हें भारत लेकर आया। जब उन्होंने राजीव गांधी से विवाह किया, तब श्रीमती इंदिरा गांधी सत्ता में थीं। यह निश्चित था कि उनके छोटे बेटे संजय गांधी उनके उत्तराधिकारी होंगे। लेकिन संजय गांधी जनवरी 1980 में एक विमान दुर्घटना में मारे गए, और उनकी पत्नी मेनका गांधी ने एक कड़वी घटना के बाद मार्च 1982 में श्रीमती गांधी का निवास छोड़ दिया। अब यह स्पष्ट था कि राजीव गांधी श्रीमती गांधी के राजनीतिक उत्तराधिकारी होंगे।
तब सोनिया गांधी ने भारत में 15 वर्ष रहने के बाद अप्रैल 1983 में भारतीय नागरिकता लेने का निर्णय लिया। राजीव गांधी की दुखद हत्या के बाद नरसिम्हा राव उनके उत्तराधिकारी बने। वह समानांतर सत्ता चलाने के इच्छुक थीं, जिसे विद्वान और बुद्धिजीवी नरसिम्हा राव ने बर्दाश्त नहीं किया। उन्हें इसके लिए मनमोहन सिंह का इंतजार करना पड़ा। जिसने भी उनके अधिकार को चुनौती दी, उसे अपमानजनक ढंग से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया।
कांग्रेस के पुराने नेता सीताराम केसरी को एआईसीसी कार्यालय में शारीरिक रूप से उठाकर बाहर फेंक दिया गया। नरसिम्हा राव से बदला लेने के लिए उन्होंने उनकी मृत्यु तक प्रतीक्षा की और अंततः सुनिश्चित किया कि उनकी मृत्यु के बाद उनके शरीर का दिल्ली में अंतिम संस्कार न होने दिया जाए।
इसलिए यह एक अपरिहार्य निष्कर्ष है कि श्रीमती सोनिया गांधी सत्ता के चुनावी रास्ते को नहीं मानतीं और विपक्ष में बैठना उन्हें घुटन भरा लगता है। उनके लिए सत्ता के बिना भारत नहीं है, भले ही इसके लिए बलपूर्वक शासन परिवर्तन का सड़क मार्ग अपनाना पड़े।
चुनावी रास्ते पर विश्वास नहीं
2004 की संयोगवश जीत के बाद से चुनावी रास्ते को लेकर आशंका श्रीमती सोनिया गांधी को परेशान करने लगी थी। 149 सीटों के साथ कांग्रेस ने जोड़-तोड़ से सरकार बनाई, लेकिन वह पूरे समय कमजोर रही। आत्म-संदेह, मनोबल भंग और अपराधबोध के जरिए हिंदू सामूहिक मनोविज्ञान का आमूल पुनर्गठन आवश्यक हो गया। इसलिए देश भर में कथित तौर पर पाकिस्तान की मदद से विस्फोटों की एक श्रृंखला चलाई गई, जो अंततः 26/11 में परिणत हुई—एक ‘हिंदू आतंक’ की चाल।
इस बीच चुनावी रास्ते से सत्ता तक पहुंचने की अस्थायी कोशिशें भी हुईं। उस प्रयास में राहुल गांधी ने पवित्र हिंदू यज्ञोपवीत धारण करना शुरू किया और स्वयं को ब्राह्मण भी घोषित किया। उनके मंदिर दर्शन प्रचार पाने के लिए संचालित किए गए। लेकिन इन हाव-भावों को कोई विश्वास नहीं मिला, क्योंकि वे विश्वसनीयता से रहित थे।
चुनावी रास्ते में असफल होने के बाद वे सत्ता कब्जाने के लिए बदले की भावना से सड़क मार्ग पर लौट आए। उच्चतम न्यायालय तक अपने मार्च के दौरान वे मोदी सरकार को सत्ता से बाहर करने के अपने इरादे पर स्पष्ट थे। उनके एक सहयोगी, [मूल में शब्द अस्पष्ट], ने खूनी हिंसा के जरिए शासन परिवर्तन की सलाह देने तक का काम किया। यह राजद्रोह है, खुला विद्रोह है, राष्ट्र के विरुद्ध हथियार उठाने का आह्वान है, और फिर भी न्यायपालिका अविचलित है। उसकी दुविधा ने भारत-विरोधी ताकतों को और हिम्मत दी है।
यदि इस घटना को नहीं रोका गया, तो भारत को केला गणराज्य बना दिया जाएगा। न्यायपालिका राष्ट्र-विरोधी तत्वों और भारत-विरोध करने वालों से निपटने में इतनी लाचार क्यों है? क्योंकि वह अभी तक गांधी परिवार की पकड़ से खुद को मुक्त नहीं कर पाई है।
न्यायपालिका को कौन विकृत करता है?
आपातकाल के दौरान और उसके बाद न्यायपालिका गांधी परिवार के संबंध में संदेह-ग्रस्त रहने लगी। श्रीमती गांधी ने सुनिश्चित किया था कि भविष्य में कोई जगमोहन लाल सिन्हा न हो। वे इलाहाबाद उच्च न्यायालय के वह न्यायाधीश थे जिन्होंने जून 1975 में चुनावी कदाचार पर श्रीमती इंदिरा गांधी के विरुद्ध फैसला दिया था।
उसके बाद, न्यायपीठ में आने की महत्वाकांक्षा रखने वाले हर इच्छुक वकील को गांधी परिवार के प्रति तीव्र वफादारी की परीक्षा की कठिन कसौटी पर खरा उतरना पड़ता था। सोनिया गांधी को श्रीमती गांधी द्वारा सावधानी से खड़ी की गई न्यायिक व्यवस्था विरासत में मिली।
सोवियत संघ की ओर तीव्र झुकाव के कारण श्रीमती इंदिरा गांधी ने साम्यवादी विचारधारा में रंगे कई न्यायाधीश नियुक्त किए। सोनिया गांधी और भी आगे गईं और माओवादी, जिहादी और चर्च-समर्थक झुकाव वाले न्यायाधीश नियुक्त किए। माओवादी झुकाव वाले एक न्यायाधीश बी. सुदर्शन रेड्डी थे, जो सेवानिवृत्ति के बाद आई.एन.डी.आई.ए. गठबंधन के उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवार बने।
करीब पांच दशकों में न्यायपालिका एक वंशवादी और अंदरूनी गुटीय निकाय बन गई, जिसमें न्यायाधीश अपने बेटों और भतीजों के लिए न्यायपीठ में आने का रास्ता बनाते रहे। जो चुनाव से बाहर रह गए, वे बार के सदस्य बने और न्यायपीठ तक उनकी गुप्त पहुंच रही। सोनिया के एक वकील कैमरे में पकड़े गए, जो बार से न्यायपीठ में पदोन्नति के वादे के बदले यौन-संबंधी एहसान मांग रहे थे।
समय के साथ एक पूरा पारिस्थितिकी तंत्र, या यूं कहें कि एक माफिया, विकसित हो गया, जो गांधी परिवार का आभारी था।
2014 में नई राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के अंतर्गत संसद ने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) विधेयक पारित किया, जिससे न्यायाधीशों की नियुक्ति में सरकार को अधिक शक्तियां मिलीं। संविधान के प्रति पूर्ण उपेक्षा दिखाते हुए उच्चतम न्यायालय ने कॉलेजियम प्रणाली जारी रखने के पक्ष में NJAC को अत्यंत आपत्तिजनक ढंग से अस्वीकार कर दिया।
यह ऐसी व्यवस्था है जिसमें कुछ न्यायाधीशों के पास लाखों मतदाताओं, उनके निर्वाचित प्रतिनिधियों और संसद की जरूरतों, आकांक्षाओं और अपेक्षाओं को रद्द करने की शक्ति है।
हालांकि, सोनिया की पकड़ के कारण न्यायपालिका NJAC को बिना किसी विरोध के पूर्वनिर्धारित तथ्य मान लेती।
निष्कर्ष
न्यायपालिका के पास इसके अलावा कोई विकल्प नहीं है कि वह उनके कथित संवैधानिक कदाचार, चुनावी रास्ते के प्रति उनकी उपेक्षा और सत्ता कब्जाने के लिए जिहादियों और माओवादियों के कथित हथियारीकरण पर चुप बैठे। न्यायपालिका के पास गांधी परिवार से जुड़े लंबित एकदम स्पष्ट मामलों पर चुप रहने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।
बेटे राहुल गांधी को अपनी मां से याचक/आज्ञाकारी न्यायपालिका विरासत में मिली है। जिहादियों, माओवादियों और दिमागी नक्सलों के साथ उच्चतम न्यायालय तक उनके मार्च में न्यायपालिका सहभागी लगती है। यह ‘टुकड़े-टुकड़े’ गिरोह को एक तरह का न्योता था।
भारत को न्यायपालिका से कौन बचाएगा?
(इस लेख की सामग्री लेखक और योगदानकर्ता के विचारों को दर्शाती है, न कि अनिवार्य रूप से प्रकाशक और संपादक के। सभी विवाद केवल दिल्ली/नई दिल्ली के सक्षम न्यायालयों और मंचों के अनन्य अधिकार क्षेत्र के अधीन हैं।)
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